क्या दिलीप कुमार और भारत रत्न के बीच कुछ फासले हैं?

यह तो सर्वत्र स्वीकृत बात है कि हिन्दी सिनेमा में नायक की भूमिकाएं निभाने वाले अभिनेताओं में वे चुनींदा सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में से एक रहे हैं बल्कि हिन्दी सिने प्रेमियों का बहुमत उनको उन श्रेष्ठ्तमों में भी श्रेष्ठ मानता रहा है, उन्हें जो इज्जत इस देश में प्रदान की गयी है वह बिरले लोग ही कमा पाए हैं| गाहे बगाहे ऐसी चर्चाएँ चलती रही हैं कि दिलीप कुमार को “भारत रत्न” से विभूषित किया जाए| भारतीय सिविल पुरस्कारों की श्रेणी में इससे एक ही कदम नीचे के “पद्म विभूषण” पुरस्कार से उन्हें २०१५ में ही विभूषित कर दिया गया था| कहा जाता है २०११ में भी दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन के नाम “पद्म विभूषण” पुरस्कार के लिए चयनित थे लेकिन अमिताभ बच्चन को कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकारों के काल में ऐसे पुरस्कार मिल पाना सन १९९७ के बाद से मुश्किल बात ही रही है सो दोनों के नामों पर कुछ आपतियां लग गयीं और चार साल बाद राजग सरकार के दौर में दोनों को ये पुरस्कार मिले|

सत्यजीत रे और लता मंगेशकर को छोड़ दें तो ऐसे कलाकारों को भारत रत्न नहीं मिला है जिनकी प्रसिद्धि केवल सिनेमा और सिनेमाई संगीत के कारण है| एम् जी रामचंद्रन, एम् एस सुब्बालक्ष्मी, रवि शंकर, बिस्मिलाह खान, भीमसेन जोशी, और भूपेन हजारिका केवल सिनेमा या इसके संगीत से जुड़े कलाकार नहीं थे|

केवल अभिनय के क्षेत्र में कोई कितना भी प्रसिद्द क्यों न हो, ऐसा मुश्किल लगता है कि भारत रत्न उन्हें मिल जाए| वैसे अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार दोनों ही पद्म विभूषण से सम्मानित किये जा चुके हैं और इसके बाद सिर्फ भारत रत्न पुरस्कार ही बचता है|

दिलीप कुमार और भारत रत्न के बीच उनके जीवन से जुड़े कुछ विवाद या उनकी कुछ गलतियां अवश्य ही खड़ी मिलेंगी| ऐसा नहीं कि अन्य भारत रत्न पुरस्कृत लोगों के जीवन किसी भी किस्म के विवादों से परे थे| और ऐसा भी नहीं है कि दिलीप कुमार को भी भारत रत्न मिल जाएगा तो कुछ ऐसा गलत हो जाएगा जो पहले कभी नहीं हुआ| लेकिन उन्हें भारत रत्न नहीं मिलता है या नहीं मिलता है इससे इतर उनके जीवन की कुछ गलतियां तो स्पष्ट ही दिखाई दे जाती हैं, जिनसे उनके स्तर का व्यक्ति बच कर निकल सकता था|

मोहम्मद युसूफ खान उर्फ दिलीप कुमार साहब के साथ कुछ विवादों में से एक रहा – उनका हाजी मस्तान, कभी बम्बई  में अपराध जगत के सरगना, के साथ बैठ कई आयोजनों में शिरकत करना, उसके साथ व्यक्तिगत मुलाक़ात के फोटो खिंचवाना, या उसके कथित समाजसेवी काम में उसकी मदद करना आदि, (तथ्यों के अनुसार हाजी मस्तान के साथ फोटो दिलीप कुमार के समकालीन अन्य अभिनेताओं के भी हैं)| दिलीप कुमार ने अपनी जैसी छवि सिनेमा के परदे पर गढ़ी और सार्वजनिक जीवन में भी दर्शाई, उससे यह स्पष्ट है कि वे स्वयं पर नियंत्रण रखकर हाजी मस्तान से दूरी बनाए रख सकते थे|

