Is Is Love Enough? Sir (2018) on Netflix Italy?

अमीर घराने की लड़की का घरेलू सहायक, ड्राइवर, चौकीदार आदि लड़के के साथ प्रेम दर्शाती फ़िल्में दिखाई दे जाएंगी| राजे रजवाड़ों के काल में राजा या राजकुमार का दासी संग प्रेम भी किस्से कहानियों का हिस्सा रहा है| राजा द्वारा गरीब या सामान्य परिवेश की युवती या वनवासी युवती से विवाह करने के प्रसंग भी खूब मिलते हैं|

लेकिन आधुनिक काल के भारत में किसी युवक का अपनी घरेलू सहायिका संग प्रेम करने के प्रसंग अपवाद स्वरूप ही मिलेंगे| अपने दफ्तर की सेक्रेटरी से विवाह करना, या अपनी दफ्तरी सहायिका से विवाह करना, व्यावसायिक रूप से अन्य कार्य के कारण संपर्क में आई युवती, जो आर्थिक एवं सामाजिक  रूप से एक अलग वातावरण में रहती है, से प्रेम विवाह ऐसा नहीं चौंकाता जैसा किसी युवक का यह कहना कि वह अपनी कम पढ़ी लिखी, गाँव से कुछ अरसा पहले ही शहर में आई गरीब घरेलू सहायिका संग प्रेम करने लगा है, चौंकाएगा|

प्रेम और विवाह ऐसे गठबंधन हैं जो हैं तो व्यक्तिगत मामले लेकिन इनमें प्रेमियों और जोड़े के दोनों व्यक्तियों के अलावा समाज भी आ जाता है|

इस फ़िल्म में ऐसा कहने वाले अमीर युवक का अमीर मित्र उससे कहता भी है कि तुम अपनी मेड के साथ प्रेम नहीं कर सकते| उसे छुरी कांटे से खाने का मतलब भी नहीं पता और उसकी माँ इसके साथ टेबल शेयर करने का सोच भी नहीं सकती| तुम्हारे माता-पिता अपनी सोसायटी में कैसे इसका परिचय कराएंगे?

शायद खूबसूरती और बेहद उल्लेखनीय गुणों की प्रतिभाशाली स्वामिनी युवती के साथ ऐसे मामले में परिभाषाएँ और समस्याएँ बदल जाएँ लेकिन साधारण शक्ल- सूरत की, कम पढ़ी लिखी विधवा युवती के मामले में तो लोगों के मन में किन्तु परंतु के बादल छाए ही रहेंगे|

रत्ना (Tillotama Shome) अपने विवाह के चार माह बाद ही विधवा हो गई थी| उसके गरीब पिता ने बिना दहेज शादी करने के लिए राज़ी हो जाने वाले बीमार दामाद संग अपनी बेटी का विवाह करा दिया था| अब विधवा रत्ना मुंबई में एक अमीर युवक अश्विन (Vivek Gomber) के अपार्टमेंट में उसकी घरेलू सहायिका बन कर रहती है| अमेरिका से भारत लौटे अश्विन की शादी के बाद नवदंपति का घर संभालने के लिए अश्विन की माँ ने रत्ना को वहाँ भेजा है|

फ़िल्म के शुरू में ही अश्विन अपनी शादी रद्द कर देता है| अब अपने अपार्टमेंट में वह और रत्ना ही रहते हैं| अश्विन का ड्राइवर रत्ना से पूछता भी है कि क्या अब वह उसके लिए कोई नया काम तलाशे क्योंकि अकेले अश्विन संग रहने से तो लोग बातें करेंगे|

रत्ना इन बातों पर ध्यान नहीं देती| वह अश्विन के घर संतुष्ट है| उसे इस बात से कोई भय नहीं लगता कि अपार्टमेंट में केवल वह और अश्विन ही रहते हैं|

प्रेम में साधारणतया जूनून को ही महत्ता दी जाती है विशेषकर कहानियों और फ़िल्मों में| इस फ़िल्म का प्रेम बेहद मंद आंच पर पका पदार्थ है| इसे प्रथम दृष्टि में हुए आकर्षण से उपजा प्रेम भी नहीं कह सकते| अमेरिका से लौटा अश्विन भारतीयों के ऊंच-नीच के भेदभाव से दूर है और रत्ना से अपने सोच और आदत अनुसार अच्छा बर्ताव किया करता है| लेकिन अगर उसकी शादी नियत निर्णय के अनुसार सबीना से हो जाती तो रत्ना उसके लिए घरेलू सहायिका ही रहती और अवश्य ही वह उससे हमेशा अच्छा बर्ताव ही किया करता लेकिन क्या तब ऐसे प्रेम के अंकुर फूटने की संभावना रहती जैसी कि अब उत्पन्न हो पाई जब शादी टूटने के बाद की विषाद भरी परिस्थितियों में रत्ना संवेदनशीलता का परिचय देकर छोटी छोटी बातों का ध्यान रख कर बात करती है, काम करती है जिससे अश्विन को पुराने टूटे रिश्ते को लेकर कोई ठेस न पहुंचे?   

