बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित फ़िल्म – मंजिल, के इस गीत का फिल्मांकन उस दौर के सामाजिक परिवेश के संकेत देता है| मित्र की शादी के समारोह में उसके घर पर आयोजित पार्टी में वे सबके कहने पर एकदम घरेलू माहौल में गीत गाने बैठते हैं तो सब कुछ बड़ा सहज लगता है| दोस्त की छोटी बहन बड़ी सहजता से उनके पास आकर बैठ जाती है जिससे पता चलता है बड़े भाई के मित्र से उसका वैसा ही स्नेह भरा संबंध है जसा अपने भाई के साथ है|

घर के अन्दर सावन के महीने में नायक (अमिताभ बच्चन), अपने मित्र (अनवर अली) के विवाहोपरांत समारोह में एक ऐसा गीत गा रहा है जिसमें सावन और युवा मनों का सम्बन्ध उपस्थित है| यह घर के अन्दर मौसम के असर के बखान का गीत है| यह मौसम के भारतीय मनुष्य संग सम्बन्ध का गीत है| यह गीत भारतीय मनुष्य के ऊपर सावन के असर का वर्णन है| भारत में सावन पर हजारों लोक गीत होंगे और भारत की हर किस्म की संस्कृति ने सावन और बरखा को भरपूर सांस्कृतिक महत्त्व दिया है|  युवा प्रेमियों के लिए सदैव ही सावन एक महत्वपूर्ण काल रहा है, शायद इसलिए भी कि पुराने कालों में बरखा ऋतू में बाहरी गतिविधियाँ कम हो जाती थीं और घर के अन्दर ही ज्यादा समय लोग व्यतीत किया करते थे| जब वक्त ऐसा ठहराव प्रदान कर दे तो युवाओं को एक दूसरे को जानने समझने का अवसर बेहतर तरीके से मिलता होगा क्योंकि मन में बाहरी जगत के कार्य कलापों के भटकाव नहीं होते थे| बरखा ऋतु से सम्बंधित सभी गीत कवियों द्वारा ठहराव के भावों में रचे गए गीत हैं भले ही उनमें चंचलता का वर्णन ही क्यों न हो|

एक तरह से नायक सावन और युवा दिलों के सम्बन्ध का सामान्यीकरण करते हुए गीत गा रहा है और इसे नवविवाहित जोड़े की भावनाओं की अभिव्यक्ति भी कहा जा सकता है|

रिम-झिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाए मन

भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन

रिम-झिम गिरे सावन…

कबीर की उलटबांसियों सरीखे भाव सावन और युवा मन से जुड़े होते हैं| ठंडे पानी की फुहारों में भी मन के सुलगने का वर्णन बरखा ऋतु के श्रृंगार गीतों में मिला करता है| बरसात में दूसरे या बाहरी जगत अक्सर ही विलीन हो जाया करता है मनुष्य के जेहन से| अगर प्रेमी जोड़ों की बात हो तो वर्षा काल उनके जीवन के युवा दिनों में बहुत से प्रेमी जोड़ों का पसंदीदा मौसम भी हो सकता है|

जब घुंघरुओं सी बजती हैं बूंदे,

अरमां हमारे पलके न मूंदे

कैसे देखें सपने नयन,  सुलग सुलग जाए मन

भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन

रिम-झिम गिरे सावन…

यूँ तो बरखा की बूंदे पानी में पड़ें तो टप्प की आवाज आती है| पर जब झमाझम बरसात की झड़ी लगी हो तो बूंदे ज़मीन या फर्श पर पड़कर मोतियों की तरह चमकती लगती हैं| बूंदों को ज़मीन पर ही पड़ता देखते रहो तो उनके नृत्य में खोये इंसान का कुछ देर में इस पंक्ति – जब घुंघरुओं सी बजती हैं बूंदे, से सीधा नाता जुड़ जाएगा जहां उसे इस पंक्ति की व्याख्या की आवश्यकता नहीं होगी वरन वह जीवांट रूप से इसके मर्म को देख पायेगा, महसूस कर पायेगा|

नायक अपने नवविवाहित मित्र को मानो बरसात के मौसम का भरपूर आनंद उठाने की सलाह काव्यात्मक रूप में दे रहा है| बरसात के इस मौसम में युवा दिलों के अरमान सोने के कारण अधूरे न रह जाएँ| मन सुलगता हो तो नींद कैसे आये और नींद न आये तो ख़्वाब कहाँ से आयेंगे|  

महफ़िल में कैसे कह दें किसी से,

दिल बंध रहा है किस अजनबी से

हाय करे अब क्या जतन,  सुलग सुलग जाए मन

भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन

रिम-झिम गिरे सावन…

इस अंतरे को नायक द्वारा अपने अन्दर नायिका के प्रति आकर्षण जागने के अहसास की दबी छिपी अभिव्यक्ति भी कहा जा सकता है और पारिवारिक गठबंधन वाले परम्परागत तरीके के विवाह में अभी तक एक दूसरे से अनजान रहे नवविवाहित युगल के आपसी आकर्षण की बात करना भी कहा जा सकता है| विवाह के बंधन में वे भले ही बंध गए हों लेकिन एक दूसरे को जानने समझने में समय लगेगा भले ही नए जुड़े रिश्ते के कारण अभी से एक दूसरे के प्रति मोह जाग गया हो|

इस गीत से ठीक पहले सड़क पर नायक को अपना पीछा करने वाला कोई लफंगा समझने की भूल करने वाली नायिका (मौशुमी चटर्जी) के मन के भाव को भी यह अंतरा अभिव्यक्त करता है| कला की यही खूबी है कि उस महफ़िल में बैठे सभी लोगों को गीत अपना ही लग रहा होगा|

योगेश ने एक सरल और साधारण बोल वाला गीत फ़िल्म में इस अवसर के लिए लिखा| गीतों के बोल (योगेश), गीत की धुन (राहुल देव बर्मन) और गायिकी (किशोर कुमार)में सर्वोपरि इसमें गायिकी का सहयोग लगता है| इस गीत को जो अमरता मिली है वह किशोर कुमार की आवाज़ और गायिकी के कारण मिली प्रतीत होती है| किशोर कुमार ने खुले गले की अपनी गायिकी से इस सरल बोलों के गीत को अच्छा स्तर प्रदान किया है|

उस दौर के अपने अतिमानव एवं असाधारण किस्म के चरित्रों से उलट यहाँ एक साधारण मनुष्य के रूप में अमिताभ बच्चन उसी तरह का अभिनय भी करते हैं| सत्तर का दशक उनके अपने अभिनय की रेंज दिखाने का वक्त था और उन्होंने इसे भली भांति भुनाया भी| मंजिल में वे ताजे अभिनय के स्वामी लगते हैं और यह इस गीत में उनके अभिनय से भी स्पष्ट हो जाता है|

बासु चटर्जी और आर डी बर्मन आपस में सलाह कर सकते थे कि जब हारमोनियम की ध्वनि गीत में रहनी ही नहीं है तो क्यों गीत के फिल्मांकन में इसका उपयोग किया जाए? आखिर बिना किसी वाद्य यंत्र के भी परदे पर नायक गीत गा सकता है| इस बात को भारतीय फिल्मों के दर्शक शुरू से ही अपनी स्वीकृति देते आये हैं और यह उन्हें नहीं खलता|