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मोहम्मद युसूफ खान उर्फ दिलीप कुमार साहब के साथ कुछ विवादों में से एक रहा – उनका हाजी मस्तान, कभी बम्बई  में अपराध जगत के सरगना, के साथ बैठ कई आयोजनों में शिरकत करना, उसके साथ व्यक्तिगत मुलाक़ात के फोटो खिंचवाना, या उसके कथित समाजसेवी काम में उसकी मदद करना आदि, (तथ्यों के अनुसार हाजी मस्तान के साथ फोटो दिलीप कुमार के समकालीन अन्य अभिनेताओं के भी हैं)| दिलीप कुमार ने अपनी जैसी छवि सिनेमा के परदे पर गढ़ी और सार्वजनिक जीवन में भी दर्शाई, उससे यह स्पष्ट है कि वे स्वयं पर नियंत्रण रखकर हाजी मस्तान से दूरी बनाए रख सकते थे|

उन्हीं के सहकलाकार मित्र देव आनंद ने तो कभी किसी माफिया संग किसी सार्वजनिक जलसे में शिरकत नहीं की, न ही उनके साथ तसवीरें खिंचवाई| हाजी मस्तान भले ही कितने ही समाज सेवा के कार्य में संलग्न रहा हो, पर दिलीप कुमार को उससे जुड़ना जेब नहीं देता था| ऐसा भी कहा गया कि रमेश सिप्पी की शक्ति के निर्माता मुशीर रियाज़ का फिरौती के लिए अपहरण कर लिया गया था और समझौता दिलीप कुमार की मध्यस्थता से हुआ| ऐसा तभी संभव है जब दिलीप कुमार के साथ अंडरवर्ल्ड की ऐसी ताकत हो जिससे बाकी घबराते हों या अपहरणकर्ता दिलीप कुमार के प्रशंसक हों और उन्होंने अपनी साख का उपयोग करके मध्यस्थता की| यह भी संभव है कि उन्हीं दिनों वे बम्बई के शेरिफ भी हों और उस नाते उन्होंने मध्यस्थता की हो| बहरहाल हाजी मस्तान संग मित्रता उनके उजले व्यक्तित्व पर एक दाग सरीखा ही है|

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पत्नी-सायरा बानू, के रहते दूसरा निकाह ‘आस्मा बेग़म‘ से कर लेने से भी उनके व्यक्तित्व पर उजलेपन की चमक धूमिल हुई| इस मामले पर उन्होंने अपनी जीवनी में कुछ प्रकाश डाला है लेकिन वह तर्कसंगत नहीं लगता और आस्मा बेग़म संग उनकी तसवीरें ऐसी गवाही नहीं देतीं जैसी बातें उन्होंने अपनी जीवनीकार को बताईं| पिछले पच्चीस – तीस सालों में जिस तरह सायरा बानू उनकी परछाई की तरह उनके साथ रही हैं, उससे दिलीप कुमार को अपने जीवन का आस्मा बेग़म वाला अध्याय सालता तो रहा ही होगा और इसलिए अपनी जीवनी में उन्होंने सबसे ज्यादा बल्कि अपने से भी ज्यादा सायरा बानू की छवि गढ़ने पर ध्यान दिया है| जीवनी की चर्चा में यह कहना गलत नहीं कि जिस उच्च स्तर की जीवनी दिलीप कुमार जैसी शख्सियत से अपेक्षित थी वह उस लिहाज से बेहद औसत जीवनी है, न रोचक न प्रेरणात्मक|

