Khushbuशरत चंद्र चटर्जी की कहानी पर आधारित खुशबू, एक पीरियड फिल्म है और फिल्म देखते हुए इस बात को ध्यान में रखना जरुरी है क्योंकि आधुनिक दौर की परिभाषाएँ ऐसी फिल्मों पर लागू नहीं होतीं और हो नहीं सकतीं क्योंकि वे बीते दौर की कहानियाँ और किरदार दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत कर रही हैं| कहानी चुनने के पश्चात निर्देशक के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती होती है उस कथा को इस असरदार तरीके से दर्शकों के सामने प्रस्तुत करे जिससे फिल्म के सभी तत्व विश्वसनीय लगें| नये जमाने में कथा भले ही विश्वसनीय न लगे क्योंकि समय बदल चुका है लेकिन उस कहानी का प्रस्तुतीकरण विश्वसनीय लगना चाहिए| और अच्छे निर्देशकों की यही खूबी होती है कि उनकी फिल्मों में केवल कहानी ही नहीं बल्कि उसे दिखाने का तरीका कहानी से कहीं ज्यादा प्रभावशाली होता है और दर्शक परदे पर घटित हो रही सामग्री के विजुअल्स में खो कर रह जाता है और तब इस बात के कोई मायने नहीं कि नये जमाने में यह कथा सार्थक रही या नहीं|

बाल-विवाह की प्रथा अब चलन में नहीं है (अपवाद स्वरूप बाल-विवाह कहीं हो जाएँ तो अलग बात है) लेकिन इससे यह बात स्थापित नहीं होती कि अब दर्शक बाल-विवाह पर बनी फिल्मों को रुचिकर नहीं पायेगा| उसकी रूचि निर्भर करती है निर्देशक की कुशलता पर| निर्देशक के पास योग्यता, क्षमता और कल्पना होनी चाहिए जिससे कि वह दर्शक को उस वातावरण में ले जाए जिसकी कहानी उसकी फिल्म दिखा रही है|

गुलज़ार की फिल्म – खुशबू , सफलतापूर्वक उस काल में ले जाती है और परिवेश में दर्शक के ध्यान को रमा देती है जिसमें फिल्म को बुना गया है| गुलज़ार ने फिल्म की नायिका कुसुम (हेमामालिनी) के रूप में एक जबर्दस्त चरित्र गढा जिसे नारीवादी भी सराहना चाहेंगें और परम्परावादी भी|

गुलज़ार की रचनाशीलता (निर्देशन, पटकथा-संवाद-गीत लेखन), राहुलदेव बर्मन का संगीत और कुसुम का सुदृढ़ चरित्र, और मुख्य अभिनेताओं का शानदार अभिनय खुशबू फिल्म के चार मजबूत स्तंभ हैं|

साहित्य पर आधारित खुशबू, एक ऐसी युवती कुसुम के दुख भरे जीवन को दिखाती है जिसकी शादी किशोरावस्था में कदम रखते ही हो गई थी पर जिसका गौना नहीं हो पाया क्योंकि उसके पिता और होने वाले ससुर के मध्य झगडा हो गया और उसके पति के पिता ने रिश्ता तोड़ दिया| समस्या आ खड़ी होती है इस समीकरण से कि कई साल बाद भी कुसुम तो अपने विवाह को सत्य मानती है जबकि उसके कथित पति और उसके घर वाले इस बात को लगभग भुला चुके हैं|

अपनी उपस्थिति वाले पहले ही दृश्य से हेमामालिनी अपनी बेहद प्रभावशाली अदाकारी से दर्शक को चौंकाती चलती हैं| कुसुम के दुख, उसके स्वाभिमान, उसके अहंकार, उसकी जिद, उसकी स्वंय को ही हानि पहुंचाने वाली प्रवृत्ति, उसकी हर स्थिति में जीने की अदम्य इच्छाशक्ति, संघर्ष और वांछित प्रेम को पाने के लिए उसका दृढ़ आत्मविश्वास, उसके व्यक्तित्व के हर पहलू को हेमामालिनी ने बखूबी परदे पर साकार कर दिखाया है| संवाद अदायगी और मौन रह कर कुसुम के भावों को प्रदर्शित करने में हेमामालिनी ने गजब का संतुलन दिखाया है| इस बात को याद किया जाये कि शोले भी उसी समय बन रही थी जब खुशबू तो हेमामालिनी के अभिनय प्रदर्शन की चमक और बढ़ जाती है क्योंकि शोले में उन्हें अनवरत चटर-पटर बोलने वाली ग्रामीण युवती का पात्र निभाना था और यहाँ लगभग खामोश रहने वाली ग्रामीण युवती का|

