दूर होने की कसक aandhi
पुल बन जाती है अक्सर
दिलों को क़रीब लाने को।

पर अति निकटता के अहसासों की आँच
जाने क्यों
कभी कभी विलग कर देती है
दिलों को।

मानो संबंधों की ऊष्मा से
घबरा जाते हों मन।

प्रेम, फिर विवाह, फिर कुछ समय साथ साथ रहना, फिर अलगाव, सालों की दूरियाँ, और सालों बाद पुनर्मिलन और फिर से साथ होने की वर्तुलाकार गति को समाहित करती हुयी गुलज़ार की आँधी एक बेहतरीन फिल्म है। प्रेम, मानवीय रिश्ते, सुख-दुख जैसे तत्वों, जो कि गुलज़ार की फिल्मों के मुख्य अंग होते हैं, के साथ-साथ आँधी में राजनीति की प्रष्ठभूमि भी है।

विवाह के पश्चात अलगाव और सालों बाद मिलना तो गुलज़ार की इजाज़त में भी है पर आँधी में इजाज़त की तरह से दुखद अंत नहीं है, एक मुख्य चरित्र के लिये और यहाँ दोनों मुख्य चरित्र, उतार-चढ़ाव से भरे अपने रिश्ते में संतोषजनक एवम समझौतापरक परिस्थितियों को प्राप्त कर लेते हैं।

एक उम्र में या शायद सभी उम्रों में प्रेम ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है कि प्रेमी इसके बहाव के साथ बह जाते हैं और बड़ी शिद्दत से प्रेम भाव का स्वागत अपने जीवन में करते हैं और उस वक्त्त उन्हे लगता है कि जीवन के अन्य सभी भाव प्रेम-भाव से कमतर हैं। प्रेम से सराबोर जीवन सुहाना प्रतीत होता है और प्रेमियों को लगता है कि जीवन के अगामी दौर भी ऐसे ही सुहाने और हसीन रहेंगे। प्रेम के शुरुआती दौर में प्रेमी एक दूसरे की अच्छाइयों की तरफ इतना ज्यादा आकर्षित रहते हैं कि अपने प्रेमी की कमियाँ या तो उन्हे दिखायी नहीं देती या वे उन्हे नज़र अंदाज़ कर देते हैं, तब उन्हे लगता है कि उनका प्रेम सब संभाल लेगा। वे बड़े से बड़ा त्याग करने को तैयार हो जाते हैं प्रेम को विवाह में परिणित करने के लिये। कुछ के साथ ऐसा होता भी है और विवाह के पश्चात भी प्रेम उन्हे ऊर्जा और साहस देता रहता है और साथ में वे जीवन में उँचाइयाँ प्राप्त करते चले जाते हैं। आखिरकार जीवन में ऐसा जीवनसाथी पाना जिसके साथ लगभग हर स्तर पर तारतम्य बैठ जाये, करिश्मे से कम की बात नहीं है। ऐसे जीवनसाथी के साथ जीवन काटना नहीं पड़ता बल्कि समय का भास भी होने नहीं पाता और जीवन बहुत सी श्रेष्ठ बातें देता चला जाता है।

पर बहुधा ऐसा भी होता है कि प्रेम से विवाह की ओर बढ़ते हुये दोनों प्रेमीगण, अपरिपक्वता में और भावुकता में ऐसे ऐसे कदम उठाते चले जाते हैं जिसमें वे अपने बेहद पसंदीदा कार्यों, आदतों एवम रुचियों की बलि चढ़ा देते हैं यह सोचकर कि प्रेम जीवन में सब कुछ संभाल लेगा।

ऐसा हो सकता है पर बलिदान करने वाले व्यक्ति के पास धर्य, आत्मविश्वास और अपने द्वारा लिये गये निर्णयों पर डटे रहने का संकल्प होने जैसी शक्तियों का होना बहुत जरुरी है। प्रेम ही नहीं सारे रिश्ते ऐसे हैं जिन्हे यज्ञ जैसी पवित्रता देते हुये उन्हे जिलाये रखने के लिये समय समय पर योग्य सामग्रियों की आहुति डालनी पड़ती है अन्यथा तो अपने आप छोड़ दी गयी कोई भी वस्तु प्रकृति में सिर्फ नष्टता की ओर ही बढ़ती है। मौत के लिये प्रयास नहीं करना पड़ता, जीवन स्वयं ही समाप्ति की ओर बढ़ता है। उसे समाप्त होना ही है। प्रयास करने पड़ते हैं समाप्त होने से पहले के जीवन को स्वस्थ, ऊर्जावान और सार्थक बनाये रखने के लिये।

