आग, बरसात से होते हुए आवारा तक फिल्म दर फिल्म अपने निर्देशकीय कौशल का परचम ऊंचा और ऊँचा करते हुए Shri 420 में निर्देशक राज कपूर अपनी निर्देशकीय प्रतिभा का शिखर छू जाते हैं|
इस गीत के सिनेमाई रूपांतरण में राज कपूर फिल्म मेकिंग की गाइड प्रस्तुत की है|
पूंजीवाद अगर अपने पंख फैलाकर समाज के निम्न वर्ग को ऊपर नहीं उठा पाता और समाज में एक प्रकार का समाजवाद नहीं ला पाता तो वह अपने स्वरूप के निम्न गुणों का भौंडा और अश्लील प्रदर्शन ही करता है|
श्रमजीवी वर्ग का सामूहिकता में आनंद लेना मानों जीवन दर्शन है कि एकल दुःख बहुत बड़े लगते हैं पर एकता के सामने वे जीवन में अच्छे की संभावना से बहुत छोटे हो जाते हैं और व्यक्ति में जीवटता बनी रहती है|
मेहनतकश के दिमाग में काम करते वक्त एक शान्ति बसी रहती है|
रजैय्या वस्तावैय्या कुछ ज्यादा हो जाता अतः रमैय्या वस्तावैय्या सटीक लगता है| राम तुम आओगे! इसे निश्चित बात के रूप में भी ले सकते हैं और प्रश्न वाचक अंत के साथ भी, कि राम क्या तुम आओगे?
राम आदर्श के रूप में भारतीय सभ्यता में सिरमौर हैं और जब हर तरफ अन्धेरा छाया हो और नायकत्व के अवतार की जरुरत आन पड़े तब भारतीय मस्तिष्क और ह्रदय राम के आगमन की गुहार लगाता है वह अपने नायकों में राम की छवि देखता है देखना चाहता है|
श्री ४२०’ में फुटपाथों पर बसर करने वाले श्रमजीवी, राज (राज कपूर) में उस आदर्श वादी नेता की छवि देखते हैं जो कि पढ़ा लिखा समझदार युवक है, जिसकी आँखों में अच्छा करने के सपने पलते हैं और जो एक बेहद अच्छे दिल का मालिक है और जो उन सबका उद्धार कर सकता है| उन्हें इस बात की जानकारी नहीं कि निजी विकास की ललक में राज पूंजीपतियों के हाथों का खिलौना बन चुका है|
गीत से पहले पार्टी में राज के जीवन में उसकी मासूमियत को समाप्त करने वाली खलनायिका बन कर प्रवेश करने वाली माया (नादिरा) के मादक नृत्य और काले धन के बलबूते शक्ति और ऐश्वर्य का अश्लील प्रदर्शन देख राज के दिमाग के जले साफ़ होने लगते हैं उसकी आँखों पर बंधी पट्टी खुलने लगती है|
पूंजीवाद के विकृत रूप को देख कर परेशान हो उठे राज के पार्टी स्थल से बाहर आने पर सुनाई देने वाला आलाप राज के दिमाग के विचलन को बखूबी प्रदर्शित करता है|
वहां श्रमजीवियों के सामूहिक गान और नृत्य के माहौल का असर पूंजीवाद से बजबजा रही पार्टी के माहौल से बिलकुल अलग है|

पार्टी के उत्तेजक माहौल से निकल कर श्रमिकों के पास पहुँचते ही गीत कानों को शीतल भाव प्रदान करने वाला बन जाता है|

यहाँ रोमांस की हल्की फुल्की छेड़छाड़ के मध्य जीवन का उल्लास झलकता है साथ ही यह आभास भी गीत देता है कि पूंजीवाद के शिखर पर बैठे सेठ धरमचंद के आलीशान बंगले के साए तले फुटपाथ पर जीवन यापन कर रहे श्रमजीवी अगर एकत्रित न रहें तो पूंजीवाद उन्हें कुचल ही नहीं देगा वरन अलग-अलग वे जीवन का नाम मात्र का आनंद भी न ले पायेंगें|