दिलीप कुमार राजनीतिक रूप से बेहद चेतन व्यक्ति रहे हैं| सिने उद्योग में अपने सामाजिक दायित्वों को भी उन्होंने भरपूर निभाया और हमेशा ही तकनीशियनों और अन्य कलाकारों के हितों के लिए कार्य करते रहे| कांग्रेस पार्टी का साथ उन्होंने बखूबी निभाया और उसके प्रचार के लिए दशकों तक देश भर में दूर दराज के क्षेत्रों की धूल फांकी| लेकिन यह आश्चर्य का विषय है कि जहां राजनीतिक रूप से वे उतने ही चेतन दिखाई देते थे जितने सक्रिय राजनेता जैसे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर लेकिन जब देश में आपातकाल लगा तो दिलीप कुमार के इसके विरोध में सक्रिय होने की कोई सूचना कहीं से नहीं मिलती| चंद्रशेखर तो कांग्रेस के ही युवा नेता थे, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नजदीकी भी थे लेकिन उन्होंने आपातकाल का विरोध विपक्षी नेताओं से ज्यादा ही किया और १८ माह जेल कारावास काटा| दिलीप कुमार के पुराने साथी देव आनंद और प्राण ने अन्य फ़िल्मी कलाकारों के साथ मिलकर आपातकाल का सक्रिय विरोध किया, नेशनल पार्टी भी बनाई जिससे चुनाव लड़ा जा सके| लेकिन लगभग हर मोर्चे पर फ़िल्मी दुनिया में आगे रहने वाले दिलीप कुमार इस परिदृश्य से गायब ही रहे| सुनील दत्त, संजय खान, आदि भी गायब ही रहे| कई मौकों पर चौके छक्के लगाने वाले दिलीप कुमार इस मैच में बैटिंग करने ही नहीं उतरे| सही को सही और गलत को गलत न कहते हुए उन्होंने राजनीतिक दल विशेष के प्रति निष्ठा को देश हित से ज्यादा अहमियत दी| उनका यह चुनाव, उनकी यह निष्क्रियता उनकी राजनीतिक चेतना को पूर्वाग्रही ठहराती है| आपातकाल का विरोध न करना इसका समर्थन करना ही था|

जिस आइडिया ऑफ़ इंडिया और गंगा जमुनी तहजीब की वे बात करते रहे मौके पर उसे जीने और स्वयं के उदाहरण द्वारा उसे सुदृढ़ बनाने से चूकते गए और सारांश में उनकी राजनीतिक चेतना संस्कृति से नहीं बल्कि दल विशेष के प्रति निष्ठा से बंधी ही दिखाई देती रही| दीपा मेहता ने इस्मत चुगताई की कहानी लिहाफ से प्रेरणा पाकर फायर फ़िल्म बनाई जिसमें दोनों मुख्य स्त्री चरित्रों के नाम राधा और सीता रख दिए| यह सीधे सीधे भड़काने वाली हरकत थी| शिव सेना के कार्यकर्ता भड़क भी गए और फ़िल्म का विरोध होने लगा| शायद कहीं कहीं इसे प्रदर्शित भी नहीं होने दिया गया| इस विरोध को गैर संवैधानिक बताते हुए दिलीप कुमार को महेश भट्ट और जावेद अख्तर अपने साथ सुप्रीम कोर्ट ले गए और मुकदमा दायर कर दिया| अच्छा है फ़िल्मी कलाकारों में भी सामाजिक, राजनैतिक चेतना और संवैधानिक अधिकारों के बारे में सजगता रहनी चाहिए| दिलीप कुमार की बाल ठाकरे से दशकों की मित्रता टूट गयी|

समय थोड़ा ही बीता था कि मकबूल फ़िदा हुसैन द्वारा बनाई गई फ़िल्म – मीनाक्षी – ए टेल ऑफ़ थ्री सिटीज़, में ए आर रहमान द्वारा संगीतबद्ध एक कव्वाली पर केरल के किसी छोटे से सम्प्रादयिक संगठन को आपत्ति हो गई और फ़िल्म का विरोध शुरू हो गया| हुसैन साहब ने फ़िल्म ही सिनेमाघरों से उतरवा ली| दिलीप कुमार सामने नहीं आये इस मामले में, जावेद अख्तर और महेश भट्ट से तो किसी को अपेक्षा भी नहीं होगी कि वे न्यायसंगत बात करेंगे| दिलीप कुमार से आशा बंधती थी कि वे सही को सही और गलत को गलत कहेंगे पर वे फिर से मौक़ा चूक गए|

उनसे जुड़ा एक और विवाद कुछ अलग किस्म का है| जिसका खामियाजा हिन्दुस्तान को पिछले सात दशकों से भुगतना पड़ रहा है और न जाने आने वाले कितने दशकों तक शातिर दिमाग वाले फिरकापरस्त लोग उसका दुरूपयोग देश के खिलाफ एक हथियार के रूप में करते रहेंगे| शातिरों से अलग हटें तो मूर्ख किस्म के लोग भी उसे नासमझी में उपयोग में ले लेते हैं और बात को ऐसे बढ़ावा देते हैं जैसे बस सत्य वही हो जो वे जानते हैं|

