श्रंखला के दूसरे सीज़न में उपस्थित कमजोरियों में सबसे बड़ी कमजोरी हर षड्यंत्र का सूत्रधार गुरुजी को दिखाना ही है| कथा का सारा वज़न इस कोण पर गिर जाता है| दुनिया में बहुत से षड्यंत्रकारी सिद्धान्त चलते रहते हैं| इनमें हमेशा विलेन दूर के होते हैं| तब बात जम जाती है| अव्वल तो हिन्दू वैश्विक राजनीति में इतने शक्तिशाली कभी रहे नहीं कि वैश्विक स्तर पर नियंत्रण रख सकें| कम से कम पिछले 1500 सालों से न तो आबादी में, न ही धन में और न ही तकनीक के स्तर वे इतने शक्तिशाली रहे कि गुरुजी की तरह विश्व भर में जैसा चाहे वैसा कर लें, अतः श्रंखला का गुरुजी वाला कोण बेहद हल्का प्रतीत होता है| गणेश गायतोंडे द्वारा किए दावे कि गुरुजी की योजनानुसार और उसके आदेश से उन्होने अमेरिका, ईरान, इराक, सीरिया, और यूरोप आदि जगहों पर हिंसा और उथल पुथल को बढ़ावा दिया, हथियार उपलब्ध कराये, बचकाने लगते हैं| इन बातों को देख सुन ऐसा लगने लगता है कि श्रंखला जल्दी जल्दी भागने के चक्कर में दर्शक की समझदारी के साथ मज़ाक ही नहीं कर रही वरन उसकी समझ का उपहास भी उड़ा रही है|

विश्व स्तर पर कुछ षड्यंत्रकारी सिद्धांत चला करते हैं जो गुप्त संस्थाओं द्वारा सारे विश्व को अपने इशारे पर और अपने लाभ हेतु  चलाने की बात करते हैं| श्रंखला अगर ऐसी किसी विदेशी संस्था जैसे Illuminati, जिसके बारे में बहुत कहा, लिखा और गढ़ा जा चुका है,  को भारत पर परमाणु हमले की उत्तरदायी बनाती तो कुछ विश्वसनीयता बन सकती थी पर गुरुजी को इन वैश्विक संस्थाओं के जैसा शक्तिशाली और षड्यंत्रकारी दिखाकर श्रंखला कतई विश्वसनीय नहीं रह पाती | ऐसा लगता है मानो किसी ने प्रोजेक्ट दिया हो कि श्रंखला को भारतीय और वह भी हिन्दू आतंकवादी गढ़ना है| पर ऐसा करना श्रंखला को औंधे मुंह गिरा देता है| इस सूरत में हो सकता है कि विदेश स्थित संस्थाएं श्रंखला को तमाम पुरस्कारों से लाभान्वित कर दें पर भारत में सीजन दो, हमेशा ही कमजोर, अटपटा और जबर्दस्ती के कोण गढ़ने वाला प्रतीत होगा| ऐसा लगता है कि भारत के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य से प्रभावित होकर इस कोण पर जरूरत से ज्यादा ज़ोर दे दिया गया| पर यही श्रंखला के दूसरे सीज़न को ले डूबा|

यूं भी दूसरे सीज़न में बहुतेरी बातें उबाऊ हैं| जैसे आलम,मालम बंधुओं वाले सारे दृश्य, परमाणु बम के रोमांचकारी वातावरण के बीच में सरताज और मेधा के आपसी संबंध ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे गरम तवे पर पानी डालकर उसे ठंडा कर दिया गया हो| सरताज और बीमार कुसुम देवी यादव के मध्य के दृश्यों में कतई कोई रोचकता नहीं थी|

दूसरे सीज़न को देखकर ऐसा लगता है घटनाओं और चरित्रों का जितना कुनबा पहले सीज़न में जोड़ा गया था उसे जल्दी में दूसरे सीज़न में निबटा दिया गया| समसामायिक दिखने के चक्कर में मॉब लिंचिंग का दृश्य अलग से चिपकाया प्रतीत होता है|

हिन्दू, मुसलिम और सिख, आतंकवादी कौन?