रमैय्या वस्तावैया, रमैय्या वस्तावैया

मैंने दिल तुझको दिया,  मैंने दिल तुझको दिया

ओ रमैय्या वस्तावैया, रमैय्या वस्तावैया

नैनों में थी प्यार की रौशनी

तेरी आँखों में ये दुनियादारी न थी

तू और था, तेरा दिल और था

तेरे मन में ये मीठी कटारी न थी

मैं जो दुख पाऊँ तो क्या, आज पछताऊँ तो क्या

मैंने दिल तुझको दिया, मैंने दिल तुझको दिया

ओ रमैय्या वस्तावैया, रमैय्या वस्तावैया

 

उस देस में तेरे परदेस में

सोने-चाँदी के बदले में बिकते हैं दिल

इस गाँव में, दर्द की छाँव में

प्यार के नाम पर ही धड़कते हैं दिल

चाँद तारों के तले, रात ये गाती चले

मैंने दिल तुझको दिया, मैंने दिल तुझको दिया

ओ रमैय्या वस्तावैया, रमैय्या वस्तावैया

यूं ऊपरी तौर पर तो श्रमिक स्त्री पुरुष एक दूसरे से छेड़छाड़ करते भावों से गीत को गा रहे हैं परन्तु गीत के बोलों की भीतरी परत राज के मनोभावों को ही प्रदर्शित कर रही है| एक एक पंक्ति एक एक शब्द उसके हृदय के ही उदगार हैं, उसके जीवन में घटित हो चुके या हो रहे या उसके मन में चल रहे ऊहापोह को ही प्रस्तुत कर रहे हैं|
निजी प्रेम सम्बन्ध में प्रेमिका विद्या (नर्गिस) द्वारा राज के गिरे हुए रूप को नकारने से खाए झटके से राज का सोया हुआ ज़मीर जागता है और वह पछतावे की आग में झुलस कर इस बात का बोध करने लगा है कि दौलत, शक्ति और सफलता के पीछे दौड़ते हुए उसने न केवल हीरे रूपी प्रेम को खोया है वरन उसने अपनी मासूमियत का भी गला घोट दिया है और अपने अंतःकरण को पछतावे की आग में जलने के लिए छोड़ दिया है|

याद आती रही, दिल दुखाती रही
अपने मन को मनाना न आया हमें
तू न आए तो क्या, भूल जाए तो क्या
प्यार करके भुलाना न आया हमें

श्रमजीवियों का सामूहिक गीत एक लोकगीत बनकर गली कूचों में गूंजने लगता है तब प्रेम में वियोग सह रही नायिका तक यह गीत ऐसे ही पहुंचाया जा सकता है| गीत में यह गज़ब की सिनेमाई निरंतरता है, जहां दुखी बैठी विद्या के पास से गुजरते दूधिये के गले से निकलते गीत के बोल उसे भी छू जाते हैं और अपने टूटे दिल के उदगार वह भी गीत में जोड़ देती है| विद्या ने तो राज के आदर्शवादी रूप से प्रेम किया था और सच्चे ह्रदय से किया था| राज को अपनी ज़िंदगी से दूर कर देने के बावजूद वह राज से किये अपने प्रेम की स्मृति को भुला पाने में स्वयं को असमर्थ पाती है|

वहीं से दूर से ही, तू भी ये कह दे कभी
मैंने दिल तुझको दिया, मैंने दिल तुझको दिया
ओ रमैय्या वस्तावैया, रमैय्या वस्तावैया

प्रेम के रूप विचित्र होते हैं| राज को अपने से दूर करके भी उसका ह्रदय इस बात की प्रार्थना करता है कि अभी भी राज यह कह दे कि वह विद्या से प्रेम करता है|

अपनी हानि के बोझ तले दबे खड़े राज के लिए भी अपने ह्रदय के भावों को दबाये रखना अब असंभव हो चला है|
जिस तरह से श्रमजीवी वर्ग राज का स्वागत करता है वह परदे पर परदे के पीछे की कहानी भी दिखाता है कि राज कपूर एक फ़िल्म को बनाते समय उसके निर्माण से जुड़े लोगों को कितना सम्मान और प्रेम देते होंगे| उनमें और एक्स्ट्रा कलाकारों के मध्य जैसी नज़दीकी परदे पर नज़र आती है वह ऐसे व्यक्तियों, जो पेशावर अभिनेता न हों, के केवल अभिनय के बूते की बात नहीं|

