हिन्दी की सुप्रसिद्ध लेखिका मन्नू भंडारी की लगभग बीस पृष्ठों में समायी कहानी – ‘ यही सच है ’ पर निर्देशक बासु चटर्जी ने दो घंटे से कुछ कम अवधि की एक बेहद रोचक, नाटकीय और दृश्यात्मक फ़िल्म बनाकर सिद्ध किया कि तात्कालिक साहित्य पर भी बेहतरीन फ़िल्म बनाई जा सकती है| “ यही सच है “ आधुनिक काल के शहरी चरित्रों की कहानी है, और बासु चटर्जी ने कथा की मूल भावना को न सिर्फ बरकरार रखा बल्कि उसे सिनेमाई खूबसूरती भी प्रदान की|

फ़िल्म- रजनीगंधा, का संगीत पक्ष बेहद मजबूत और लोकप्रिय रहा है| इस फ़िल्म के गीतों के साथ निर्देशक बासु चटर्जी और संगीत निर्देशक सलिल चौधरी ने प्रयोग किया और गीतों को पृष्ठभूमि में ही रखा गया, और चरित्रों ने उन्हें परदे पर गाया नहीं, हालांकि गीतों में उनके उस वक्त की भावनाएं ही व्यक्त होती हैं|

गीतकार योगेश ने आनंद (1971) से लेकर शौक़ीन (1982) तक लगभग एक दशक के अरसे में हृषिकेश मुकर्जी (आनंद, मिली) और बासु चटर्जी की सभी फिल्मों के लिए गीत लिखे और सलिल चौधरी, सचिन देव बर्मन, पंचम और राजेश रोशन की आकर्षक धुनों से सजी इन सभी फिल्मों को सरल भाषा के प्रभावशाली गीत प्रदान करके इन सभी फिल्मों के संगीत को जन साधारण में लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया|

राग पीलू में संगीतबद्ध इस गीत में एक भी शब्द ऐसा नहीं है जिसे क्लिष्ट कहा जा सके लेकिन तब भी इस गीत को गाना इतना आसान नहीं है| इसमें लता मंगेशकर के गायन का योगदान ही है  जिन्होंने इस गीत में अपनी गायिकी के बहुत से गुण सम्मिलित करके इसे विशिष्ट बना दिया|

लता मंगेशकर के गाये गीतों को टीवी पर और मंचों पर बहुत से नवोदित गायक गायिकाएं गाया करती हैं, लेकिन इस गीत – “रजनीगंधा फूल तुम्हारे…” को गाने का प्रयास बहुत गायक नहीं करते| आजकल के किसी नामचीन गायक या गायिका को लता जी के इस गीत को गाते हुए देख पाना सुखद बात होगी|

लता ने जिस मधुर अंदाज में गुनगुनाने और तत्पश्चात “हाँ” कह कर इस इस गीत को सुरों से सजाया है, वह आरम्भ से ही गीत में ध्यान ही नहीं खींचता बल्कि श्रोता को आनंद के क्षणों में ले जाता है|

विद्या सिन्हा की यह पहली फ़िल्म थी और अमोल पालेकर भी पहली बार हिंदी फिल्मों में कदम रख रहे थे| फ़िल्म में कथा तीन शहरों दिल्ली, कोलकाता, और मुंबई में विचरण करती है| यह गीत दिल्ली में आधारित किया गया है|

रजनीगंधा के फूल और विद्या सिन्हा की परदे पर ताजे खिले फूल सी मुस्कान लिए हुए उपस्थिति इस गीत के फिल्मांकन में एक ताजगी भर देती है और बहुत से दर्शकों को उनकी कल्पना में रजनीगंधा की सुगंध का एहसास होने लगे तो यह बिलकुल संभव है|

दीपा बहुत महत्वाकांक्षी युवती नहीं है| उसे रोमांटिक कहा जा सकता है| वह प्रसन्न रहना चाहती है| वह सुव्यवस्थित है| उसका प्रेमी संजय (अमोल पालेकर) उससे प्रेम तो बहुत करता है लेकिन वह लापरवाह है और दीपा द्वारा उअके प्रेम को स्वीकृत करने के बाद उसे थोड़ा हलके में लेता है कि अपने आकर्षक व्यवहार के बलबूते वह उसे मना ही लेगा| शाम 5.30 बजे आने का वादा करके वह दीपा के घर काफी देर से पहुंचता है और दीपा के मनपसंद रजनीगंधा के फूल भेंट करके और अपनी मीठी बातों से दीपा के क्रोध को शांत कर ही देता है| वह अपने कार्यालय के कार्य से सप्ताह भर के लिए दिल्ली से बाहर जा रहा है| संजय के जाने के बाद, संजय के संग व्यतीत किये गए अच्छे समय के कारण, दीपा का मन प्रसन्नता से तृप्त है और इन्हीं क्षणों में साहित्यिक दृष्टि से अच्छे काव्य से भरा यह प्रेमगीत उसकी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए अस्तित्व में आता है|  

हाँ, यूँ ही महके प्रीत पिया की, मेरे अनुरागी मन में

रजनीगंधा फूल तुम्हारे, महके यूँ ही जीवन में,

हाँ, यूँ ही महके प्रीत पिया की, मेरे अनुरागी मन में

गुनगुनाने के बाद “हाँ” से मोहक अंदाज़ में गायिकी आरम्भ करके, लता, एक पथ पर अपने गायन को चलाते हुए अचानक “मेरे” शब्द को उस पथ से अलग ले जाकर गाती हैं, तो वे जता देती हैं कि क्यों इस गीत को उन जैसा गाना कठिन हो सकता है|  

अधिकार ये जब से साजन का हर धड़कन पर माना मैंने

मैं जब से उनके साथ बँधी, ये भेद तभी जाना मैंने

कितना सुख है बंधन में

मनुष्य मूलतः स्वतंत्रता चाहता है, एक प्रेम में होना ही ऐसी स्थिति है जहां उसे इस बंधन में बंधने में भी आनंद मिलता है| निजी अहं भी आड़े आता ही है, दूसरे के अस्तित्व के अपने होने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाने से लेकिन प्रेम में यह भी संभव हो जाता है| इस स्वयं देखे अनुभव से नायिका का मन आनन्द से विभोर हो गया है| और वह प्रेम में हर समय प्रेमी के सानिध्य में रहने की कल्पना में प्रवेश कर जाती है|

हर पल मेरी इन आँखों में बस रहते हैं सपने उनके

मन कहता है मैं रंगों की, एक प्यार भरी बदली बनके

बरसूँ उनके आँगन में

रजनीगंधा फूल तुम्हारे…

अपने अन्दर उमड़ते प्रेम से आह्लादित नायिका दावा तो कर देती है कि प्रेम की रंगीन बदली बन कर वह प्रेमी के आँगन में बरसना चाहती है लेकिन जब उसके तसव्वुर में उसका प्रेमी उसे अपने पास आने का निमंत्रण देता है तो वह शर्मा कर अपने सपने से बाहर आ जाती है|

लता मंगेशकर के इस खूबसूरत गीत में विद्या सिन्हा ने जिस सहज ढंग से अभिनय किया है उससे यह उनके फ़िल्मी जीवन के तीन प्रतिनिधि गीतों में से एक बन गया है| बहुतों के लिए तो यही उनका प्रतिनिधि गीत है|

किसी भी श्रोता और दर्शक को आनंद प्रदान करने में यह गीत कभी नहीं चूकता|

…[राकेश]