श्रंखला की यह कैसी समझ है कि भारत विभाजन के वक्त्त मुसलिम गिरोह द्वारा एक सिख लड़की को अगवा कर लिया जाता है| और कालांतर में उस लड़की का बेटा, शाहिद खान, भारत का ही दुश्मन बनकर भारत से 1947, 1965 और 1971 का बदला लेने के लिए उसका खात्मा करना चाहता है और उसके लिए उसे भारत पर परमाणु बम के हमले से भी परहेज नहीं है| अपनी माँ के बलात्कार और उससे जबरन शादी के कारण उसे पाकिस्तान और अपनी माँ के अपहरणकर्ताओं से नफरत नहीं होती, उसे नफरत होती है भारत से, जहां के हिन्दू और सिख समुदाय से उसकी माँ आती है! ऐसा क्यों हुआ, इस मनोविज्ञान की तरफ श्रंखला ध्यान नहीं देना चाहती|

इधर भारत में महाराष्ट्र के एक गाँव में अपने पिता के भिक्षा मांगने के कारण उसे नापसंद करने वाला लड़का गणेश गायतोंडे अपनी माँ और उसके प्रेमी की हत्या कर देता है| बड़े होकर औरतखोर बन चुके गायतोंडे को बालों में गजरा लगाये हुई वेश्याओं से नफरत है क्योंकि उनमें उसे अपनी माँ की छवि दिखाई देने लगती है क्योंकि वह भी गजरा लगाया करती थी| अपनी माँ उसे अति प्रिय थी पर फिर भी वह उसकी हत्या कर देता है और जीवन भर अनैतिक कृत्यों में संलग्न रहता है? श्रंखला इच्छानुसार चरित्रों के मनोविज्ञान को प्रस्तुत करती है| शाहिद, गणेश दोनों के मनोविज्ञान को वह विश्लेषित नहीं करती लेकिन सरताज के मनोविज्ञान की अधकचरी या अधपकी झांकी जरूर प्रस्तुत करती है| फिलीस्तीनी माँ और यहूदी पिता की संतान बात्या का मनोविज्ञान सरताज से ब्रिटिश लहज़े में बोले मिनट भर के संवाद से प्रस्तुत हो जाता है| मैल्कम मुराद का अच्छा खासा बड़ा रोल है पर उसके बारे में दर्शक को उतना ही पता चलता है जितना भारतीय पुलिस वाले अपने संवादों में बोलते हैं|

जैसे जे पी दत्ता  की एल ओ सी में मुख्य भारतीय सैनिक चरित्र  आवेश में पाकिस्तानी सेना के सामने आकर चिल्ला कर मर जाते हैं वैसे ही अंत में सेक्रेड गेम्स के चरित्रों में आत्महत्या या उनकी हत्या का दौर आता है| त्रिवेदी और जोजो को गणेश मार देता है और स्वयं भी आत्महत्या कर लेता है|

बंटी को मैल्कम मार देता है (क्यों? इसकी कोई खास वजह नहीं दिखती) और स्वयं भी अपने को सरताज के सामने गोली मार लेता है| मैल्कम क्यों आत्मघात करेगा? पहले की तरह वह सरताज को मारने का प्रयास क्यों न करेगा? उसके बलिदान से गुरु जी का कौन सा यज्ञ पूरा हो रहा है?

