merakuchhsaman1फिक्र तौसवीं ने क्या कभी सोचा होगा कि उनकी कृति प्याज के छिलके का शीर्षक एक फिल्मी गीत के लिये एक रुपक का काम करेगा?

पर ऐसा तो सदियों से सिद्ध होता रहा है कि

जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि

कवियों को कुछ खर्चा तो करना पड़ता है नहीं कहीं पहुँचने के लिये। सिद्ध योगियों को भी सूक्ष्म शरीर की यात्रा करने के लिये बरसों घोर तपस्या करनी पड़ती है तब भी लाखों में से किसी एक बिरले को ऐसा सौभाग्य मिलता है पर कवि तो कहीं भी, कभी भी कैसे भी, पहुँच जाते हैं।

इजाज़त के गीत – ” मेरा कुछ सामान …” में ” एक सौ सोलह चाँद की रातें एक तेरे काँधे का तिल ” वाली पंक्त्ति पर बहुत सारे श्रोता अटके रह गये हैं कि इस पंक्त्ति का अर्थ क्या है और क्यों गुलज़ार साब ने ये पंक्त्ति लिखी?

गुलज़ार एक दो मर्तबा खुद ही अपने साक्षात्कारों में कह चुके हैं कि गीत में “एक सौ सोलह” के अंक का कोई खास जुड़ाव फिल्म के कथानक से नहीं है|

एक दफा उन्होंने कहा कि अंक इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितने यह बात कि प्रेम संबंध में जीने वाले दो में से एक व्यक्ति इस बात को सहेज कर रखता है कि उसने कितनी चांदनी रातें अपने प्रेमी के संग बिताई हैं|

एक अन्य स्थान पर उन्होंने कहा कि उनके और पंचम के संयुक्त गीतों पर शोध करने वाले व्यक्तियों ने उन्हें बताया कि पंचम ने उनके लिखे 116 गीतों को संगीतबद्ध किया था|

इस गीत के संबंध में गुलज़ार की अपनी दी हुयी व्याख्याओं के बावजूद और यह कहने के बावजूद कि इसमें रहस्य वाली कोई बात नहीं है  बहुत बड़ी संख्या में  ऐसे श्रोता या दर्शक आज भी इस पंक्ति में रहस्य खोजने में लगे रहते हैं|

एक सज्जन ने एक दफा काँधे/कंधे का संबंध मराठी भाषा से जोड़ दिया था जहां प्याज को कंधा कहते हैं|

इजाज़त के इस गीत के बारे में एक परिचित द्वारा की गयी चर्चा याद आती है|

मित्र: “बॉस, मैने कहीं पढ़ा है कि एक सौ सोलह वह संख्या है जितने दिन/रात माया महेंद्र के साथ रहती है”

“कब महेंद्र की शादी से पहले”?

“शायद”

“पर तब भी क्या कवि हृदय माया, जो कि एक बेतरतीब इंसान है और जो किसी योजना पर अमल करके जीने में विश्वास नहीं करती, एक मिनट में इतनी केलकुलेटिव हो जायेगी कि इतनी सटीक संख्या लिख भेजेगी महेन्द्र को? यह बात तो माया के चरित्र से मेल खाती नहीं और न ही माया द्वारा महेन्द्र को लिखी कविता नुमा पाती की प्रकृति और प्रवृत्ति से मेल खाती है। कहाँ तो सारी पाती उन बातों का जिक्र करती है जो सिर्फ अहसास हैं और जिन्हे सिर्फ उन्हे जीने वाला ही याद कर सकता है। तो फिर ऐसे कवित्त भाव वाली पाती में कहाँ से एकदम व्यवसायी प्रकृत्ति घुसपैठ कर जायेगी कि माया बैंक के चैक की तरह एक खरी खाँटी संख्या एक सौ सोलह वापस माँगने लगेगी। जमी नहीं यह बात”

मित्र कुछ देर चुप रहे फिर सहसा उत्साह और ऊर्जा से भरकर मैदान में आ गये,”बॉस मुझे याद आ रहा है कि कहीं नेट पर ही पढ़ा था कि जब सुधा चली जाती है महेन्द्र को छोड़कर तब माया महेन्द्र के साथ चार महीने रहती है और चार महीनो के होते हैं एक सौ बीस दिन/रात और उसमें से चार अमावस्या की रातें निकाल दो तो बच जाती हैं एक सौ सोलह चाँद की रातें। बोलो हिसाब सही बैठता है कि नहीं”