रत्ना अश्विन की मानसिकता और उसकी जरूरतों को बखूबी समझती है और समय पर वह उसे जीवन की अपनी दृष्टि अनुसार प्रोत्साहन भरी समझ भी देती है| विषाद से घिरे अश्विन पर इस सुझाव का असर भी पड़ता है और वह अगले ही दृश्य में स्कवॉश खेलता दिखाई देता है और जीवन में उमंग के साथ वापसी करता दिखाई देता है|

रत्ना को शादी से पहले से फैशन डिजायनिंग में रुचि थी और मुंबई में अवसर मिलते ही वह टेलरिंग सीखने के प्रयास शुरू कर देती है| अश्विन उसका हौसला बढ़ाता है| पर ऊंच नीच की बुराई से भिनभिनाते भारतीय समाज में अमीर वर्ग को कपड़े प्रदान करने व एक फैशन डिजाइनर जब उसे अपने शो रूम से अपमानित करके बाहर निकाल देती है तो रत्ना के मन में कड़वाहट घर कर लेती है| परिस्थितियाँ कैसे मानव के मन को जकड़ लेती हैं इसका अच्छा प्रदर्शन फ़िल्म करती है| जीवन में धनात्मक सोच रखने की सलाह देना आसान है लेकिन उसे स्वयं के जीवन में उतारना कठिन है| अपमानित रत्ना अपने शुभचिंतक अश्विन के ऊपर अपनी कड़वाहट निकालती है| रत्ना से मैत्रीपूर्ण व्यवहार करता अश्विन उससे और खुलकर बातें करना चाहता है और रसोई में जाकर वहीं खड़े खड़े उससे बातें करके उससे सहज होना चाहता है लेकिन रत्ना उससे बेरुखी भरा व्यवहार करती है| बाहरी जगत से मिली ऋणात्मकता को वह उसके ऊपर उड़ेल देती है|

उसके अप्रत्याशित ऋणात्मक व्यवहार से चकित अश्विन ही रत्ना को फैशन डिजायनिंग की किताब और एक सिलाई मशीन उपहार में देता है ताकि वह अपने सपनों को पूरा करने की यात्रा आरंभ कर सके और कहता है,” सबको सपने देखने और उन्हें पूरा करने का अधिकार है, तुम्हें भी”|

इससे पहले अश्विन की संवेदनशीलता का परिचय दो घटनाओं से होता है| अश्विन की उच्च सोसाइटी की दो प्रतिनिधि महिलाएं रत्ना का अपमान करते हुये उसे डांटती हैं और एक तो उसका वेतन काटने की बात करती है जिसके जवाब में अश्विन कहता है,”इट्स गुड शी डज नॉट वर्क फॉर यू’|

ऐसे प्रसंग रत्ना और अश्विन के मध्य विश्वास को जन्म देते हैं| स्त्री होने के नाते रत्ना अश्विन के अंदर अपने प्रति उपज रहे स्नेह से अंजान नहीं है| पर वह इस बात को स्वीकार नहीं करना चाहती क्योंकि उसे अपने और अश्विन के धरातलों का अंतर साफ पता है|

अपनी छोटी बहन की शादी में गाँव में आने पर अश्विन का फोन आने पर वह एकांत में जाकर उसका फोन सुनती है और पूछती है,”कोई काम था?”

उनके सामाजिक अंतर के कारण उनके परस्पर व्यवहार में एक दूसरे के प्रति विश्वास के बावजूद एक अटपटापन भी है क्योंकि दोनों ही इस बात को महसूस कर रहे हैं कि वे कुछ ज्यादा ही करीब आते जा रहे हैं पर दो अलग-अलग सामाजिक संसारों से आने के कारण वे समझ भी पाते कि आपस में कैसा व्यवहार करें|

रत्ना के तीन दिन के लिए गाँव चले जाने के कारण अश्विन को घर में अकेलापन महसूस होता है और वह पहली बार रत्ना के कमरे में जाता है और उसकी अनुपस्थिति में उसकी उपस्थिति को उसकी चीजों के माध्यम से महसूस करता है|