कुसुम के दुख की बानगी तो सारी फिल्म में कदम कदम पर बिखरी पड़ी हैं| बिना गौने की शादी वाला उसका पति बृन्दावन (जीतेंद्र) कालान्तर में डाक्टर बन गया और उसने एक अन्य युवती लक्ष्मी (शर्मीला टैगोर) से विवाह कर लिया था और उस विवाह से उसका एक बेटा चरण (मास्टर राजू) है| लक्ष्मी का देहांत हो चुका है और बृन्दावन अब अपने बेटे और अपनी माँ (दुर्गा खोटे) के साथ रहता है| कुसुम का भाई कुञ्ज (असरानी), जो गाँव गाँव फेरी लगाकर बच्चों के खिलौने बेचा करता है अक्सर बृन्दावन के गाँव भी जाता है और चरण और उसकी दादी से मिलता रहता है| बृन्दावन तो विवाह करके गृहस्थ हो गया था मगर कुसुम को विश्वास था बृन्दावन से हुए अपने विवाह पर| हालांकि उसने अपने हाथ पर बृन्दावन के नाम का टेटू तो अपने हाथ की त्वचा को जला कर मिटा दिया था पर उसके दिल में बृन्दावन का ही नाम चस्पा था| उसका कोई संपर्क बृन्दावन या उसके घर वालों से नहीं था अपरान्तु उसे अंदर विश्वास था कि कभी न कभी उसका मिलन बृन्दावन से अवश्य ही होगा| वह अपने को विवाहित ही मानती है और जब बृन्दावन की माँ कुञ्ज से कहती है कि कुञ्ज को इतनी बड़ी उम्र की कुंवारी बहन घर में नहीं रखनी चाहिए और कुञ्ज को उसका विवाह कर देना चाहिए तो कुसुम क्रोधित हो जाती है और कुञ्ज से कहती है कि उन्हें शर्म नहीं आई मुझे कुंवारी कहते हुए|

कुसुम की समझ इतनी सीधी नहीं बल्कि जटिल है| बरसों से बृन्दावन से बचपन में हुए विवाह के भरोसे बैठी कुसुम से जब उसकी बचपन की सखी – मन्नो (फरीदा जलाल) उससे पूछती है कि अगर बृन्दावन उसके पास आए उसे ले जाने के लिए तो क्या वह चली जायेगी पति के साथ? तो वह तुनक कर कहती है,

”में क्यों जाऊंगीं? मुझसे प्यार किया होता तो किसी और से शादी क्यों करते शहर जाकर? मैं इतनी भी गयी-गुजरी नहीं हूँ| सुहाग भी लूँ तो भीख में?”

कुसुम के अंदर बृन्दावन से अपने रिश्ते को लेकर एक पूरा संसार बसा हुआ है और जिसे सिर्फ वही समझ पाती है| वह बरसों से झेल रहे दुख को समझौते करके खत्म करने के बारे में सोचने को राजी नहीं| हर आदमी उससे सहानुभूति रखता है पर उसे अपना अधिकार सम्मान के साथ चाहिए| उसकी अपेक्षा और शिकायत बृन्दावन से है और सालों से इस रिश्ते को लेकर दुख झेलने के बावजूद दुख समाप्त करने के लिए उसे अपने स्वाभिमान को दरकिनार करके निर्णय लेने से सख्त परहेज है| कुञ्ज उसे बिना बताए बृन्दावन, उसकी माँ और चरण को घर पर खाने के लिए आमंत्रित कर आता है और खुद कुसुम के भय से सुबह ही घर से गायब हो जाता है क्योंकि उसे लगता है कि कुसुम सब संभाल लेगी और बृन्दावन की माँ कुसुम को अपना लेंगीं|