“मित्रवर यह तो आपने पहले से भी ज्यादा विचित्र हिसाब किताब बता दिया जिसका कोई भी सम्बंध कम से कम गुलज़ार वाली इजाज़त से तो दिखायी नहीं ही देता”

“क्यों क्या गलती है इस हिसाब में”। मित्र कुछ आवेश में बोले।

“पहला ऑब्जेक्शन तो यह है महोदय कि फिल्म कहीं भी यह नहीं दिखाती कि माया महेन्द्र के साथ चार महीने रहती है। महेन्द्र ही सुधा को रेलवे प्लेटफार्म पर लगे बैंच पर बैठे बैठे सुधा को बताते हैं कि दिल का दौरा पड़ने के एक माह बाद माया उनके पास आयी थी और कुछ दिन वहीं रही देखभाल करने के लिये। सुधा की माँ दादा जी को बताती हैं कि सुधा दो महीने से महेन्द्र को छोड़कर यहाँ आकर बैठी हुयी है। सुधा, दीना पाठक को भी यही बताती है कि दो महीने से महेन्द्र ने उनसे कोई सम्पर्क नहीं किया है और कुछ दिन पहले उन्होने ही फोन किया था जो माया ने उठाया था। इन सब घटनाओं से से माया की मृत्यु होने तक माया महेन्द्र के साथ चार महीने रहती है, इस बात का कोई जिक्र फिल्म नहीं करती… ”

बात को पूरी होने से पहले ही मित्र बोल पड़े,” पर फिर यह भी तो हो सकता है कि माया महेन्द्र के साथ चार ही महीने रही हो”

“बिल्कुल हो सकता है, पर फिल्म ऐसा दिखाती नहीं है और दर्शक अपने मन से तो कल्पना कर नहीं लेगा, और अभी असली आपत्ति तो सुन लो इस थ्योरी के ऊपर”

“असली वाली भी बता दो”

“मान्यवर पिछले दो दशकों आपने इजाज़त कम से कम दस बार तो देखी ही होगी। अपने दिमाग को थोड़ा सा कष्ट देंगे तो आप याद कर पायेंगे कि कब इस गीत वाली पाती महेन्द्र को मिलती है?”

मित्र चुप रहे।

“आपकी चुप्पी बता रही है कि आपको बखूबी याद आ रहा है कि यह पाती महेन्द्र को मिलती है सुधा से शादी करने के कुछ समय बाद ही, जब सुधा महेन्द्र से कहती हैं कि वे माया की चीजें उसके पास पहुँचवा दें और सामान भेजने के बाद महेन्द्र को तार मिलता है जिसमें कविता- “मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है” लिखी हुयी है। तो माया द्वारा महेन्द्र के दिल के दौरे के बाद उनके साथ बिताये गये समय की बात तो आप भूल ही जाओ। इस घटना से बहुत पहले का वाक्या है इस कविता का जन्म। यह तो सुधा और महेन्द्र के हनीमून पर कुद्रेमुख पर जाने से भी पहले की घटना है”।

मित्र ने हथियार डाल दिये और गहरी साँस लेकर वे बोले,” एक थ्योरी हाथ लगी थी तुमने उसमें पंक्चर कर दिया। अब नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात।”

“अगर आप ढ़ंग से मेरा कुछ सामान सुनें तो उसमें तो माया उनकी और महेन्द्र की सांझी विरासत की बातें कर रही हैं। वे तो हवलदार से मिली अठन्नी में से भी अपने हिस्से की चवन्नी ही माँग रही हैं। जो कुछ भी साझा था उनके और महेन्द्र के बीच वे उसमें से आधा माँग रही हैं। अगर माया व्यापारी की तरह एक सौ सोलह चाँद की रातों को माँगेंगी तो ऐसा तब ही हो सकता है जब उन्हे पता हो पक्के तौर पर कि उन्होने और महेन्द्र ने दौ सौ बत्तीस चाँद की रातें साझे रुप से साथ साथ व्यतीत की हैं। पर फिल्म तो ऐसा कुछ नहीं दिखाती या बताती। जब गुलज़ार साब ने ही फिल्म के कथानक में ऐसी कोई तयशुदा बात नहीं दिखायी तो दर्शक कैसे अपनी तरफ से कल्पना कर सकता है कि बस यही वह संख्या है जितनी रातें माया और महेंद्र साथ रहे हैं।”

“तो गुत्थी तो उलझी ही रह गयी ना”

” अरे भाई, गुत्थी क्या है इसमें एक सौ सोलह चाँद की रातें एक ऐसे ही वर्णित की हुयी संख्या है। ऐसी कल्पनाओं का समावेश अपनी रचनाओं में करके दर्शकों और श्रोताओं को जाग्रतावस्था में रखने की कलाकारी तो गुलज़ार साब शुरु से ही करते रहे हैं, फिर चाहे उनकी बनायी फिल्में हों, या उनके लिखे संवाद और गीत। इट वाज जस्ट ऐ रेंडम नम्बर।

मित्र : पर … लोग कितने सालों से इसकी व्याख्या करते आ रहे हैं। कुछ तो अर्थ होगा इस संख्या का?