प्रेम-विवाहोपरांत जो दम्पति अपने निर्णयों पर अडिग नहीं रह पाते वे जल्दी ही अपने साथी की कमियों पर जरुरत से ज्यादा ध्यान देने लग जाते हैं, इन ऋणात्मक भावों से उनमें कुंठा उत्पन्न होने लगती है कि क्या यही वह साथी था जिसके लिये उसने माता-पिता का विरोध किया, जमाने भर का विरोध किया? प्रेमी भी भूल जाते हैं कि असल में जमाने भर का विरोध वे साथी के कारण नहीं करते बल्कि उस प्रेम के कारण करते हैं जो उन्हे अपने साथी से होता है या उस साथी के कारण उनके अंदर जन्मता है या सतह पर उभर कर आता है। जो प्रेम के कारण प्रेम था वह अब व्यक्तिवादी हो जाता है और व्यक्ति में तो कमियाँ होती ही हैं। इस सच्चाई से मुँह मोड़कर लोग शिकायती बन जाते हैं और उन्हे लगने लगता है कि उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी प्रेम के वसीभूत होकर अपने प्रेमी से विवाह करना क्योंकि इस विवाहरुपी निर्णय के फलस्वरुप वे उन तमाम लक्षयों से दूर हो गये ज्न्हे वे हासिल करना चाहते थे। उन्हे अपनी हर नाकामी की जड़ प्रेम-विवाह करने के निर्णय में नज़र आने लगती है।

दूसरी तरफ प्रेमी भी जो विवाह से पूर्व हर कदम पर साथ देने का दावा करते हैं वे भी विवाह के पश्चात परम्परागत विचारधारा से बंधने लगते हैं और अगर प्रेम विवाह में स्त्री कुछ करना चाहती है तो विवाह के पश्चात प्रतिबंध पति की ओर से ज्यादा लादे जाते हैं। दोनों ही पक्ष न तो पूर्णरुपेण सही होते हैं और न ही गलत। विवाह पश्चात जीवन कुछ बदलाव तो लेकर आयेगा ही। विवाह उपरांत का जीवन कुछ नयी जिम्मेदारियाँ लेकर आयेगा और दोनों पक्षों को इन बदलावों के लिये अपने को तैयार करना ही पड़ेगा अन्यथा रोज़मर्रा के छोटे लगने वाले तर्क-कुतर्क और झगड़े ही, पति और पत्नी दोनों के ही अहंकार को इतना बड़ा बनाते चले जाते हैं कि दो जिस्म एक जान और कभी एक दूसरे से अलग जीवन न जीने की कल्पना करने वाले प्रेमी भी अलग हो जाते हैं।

कमलेश्वर के उपन्यास पर आधारित गुलज़ार की आँधी भी ऐसे दो प्रेमियों, आरती (सुचित्रा सेन) और जे.के (संजीव कुमार) की कथा दिखाती है जो प्रेम के वशीभूत हो विवाह कर लेते हैं जबकि आरती के धनवान पिता (रहमान) इस विवाह के खिलाफ हैं, वे आरती को राजनीति में स्थापित करना चाहते हैं और उन्हे बड़ा आश्चर्य होता है कि आरती एक चमकता हुआ राजनीतिक भविष्य छोड़कर घर-परिवार के चक्कर में फँसने जा रही है और विवाह भी वह एक साधारण स्तर के व्यक्त्ति से कर रही है। विवाह हो जाता है और धीरे धीरे आरती को अपने पिता के संरक्षण में पनप सकने वाले राजनीतिक अस्तित्व की याद आने लगती है और एक बेटी के जन्म के पश्चात भी वह पिता के समर्थन से राजनीतिक बैठकों में जाने लगती है। जाहिर है जे.के को यह सब पसंद नहीं है।

छोटे-छोटे मतभेद बड़े रुप लेते जाते हैं और अंततः एक दिन एक गलतफहमी के कारण बात दोनों के अलग रहने तक आ जाती है।

बेटी जे.के के पास रह जाती है और आरती अपने पिता के घर चली जाती है अपना राजनीतिक भविष्य बनाने।