वे तीनों कुसुम के घर मेहमान बन पहुँच भी जाते हैं और अंजान कुसुम इस बात से परेशानी में आ जाती है कि घर में खाना बनाने के लिए कुछ भी सामग्री नहीं है| वह पूरे अधिकार से बृन्दावन को बाजार से सामान लाने के लिए कह देती है पर उसे यह भी दर्शाना चाहती है कि कुञ्ज की जेब में सब पैसे चले गये|

कुसुम दिन भर बृन्दावन की माँ की खूब सेवा करती है पर उसे ठेस लगती है जब जाते हुए बृन्दावन की माँ उसे सोने के कंगन दे जाती हैं यह कहकर कि ये शगुन के हैं| आजकल के नारीवादी भी कुसुम के दृष्टिकोण पर अचरज प्रकट करेंगे पर वह कुञ्ज को यह कहकर कि मांजी भूल से कंगन यहाँ छोड़ गईं, कंगन वापिस भिजवा देती है और वह यह जानती है कि बृन्दावन की माँ इससे नाराज होंगीं और उससे फिर से रिश्ता जोड़ने की बात भूल जायेंगीं पर उसे अपने स्वाभिमान से समझौता पसंद नहीं| बृन्दावन इस बात को समझता है और अपनी माँ से कहता है कि उन्हें पहले कुसुम से खुलकर रिश्ते की बात करनी चाहिए थी, उसकी सहमति लेनी चाहिए थी, यूँ एकदम से कंगन नहीं देने चाहिए थे|

जिस बात के लिए कुसुम बरसों से इंतजार कर रही थी, वह घड़ी आई थी पर कुसुम ने मौके को ठुकरा दिया|

स्थितियां ऐसे ही बनती बिगड़ती रहती हैं और ऐसी स्थिति आ जाती है जहां कुसुम के दुख से उससे ज्यादा दुखी कुञ्ज अपना धैर्य खो देता है और कुसुम से कहता है,” मैं क्या करूँ… पर तू भी तो नहीं मानती… तोडती भी तो नहीं इस रिश्ते को जो पता नहीं है भी या नहीं| इससे तो अच्छा था तू विधवा हो जाती|” और वह उसकी चूड़ियाँ तोड़ देता है|
कुंठा और गुस्से में वह बृन्दावन के नौकर को कुसुम की टूटी हुयी चूडियों के टुकड़े देकर कहता है कि जाकर बृन्दावन और उसकी माँ से कह देना अब यह रिश्ता टूट गया और बृन्दावन, कुञ्ज और कुसुम के लिए मर गया|

स्तब्ध कुसुम की सारी आशाएं धूमिल होती नज़र आती हैं पर जब सब समाप्त होने लगता है तभी हल्का सा झरोखा खुलता है और आशा के सूरज का हल्का सा प्रकाश अंधकार के असर को कम करता है|

पूरी फिल्म इसी बात पर टिकी है कि क्या कुसुम और बृन्दावन का पुनर्मिलन होगा और होगा तो कैसे क्योंकि जब भी लगता है कि अब बात बन जायेगी तभी कुछ न कुछ समस्या दोनों के रिश्ते पर ग्रहण बन कर छा जाती है|

जब वह घड़ी आ जाती है जब कुसुम को पता है कि अब शायद वह बृन्दावन से कभी मिल नहीं पायेगी, तब कुसुम से रिश्ते के उतार चढ़ाव से परेशान बृन्दावन स्वयं ही कह उठता है –

कुसुम जी चाहता है एक बार फिर तुमसे साथ चलने के लिए कहूँ पर जानता हूँ तुम मना कर दोगी| पता नहीं क्या कमी है मुझमें कि तुम मुझे हर बार ठुकरा देती हो| क्या तुम बता सकती हो क्या कमी है मुझमें?