उनको फिल्मों में काम करना था, लेकिन वे नहीं चाहते थे कि उनके पिता को यह बात पता चले, और संयोगवश उनका असली नाम ‘मोहम्मद युसूफ खान‘ काफी लंबा नाम भी था फिल्मों के लिहाज से,  तो देविका रानी ने, लेखक भगवती चरण वर्मा की मार्फ़त उनको जो नाम सुझाए सुझाए थे उनमें तीन नाम – वासुदेव, जहांगीर और दिलीप कुमार पर ही सबकी निगाहें ठहरी अंतिम नाम चुनने का फैसला भी उनके ऊपर ही छोड़ दिया गया था कि वे किसी एक नाम का चुनाव कर लें|

उन्होंने उस वक्त के सबसे बड़े नाम “अशोक कुमार” के पैटर्न पर ‘दिलीप कुमार‘ नाम छाँट लिया जो कि संयोगवश एक हिन्दू नाम है|

दिलीप कुमार नाम चुनने से ऐसा खतरनाक मिथक पनप गया कि उन्होंने दिलीप कुमार नाम इसलिए रखा कि एक मुसलमान कलाकार के लिए घनघोर रूप से सांप्रदायिक (हिंदू बहुल) देश- भारत में जगह बनाना असंभव होता?

वे ‘जहाँगीर‘ नाम भी तो चुन सकते थे, उनके मुसलमान सम्प्रदाय में जन्म लेने के कारण वो ज्यादा ज़ेब देता उनके  व्यक्तित्व पर| उन जैसा जहीन फनकार किसी भी नाम से फ़िल्में करता ऐसे ही शोहरत पाता|

पर उनके द्वारा “दिलीप कुमार” नाम चुनने के पीछे साम्प्रदायिक भाव होने के मिथक को गढ़ने वाले  फिरकापरस्तों को एक हथियार मिल गया – कि चूँकि उस समय हिन्दू -मुसलमान संप्रदायों में तनाव था सो मुसलमान नाम रखना किसी नये फ़िल्मी कलाकार के लिए लाभदायक नहीं होता| पहले से परेशानियों से घिरे हिन्दुस्तान की परेशानियों में और इजाफा इस मुद्दे से हो जाता है|

चूँकि  यह मुद्दा ‘देविका रानी‘ के साथ उनकी उस बैठक  के समय से आज तक हिन्दुस्तान के खिलाफ उपयोग में लाया जाता रहा है पर कभी ऐसा पढ़ने, सुनने और देखने में नहीं आया कि उन्होंने इस आरोप का खंडन देश में सार्वजनिक तौर पर किया हो, जबकि उनका एक बयान ऐसी अलगाववादी ताकतों, जो देश में सदा ही हिन्दू मुसलमानों के बीच दरार बढाने में लगे रहते हैं, के कुत्सित प्रयासों पर लगाम लगाने में सहायक सिद्ध होता| पर उन्होंने ऐसा किया नहीं| उनके हिंदू सिनेमाई नाम के पीछे सांप्रदायिक तत्व ढूँढने वाले अलगावादी लोग इन बातों के उत्तर खोज लें तो अच्छा हो-

– उनकी पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा‘ आयी सन 1944 में, मतलब यह ठहरता है कि  ‘देविका रानी‘ के साथ उनकी मुलाक़ात कम से कम एक बरस पूर्व 1943 में तो हुयी ही होगी| और सन बयालीस का भारत छोडो आन्दोलन शुरू हो ही चुका था पर पाकिस्तान तो न बना था कि उनके मुसलमान नाम से जगत को समस्या होने लगती और होती तो खुर्शीद कैसे उसी दौरान चर्चित गायिका-अभिनेत्री बन गयीं? उसी के कुछ समय पश्चात मुस्लिम सुरैया को किसने इतना बड़ा स्टार बना दिया?