कोई विशेष अर्थ तो याद नहीं आता। कोई संख्या लेनी थी सो ऐसे ही एक सौ सोलह आ टपकी दिमाग में। अब एक सौ सोलह कितनी अच्छी संख्या है। जोड़ो तीनों अंको को तो निकल के आता है आठ और आठ में एक शून्य के ऊपर दूसरा शून्य टिका है, बड़ी जादुई संख्या है शून्य। पहले जोड़ दो किसी संख्या के तो एकदम से उसके शेयर डाऊन हो जाते हैं और बाद में जोड़ दो तो गुणात्मक वृद्धि हो जाती है संख्या की कीमत में।

मित्र: मजाक छोडो पर क्या  ऐसा नहीं हो सकता कि जैसे चाँद साल भर में अपनी कलायें बदलता रहता है तो क्या एक सौ सोलह वह संख्या हो सकती है जितनी बार चाँद अपनी कला बदलता है एक साल में।

हो सकता है, बिल्कुल हो सकता है। हो सकता है कभी गुलज़ार ने ऐसा पढ़ा हो और उनके अवचेतन में ऐसा बैठा रह गया हो और जब चाँद की रातें लिखने की बारी आयी तो एक सौ सोलह अपने आप उनके दिमाग में से बाहर आकर खिल गयी।

खैर, इस ” एक सौ सोलह चाँद की रातें ” वाली बात, जो कि लोगों ने बिना मतलब ही एक गुत्थी बना डाली है, से इतर गीत बेहद आकर्षक है।

merakuchhsaman2गुलज़ार ने बहुत अच्छे विम्ब इस गीत में रचे हैं, और आशा भोसले ने बहुत ही मधुर तरीके से गीत को गाया है। पंचम ने ऐसी कमाल की धुन बनायी है कि न केवल बनाने में प्रयुक्त्त धैर्य दिखायी देता है बल्कि गीत अपने असर से धैर्य को बिखेरता चला जाता है और व्याकुलता को साफ करता जाता है। श्रोता प्रेम, दुख और भावनाओं के सागर से रुबरु तो होता है पर कहीं भी किसी भी क्षण किसी भी शब्द पर उसका दिमाग उत्तेजित नहीं होता है।

गुलज़ार ने ही बरसों पहले पंक्त्तियाँ लिखी थीं :-

सिर्फ अहसास है ये दूर से महसूस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो।

प्यार के अनछुये अभौतिक अहसास की बातें इजाज़त के “मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है” में भी हैं।

सावन के कुछ भीगे दिन, ख़त में लिपटी रात ” भौतिक रुप से देखने समझने की चीजें या बाते नहीं है और उन्हे सिर्फ अहसासों में ही जिआ और महसूस किया जा सकता है।

पतझड़ में कुछ पत्तों के गिरने की आहट / कानों में एक बार पहन के लौट आयी थी / पतझड़ की वो शाख अभी तक काँप रही है वो शाख गिरा दो / मेरा वो सामान लौटा दो

ऐसी विम्बीय कल्पनायें और तुलनायें व्याख्या करने के लिये नहीं होती। इन्हे जैसे का तैसा ही स्वीकार किया जा सकता है। गुलज़ार खुद चाहें तो वे भी इन पंक्तियों की व्याख्या नहीं कर पायेंगे।

पेड़ों की फैली शाखाओं एवम उन शाखाओं पर बसते पत्तों से हवा के टकराने से उत्पन्न हुयी आवाज को सिर्फ वही समझ/याद कर सकता है जिसने वास्तविक ज़िन्दगी में ऐसा अपनी आँखों से देखा है और कानों से सुना है।

हवा सांय सांय चल रही थी पढ़ कर ही इस बात का पूरा अस्तित्व नहीं जाना जा सकता।

कुछ बातें अनुभूतियों के दायरे में ही पनपती हैं और यह गीत तो पूरा का पूरा अनुभूतियों के अस्तित्व के सहारे ही रचा गया है और इसी भरोसे इस गीत का अस्तित्व भी है कि जानने वाले इस गीत और इसके शब्दों और भावों को पहचान लेंगे।

