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Cinema, Theatre, Music, Literature & Life

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May 2025

रेजांग ला की लड़ाई (18 नवंबर 1962) = हक़ीक़त (1964)

परसेप्शन बहुत बड़ी बात है| 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो भारत उसका सैन्य मुकाबला करने के लिए उसके स्तर पर तैयार नहीं था| अंग्रेजों द्वारा कंगाली की कगार पर छोड़ दिया गया देश विकास के मार्ग... Continue Reading →

Mother Teresa : ओशो विश्लेषण

राजनेता और पादरी हमेशा से मनुष्यों को बांटने की साजिश करते आए हैं| राजनेता बाह्य जगत पर राज जमाने की कोशिश करता है और पादरी मनुष्य के अंदुरनी जगत पर|   इन दोनों ने मानवता के खिलाफ गहरी साजिशें मिलकर... Continue Reading →

… मेरा नाम!

फ़िल्मी दुनिया में व्यवसायिक रूप से अपना असली नाम न रखकर, कोई अन्य नाम रखने की प्रथा पुरानी है| कई बार लोगों ने अपने कठिन लगते नामों को सरल रुप देने वाले नाम रख लिए, कभी उनके नाम वाला ही... Continue Reading →

आयातित – स्वदेशी : सोचा न था(2005)- नरेंद्र मोदी

निर्देशक इम्तियाज़ अली की सबसे पहली और सबसे अच्छी फ़िल्म - सोचा न थी, के क्लाइमेक्स में आपसी रिश्ते के लिए "कभी हाँ कभी ना" करते नायक (अभय देओल) और नायिका (आयशा टाकिया) नायक की कम्पनी के मुख्यालय से एक... Continue Reading →

बाबाजी, स्त्री नरक का द्वार नहीं है|

बाबाजी तुम ब्रह्मचारीतुम्हारी सोच के अनुसारऔरत नरक का द्वार। लेकिनमैं तो ब्रह्मचारी नहींदिखने में भीढ़ोंगी- पुजारी नहींमेरे लिये तोहर औरत खूबसूरत हैबशर्ते यह किवह औरत हो। तुमने जिसे नकाराधिक्काराऔर अस्पर्श्य विचारा हैउसके आगे मैंने तोसमूचा जीवन हारा है। मेरी दृष्टि... Continue Reading →

अमृता प्रीतम : मेरे घर का सीधा सा इतना पता है!

आज मैंने अपने घर का नम्बर हटाया हैऔर गली के माथे पर लगागली का नाम हटाया हैऔर हर सड़क कीदिशा का नाम पोंछ दिया हैपर अगर आपको मुझे जरुर पाना हैतो हर देश केहर शहर कीहर गली काद्वार खटखटाओयह एक... Continue Reading →

Begunah (1957) : Booklet

मैं कुर्सी तेरे आँगन की (दीवाना, 14-20 दिसम्बर 1978)

1978 में प्रदर्शित राज खोसला निर्देशित फ़िल्म 'मैं तुलसी तेरे आँगन की' का साप्ताहिक (हास्य) पत्रिका 'दीवाना' में छपा पैरोडी रिव्यू सामने आया| इसमें कलाकारों द्वारा फ़िल्म में निभाये चरित्रों के नामों को बिगाड़ कर इस्तेमाल किया गया है, शायद... Continue Reading →

Socialism, Communism – Osho

समाजवाद और साम्यवाद : वही फर्क करता हूं मैं जो टी.बी. की पहली स्टेज में और तीसरी स्टेज में होता है, और कोई फर्क नहीं करता हूं। समाजवाद थोड़ा सा फीका साम्यवाद है, वह पहली स्टेज है बीमारी की। और पहली स्टेज पर बीमारी... Continue Reading →

पंडित नेहरु और हिंदी फ़िल्में

पचास और साठ के दशक का हिंदी सिनेमा भी नेहरु के विशाल व्यक्तित्व के प्रभाव से अछूता नहीं रहा और हिंदी फिल्मों के नायकों का चरित्र भारत को लेकर नेहरुवियन दृष्टिकोण से प्रभावित रहा और उसमें चारित्रिक आदर्श की मात्रा डाली जाती... Continue Reading →

पंडित नेहरु : श्रद्धांजलि (अटल बिहारी वाजपेयी)

29 मई 1964, राज्यसभा एक सपना था जो अधूरा रह गया। एक गीत था जो गूँगा हो गया। एक लौ थी, जो अनन्त में विलीन हो गयी। सपना था, एक ऐसे संसार का, जो भय और भूख से रहित होगा।... Continue Reading →