रत्ना के गाँव से तीन दिन में लौट आने पर वह खुश भी है और आश्चर्यचकित भी कि वह तीन ही दिन में लौट आई| रत्ना सपाट बयानी करती है कि तीन दिन की छुट्टी के लिए बोल कर गई थी सो उसे आना ही था| हो सकता है रत्ना ने भी गाँव में अश्विन की अनुपस्थिति को महसूस किया हो और उसे पता है कि अश्विन के लिए अकेले घर में रहना मुश्किल होगा इसलिए गणेश चतुर्थी से पहले ही वह वापिस आ जाती है| पर इस बात को वह दर्शाना नहीं चाहती|  

दफ्तर जाने की बात करता अश्विन रत्ना से शादी के फोटो दिखाने की मांग करता है और आश्चर्यचकित रत्ना उसे मोबाइल में फोटो दिखाती है|

इन सब नज़दीकियों की परिणति होती है गणेश उत्सव में भीड़ में नाचती रत्ना के अश्विन के साथ वापिस घर में आने पर अश्विन द्वारा उससे दैहिक नजदीकी दर्शाने में और कुछ पलों के लिए रत्ना भी भावनाओं में बह जाती है पर फोन की घंटी उसे जमीन पर ले आती है और अश्विन की माँ का फोन पर यह कहना कि वह घर पर आयोजित एक पार्टी में हाथ बंटाने के लिए उसके घर आ जाये, रत्ना की भावनाओं के तवे पर ठंडा पानी छिड़क कर उसे भी ठंडा कर देता है|

जिस पार्टी में अश्विन, उसके माता पिता और परिचित उपस्थित हैं वहाँ रत्ना को हाथ में ट्रे लिए मेहमानों के सामने खाने पीने की सामग्री लिए घूमना है| बाद में अन्य घरेलू सहायकों और ड्राइवर आदि के साथ फर्श पर बैठ कर खाना खाना है| और यह सब रत्ना को वास्तविकता का बोध कराने के लिए काफी हैं कि उसका और अश्विन का संसार बहुत अलग है|

अश्विन के पार्टी के बाद वहाँ आने, जहां वह अपने जैसे सहायकों संग बैठी खाना खा रही है, से रत्ना क्रोधित हो जाती है और बाद में घर पर अश्विन को कहती है कि उसे वहाँ नहीं आना चाहिए था और सब उसका मज़ाक उड़ा रहे थे| अश्विन के उसके प्रति अपने प्रेम का प्रदर्शन करने पर रत्ना उसे चेताती है कि वह अश्विन की रखेल बनकर नहीं रहेगी और अश्विन को इस संबंध को समाप्त करना ही होगा|

ऐसे संबंध तो श्याम बेनेगल की अंकुर और कुमार शाहनी की तरंग में बखूबी दर्शाये जा चुके हैं| यह फ़िल्म वैसा पुराना शारीरिक संबंधों का रास्ता नहीं पकड़ती बल्कि प्रेम की राह पकड़ती है|

रत्ना को अश्विन का घर छोडने के अलावा कोई रास्ता नहीं सूझता| उसे शायद अब अपने ऊपर विश्वास नहीं है कि भावनाओं के समक्ष वह कब तक मजबूत बनी खड़ी रहेगी| अपनी सामाजिक सच्चाई से इतर उसकी संवेदनशीलता की पराकाष्ठा भी दिखाई देती है जब वह अश्विन से कहती है,”आपकी मम्मी जी ने एक बेटा पहले ही खो दिया है, मैं उनके साथ ऐसा नहीं कर सकती”|

अभी संभवतः उसे इस बेमेल प्रेम की प्रासंगिकता पर बिलकुल भी भरोसा नहीं है| वह घर छोड़ जाती है और अश्विन भी अपने माता पिता के प्रति अपने द्वारा ओढ़े गए उत्तरदायित्व से मुक्त हो अमेरिका जाने की तैयारी शुरू कर देता है| उसके पिता भी इसे ठीक मानते हैं कि मेड के साथ प्रेम में रहने से बेहतर है वह अमेरिका चला जाये|

एक अति आधुनिक अपार्टमेंट से निकाल कर अपनी नव विवाहिता छोटी बहन के साथ सुख सुविधाओं से रहित छोटे से कमरे में पर्दा डालकर रहना और अपने बहनोई और अन्य लोगों की बातें सुनना, जीवन में पहली बार उपजे प्रेम को आरंभ में ही कुचल देने से घायल रत्ना को उन्मुक्त आसमान में सांस मिलती है अश्विन की मित्र फैशन डिजाइनर द्वारा अपनी कंपनी में बतौर फैशन डिजाइनर काम पर रखने से| जिस सपने को उसने बरसों से सहेजा हुआ था वह आज पूरा होने की यात्रा आरंभ कर चुका था| उसे पता है अश्विन ने उसकी सहायता की है| घर छोडते हुये अश्विन ने रत्ना से बार बार निवेदन किया था कि उसे उसके लिए कुछ करने दे लेकिन तब रत्ना ने उसे रोक दिया था शायद इस भुलावे में कि वह उसे कुछ धन दे देगा या अपने किसी परिचित के यहाँ काम दिलवा देगा| उसे यह पता नहीं था कि वह ऐसा कुछ कर सकता है जो उसके आत्मसम्मान को सबसे ज्यादा बढ़ावा दे सके| प्रसन्नता से भारी रत्ना अश्विन की बिल्डिंग में जाती है लेकिन उसके अपार्टमेंट पर ताला लगा देख कर निराश हो जाती है|