कुसुम के उत्तर में उसके बृन्दावन से रिश्ते की गाँठ बंधी है –

“हाँ अधिकार की कमी है आपमें| जिस अधिकार से मैं चरण को रोक लेती हूँ, आपको रोक लेती हूँ, उस अधिकार से आप क्यों नहीं ले जाते मुझे| क्यों नहेने अधिकार दिखाकर मेरा अहंकार चूर चूर कर देते| यदि आप अधिकार दिखाते तो मैं भला कौन हूँ जो मना कर पाती|”

अधिकार की पहल न कर पाना बहुत बार रिश्तों में उदासीनता ला देता है क्योंकि दूसरे पक्ष को लगने लगता है कि दूसरे को उसकी परवाह ही नहीं है और कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह उसके साथ है या उससे अलग| कुसुम बृन्दावन जैसी पढ़ी लिखी नहीं है पर वह रिश्ते की मूल बात उसे कह देती है|

फिल्म में भावनाओं के समंदर में रह रह कर ज्वार आता है| वह न काटी जा सकने वाली रात है जिसमें कुसुम और बृन्दावन दोनों आँखों में रात काट रहे हैं| कुसुम को क्षीण सी आशा है कि शायद बृन्दावन उसके पास आकर उससे बात करेगा और बृन्दावन को कुसुम के अनसमझे स्वाभिमान के कारण हिचक है|

फिल्म में बेहतरीन संवादों और दृश्यों का उपयोग किया गया है| कुसुम और चरण के बीच का प्रथम दृश्य बेहद रोचक है जहां कुसुम चरण को मिठाई खिलाती है और उसके पानी मांगने पर उससे कहती है –

पहले मुझे माँ कहो तब पानी दूंगीं|

जिस तरह से इस दृश्य को दृश्यांकित किया गया है ऐसा बहुधा फिल्मों में देखने को मिलता नहीं| ऐसा प्रतीत होता है हेमामालिनी और राजू को दृश्य समझाकर गुलज़ार ने उन दोनों को पूरी छूट दे दी कि वे अपने तरीके से अभिनय कर डालें और उन दोनों ने ऐसा अभिनय उस दृश्य में किया हो मानों वे कैमरे की उपस्थिति से अनभिज्ञ हों और वास्तविक जीवन में एक दूसरे से बात कर रहे हों|

ऐसे ही एक दूसरे दृश्य में चरण कुसुम से पूछता है –

माँ मैं ये खिलौना ले लूँ|

कुसुम कहती है – ले लो बेटा|

उसे तुरंत एहसास हो जाता है कि उसने पहली बार चरण को बेटा कहा है और ऐसा महसूस करके वह स्वयं से ही शर्मा जाती है|

सिंदूर देख कर चरण कुसुम से पूछता है –

यह क्या है?

कुसुम – यह सिंदूर है जब तुम्हारे बाबा मेरी मांग में इसे ऐसे भरेंगे तब मैं उनके साथ जाऊँगी|

चरण – अगर बाबा नहीं लगायेंगें तो तुम नहीं जाओगी?

कुसुम – नहीं

चरण – मैं लगा देता हूँ|

कुसुम – बदमाश मेरे सिंदूर लगायेगा…अपनी बीवी को लगाना|

कुसुम और चरण के साथ के दृश्य बेहद मनोरंजक हैं|

कुञ्ज कुसुम का बड़ा भाई है परन्तु कुसुम उससे व्यवहार करती है जैसे वह उसका छोटा भाई हो| उनके बीच के एक रोचक दृश्य को याद करें|

इस दृश्य में, जो कि न केवल कुसुम के मन में उसके बृन्दावन से रिश्ते की थाह देता है बल्कि उसके स्वाभिमान को भी दर्शाता है, कुञ्ज घर वापिस आकर कुसुम को बताता है कि आज बादल गाँव में उसकी मुलाक़ात चरण से और बृन्दावन की माँ से हुयी| और वह उसे बृन्दावन की माँ से हुयी सारी बातचीत बता है|

कुसुम गुस्से में बृन्दावन को डांटते हुए कहती है  –

उन्हें शर्म नहीं आई मुझे कुंवारी कहते हुए और तुम भी चुपचाप सुनते रहे|

कुञ्ज – पर वो तो यही मानते हैं ना कि जब गौना नहीं हुआ तो शादी पूरी कहाँ हुयी|

कुसुम – उन्होंने कह दिया और तुमने माँ लिया| क्या माँ भी ऐसा ही मानती थी| अगर मानती तो मुझे क्यों लेकर जाती उनके घर?