परुलकर, बिपिन भोसले को मार देता है और फिर अपने को गोली मार लेता है| उससे पहले एक दृश्य में परुलकर किसी को फोन कर कहता है कि “बिबिंका 623 एक्टिवेट” हो गया है| दिल्ली में मीटिंग में व्यस्त, शायद प्रधानमंत्री के सामने जाकर एक अधिकारी यही बात दुहराता है| अपने पिट्ठू इंस्पेक्टर माजिद खान से महाराष्ट्र के गृहमंत्री बिपिन भोसले के बारे में पूछकर वह कहीं फोन करता है और अगले ही दृश्य में अज्ञात स्थान पर भोसले से पूछताछ कर रहे पुलिस कमिश्नर के पास दिल्ली से फोन आ जाता है भोसले को छोडने के लिए| अगर परुलकर इतनी ही पहुँच वाला है कि प्रधानमंत्री तक पहुँच रखता हो तो आत्महत्या क्यों करेगा?

करेले पर नीम चढ़ा वाली कहावत चिरतार्थ होते दिखाई देती है टास्क फोर्स द्वारा परमाणु बम को हैंडल करने के तरीकों को देखकर| भारत 1974 और फिर 1998 से परमाणु बम तकनीक से लैस देश है और भारत के पास, इसके किसी भी शहर में, परमाणु बम को खोजने के बाद अगर आधा घंटे का समय हो, तो यह सेक्रेड गेम्स के बचकाने तौर तरीकों से बम को निष्क्रिय नहीं ही करेगा वरन पूर्ण वैज्ञानिक और उचित तरीकों से इस पर काबू पा लेगा या पाने की कोशिश करेगा| श्रंखला के जनक परमाणु विज्ञानियों से सलाह मशविरा कर सकते थे इस भाग को फ़िल्माने से पहले| सारे मुंबई को खाली करवाना, कहाँ से तर्क संगत लगा उन्हे? श्रंखला इस बिन्दू पर कुछ भी स्तरीय नहीं दिखा पाई|

और सबसे अचरज की बात यह कि श्रंखला के लेखक मीडिया में साक्षात्कार दे देकर लोगों को भ्रमित करने की कोशिश में लगे रहे कि सरताज बात्या के साथ मिलकर उसकी योजना का हिस्सा बन गया| इस तरह सरताज, बात्या और अंततः गुरुजी की विध्वंसकारी योजना का नया पालनहार बन गया| ऐसा विचार श्रंखला के लेखकों और निर्देशकों का था तो सरताज को बम के साथ गाड़ी में क्यों बैठना था? सक्रिय हो चुके बम को तो कुछ मिनटों में फट ही जाना है, जैसा कि गुरुजी चाहता था, तो सरताज उस गाड़ी में बैठकर उसे निष्क्रिय करने की कोशिश क्यों करेगा और अगर निष्क्रिय करने का सिर्फ दिखावा कर रहा है तो बम के साथ आत्मघात का रास्ता क्यों अपनाएगा? बम तो बिना उसके कुछ करे धरे योजनानुसार फट ही जाना है और क्राइम ब्रांच का अधिकारी सरताज को हेलिकॉप्टर में ले जाना ही चाहता है| सरताज अगर बात्या और गुरुजी के पक्ष में हो गया है तो क्यों बम के साथ रुकेगा?

बम ढूँढने के बाद मुंबई पुलिस और क्राइम ब्रांच के पास तीस मिनट से तो ज्यादा ही थे| मान लीजिये वे परमाणु विज्ञानियों के संपर्क में पहले से थे और उनके पास बम ढूँढने के बाद उसे निष्क्रिय न कर पाने की संभावना के साथ बैक अप में विज्ञानियों की सलाहनुसार दो-तीन विकल्प थे और जिसमें एक विकल्प गाड़ी को एयरलिफ्ट करके दूर समुद्र में डुबोने का विकल्प भी था और जब गाड़ी को हवा में उठाया जा रहा है तभी सरताज सिंह उसमें बैठ जाता है काल ग्रंथ हाथ में लेकर और उसमे दिये कोड्स के अनुसार बम को निष्क्रिय करने के प्रयास करता है| तब अंत, जैसा दिखाया गया (काला हो चुका पर्दा) वैसा कुछ तो सार्थक लगता| तब बम अगर फूटता तो शहर से दूर समुद्र में फूटता और अगर निष्क्रिय हो जाता है तो तीसरे सीजन की गुंजाइश बच जाती है| अभी अगर बम उसी पार्किंग में फूट जाता है तो उसका असर जाने कितने किलोमीटरों तक होगा?

