सेठ दामोदर के घर पर!
जवाहर – मैडम, आपको सेठ जी के सभी लाकर्स आदि खुलवाने पड़ेंगे| सेठ जी के कमरे में एक तिजोरी दिखाई दी थी उसकी चाभी है आपके पास?
सुनीता- बैंकों आदि में लाकर्स की जानकारी मुझे नहीं है, लेकिन उनके कमरे की तिजोरी की चाभी वे अपने पास ही रखते थे लेकिन घर आने के बाद अपने कमरे में ही कपड़ों की अलमारी में रख देते थे| चाभी उनके कमरे में ही होनी चाहिए|
जवाहर – सुभाष, सेठ जी का कमरा खुलवाओ| आइये मैडम, सेठ जी का कमरा देखते हैं|
सेठ जी के कमरे में जाकर जवाहर और सुभाष मेज की दराजें इत्यादि खोलकर देखते हैं| सुनीता एक अलमारी खोलकर एक चाभी उठाती है और जवाहर को देती है|
यह है तिजोरी की चाभी|
जवाहर – सुभाष खोलो तिजोरी को और सारा सामान बाहर निकालो|
सुभाष तिजोरी खोलकर सारा सामान बाहर निकलता है| सामान में कुछ जेवरात, नकदी, संपत्तियों संबंधी कागजात, कुछ खाली स्टैम्प पेपर्स, कुछ मुहरें, और एक लिफाफा मिलता है|
सुनीता उस लिफ़ाफ़े को गौर से देखती है और उसे उठाकर जवाहर को देती हुयी कहती है,” मुझे नहीं पता कि सेठ जी की मौत से इसका कोई संबंध है या नहीं पर तकरीबन दो माह पहले यह लिफाफा डाक से आया था| मेरे पति घर पर नहीं थे, मैंने ही इसे रिसीव किया था, और जब शाम को मैंने इसे अपने पति को दिया और उन्होंने लिफाफा खोलकर अंदर का कागज़ पढ़ा तो उनके चेहरे से मानों खून ही निचुड गया था|”
जवाहर – आपके पति के स्वेटर पर धब्बे मिलने के आसपास ही यह लिफाफा आया था?
सुनीता- जी हाँ, शायद दो-तीन दिन बाद ही| उसके बाद तो मेरे पति जैसे किसी अज्ञात शक्ति से लड़ते रहे और अपना बचाव करते रहे| कुछ ही हफ़्तों में उनका शरीर गलकर आधा रह गया था|
जवाहर – आपने पढ़ा नहीं कि अंदर पत्र में क्या लिखा था?
सुनीता– नहीं मेरे पति ने उस समय यह कागज़ मुझे नहीं दिया, उन्होंने स्वयं ही इसे अपनी तिजोरी में रख दिया था| उसके बाद वे अधिकतर इसी कमरे में रहे| और वैसे भी उन्होंने नहीं दिया तो मेरे उसे पढ़ने का कोई औचित्य नहीं बनता| आज अचानक इसे देखकर उस दिन की याद आ गयी जब मैंने उन्हें यह लिफाफा सौंपा था|
जवाहर – सुभाष पढ़ना तो ज़रा क्या लिखा है पत्र में|
सुभाष सभी को स्पष्ट सुनाई दे जाए ऐसी आवाज में पढता है,
“ तुम और बाकी दुनिया ही नहीं अब उसे भी मुझसे कोई जवाब नहीं मिल पायेगा|
मेरी आँखें भी अब कुछ पलट कर प्रसारित नहीं करेंगीं|
मैं अब एक मूक दर्पण हूँ|
देखोगे तो हूँ, नहीं तो हूँ ही नहीं|
सामने आ खड़े हो आँखों में आँखे डालकर तब भी अब मिलने की कोई संभावना नहीं|
मैं अब सबसे मुक्त हूँ|
उसकी चिंता से भी परे|
तुम्हें अपना बचा समय कुछ अच्छाई कमाने में बिताना हो तो उसके प्रति अपनी
जिम्मेदारी निभा देना|
पर अब तुम्हें इस इतने बड़े संसार में उसे खोज कर अपना
दायित्व निभाना पड़ेगा|
मौक़ा था तुम्हारे पास पर अब तक तुमने गँवाया ही है| पाप
धोने का थोड़ा सा वक्त्त है तुम्हारे पास, कोशिश कर सको तो कर लो वरना पाप को
ढोते ही रहना होगा| इतनी चेतावनी जरुर कि पाप का बोझ तुम्हें अब चैन से साँस
भी लेने नहीं देगा”|
जवाहर – किसी का नाम नहीं है, किसने लिखा है? किसको लिखा है?