जब अश्विन ने उसके प्रति अपनी भावनाओं का प्रदर्शन उसके सामने किया था तब चाहा था कि रत्ना उसके प्रति बराबरी का व्यवहार करे और उसे अपने से ऊँचा न समझे लेकिन रत्ना तब ऐसा सोचने में भी असमर्थ थी|

आज अश्विन की बिल्डिंग की अपनी मनपसंद जगह, छत से जब वह दूर तक का नज़ारा देख अपने जीवन की विस्मयकारी यात्रा के बारे में सोच रही है तभी अश्विन का फोन आता है, जो उसने शायद एयरपोर्ट से या अमेरिका से किया होगा| आज़ जब दोनों के मध्य भौतिक दूरी आ गई है तब रत्ना पहली बार अश्विन को ‘सर’ न कह कर ‘अश्विन’ कहती है|

फ़िल्म दोनों को एक समान धरातल पर खड़ा दिखाकर समाप्त ह जाती है लेकिन दर्शकों के सामने बहुत सारे प्रश्न छोड़ जाती है, क्योंकि असली जीवन में तो कहानी अब शुरू होती है|

क्या यह प्रेम कहानी आगे बढ़ती है? प्रेमियों की आपसी स्वीकृति के बाद समाज उन्हें किस दृष्टि से देखेगा? क्या अश्विन रत्ना को लेकर अमेरिका जाएगा जहां ऐसी बन्दिशें नहीं सहन करनी पड़ेंगी? फ़िल्म सब कुछ खुला छोड़ देती है और एक तरह से मुख्य चरित्रों के वास्तविक सामाजिक सघर्ष से बच निकलती है| भिन्न पृष्ठभूमि से आने के कारण उनके आपस में भी मतभेद और संघर्ष हो सकते हैं, लेकिन फ़िल्म बीमार लड़की और हरी पत्ती की पेंटिंग वाली कथा जैसे भाव लेकर समाप्त हो जाती है|

फ़िल्म बेहद धीमी गति से दो मुख्य चरित्रों के एक साथ व्यतीत किए जाने वाले समय को दिखाती है| और आपसी आकर्षण के बावजूद आपस में अटपटेपन को महसूस करने से उत्पन्न संघर्ष को बेहद खूबसूरती से दर्शाती है| संक्षेप में और संकेतों में भारतीय समाज की परतों को फ़िल्म दिखाती जाती है और जैसे रत्ना और अश्विन आपसी आकर्षण में डूब ही जाते है वैसे ही दर्शक को अपने आकर्षण में बाँध ही लेती है|

तिलोतमा ने शानदार और गहराई वाला अभिनय किया है| रत्ना के चरित्र में उन्हें एक जबर्दस्त अवसर मिला था जिसे उन्हों ने भरपूर भुनाया है| रत्ना के चरित्र की बारीकियों को उन्होंने जिस तरीके से उभारा है, उससे आशा बनती है कि भविष्य में उन्हें ऐसे और बेहतरीन मौके मिलेंगे, वरना मीरा नायर की मॉनसून वेडिंग के चमकदार प्रदर्शन और बीच के सालों में कुछ अच्छी फिल्मों में अच्छे अवसर मिलने के बावजूद उनके हिस्से में न्यायोचित चर्चा नहीं आ पाई|

विवेक गोंबर भी अपने चरित्र की सीमाओं के अनुरूप अभिनय करके दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहते हैं|  

निर्देशिका ने छोटी छोटी भूमिकाओं में सभी अभिनेताओं से बेहतरीन काम लिया है और अभिनय के क्षेत्र में फ़िल्म अव्वल सिद्ध होती है|

फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी बेहद प्रभावशाली है और अन्य हिन्दी फिल्मों की सिनेमेटोग्राफी के समक्ष तो बहुत ज्यादा अच्छी गुणवत्ता वाली लगती है|

सिनेमा को कला की ओर ले जानी वाली फ़िल्म है ये|

रोहेना गैरा ने एक बहुत अच्छी फ़िल्म बनाकर अपने आगे के कार्यों के बारे में उत्सुकता जगा दी है|

…[राकेश]