दूसरे विकल्प में गाड़ी को लोहे और कंक्रीट की मोटी परतों से ढकना है| आधे घंटे में ये विकल्प असंभव नहीं लगते, दुस्साहसी अवश्य लग सकते हैं पर फिल्में दुस्साहस पर असाधारण साहस के प्रदर्शन की कहानियाँ ही होती हैं| कम से कम बचाव दल में लगे चरित्र कुछ करने का प्रयास करते तो दिखते| बी आर चोपड़ा और रवि चोपड़ा की द बरनिंग ट्रेन के क्लाइमेक्स को याद कीजिये| ट्रेन में धर्मेंद्र, विनोद खन्ना और जीतेंद्र ट्रेन को रोकने की वीरता दिखा रहे हैं तो स्टेशन पर विनोद मेहरा आपातकालीन स्थिति के कारण युद्धस्तर पर ऊँचा उठता रेलवे ट्रैक बनवा रहे हैं जिससे ऊपर चढ़ते हुये ट्रेन की स्पीड कम हो जाये और स्टोपर्स द्रुत गति से आती ट्रेन के धक्के को सहन कर उसे रोक सकें| इन सब हरकतों को देख दर्शक रोमांचकारी अवस्था से तो गुजरता है| सेक्रेड गेम्स में अभी जैसे परमाणु बम को संभालने का जैसा तरीका दिखाया है वह श्रंखला के दूसरे सीजन में पसरी बोरियत की डोज़ को कई गुना बढ़ा देता है और दर्शक को ऊबा देता है|

श्रंखला में पंकज त्रिपाठी के अच्छे अभिनय के बावजूद आश्रम और अध्यात्म वाला भाग कमजोर रहता है क्योंकि उसके पीछे का दर्शन कमजोर है| पंकज त्रिपाठी की उपस्थिति वाले दृश्यों में आकर्षण तो बना रहता है पर लेखन की कमजोरी इस हिस्से में स्पष्ट दिखाई देती है|

गुरु जी द्वारा नए मानव, नए युग की शुरुआत सिर्फ बंबई/मुंबई को तहस नहस करके कैसे हो जाएगी यह समझ से परे की बात  है? गुरुजी धरती पर तीन संघर्षरत क्षेत्र बताता है  – नॉर्थ एवं साउथ कोरिया, इज़राइल एवं फिलिस्तीन और भारत एवं पाकिस्तान, जहां परमाणु युद्ध करवा कर वह कलयुग को समाप्त कर सकता है| रूस, अमेरिका और चीन जैसे बड़े देशों में कलयुग चलता रहेगा? गुरु जी के उद्देश्य लचर तरीके से परिभाषित किए गए हैं| जगह-जगह बम एक साथ फोड़ने से भी उसके उद्देश्य की पूर्ति का मार्ग दिखाई दे सकता है पर केवल मुंबई पर पाकिस्तानी द्वारा हमला करवा कर कौन से बड़े उद्देश्य की पूर्ति हो जाएगी यह पहेली समझ से परे की बात है? वह मानकर चलता है कि बस भारत पाकिस्तान के मध्य परमाणु युद्ध होने से बाकी सभी देश भी पूरी धरती पर हर तरफ परमाणु युद्धों में संलग्न हो जाएँगे और यह सभ्यता समाप्त हो जाएगी, केवल वह और उसके शिष्य बचे रहेंगे| और परमाणु विस्फोट से दुनिया नष्ट करके अपने बनाए बंकरों में गुरु जी और उसके शिष्य कितने साल जीवित रह कर स्वस्थ वातावरण में सतयुग लाने का इंतजार करेंगें? परमाणु विस्फोट का विकिरण (रेडिएशन) कोई साल दो साल में तो समाप्त होने से रहा| गायतोंडे सन 1959 में जन्मा है और गुरुजी 1958 में| 2017 में परमाणु विस्फोट के बाद बंकरों में गुरुजी और गायतोंडे जैसे वृद्धावस्था की ओर अग्रसर लोग कितने साल ज़िंदा रहकर सतयुग का आनंद ले पाएंगे? गुरुजी कोई मूर्ख तो था नहीं| जो सन 1992 के मध्य तक तक गायों का दूध दुह रहा हो और केवल अगले एक दशक में ही क्रोएशिया समेत अन्य विदेशी जगहों पर आश्रम स्थापित कर ले वह इतना व्यवहारिक तो होगा ही कि उसकी योजना की परिणति क्या है?