कुञ्ज दबे स्वर में – नहीं माँ तो नहीं मानती थी पर…

कुसुम बिफर कर – तुम क्यों गये उनके घर? क्या तुम्हे याद नहीं कैसे उन लोगों ने मुझे और माँ को घर से निकाल दिया था?

कुञ्ज समझाने के अंदाज में – कुसुम, अगर पुरानी बातों को कुरेदेंगें तो सुलह कैसे होगी?

कुसुम – सुलह! तुमसे किसने कहा था सुलह करने को?

कुञ्ज – मैं तो तेरी खातिर गया था, वरना मुझे क्या पड़ी है कि मैं उनके घर जौन|

कुसुम – तुम्हे मेरी फ़िक्र करने की जरुरत नहीं है|

कुञ्ज – तेरी समझ में तो कुछ आता है नहीं|

कुसुम – मुझे समझने की जरुरत नहीं है, और तुम्हारी जो समझ बूझ है मैं वो अच्छी तरह जानती हूँ| जिसके घर दूध मिल गया पीने को उसी की मूंछे लगा लीं|

कुञ्ज – पर…

कुसुम – रहने दो भईया लाओं गिलास दो

कुञ्ज – पर मैं तो तेरी भलाई के लिए ही…. और मैं उम्र में तुझसे बड़ा हूँ, तुझे मेरी बात सुननी चाहिए|

कुसुम – तुम रहने दो भईया| लाओं गिलास दो और हाथ धो लो|

कुञ्ज हार मानते हुए – धो लेते हैं भाई

कुसुम – और कल से बादल गाँव जानी की जरुरत नहीं है| एक बादल गाँव में सामान ना बेचने से हम भूखे नहीं मर जायेंगें|

कुसुम और बृन्दावन के बीच के सारे दृश्य भी बेहद रोचक हैं| पर एक दृश्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो इस बात को बताता है कि कैसे कुसुम के पास बृन्दावन के बारे में बातें छान कर पहुँचती रहे एहेन और उन्ही के बूते उसने बृन्दावन के प्रति विचार बना रखे हैं, जिनमें शिकायतें भी हैं|

जब बृन्दावन के सामने स्पष्ट सा ही है कि अब उसकी माँ कुसुम को स्वीकार नहीं करेगी क्योंकि कुसुम ने कंगन लौटा कर उसकी माँ का अपमान किया है तो वह कुसुम के गाँव में उसके सामने से बिना कुछ कहे ही गुजरता जाता है, वह इस न हो सकने वाले रिश्ते में आहुति डाल इसकी ज्वाला को प्रज्ज्वलित करके कुसुम की परेशानियां और नहीं बढ़ाना चाहता पर कुसुम तो और ही कुछ सोचती है| चरण भी कुसुम को देख उसकी ओर भाग जाता है| और कुसुम अपनी सखी मन्नो से कहलवा देती है कि बृन्दावन चरण को कुसुम के पास छोड़ जाए और शाम को लौटते हुए लेता जाए|

बृन्दावन जब कुसुम के घर पहुंचता है चरण को लेने तो कुसुम कहती है |

कुसुम – अंदर आ कर बैठ जाओ, चार लोग देखेंगें बाहर खड़े हुए|

बृन्दावन – चार लोग अंदर जाते हुए नहीं देखेंगें?