– एक मुसलमान निर्देशक महबूब खान की ‘रोटी‘ भी सन १९४२ में आ गयी थी, जिसमें शेख मुख्तारअख्तरी बाई फैजाबादी (बेगम अख्तर), और अशरफ खान तीन महत्वपूर्ण भूमिकाओं में थे और गीत लिखे थे ड़ा. सफ़दर आह ने, और फिल्म उस साल की उन फिल्मों में से एक थी जिन्होने चोटी की सफलता प्राप्त की| ये कैसे हो गया अगर माहौल मुस्लिम कलाकार विरोधी था?

– कमाल अमरोही कैसे सफल निर्देशक बन गये उसी दौरान या कुछ बाद में?

– नर्गिस ने कौन सा मेकअप किया कि उनकी मुस्लिम पहचान उनके बड़ा स्टार बनने की राह का रोड़ा न बनी?

– पचास के दशक में फिल्मों में आई वहीदा रहमान ने भी ऐसा क्या रूप धरा कि लोग उन्हें एक बेहतरीन अभिनेत्री के तौर पर बेइंतहा आदर देने लगे?

– साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी, और मजरूह सुल्नानपुरी आदि को तो नाम बदलने की जरुरत न पडी|

– और नौशाद? उन्हें क्यों दरकिनार करा जाये, उन्होंने तो दिलीप कुमार के फिल्मों में आने से पहले ही वहाँ अपने झंडे फहरा दिए थे| किसने उन्हें हर दिल अजीज़ संगीत निर्देशक बनाया?

– मोहम्मद रफ़ी कैसे अपने मुस्लिम नाम के साथ भारत के सबसे बड़े गायकों में से एक बन गये?

 तलत महमूद की मखमली आवाज को बुलंदियों की शोहरत क्या मुसलमानी नाम छोड़ कर मिली?

– के. आसिफ की मुग़ल-ऐ-आज़म कैसे कालजयी फिल्म बन गयी?

– उनके बाद फिरोज खानसंजय खान, और अमजद खान आदि को क्यों नहीं जरुरत पडी नाम बदलने की? इन्हें कैसे सफलता मिल गयी?

– अगर ये सब और इनके जैसे और बहुत सारे मुस्लिम अपने मुस्लिम नाम के साथ ही स्टार बन गये तो एक युसूफ खान के ही मुस्लिमपने में ऐसे क्या सींग लगे थे कि हिन्दुस्तान उनके नाम से भड़क जाता और वे स्टार न बन पाते?

मुद्दे की बात यह कि अगर उन्होंने खुद ही एक हिन्दू नाम अपने सिनेमाई काम के लिए चुना तो यह बात डंके की चोट पर दुनिया से कही क्यों नहीं? उनके सिनेमा में पदार्पण के बाद भी मुस्लिम कलाकारों ने अपने वास्तविक नाम के साथ सफलता पायी|

अभी भी हिन्दी फिल्म उधोग के तीन-चार सबसे बड़े और सफल सितारे – आमिर खानसलमान खानशाहरुख खानसैफ अली खान, अपने वास्तविक मुस्लिम नामों के साथ ही यह सब कुछ नाम, शौहरत, सफलता और धन सम्पदा पा चुके हैं| उन्हें तो कोई अड़चन न आयी बड़ा स्टार बनने में| तो युसूफ खान को ही क्या समस्या आनी थी?

दिलीप कुमार ने इस बात का जिक्र किया लन्दन में महेंद्र कौल को साक्षात्कार देते हुए| ऐसा कहीं भी जिक्र नहीं है कि साम्प्रदायक कारणों से उन्हें दिलीप कुमार– एक हिंदू नाम धारण करना पड़ा| पर भारत में उन्होंने कभी इस मिथकीय गुब्बारे की हवा नहीं निकाली जो कि उनकी तरफ से एक बड़े स्तर की गलती थी|

आज तक जितने भी राजनेताओं को “भारत रत्न” से विभूषित किया गया है उनमें एक भी ऐसा नहीं होगा जिसके पुरस्कार पाने के ऊपर किसी न किसी तरह के किन्तु-परन्तु -लेकिन आदि संशय के बादल न छाए हों| बल्कि “भारत रत्न” के हरेक पुरस्कृत व्यक्ति के साथ कुछ न कुछ विवादास्पद तो अवश्य ही जुड़ा रहा होगा| आखिर सभी मनुष्य ही हैं देवता तो हैं नहीं कि अपने अपने जीवन में उनसे कोई गलती हुई ही नहीं और इस नाते कोई विवाद भी उनके साथ नहीं जुड़ा|