ऐसा कहा जाता रहा है और फिल्म के प्रथम प्रदर्शन के समय ऐसा माना भी गया था कि फिल्म भारत की उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के जीवन से सामंजस्य रखती है। फिल्म में आरती और इंदिरा गाँधी में एक तो यही समानता मानी जा सकती है कि दोनों का अपने अपने पति से अलगाव रहा और दोनों अपने अपने पिता के साथ रहीं। फिल्म में आरती को इलाहाबाद से चुनाव लड़ते हुये दिखाया गया है और इंदिरा गाँधी का इलाहाबाद, फूलपुर और रायबरेली संसदीय क्शेत्रों से नजदीकी रिश्ता रहा है। इलाहाबाद कभी नेहरु परिवार की संसदीय सीट माना जाता था। परंतु बस इतना ही सामंजस्य आरती और इंदिरा गाँधी में माना जा सकता है। जहाँ इंदिरा गाँधी के पति फिरोज़ गांधी स्वयं भी राजनीतिज्ञ थे और सांसद भी रहे वहीं आँधी फिल्म में आरती के पति जे.के को राजनीति से नफरत है और वह एक होटल में मैनेजर है।

ऐसा भी कहा जाता है कि कमलेश्वर की पुस्तक और आंधी फिल्म दोनों में ही इंदिरा गाँधी और बिहार की राजनीतिज्ञ तारकेश्व्बरी सिन्हा के राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन से कुछ प्रेरणा ली गयी थी, आरती के चरित्र को गढ़ने के लिये, पर फिल्म इन दोनों के ही जीवन पर आधारित नहीं है।

चरित्र-चित्रण और चरित्रों का विकास, दो बहुत ही खास पहलू हैं आँधी के। चरित्र ऐसे नहीं लगते कि वे किसी खास तरीके का पालन कर रहे हैं और उन्हे सब कुछ पहले से पता है। वे जीवन के विभिन्न पहलुओं का सामना करते हैं और दर्शक उनके साथ-साथ ही उन बातों को जान पाता है जो उनके साथ घट रही हैं और पहले से अनुमान लगाना मुश्किल है के अब वे ऐसा करेंगे या कहेंगे। किन्ही परिस्थितियों में वे कुछ निर्णय लेते हैं और ये निर्णय उनके लिये अच्छे या बुरे परिणाम लेकर आते हैं। किन्ही कारणवश वे बुरे परिणामों की ओर बढ़ते हैं।

कुछ साल बीतते हैं। दूरियाँ उनकी समझ को बढ़ाती हैं और जब नौ-दस साल बाद वे मिलते हैं तो एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझने की चेष्टा करते हैं। ऐसी समझ उनमें पहले नहीं थी। एक दूसरे के लिये ऐसी संवेदनशीलता उनमें पहले नहीं थी। ऐसा अगर पहले हो पाता तो उनका अलगाव न हो पाता।

ऐसा नहीं है कि केवल जे.के दोषी है या कि सारा दोष आरती का ही है उनमें हुये अलगाव के पीछे। दोनों में कमियाँ हैं और दोनों ही अलगाव को बढ़ावा देते हैं अपनी नासमझी और कमियों के कारण।

जे.के का चरित्र कई सारी मानसिकताओं से गुजरता है और अलग-अलग समय पर भिन्न स्तर की समझ और परिपक्वता का मालिक बनता है।

विवाह के एकदम बाद जे.के में अपने पुरुष होने का दंभ भी है और उसे आरती से अपेक्षायें हैं कि वह घर में दूसरे दर्जे की इंसान बन कर रहे। उस वक्क्त तो जे.के ने गुस्से में आरती से कह भी दिया था,

पत्नी हो पत्नी की तरह रहो, मेरा पति बनने की चेष्टा न करो“।

और कि,

मुझे तुम्हारा रोज़-रोज़ का नाटक पसंद नहीं सीधी तरह घर पर बैठो और बच्चे को संभालो“।

उधर आरती भी शुरु में तो अपने प्रेम के वशीभूत होकर अपने पिता की छत्रछाया और अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा आदि छोड़ने के लिये तत्पर रहती है परंतु विवाह के एक साल बाद ही उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षायें जोर मारने लगती हैं और उसे घर पर बैठ अपनी बेटी का लालन-पालन करना समय और टेलेंट की बर्बादी लगता है। उसे ऐसा भी अहसास होने लगता है कि उसके दल की वर्किंग कमिटी की महिला सदस्यों के पति ऊँचे-ऊँचे ओहदों पर हैं और एक वही है जिसका पति एक साधारण सा सहायक मैनेजर है एक होटल में।

उस वक्त्त वह भूल जाती है कि जे.के ने विवाह से पूर्व ही इन सब बातों को बता दिया था और कह् दिया था कि उसकी राजनीति में कतई भी दिलचस्पी नहीं है।

तो आरती और जे.के के अलगाव के पीछे गलती दोनों की ही है।

रिश्ते में परस्पर कटुता पनप जाने के बाद हुये अलगाव के बाद कितने ऐसे जोड़े हो सकते हैं जिन्हे समय ऐसा मौका दे जिससे कि वे कई साल बाद एक दूसरे से मिल सकें?

