प्रेम, चित्त को अब तक व्यक्ति द्वारा समझी गई सामान्य स्थिति से विचलित करता ही है| चित्त जब प्रेम में पड़ने के कारण विचलन में आ जाए तब दो स्थितियां हो सकती हैं| अगर व्यक्ति प्रेम का प्रत्युत्तर नहीं चाहता, उसकी ऐसी कोई आकांक्षा नहीं कि जिससे उसे प्रेम हुआ है वह भी बदले में उसे प्रेम करे ही करे तो वह अपने भीतर ही इस प्रेममयी स्थिति का आनंद ले सकता है और तब प्रेम की स्थिति “गूंगे का गुड़” के भाव वाली हो जाती है| वह प्रेम रस में सराबोर रहता है| उसे सिर्फ प्रेम करने से ही मतलब है, दूसरा, जिसे वह प्रेम करने लगा है, महत्वपूर्ण तो रहता है लेकिन चूंकि वह उससे उत्तर में कुछ नहीं चाहता तो वह विचलन में धनात्मक दिशा में जाता है| प्रेम उसके मानसिक स्वास्थ्य को नहीं बिगाड़ पाता| प्रेम में मिलने वाला रस उसके तेज को बढ़ा देता है|

पर अगर व्यक्ति अपने प्रेम के बदले प्रेम ही चाहने लगता है तो उसके विचलन की स्थिति बदल जाती है| करेले पर नीम चढ़ा वाली स्थिति तब आ जाती है अगर वह अपने प्रेम के लक्ष्य के समक्ष अपने प्रेम का प्रदर्शन भी नहीं कर पा रहा है, और इस नाते अपने अन्दर दुखी भी रहता है कि उसे बदले में प्रेम कैसे मिल पायेगा? तब व्यक्ति प्रेम के कारण विचलन में ऋणात्मक दिशा में चला जाता है|

इन स्थितियों के मध्य बहुत सी स्थितियों की परते हैं, जिनके अन्दर प्रेमी गण विचरण करते रहते हैं|

गुलज़ार, लता मंगेशकर और विशाल भारद्वाज के इस बरसों पुराने रचे गए गीत, जो फ़िल्म प्रदर्शित न हो पाने के कारण कहीं खो गया था, और जिसे सितम्बर 2021 में लता जी के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में प्रदर्शित किया गया है, की प्रकृति मूलतः और पूर्णतः फ़िल्मी गीत वाली है| जिसके कारण इसे पूर्णतः समझा नहीं जा सकता क्योंकि यह फ़िल्म में किसी चरित्र के लिए किन्ही विशेष परिस्थितियों को दर्शाने के लिए लिखा गया था और इसका फिल्मांकन या तो हो नहीं पाया और यदि हुआ तो वह दर्शकों के सामने कभी नहीं आ पायेगा| गुलज़ार के कुछ फ़िल्मी गीतों को समझना तब जटिल बन जाता है जब उनका फिल्मांकन लोगों तक न पहुंचा हो| इस गीत को पूर्णतः स्वतंत्र गीत की तरह नहीं सुना और समझा नहीं जा सकता| वह कमी इसके काव्य की व्याख्या में रह ही जानी है|

तीनों महारथी हैं सो बेहतरीन बोल हैं, गाया शानदार तरीके से गया है और आकर्षक रूप से इसे संगीतबद्ध किया गया है, सो उस नाते साधारण संगीतप्रेमी को कहा जा सकता है कि गीत का आनंद लो, उसकी व्याख्या क्यों चाहिए? लेकिन चूंकि फ़िल्मी गीत सिचुएशन आधारित रचना होते हैं तो उनके अस्तित्व का सन्दर्भ जानना आवश्यक हो जाता है| “सजन रे झूठ मत बोलो” जैसे गीतों में सन्दर्भ जानने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि फ़िल्म में न भी हो ऐसा गीत, उसकी स्वतन्त्र सत्ता है, जिसके कारण वह कहीं भी श्रोता से सम्बन्ध स्थापित कर लेगा लेकिन “ ठीक नहीं लगता ” जैसे गीत वैसा सहज सम्बन्ध नहीं बना सकते एक ऐसे सामन्य संगीत प्रेमी से, जो गीत के बोलों के अर्थ तक पहुंचना चाह रहा हो|

गीत पर ध्यान न दें और सिर्फ सुनें तो मधुर और आकर्षक गीत है लेकिन अगर बोलों के विश्लेषण में उलझ गए तो गीत कुछ ऐसी समस्याएं उपजा देता है जिनका समाधान जिस फ़िल्म के लिए यह बना था, उसकी कथावस्तु और उस चरित्र की परिस्थितियों को जानने के पश्चात ही मिल सकता है| 

