गुलज़ार साब की अपनी बनायी फिल्मों में “लेकिन” और “अचानक” दो ही थ्रिलर हैं। अचानक में गुलज़ार समाज में साधारणतया बसने वाली बेवफाई, कत्ल, नैतिकता और मौत की सजा आदि की परिभाषाओं को खंगालते हैं।

सैंकड़ों को वहाँ जंग में मारने पर उसे वीरता का मैडल दिया जाता है और यहाँ दो को मारने पर उसे फाँसी की सजा दी जाती है“। बुरी तरह से घायल एक फौजी अफसर का इलाज कर रहा डाक्टर फौजी के अफसर से कहता है।

सीधा सीधा कुछ तो मुश्किल से ही गुलज़ार की रचनात्मक बगिया में उग सकता है। सोते हुये दिमाग के लिये गुलज़ार की रचनात्मकता नहीं है। वे तो बच्चों को भी ऐसी चीज देते हैं जो उन्हे सोचने पर मजबूर करे।

बच्चों के लिये खास तौर पर उपजाये गये उपवन में भी माली गुलज़ार के प्रयास से फूल ऐसे ही नहीं खिल उठते वरन वे चड्डी पहन कर खिलते हैं और दुनिया के सामने आते हैं।

अचानक भी एक सीधा सपाट क्राइम थ्रिलर नहीं है बल्कि इस फिल्म में एक साथ कई फिल्में बसती हैं। एक थ्रिलर के तौर पर फिल्म के कथानक में कुछ कमियाँ हैं पर दृष्यों के निर्माण और उनके प्रस्तुतीकरण में अच्छी कसावट है और उनके प्रस्तुतीकरण में कमी नहीं दिखती।

फिल्म का एक हिस्सा है जहाँ फौजी ट्रेनिंग पाते नायक के क्रियाकलापों द्वारा कामेडी और रोमांस फिल्म में नजर आता है।

फिल्म का एक अन्य हिस्सा पचास के दशक के अंत में हुये बहुचर्चित या कुख्यात हत्याकांड, जिसमें एक नेवी ऑफीसर कवस एम नानावटी, उनकी विदेशी पत्नी सिल्विया और उसके भारतीय प्रेमी प्रेम आहुजा का त्रिकोण शामिल था, से प्रेरित है। अचानक का नायक भी उस केस की तरह अपनी पत्नी को अपने ही जिगरी दोस्त के साथ प्रेम लीला रचाते हुये देखकर प्रेमी को मार डालता है। पर उस केस से अलग अपनी पत्नी से बेहद प्रेम करने वाला फौजी अफसर अपनी पत्नी को भी मार डालता है।

फौजी ट्रेनिंग ने जो तरीके उसे दुश्मन से निबटने के लिये सिखाये थे उन्हे ही अपनाकर वह अपनी पत्नी और अपने दोस्त की हत्या कर डालता है।

इसे फिल्म की कमी कह सकते हैं या गुलजार साब द्वारा फिल्म के इस हिस्से को एक खुले रुप में छोड़ देना क्योंकि वे अपनी तरफ से कोई व्याख्या अपनी फिल्म में नहीं प्रस्तुत करते कि नायक की पत्नी और उसके दोस्त क्यों उसे धोखा देते हैं जबकि पत्नी नायक से भी प्रेम करती है या कम से कम ऐसा दिखाती है। और वह ऐसे माहौल में नहीं रहती और न ही पली बढ़ी है जहाँ उसे न चाहते हुये भी नायक के साथ शादी करने या शादी के बाद भी उसी के साथ रहने की मजबूरी सहन करनी पड़ी हो या करनी पड़ रही हो।

फिल्म के इस हिस्से का खुलापन बहस की इतनी गुंजाइश छोड़ती हुयी चलता है कि क्या नायक अपनी पत्नी और अपने दोस्त की इस बेवफाई को स्वीकार करके उन दोनों से दूर जाकर उन्हे उनकी जिन्दगी जीने के लिये छोड़ सकता था? क्या उसे उन्हे मारना जरुरी था?

पर ऐसा करके यह गुलज़ार साब की अन्य फिल्मों की तरह एक सामाजिक और मानव की मनोस्थितियों का विश्लेषण और अन्वेषण करने वाली फिल्म बन जाती और उस समय 1973 में युवा निर्देशक गुलज़ार एक अपराध और रोमांच पर आधारित फिल्म बनाने के मूड में थे।

या यह भी कहा जा सकता है कि गुलज़ार चूँकि ख्वाजा अहमद अब्बास की कहानी पर फिल्म बना रहे थे सो जो कमजोरियां दिखाई देती हैं वे कहानी की हैं|

पुलिस की निगरानी में अपने घर में अपने शयनकक्ष में अपनी पत्नी की आत्मा की शांति के लिये प्रार्थना करता नायक अपनी पत्नी का मंगलसूत्र मिलने पर एक साधारण अपराधी की तरह चुपके से भाग न जाता क्योंकि पुलिस की निगरानी में भी वह अपनी पत्नी की एक इच्छा पूरी कर सकता था परन्तु तब जंगल में पुलिस से बच कर भाग रहे नायक के दृष्य फिल्म से गायब हो जाते और वे दृष्य बेहद अच्छे ढंग से फिल्माये गये हैं और बेहद असरदार बन पड़े हैं परन्तु उनके होने के लिये एक अच्छा तर्क फिल्म के कथानक में मौजूद नहीं है।