सालों की दूरियाँ अपनी कमजोरियों को देखने का मौका भी देती हैं। अपने द्वारा अपने साथी के साथ ज्यादतियों का पुनरीक्षण करने का अवसर देती है। ऐसी समझ देती है, ऐसा पछतावा देती हैं कि काश उस समय इतना कटु न बोला होता, काश साथी का पक्ष भी जाना होता, काश धैर्य से बातें सुलटा ली होतीं।

ऐसे पछतावे जे.के और आरती को भी होते हैं और नौ-दस सालों के बाद मिलने पर दोनों ही इस बात को महसूस और स्वीकार भी करते हैं,। ऐसी समझ और परिपक्वता उन दोनों में भी आती है, तभी अंत में जे.के, आरती से कहता है कि उसे जो राजनीतिक जिम्मेदारी अपने हाथों में ली हैं उन्हे उसे पूरा करना चाहिये। आरती के राजनीतिक विपक्षियों की घटिया राजनीतिक चालें जे.के और आरती, दोनों को उनके रिश्ते के बारे में नई समझ प्रदान करने में सहायक सिद्ध होती हैं। किसी भी नारी की सफलता से मुकाबला करने के लिये पुरुष प्रतिद्वन्दी के लिये सबसे आसान है नारी के चरित्र पर कीचड़ उछालना और आरती के विपक्षियों का ऐसा करना आरती और जे.के के मध्य कसमसा रहे रिश्ते को एक नयी पहचान दे देता है और उन्हे स्पष्ट रुप से एक-दूसरे के करीब ले आता है।

ब्रिटिश राज से आजादी के पश्चात राजनीति में सफलता पाने वाली महिला राजनीतिज्ञों ने अपने विरोधियो द्वारा लगाये गये चारित्रिक संबंधी आक्षेप अवश्य ही झेले होंगे और उनके अपने दल के नेतागण भी ऐसे दुष्प्रचार में पीछे न रहे होंगे। इस लिहाज से आँधी, चंद्रसेन (ओम शिवपुरी), एस. के. अग्रवाल (मनमोहन) और लल्लू लाल (ओम प्रकाश) के चरित्रों के जरिये इस बात को दिखाती है कि स्त्री का राजनीति में सम्मान के साथ टिके रहना कितना कठिन है।

नारी की विवाहोपरांत अपने करियर सम्बंधी महत्वाकांक्षा तो दुलाल गुहा की फिल्म दो अनजाने में भी दिखायी गयी है पर जैसी ऊँचाई आँधी फिल्म हासिल करती है ऐसी इस विषय पर बनी अन्य हिन्दी फिल्में नहीं कर पातीं।

फिल्म आरती और जे.के के प्रेम और प्रेम के बाद विवाह, अलगाव और कई साल बाद दोबारा मिलने की घटनाओं को वर्तमान और फ्लैशबैक के मिश्रण के तौर पर बड़े आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करती है। फिल्म में फ्लैशबैक तकनीक का बहुत अच्छे ढ़ंग से उपयोग किया गया है। फिल्म जे.के और आरती के कई साल बाद एक दूसरे से मिलने से शुरु होती है और उनकी यादों के सहारे उनके बीते जीवन की झलकियाँ दर्शक को देखने को मिलती हैं।

क्या जबर्दस्त गहराई से गुलज़ार आरती और जे.के के सालों बाद मिलने के दृष्यों को गढ़ते हैं! जे.के के घर में प्रवेश करने पर सजा-संवरा घर देख आरती को कहीं आशंका हो सकती है कि कहीं जे.के ने दूसरी शादी तो नहीं कर ली और इसीलिये वह पूछ ही बैठती है,”कौन रखता है घर को इतना साफ-सुथरा”। यह जानकर कि उसकी आशंका सच नहीं है, उसके अंदर की माँ जाग उठती है पर उसे भय भी है कि उसकी बेटी उसे किस रुप में स्वीकार करेगी। वह काँपते स्वर में बेटी के बारे में पूछती है।