सब ठीक तो है लेकिन, कुछ ठीक नहीं लगता

दिल पास तो रहता है, नज़दीक नहीं लगता

ठीक नहीं लगता, ठीक नहीं लगता, ठीक नहीं लगता, ठीक नहीं लगता 

सब ठीक तो है लेकिन, कुछ ठीक नहीं लगता

उपरोक्त पंक्तियों से, और जैसा इन्हें गाया गया है, ऐसा प्रतीत होता है कि प्रेम में नई-नई प्रवेश करने वाली युवती के उदगार इनसे प्रदर्शित किये गए हैं| अगर इन्हें इस गीत के अंतिम अंतरे के अंदाज़ में गाया जाता तो यह प्रेम में कुछ अरसा व्यतीत करने के पश्चात दो प्रेमियों के मध्य किसी किस्म की दूरी आ जाने के बाद के उदगार भी बन सकते थे| प्रेम के कारण चित्त के कहीं अटक जाने, कहें खो जाने को बेहतरीन शब्दों में गुलज़ार प्रदर्शित करते हैं| सब कुछ उसी तरह ठीक लगता है जैसा प्रेम में पड़ने से पहले लगता था लेकिन अन्दर गहरे में प्रेम में पडा व्यक्ति जानता है कि सब कुछ ठीक नहीं है और उसके चित्त में विचलन आ चुका है| अब कोई दूसरा बेहद महत्वपूर्ण हो गया है और उसकी अपनी स्वतन्त्र स्थिति में एक बड़ा बदलाव आ आया है| उसकी विशुद्ध प्रसन्नता अब किन्हीं बातों पर निर्भर हो गई है|

दिल पास तो रहता है, नज़दीक नहीं लगता

दिल के शरीर में धडकने का अहसास तो नव प्रेमी को रहता है लेकिन उसके दिल का सूक्ष्म शरीर उसके नज़दीक नहीं रह पाटा, वह प्रेमी के सूक्ष्म शरीर की खोज में उसके अस्तित्व से बाहर चला जाता है|

लता जी ने “दिल” शब्द को इस तरीके से गाया है कि दसियों बार हेडफोन के द्वारा सुनने के बाद भी “दिन” सुनने का भ्रम उत्पन्न होता है| वैसे तो इस पंक्ति में दिन भी ठीक लगता है| आखिर नव प्रेमी का समय उसके पास तो लगता है लेकिन उसके नियंत्रण में नहीं रहता उस नाते उसे समय से नज़दीकी का एहसास नहीं ही होता|

जब शाम हो जंगल में

माटी की महक आये

पियू कहाँ कहीं बोले?

हवा हंस के गुज़र जाए

कहने को बहत कुछ है

पर कुछ भी नहीं कहना

इस पहले अंतरे को दो अर्थों में लिया जा सकता है| ये युवती के अपने ह्रदय के उदगार हो सकते हैं और वह प्रेमी की शिकायत में भी इन्हें गा सकती है| पियु कहाँ कहीं बोले, प्रेमी से शिकायत की पंक्ति है तो हवा हंस के गुज़र जाए, हवा द्वारा उसकी स्थिति से छेड़छाड़ करने को बयान करती है,

लेकिन अगली दो पंक्तियाँ, “कहने को बहत कुछ है”, और “पर कुछ भी नहीं कहना” युवती की अपनी स्थिति भी हो सकती है और उसके प्रेमी की भी| या तो युवती के पास कहने को बहुत कुछ है लेकिन वह कह नहीं पाती, या उसका प्रेमी भी बहुत कुछ कह सकता है लेकिन कहता नहीं या कह नहीं पाता और यह स्थिति युवती को कुंठा में डालती है|  

चिंगारियां उडती हैं

खामोश अलाव है

हम दोनों अकेले हैं

सुनसान पड़ाव है

कुछ बात तो है

हमसे,

कुछ बात नहीं होती

कुछ ठीक नहीं लगता, ठीक नहीं लगता, ठीक नहीं लगता, ठीक नहीं लगता, ठीक नहीं लगता   

अंतिम अंतरे की पहली चार पंक्तियाँ ऐसे संकेत देती हैं जैसे प्रेम में रहने की कुछ अवधि के पश्चात दोनों प्रेमियों में कुछ दूरी आ गई हो और मन के अन्दर बात करने के भाव की लपटें तो उठती हैं लेकिन किसी कारणवश वे बीच में जम गई बर्फ को पिघला नहीं पाते|

कुछ बात तो है

हमसे,

कुछ बात नहीं होती

अंतिम पंक्तियां भी द्विअर्थी हैं| “कुछ बात तो है, हमसे कुछ बात नहीं होती“, युवती की स्वयं की या प्रेमी की झिझक को दर्शाती हैं| लेकिन “कुछ बात तो है, हमसे, कुछ बात नहीं होती” उन दोनों की ही एक दूसरे से बात करने में असमर्थता की तरफ इशारे करती है|

बहुत बार गुलज़ार का एक सरल सा प्रतीत होता गीत भी असल में क्लिष्ट ही होता है| वे फ़िल्म की परिस्थितियों का अध्ययन करके गहरे अर्थ में गीत रचते हैं और बिना फिल्मांकन के गीत को समझना मुश्किल हो जाता है| उनका लिखा फ़िल्मी गीत अपने साथ फिल्मांकन के लिए एक स्क्रिप्ट अलग से लिखे जाने की आवश्यकता को दर्शाता है|

इस ख़ूबसूरत गीत में वाद्य यंत्रों से ऐसे संगीत का निर्माण विशाल भारद्वाज ने किया है जिससे लगता है कि यह गीत प्रकृति की गोद में और विशेषकर ऐसे पर्वतीय इलाके में, जहां नदी भी बहती हो और झरने की ध्वनि भी सुनाई देती हो, फ़िल्माया जाना था|

हिन्दी सिने-संगीत के प्रेमी जनों को संगीत के इन तीन महागुणियों ने इस बेहतरीन गीत के माध्यम से एक शानदार उपहार प्रदान किया है|