सुभाष – नहीं बस इतना ही लिखा है, नाम भी नहीं है| लिफ़ाफ़े पर भी भेजने वाले का नाम नहीं है| लिफ़ाफ़े पर केवल सेठ जी का नाम और पता लिखा है|
जवाहर – डाकखाने की मुहर तो होगी लिफ़ाफ़े पर, कहाँ की है?
सुभाष – कुछ स्पष्ट नहीं है, हल्की सी छाप है| इसे पढ़ा नहीं जा सकता| और सर जरुरी तो है नहीं कि लिखने वाले ने इसे वहां से पोस्ट किया हो जहां वह रहता है| साधारण डाक से भेजने के लिए कहीं के पोस्ट बॉक्स में डाल सकता है|
जवाहर, सहमति में सर हिलाकर, सुनीता से पूछता है,” आप कुछ बता सकती हैं, यह पत्र किसने लिखा और भेजा होगा?
सुनीता- नहीं मुझे तो कुछ सुझाई नहीं देता|
जवाहर – जिसने भी लिखा है, इतना तो स्पष्ट ही है इस पत्र से कि वह आपके पति के बहुत नजदीक का व्यक्ति है| नाम नहीं लिखा है पर पत्र का भाव बताता है कि शायद यह पत्र किसी स्त्री ने लिखा है| आपको कतई अंदाजा नहीं कि इसे किसने लिखा है? थोडा सोचिये|
सुनीता- नहीं मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है| मुझसे उन्होंने कभी इस बारे में बात नहीं की|
तभी कमला दरवाजे पर खटखटा कर सुनीता से कहती है, ”मेमसाहब, अकरम और इमरान आये हैं|”
सुनीता – मैं आती हूँ|
जवाहर – ये दोनों कौन हैं?
सुनीता- ये गाँव देहात में सेठ जी के खेतों और बागों का काम देखते हैं| मेरा उनसे सीधा संपर्क नहीं है, कभी कभी बागों में लगने वाले फलों को देने और हिसाब किताब देने सेठ जी के पास आते रहे हैं|
जवाहर – सुभाष, ये सब सामान साथ ले लेना| और कमरा वापिस सील करवा दो| चलिए मैडम मैं भी मिलता हूँ आपके बागों के रखवालों से|
सुनीता और जवाहर नीचे बैठक में आते हैं जहां ग्रामीण वेशभूषा में दो हष्ट-पुष्ट व्यक्ति खड़े हैं| वे दोनों सुनीता देवी को सलाम करते हुए कहते हैं, “ सेठ जी की खबर सुनते ही दौड़े चले आये|”
जवाहर – क्या नाम हैं आप दोनों के और क्या काम करते हैं आप लोग सेठ जी के यहाँ?
“साहब, मेरा नाम इमरान है और ये अकरम है| हम लोग सेठ जी की खेतीबाड़ी और बागों की देखभाल का काम देखते हैं|”
जवाहर – क्या ठेके पर लेते थे सेठ जी से जमीन और बाग़?
अकरम – नहीं साहब, हम तो सेठ जी के मुलाजिम हैं|
इमरान – पर सेठ जी ने कभी हमसे मुलाजिम वाला बर्ताव नहीं किया, हमेशा यही कहते थे, मेरी खेतीबाड़ी तो तुम लोगों की ही है, तुम दोनों न होते तो बिना खेती के सब बंजर हो जाती जमीन| भाई की तरह सब कुछ हमीं पर छोड़ रखा था| सलीम, मेरे बेटे से कितनी मोहब्बत करते थे| जब भी गाँव आते थे, उसके लिए तोहफे लाते थे|
जवाहर – सेठ जी जाते थे वहां गाँव में जमीन और बाग़ आदि देखने?