इससे इतर कहाँ तो गुरुजी को सभी चरित्रों का बाप दिखाया गया पर गणेश गायतोण्डे गुरुजी की हत्या करके आसानी से सबके सामने कालग्रंथ लेकर आश्रम से फरार हो जाता है और कोई उसे रोकने का प्रयत्न तक नहीं करता जबकि इसी सेट अप में पिस्तौल लिए सरताज से आश्रम के सुरक्षाकर्मी भिड़ जाते हैं| श्रंखला तार्किक तरीके से नहीं वरन अपनी सुविधा से जोड़ तोड़ करके इधर उधर मुड़ती रहती है|

सेक्रेड गेम्स एक और बात स्थापित करती है कि पर्दे पर गाली गलौज, नग्नता और पाशविक हिंसा दिखाने की छूट मात्र से ही कोई फ़िल्म अपने आप बहुत अच्छी नहीं बन जाती| सेक्रेड गेम्स के बाकी दो निर्देशकों को छोड़ दें, अनुराग कश्यप को अपनी पहली फ़ीचर फ़िल्म – पाँच, के समय से ही शिकायत रही है कि उन पर बहुत बन्दिशें हैं और वे अपनी कलात्मक रचना को मन मुताबिक निर्मित और प्रस्तुत नहीं कर पाते| सेक्रेड गेम्स ने उन्हे वैसा धरातल दिया जहां उन पर किसी किस्म की कोई बंदिश नहीं थी| पर क्या सेक्रेड गेम्स का उनका वाला भाग, उनकी उन पिछली तमाम फिल्मों जैसे पाँच, गुलाल, ब्लैक फ्राइडे, नो स्मोकिंग, देव डी, अग्ली, और बॉम्बे वेल्वेट आदि से बेहतर बन पाया जिसमें उनके सिर पर सेंसर की गाइडलाइंस का साया मँडराता रहा?

 

हाल के बरसों की उनकी फिल्मों में भी कुछ बातों की पुनरावृत्ति फॉरमूले  की भांति सामने आने लगी है| जैसे बैंड के माध्यम से किसी गायक को प्रस्तुत करना| देव डी के बाद से उनकी लगभग हर फिल्म में यह उपस्थित होता रहा है और यहाँ भी इसकी उपस्थिति है| बंटी और उसकी बहन का आपसी कोण, रमन राघव 2.0 वाले रमन और उसकी बहन लक्ष्मी के कोण की पुनः प्रस्तुति लगती है| नवाजुद्दीन सिद्दीकी जादुई अभिनय क्षमता के अभिनेता हैं पर श्रंखला के दूसरे सीजन में कई जगह ऐसा लगता है कि मानो अनुराग और नवाजुद्दीन दोनों शूट करते हुये कहीं कहीं थकान के शिकार हो गए|

कुल मिलाकर सेक्रेड गेम्स अगर वैब संसार में भारतीय सामग्री के लिए संभावनाओं की सौगात और प्रसिद्धि लाई,  तो साथ ही इसे बनाने वालों की कला की कमियाँ भी उनकी पहली बनाई फ़िल्मों से ज्यादा यहाँ उजागर होती हैं|

…[राकेश]

 

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