रस्ता वही और मुसाफ़िर वही
एक तारा न जाने कहाँ छुप गया

इस गीत को दो टैग लाइन देने का श्रेय भी दिया जाना चाहिए|
रमैय्या वस्तावैया’ और
एक तारा न जाने कहाँ छुप गया

दुनिया वही, दुनियावाले वही
कोई क्या जाने किसका जहाँ लुट गया

राज के दिल में क्या चल रहा है कोई इस बात से अवगत नहीं है| दुःख निजी ही होता है| एकल व्यक्ति के दुःख से उसे प्रेम करने वाले भले ही द्रवित हो जाएँ पर बाकी दुनिया का कारोबार अपनी गति से अपनी दिशा में चलता रहता है|

मेरी आँखों में रहे, कौन जो मुझसे कहे
मैंने दिल तुझको दिया, मैंने दिल तुझको दिया
ओ रमैय्या वस्तावैया, रमैय्या वस्तावैया

फ़िल्म में राज की इस पृष्ठभूमि के अलावा कि वह इलाहाबाद से ग्रेजुएशन में गोल्ड मैडल लेकर बम्बई आया है, उसके जीवन के बारे में कोई और जानकारी नहीं मिलती| पचास के दशक में इलाहाबाद जैसे शिक्षा के कारण प्रसिद्ध छोटे शहर से बम्बई जैसे औधोगिक महानगर में जा पहुंचे व्यक्ति के सामने बहुत बड़ा सांस्कृतिक अंतर व्याप्त हो जाता होगा| और वहां की भीड़ में उसका अकेलापन अपने भयानक रूप में उसके सम्मुख आ खडा होता होगा| अपने जैसे ही निर्धन साथियों और विद्या जैसी बेहद गुणवान प्रेमिका का साथ छूट जाने से उत्पन्न अकेलेपन की भयावहता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है|

ऐसे में या तो प्रेम का ऊष्मामयी साथ हो या ममता रुपी शीतलता की पनाह मिले तभी व्याकुल मन को शान्ति मिल सकती है| और राज को माँ सामान वृद्धा गंगा (ललिता पवार) की ममता का ठौर मिलता है| गंगा मैय्या द्वारा हाथ से इशारे करके “मैंने दिल तुझको दिया” के सन्देश द्वारा दिलासा देने से केवल नायक राज ही शान्ति नहीं पाता बल्कि उस एक दृश्य की सहायता से राज कपूर, दुनिया भर के लाखों करोड़ों अपने घरोंदे छोड़कर दूसरी अनजान जगहों पर जा पहुंचे अप्रवासियों के दिलों को छू जाने वाला महान सिनेमेटिक क्षण परदे पर रच देते हैं|

राज कपूर को यूं ही परदे का जादूगर नहीं कहा जाता| एक व्यक्ति के भावों को कैसे करोड़ों लोगों के भाव से एकाकार किया जाए इस कला में वे निष्णात थे| इस गीत में कितने ही दृश्यों में उनकी आँखों में पसरे दुःख को देख बहुत बार यह लगता है कि श्वेत श्याम का माध्यम इस गीत में उनकी उपस्थिति के लिए नाकाफ़ी था, उनके नीली आँखों से उत्सर्जित दुःख के बवंडर को रंगीन फिल्मांकन ही न्यायोचित प्रदर्शन दे सकता था|

यह गीत इस बात की गवाही भी देता है की भले ही दिलीप कुमार ट्रेजेडी किंग हों और मीना कुमारी ट्रेजेडी क्वीन पर जहां तक गीत के माध्यम से टूटे दिल के भावों को सिनेमाई प्रदर्शन देना हो तो राज कपूर एक निर्देशक के रूप में बेजोड़ थे और वे अन्य अभिनेताओं के साथ- साथ अभिनेता राज कपूर से भी ऐसे माहौल में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करवा पाने में बेहद सक्षम थे|
राज कपूर ने शैलेन्द्र के लिखे और शंकर जयकिशन द्वारा संगीतबद्ध और लता, रफ़ी और मुकेश द्वार गाये गीत के द्वारा एक महान और अमर फ़िल्मी गीत दुनिया को उपहार स्वरूप भेंट दिया है|
…[राकेश]

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