इमरान – आते थे साहब| कभी कभी तो महीने में दो बार भी आ जाते थे| पर इस साल पिछले लगभग छः महीनों से नहीं आये थे, जब से बीमार पड़े|
अकरम – पिछली बार जब हम ही उनके बीमार होने की खबर सुनकर उनसे मिलने आये थे तो कहने लगे,” अकरम मेरे खेतों और बागों का ख्याल रखना| तुम लोगों को ही संभालने हैं सब खेत खलिहान| हमें दिलासा दिया था कि नफीसा, मेरी बेटी के निकाह का सारा खर्च उठाएंगे| खुदा ने हमारा खैरख्वाह छीन लिया हमसे|”
जवाहर, साथ आये सिपाहियों से कहता है,” इन दोनों के नाम पते आदि डिटेल्स नोट कर लेना|
सुनीता : इसंपेक्टर साहब, सेठ जी की बॉडी आज मिल जायेगी? उनके दाह संस्कार की रस्म पूरी करनी है, फिर अस्थियों को हरिद्वार में गंगा में प्रवाहित करना है|
सुभाष भी तब तक सेठ जी का कमरा बंद करवाकर नीचे आ जाता है|
कुछ पल सोचकर जवाहर कहता है,” मैडम, आप अभी सादे पेपर पर एक एप्लीकेशन लिख दीजिये, सेठ जी के अंतिम क्रियाकर्म करने के लिए उनकी देह लेने के लिए और अस्थि विसर्जन के लिए शहर से बाहर जाने के लिए|”
* * * * * * *
थाने में सुभाष, जवाहर से पूछता है,” सर, सुनीता देवी से एप्लीकेशन लेने की आवश्यकता तो थी नहीं| बॉडी तो उन्हें वैसे ही मिल जानी थी| और न ही वे सस्पेक्ट हैं कि उन्हें बाहर जाने के लिए पुलिस की अनुमति चाहिए|
जवाहर : सुभाष, उस पत्र को सुरक्षित रखना, उसकी कॉपी करके हेंड-राइटिंग एक्सपर्ट को दे दो, और साथ ही सुनीता देवी की लिखावट का नमूना भी| सेठ जी की लिखावट और उनके हस्ताक्षर के नमूने भी एक्सपर्ट के पास जमा कर दो, आगे काम आयेंगे| कहीं न कहीं से तो गेट खुलेगा इस भूल भुलैया में घुसने का|
सुभाष : ठीक है सर| पर सर उलझा हुआ केस है| अभी तो यही निश्चित नहीं कि सेठ की हत्या हुयी है या प्राकृतिक रूप से मौत ले गई उन्हें|
जवाहर : जितना साधारण दिखाई दे रहा है केस, उतना है नहीं| आज जो पत्र सुनीता देवी ने दिया उसने तो केस को और उलझा दिया है| और जिस तरह से सेठ की पत्नी इस मामले में अनभिज्ञता जाहिर कर रही है, उससे मुझे लग रहा है कि वह कुछ न कुछ तो हमसे छिपा रही है| और आज ये खेती बाडी और बाग़ के रखवाले टपक पड़े| शक्ल सूरत और व्यवहार से छंटे हुए लग रहे थे|
सुभाष – हाँ सर, उस पत्र की रहस्मयी भाषा ने तो मुझे चकरा दिया|
जवाहर – सुभाष उस पत्र से यह आभास तो मिलता ही है कि सेठ के जीवन में कोई अन्य स्त्री भी थी| देखो अब सिलेसिलवार तरीके से आगे बढ़ो|…
किसने वह पत्र भेजा और किसने वह गुड्डा भेजा? यह पता लगाना बहुत मुश्किल काम है इस स्टेज पर| लेकिन सुभाष, क्रिमिनल साइकोलोजी कहती है, जब वर्तमान में कुछ सुझाई न दे रहा हो तो भूतकाल में गोते लगाओ| सेठ जी और सुनीतादेवी का जन्म से लेकर अब तक का सारा जीवन निकाल कर लाओ| दोनों के बैंक खातों के डिटेल्स निकलवाओ, देखो पिछले कुछ माह में इन्होने किसी को बहुत बड़ी राशि तो नहीं दी| मुझे लगता है कुछ विस्फोटक मिलेगा इन लोगों के पास्ट में से, जिससे सारी गुत्थियां खुलती चली जायेंगीं|…
सेठ जी के घर और दफ्तर में जितने भी ड्राइवर हैं या पहले रहे हैं, सबकी सूची बना कर सबको इकट्ठा करो, कोई यहाँ से नौकरी छोड़ गया हो उसे भी बुलाओ| वे ही बतायेंगें सेठ जी कहाँ कहाँ जाया करते थे? इन बाग़ बगीचे वालों का इतिहास भूगोल भी खंगालो| फेमिली डॉक्टर और वकील पर भी नज़र रखवाओ| संपत्ति सेठ की बहुत बड़ी है| सेठ की पत्नी के हर मूव पर नज़र रखो|
सुभाष – ठीक है सर, लगता है अब दिन रात यही केस ओढा बिछाया जायेगा|
(शेष)
© …[राकेश]
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October 27, 2023 at 12:59 PM
ye kahan atka ke chhor diya apne story ko. ye aapki adat sahi nahin hai, jaari likh kar chhor dete ho aur fir puran anhin karte. mirza ghalib wala bhi aise hi adhura hai| pfc par bhi aapne kai subject aise hi chhor diye the. pura matter to do readers ko. ab ye police ki investigation mein kya hua ise jane bina reader ko chain kaise milega
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