वर्तमान और प्लैशबैक के जरिये भूतकाल का इतना आकर्षक मिश्रण गुलज़ार करते हैं कि दर्शक आश्चर्यचकित हुआ फिल्म का आनंद उठाता रहता है। वर्तमान में जे.के और आरती चाय पी रहे हैं और सहसा उनके बीते हुये जीवन से ऐसा ही दृष्य निकल आ जाता है।

प्रेमी-कम-दम्पत्ति में अलगाव के दुख से भरी आँधी में उनके वैवाहिक जीवन के शुरु के दौर में बीते इतने सुखद और गुदगुदाने वाले क्षण दिखाये गये हैं कि उन्हे याद करके न केवल दोनों चरित्र ही खुश हो सकते हैं और वापिस उस अवस्था को पाने की हसरत कर सकते हैं बल्कि दर्शक भी ऐसे ही किसी मोड़ की आस लगाने लगता है। छोटे-छोटे लेकिन खुशियों से भरे क्षणों को प्रदर्शित करना आँधी एक अन्य विशेषता है। कुछ अनपेक्षित क्षण भी हैं, विदेशी मेहमानों के साथ बैठी आरती के पास जे.के जाता है और दोनों हिंन्दी में बातें करके एक तरह से एक दूसरे से फ़्लर्ट करके पुराने दिनों की याद को ताजा करते हैं।

एक अच्छी कहानी, प्रभावी कथानक, प्रभावित करने वाले संवादों के अतिरिक्त्त संजीव कुमार, सुचित्रा सेन और ओम प्रकाश के बहुत अच्छे अभिनय के लिये फिल्म को बार बार देखा जा सकता है। चरित्र अभिनेता ओम प्रकाश ने एक से बढ़कर एक भूमिकायें की हैं और कुछ फिल्में तो उन्ही के चरित्र के ईर्द-गिर्द घूमती रहती हैं पर उनके अभिनय की एक शैली रही है जिससे वे अपनी भूमिकाओं को निभाते रहे हैं। आँधी और गुलज़ार के हिस्से यह कीर्तिमान भी जाता है कि ओम प्रकाश को यहाँ एक बिल्कुल ही अलग ढ़ंग से प्रस्तुत किया गया है और अपनी अन्य उल्लेखनीय फिल्मों से अलग ढ़ंग का अभिनय भी उन्होने कर दिखाया है। संजीव कुमार और सुचित्रा सेन तो चमकते रुप में हैं हीं यहाँ।

गुलज़ार बुद्धिमत्ता दिखाते हुये सुचित्रा सेन को एक बंगाली स्त्री का चरित्र ही देते हैं जिससे उनके हिन्दी उच्चारण की समस्या दूर हो जाती है।

रहमान, मनमोहन, ओम शिवपुरी, ऐ.के.हंगल और सी.एस.दुबे का भी अच्छा योगदान है अभिनय के क्षेत्र में।

पंचम द्वारा संगीतबद्ध किया गया फिल्म का संगीत इसका एक बहुत ही सशक्क्त पहलू बन कर उभरता है। गानों के बोल और गायिकी दोनों ही इसके संगीत को उत्कृष्ट बनाने में भरपूर योगदान देते हैं।
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फिल्म के अंत को बेहद कुशलता से गुलज़ार ने समेटा है और क्या ही बेहतरीन उपयोग इस फिल्म के एक गीत का किया है!

इस बार की जुदाई से अति-भावुक हो चुकी आरती को लेकर हेलीकॉप्टर ऊपर हवा में उठ रहा है, और नीचे जे.के खड़ा है आँखों में नमी लिये और पार्श्व में गीत गूँजता है लता की आवाज में-

इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त कदम रस्ते कुछ तेज कदम राहें…
पत्थर की हवेली को शीशे के घरोंदे में तिनकों के नशेमन तक
इस मोड़ से जाते हैं।

और इस तरह से कुछ खुशी, कुछ ग़म और कुछ संतोष के मिश्रित भावों को जगाते हुये आँधी समाप्त होकर एक बेहतरीन फिल्म के रुप में दर्शक के मन में समा जाती है और बिरला ही कोई होगा जो इस फिल्म को बार बार देखने की हसरत न रखता हो।

आँधी को देख चुके लोग इस फिल्म पर पुनः पुनः लौटते रहे हैं और ऐसा हमेशा ही होता रहेगा।

…[राकेश]

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