कुसुम – मैं दरवाजे पर खड़ी रहकर तुमसे बहस नहीं कर सकती| अंदर आकर बैठ जाओ|

बृन्दावन अंदर जाकर – कुसुम, तुम चरण को रोज रोज की आदत मत डालो| परेशानी होगी|

कुसुम – परेशानी होगी तो मेरे पास ले आना|

बृन्दावन – वो तुम्हे माँ बुलाने लगा है, बाद में पूछेगा तो क्या समझाउंगा|

कुसुम कुछ शिकायत भरे लहजे में – तो माँ ला देना उसके लिए| कोई मैं अकेली तो हूँ नहीं जिसे वो माँ बुलाता है|

बृन्दावन उत्सुकता से- और कौन है जिसे चरण माँ कहकर बुलाता है|

कुसुम- वो हैं ना बादल गाँव में, काली

बृन्दावन ठहाका लगा कर हंसता है और कहता है – काली हमारे महाराज की बेटी है और चरण की दोस्त है|

कुसुम खिसियाये स्वर में – मैं क्या जानूं| चरण कह रहा था|

बृन्दावन गंभीर स्वर में – विश्वास भी कोई चीज होती है कुसुम|

कुसुम शिकायती लहजे में- हाँ ये विश्वास ही तो था जो शहर जाकर शादी कर ली|

बृन्दावन उसे शहर में लक्ष्मी से शादी करने वाली सारी परिस्थितियों को उसे बताता है और कुसुम संतुष्ट हो जाती है|

कुसुम – चरण को यहीं छोड़ दो आज रात के लिए| मैं अकेली हूँ और चरण सो भी रहा है| कल तुम लेने आ जाना मैं चरण का हाथ पकड़ कर आ जाऊंगीं|

बृन्दावन के यह कहने पर कि कुसुम ने कंगन लौटा कर अच्छा नहीं किया, उससे माँ का अपमान हुआ| कुसुम बिफर कर कहती है – और मेरी जो बेइज्जती हुयी वो कुछ नहीं? तुम अगर मेरी बेइज्जती न करो तो मुझे मांजी के सामने छोटा होने में कोई शर्म नहीं|

बृन्दावन मुस्करा कर अपने इमान को समझाने की बात कह कर चला जाता है, कुसुम को प्रसन्न और आशा में डूबा छोड़ कर| उस वक्त दोनों को ही नहीं पता कि अभी तुषारापात होने बाकी हैं उनकी आशाओं पर|

कुसुम ने अकेलेपन में इतनी मानसिक कठिनाइयां झेली हैं कि एक तरह से वह बेहद कठोर भी हो चुकी है और कोई भी परिस्थिति उसे जीवन लीला समाप्त करने की ओर नहीं ढकेल पाती|

उसके गाँव की एक धनी बुजुर्ग महिला एके यह कहने पर कि अब तो बृन्दावन की माँ उसके लिए दूसरी पत्नी लेने गई है अब बृन्दावन कुसुम को अपना नहीं पायेगा तो वह किसके सहारे जियेगी?

कुसुम दुख से भर कर लेकिन दृढ़ स्वर में कहती है – क्यों विधवाएं नहीं जीतीं क्या?

वह ठसके में ऐसा कह तो जाती है लेकिन तुरंत ही ऐसा कहने का अर्थ भी समझ जाती है और बृन्दावन के लंबे जीवन के लिए प्रार्थना करने लगती है|

दुख से भरी कुसुम के जीवन में सुख का पड़ाव आता है जब उलझनें सुलझ जाती हैं और चरण के कहने पर बृन्दावन कुसुम की मांग में सिंदूर भर देता है|

इस दृश्य को देख रोग शैया पर पड़ा कुञ्ज भी कमरे से बाहर निकल कर कुसुम को बढ़ावा देता है-

आज पीछे मुड कर मत देखना बहन…जा अपने पति के साथ जा, पराया कर दे इस घर को आज|

कुसुम बिना पीछे मुड़े घर की चाबियाँ पीछे फेंक देती है और मन्नो की शादी के अवसर पर कही पंक्तियाँ दुहराती है –

ये तेरा घर था बाबुल, जो भी खाया पिया सब चुका कर जा रही हूँ| इस घर का कोई कर्ज मुझ पर अब नहीं है, मैं इस घर के लिए आज से पराई हो गयी|

फिल्म कुञ्ज के साथ ही शुरू होती है और अंत भी घर के दरवाजे पर अकेले खड़े कुञ्ज पर फोकस होकर समाप्त होती है| सालों से दुख झेलती आ रही छोटी बहन के जीवन में खुशियों की बहार आने के मौके से खुश और संतोष पाकर बड़ा भाई घर में अकेला खड़ा है|