जब एक अकेली छतरी में दो प्रेमी चलेंगे तो प्रेम करने वाले चाहेंगे कि उनका प्रेमी कम से कम भीगे और दोनों के ऐसा प्रयास करने से ही उनका स्पर्शित और जुड़ा हुआ हिस्सा तो सूखा रहेगा पर बाहर के हिस्से जो नितांत अलग हैं वे ही भीगेंगे। माया कहती है कि जो कुछ जुड़ा हुआ था वह उसके साथ आ गये हैं क्योंकि वह अकेली है, उसकी यादों की सांद्रता और तीव्रता ज्यादा है महेन्द्र से। वह जितनी शिद्दत से पुरानी यादों को महसूस कर सकती है उतनी गुंजाइश महेन्द्र के साथ नहीं है। सुधा से विवाह के कारण महेन्द्र के जीवन में परिवर्तन आ गये हैं और नये परिवर्तन बहुत कुछ बदल देते हैं। अगर महेन्द्र के पास अभी भी माया की यादें बची हैं तो उन्हे माया माँगती है, गीले मन के बहाने।

ये माँगे माया के अकेलेपन और कवि मन की पैदाइश हैं और जरुरी नहीं कि अगर माया महेन्द्र से साक्षात मिले तो भी वह ऐसा ही महसूस करे या मांगे। कल्पना वास्तविकता से अलग न हो उसे कल्पना ही क्यों कहा जाये?

एक सौ सोलह चाँद की रातें / एक तुम्हारे काँधे का तिल / गीली मेंहदी की खुशबु / झूठ मूठ के शिकवे कुछ / झूठ मूठ के वादे भी सब याद करा दूँ / सब भिजवा दो / मेरा वो सामान लौटा दो।

माया-महेन्द्र के प्रेम सम्बंध में नजदीकी से उत्पन्न कितनी ही यादें माया के साथ विचरती हैं जो माया को गुदगुदाती होंगी, और कभी खुशी तो कभी गम दे जाती होंगीं। कुछ ऐसी बातें होंगी जो माया और महेन्द्र प्रेम के नितांत नजदीकी क्षणों में पसंद करते होंगे और ऐसे ही क्षणों में की गयी बातें और हरकतें क्या वापिस की जा सकती हैं? माया इन्ही असंभव संभावनाओं को माँग रही है। प्रेमी प्रेम पत्र तो लौटा सकते हैं पर उन प्रेम पत्रों ने उन पर जो असर छोड़ा था उसे वे कैसे लौटायेंगे?

नजदीकी के क्षणों में प्रेमी एक ही साथ वयस्क भी हो जाते हैं और उसी समय वे बालमन भी रखते हैं। वे जानते हैं कि सब गिले शिकवे झूठे हैं पर तब भी इस अभिनय में रस लेते हैं।

भावावेश में किये वादों की असलियत वे वादे करते समय भी जानते हैं पर तब भी वे ऐसे वादे करते हैं जिन्हे वे कभी भी पूरा नहीं कर पायेंगे। वे जानते हैं यह सब पर तब भी करते हैं। प्रेममयी क्षणों में भावनाओं के वशीभूत किये गये वादे आदर्श स्थितियों में कहीं गयी आकाशीय बातें होती हैं जिनका धरती के वास्तविक धरातल की सच्चाई से कम ही वास्ता होता है। और प्रेम के क्षण बीत जाने पर उन वादों का कम ही मतलब बचता है। माया उन्ही क्षणों, और ऐसे ही समय किये खिलवाड़ के अहसासों को महेन्द्र को याद रही हैं और उन्हे अहसास दिला रही हैं कि जब ऐसे किसी भी अहसास को वापिस नहीं कर सकते तो उन भौतिक महत्व की चीजों को वापिस करने का क्या मतलब है?

और जिस दिन महेन्द्र ऐसे अहसास भी लौटाने में कामयाब हो जायेंगे उस दिन के लिये माया माँग रही हैं कि यदि उनसे भी ऐसी ही अपेक्षा रखी गयी कि वे भी उन अहसासों को दफना दें तो उन्हे इजाज़त मिलनी चाहिये कि उन प्रेम भरे अहसासों के विलोपीकरण के साथ वे खुद भी विलीन हो जायें।

माया तो महेन्द्र को नहीं माँग रही हैं अपने लिये वे तो उस प्रेम का सम्मान रखने की बात कर रही हैं जो उनके और महेन्द्र के मध्य पनपा था और जिसने अविस्मरणीय तरीके से विस्तार और गहराई पायी थी।

…[राकेश]

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