कभी एनसीसी में “सी सर्टिफिकेट” की परीक्षा के दौरान एक केडेट द्वारा सेना में दिए जाने वाले महावीर और परमवीर चक्र पुरस्कारों पर गलत बोलने और सिविल पुरस्कारों का उदाहरण देने और उनसे तुलना करने पर नाराज़ अधिकारी ने टिप्पणी की थी, “भारत रत्न” जैसे पुरस्कार नहीं हैं ये कि राजनीतिक कारणों से किसी को भी दे दिए जाएँ|

अधिकारी की इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि राजनीतिक कारणों से कई बार किसी किसी की किस्मत खुल जाती है और उसे जीते जी ही ठीक ठाक से वक्त पर भारत रत्न मिल जाता है| सचिन तेंदुलकर अवश्य ही एक अपवाद हैं जिन्हें इतनी कम उम्र में चुनाव से पहले आनन फानन में तब की सरकार ने भारत रत्न दे दिया| ऐसा तो है नहीं कि भारतीय क्रिकेट में सुनील गावस्कर और कपिल देव का योगदान सचिन से कम रहा होगा लेकिन दोनों को ही नहीं मिला| कपिल देव का नाम तो मनोज प्रभाकर ने मैच फिक्सिंग के आरोपों में भी घसीट दिया| इसी तरह भारत रत्न मिलने के बाद सचिन का नाम दो बार विवादों से जुड़ा पाया गया एक जब उन्हें भेंट में मिली फरारी कार के ऊपर देय टैक्स का मामला था दूसरा जब उन्होंने इनकम टैक्स में स्वंय को खिलाड़ी न घोषित करके अपने विज्ञापनों की कमाई की बदौलत स्वयं को मनोरंजन उद्योग से जुड़ा बताया| यह सब तो उनके सी ए ने उनसे करवाया होगा लेकिन जनता की निगाहों में दोनों मामले विवादास्पद रहे|

उनसे पहले इंदिरा गांधी को भी पचास साल के आसपास की उम्र में ही भारत रत्न मिल गया था| इसे पाने के बावजूद कुछ ही सालों में वे देश में आपातकाल घोषित करने वाली प्रधानमंत्री बनकर कुख्याति एकत्रित कर गयीं|

भारत रत्न प्राप्त व्यक्तियों की सूची देखें तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता कि दिलीप कुमार जैसी शख्सियत को भारत रत्न नहीं मिलना चाहिए| सर्वश्रेष्ठ तो यही होगा कि जिस तरह हिन्दी सिनेमा के शिखर पर राज-देव-दिलीप की त्रयी ने अपना परचम् लहराया और उनके जिक्र हमेशा एक त्रयी के रूप में ही हुए तो राज-देव-दिलीप को एक साथ संयुक्त रूप से भारत रत्न पुरस्कार से विभूषित किया जाए|

पाकिस्तान ने उन्हें अपना सर्वोच्च सिविल पुरस्कार निशान-ए-पाकिस्तान दिया था लेकिन उसमें राजनीति ज्यादा दिखाई देती है, राज कपूर भी पेशावर के थे, देव आनंद भी लाहौर के थे और दोनों ही दिलीप कुमार से कम प्रसिद्द नहीं रहे पाकिस्तान में लेकिन पाकिस्तान ने उन दोनों के नामों पर गौर करने की भी जहमत नहीं उठाई, बल्कि प्राण और मो. रफ़ी जैसे कलाकार जिन्होंने लाहौर फ़िल्म उद्योग से अपनी शुरुआत की थी उन्हें भी यह पुरस्कार नहीं दिया गया|

भारत, पाकिस्तान से बेहतर कदम उठाते हुए राज-देव-दिलीप की तिकड़ी को संयुक्त रूप से भारत रत्न देने की घोषणा कर सकता है| तीनों का ही सिनेमाई विकास एक तरह से आपस में जुड़ा हुआ ही था|

इन जैसे कलाकार ही नहीं इन जैसी शख्सियतों के इंसान भी आसानी से जन्म नहीं लेते|