कुसुम, चरण और बृन्दावन को ले जा रही गाड़ी को खींच रहे दोनों बैल भी प्रसन्नता में उछलते कूदते भागते हैं|

गुलज़ार ने एक भावुक कहानी में दुख को इस तरह से भांजा है कि फिल्म दर्शक के दिल को अंदर तक छू जाती है और दुखद प्रसंगों से भरी इस कथा में भी उन्होंने जीवन के अन्य रसों का भरपूर समावेश किया है और छोटे छोटे गुदगुदाने वाले प्रसंग दर्शक के साथ चुहलाबाजी करते जाते हैं कभी चरण के माध्यम से और कभी मन्नो के माध्यम से और कभी कुसुम और बृन्दावन की उन्मुक्त हँसी से ही प्रसन्नता विकरित हो जाती है|

गुलज़ार ने ऐसे गीत रचे हैं जो मुख्यतः कुसुम की ज़िंदगी से जुड़ाव रखते हुए उसके जीवन के प्रसंगों को गति देते हैं|

प्रसन्नता के क्षणों में मन्नो गाती है –

बेचारा दिल क्या करे सावन जले भादों जले

दो पल की राह नहीं एक पल रुके एक पल चले

गाँव गाँव में घूमे रे जोगी, रोगी चंगे करे

मेरे ही मन का ताप न जाने हाथ न धरे

तेरे वास्ते लाखों रास्ते तू जहां भी चले

मेरे लिए हैं तेरी ही राहें तू जो साथ चले

मन्नो कुसुम और बृन्दावन के रिश्ते और उनके विकल्पों को ही इस गीत में गा रही है| बृन्दावन की रहें एक कुसुम पर ही आकर नहीं रुकतीं जबकि कुसुम की एक हे राह है और वह भी बृन्दावन तक ही पहुँचती है|

एक अन्य गीत – ओ मांझी रे में गुलज़ार ने ऐसा दृश्य गीत में पिरोया है जिसे देखा तो लगभग सभी ने होगा पर इस तरह से कभी उसका रूपक के रूप में इस्तेमाल सोचा नहीं होगा|

पानियों में बह रहे हैं, कई किनारे टूटे हुए

रास्तों में मिल गये हैं सभी सहारे छूते हुए

कोई सहारा मझधार मिले जो अपना सहारा है

इस फिल्म का हर गीत रत्न सरीखा है पर दो नैनों में आंसू भरे हैं (पूरी पोस्ट यहाँ पढ़ें) तो कमाल गीत बन पड़ा है| फिल्म की परिस्थितियों से मेल खाने की बात हो या गायिकी और वाद्य यंत्रों के संयोजन की, यह गीत अदभुत है| कुसुम के भावों का सटीक चित्रण यह गीत करता है|

एक तरह से खुशबू फिल्म का सारांश या निचोड़ है यह गीत!

अभिनय के हिसाब से यह हेमामालिनी की फिल्म है|

जीतेंद्र की जम्पिंग जैक इमेज से एकदम अलग रूप में प्रस्तुत करके गुलज़ार ने उनसे काबिले तारीफ़ अभिनय करवाया| जीतेंद्र का गेट-अप फिल्म में एक तरह से वास्तविक जीवन के गुलज़ार से ही लिया गया है| जीतेंद्र के पास बहुत संवाद नहीं हैं फिल्म में और उन्होंने गुलज़ार के निर्देशन में मौन रहकर भावों का सम्प्रेषण कर पाने में भरपूर सफलता प्राप्त की|

मास्टर राजू, फरीदा जलाल, असरानी, दुर्गा खोटे और संक्षिप्त सी अतिथि भूमिका में शर्मिला टैगोर सभी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराते हैं|

शर्मिला टैगोर वाले भाग को बाद में गुलज़ार ने नमकीन ((पूरी पोस्ट) फिल्म में पूर्ण विस्तार दिया|

 …[राकेश]

Advertisements