यदि कई फिल्म बनाने के अनुभव के बाद गुलज़ार साब इस फिल्म को दस साल बाद अस्सी के दशक के शुरु में बनाते तो निश्चय ही संयोग वाले सारे हिस्से फिल्म से निकाल डालते या उन्हे और अच्छे ढ़ंग से निखारते और उन्हे और ज्यादा तार्किक बनाते।

बहरहाल फिल्म केवल एक थ्रिलर ही नहीं है और जैसा कि कहा गया है कि फिल्म कई सारे पहलुओं को लेकर आगे चलती है, अचानक भी खामोशी फिल्म की तरह एक अस्पताल में जा पहुँचती है और खामोशी फिल्म की तरह ही संवेदनाऐं उभारती है और दर्शक को भावनाओं से भर देती है। खामोशी की तर्ज पर यहाँ भी नर्स का नाम राधा ही रखा गया है।

मौत के काले बादलों से घिरे रहने वाला माहौल भी नायक और उसकी देखभाल कर रही नर्स की हंसी ठिठोली से गुलजार हो जाता है। बिरला ही कोई दर्शक होगा जो मुस्कुराहट पर ताला लगा पायेगा जब नायक बड़े गम्भीर होकर नर्स को छेड़ता है और जब वह भी बहुत गम्भीर हो जाती है तब अचानक कहता है कि लोगों के तो बारह बजते हैं पर तुम्हारे चार बजते हैं और सारा वातावरण जीवन से खिल उठता है।

ऐसे बहुत सारे मन को हल्का कर देने वाले दृष्य हैं जो दर्शक को आगे आने वाले भारी माहौल से अंजान रखते हैं और जब मौका तलाश कर दुख अपना आक्रमण करता है तब नायक की देखभाल कर रहे अस्पताल के डाक्टर्स और नर्स ही नहीं बल्कि दर्शक भी मानव सुलभ भावनाओं से भीग जाते हैं।

कोई होता जिसको अपना हम अपना कह लेते यारों” की धुन बजने की पृष्टभूमि में नायक पुलिस की गाड़ी में बैठ जाता है और पीछे रह जाता है अकेला खड़ा उसका दुखी अफसर।

उसके दुख बड़े हैं वह मौत की सजा पाये फौज के एक काबिल जवान का अफसर भी है और उस स्त्री का पिता भी जिसकी हत्या नायक के हाथों हुयी है।

अचानक के कई साल बाद हॉलीवुड में बनी सिल्वेस्टर स्टैलोन की रैम्बो सीरिज की पहली फिल्म फर्स्ट ब्लड ने एक जवान और उसके अफसर के बीच के रिश्ते को बखूबी दर्शाया था।

समाज की विडम्बना को फिल्म में डाक्टर दर्शाता है जब वह परेशान होकर दूसरे डाक्टर से कहता है कि हम क्यों ऐसे मरीजों की जान बचाऐं जिन्हे बाद में मौत की सजा दी जानी है

हिन्दी फिल्मों के विपरीत अचानक काफी छोटी लम्बाई की फिल्म है और इस गीत रहित फिल्म को एक तरह से विनोद खन्ना की फिल्म कहा जा सकता है। फिल्म के ज्यादातर दृष्यों में वे ही हैं और मेजर रंजीत के चरित्र को उन्होने काफी गहरायी से जिया है। ज्यादातर दृष्यों में उन्हे क्लोज अप में दिखाया गया है और कभी भी उनका चेहरा और गहरे भाव लिये आँखे लय नहीं खोते। उन्होने एक जीवंत फौजी, धोखा खाये पति/प्रेमी और मौत की सजा पाये एक घायल कैदी के चरित्र को बहुत अच्छे ढ़ंग से निभाया है।

अन्य कलाकारों के जिम्मे छोटी भूमिकायें आयी हैं पर उनमे भी इफ़्तिखार, फरीदा जलाल और असरानी अपनी छाप छोड़ जाते हैं। ओम शिव पुरी जरुर थोड़ा नाटकीय ढ़ंग से शुरुआत करते हैं पर वे भी थोड़ी देर बाद लय में आ जाते हैं।

फिल्म की कहानी में नजर आने वाली कमियों के बावजूद एक निर्देशक के रुप में तो गुलज़ार ने बहुत अच्छे ढ़ंग से दृष्यों को फिल्माया है और यहाँ तक कि मुख्य कथानक का हिस्सा न होने पर भी कुछ दृष्य खासे प्रभावी हैं जैसे कि ट्रेन वाला दृष्य जहाँ यात्रा कर रहे नायक की दृष्टि अपनी माँ की लिपस्टिक लगाती बालिका पर पड़ती है और वह अपनी यादों में खो जाता है और अपनी पत्नी के साथ बीत एक मजेदार प्रसंग को याद करके बेतहाशा हँसने लगता है।

फिल्म के अच्छे निर्देशन और कमजोर कथानक को देखकर ऐसा जरुर लगता है कि भले ही गुलज़ार ने कम ही फिल्में निर्देशित की हों पर वे एक लेखक से कहीं ज्यादा अच्छे निर्देशक रहे हैं कम से कम उनके पद्य लेखन के बारे में ऐसा कहा जा सकता है। अच्छा निर्देशक अपने निर्देशन से लेखन में उपस्थित कमजोरी को संभाल लेता है और गुलज़ार साब इस थ्रिलर में यही करते हैं।
achanak
कुछ कमियों के बावजूद अचानक हिन्दी सिनेमा के ऐसे चुनींदा थ्रिलर्स में आता है जिन्हे कुछ समय के अंतराल के बाद पुन: देखा जा सकता है और दर्शक ऐसा पिछ्ले 40 सालों से करते ही आ रहे हैं।

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