पंडित नेहरु और ओशो

ओशो बुनियादी तौर पर ही राजनीतिज्ञों के खिलाफ थे और सारी उम्र वे उनके खिलाफ बोलते ही रहे। उन्हें निशाना बनाते रहे। उनके ऊपर चुटकले बनाकर लोगों को शासकों की इस जाति के सामने मानव को आँखें मूँद कर समर्पण न... Continue Reading →

विफलता : क़ैदी – जयप्रकाश नारायण

काशी

काशी सध नहीं रहीचलो कबीरा!मगहर साधें सौदा-सुलुफ कर लिया हो तोउठकर अपनीगठरी बांधेइस बस्ती के बाशिंदे हमलेकिन सबके सब अनिवासी,फिर चाहे राजे-रानी हों-या हो कोई दासी,कै दिन की लकड़़ी की हांडी?क्यों कर इसमें खिचड़ी रांधे? राजे बेईमानवजीरा बेपेंदी के लोटे,छाये... Continue Reading →

काफ़िर

मैं भी काफ़िर, तू भी क़ाफ़िरफूलों की खुशबू भी काफ़िरलफ्जों का जादू भी काफ़िरये भी काफिर, वो भी काफिरफ़ैज़ भी और मंटो भी काफ़िरनूरजहां का गाना काफ़िरमैकडोनैल्ड का खाना काफ़िरबर्गर काफ़िर, कोक भी काफ़िरहंसना, बिद्दत, जोक भी काफ़िरतबला काफ़िर, ढोल... Continue Reading →

ओशो द्वारा लिखा 54 साल पुराना पत्र

प्रिय, मौन आशीर्वाद है, लेकिन यह मौन तुम्हारे द्वारा रचा नहीं जा सकता| क्योंकि तुम तो स्वयं में शोर ही हो| इसलिए तुम कैसे मौन रच सकते हो? लेकिन तुम मौन का भ्रम अवश्य ही रच सकते हो| और मौन... Continue Reading →

जंग नहीं : अटल बिहारी वाजपेयी

विश्व शांति के हम साधक हैं,जंग न होने देंगे!कभी न खेतों में फिर खूनी खाद फलेगी,खलिहानों में नहीं मौत की फसल खिलेगी,आसमान फिर कभी न अंगारे उगलेगा,एटम से नागासाकी फिर नहीं जलेगी,युद्धविहीन विश्व का सपना भंग न होने देंगे।जंग न... Continue Reading →

गाए –  इस्माइल मेरठी

इस्माइल मेरठी = मोहम्मद इस्माइल Pic - Cow Painting by Nandlal Bose

दो सत्य – ईश्वर और मृत्यु !

दो सत्य बातें कभी भूलनी नहीं चाहियें अगर तुम मुक्ति के लिए उत्सुक हो एक है मृत्यु और दूसरा है ईश्वर! मृत्यु की सच्चाई : इस संसार में हर वस्तु अपनी मृत्यु की ओर अग्रसर है| जिसका भी आरम्भ है उसका... Continue Reading →

भीगा भीगा मौसम आया

हिंदी सिनेमा में नायक-नायिका की भूमिकाएं निभाने वाले अभिनेताओं की प्रसिद्द जोड़ियों में मिठुन चक्रवर्ती और रंजीता कौर की जोड़ी भी रही है, जिन्होंने अपने फिल्मी जीवन के शुरुआती दौर में बहुत सी फ़िल्में एक साथ कीं| यह कहना भी... Continue Reading →

राजनेतागण : न काहू से दोस्ती न काहू से बैर

भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पुण्य तिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, अभिनेता राज बब्बर ने लिखा - [भारत को शुरुआत के 3-4 दशकों में ही 3-4 लड़ाईयां लड़नी पड़ी - आंतरिक उथल... Continue Reading →

भारत में कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग का आगाज़

भारत में कंप्यूटर साइंस की नींव 1950 के दशक में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI), कोलकाता में रखी गई थी, जहाँ 1956 में पहला डिजिटल कंप्यूटर HEC-2M स्थापित किया गया। इसके बाद, TIFRAC (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च ऑटोमैटिक कैलकुलेटर) 1960... Continue Reading →

लफड़ा सदन – न बन पाने वाली फ़िल्म के लॉन्च की कथा

अपने जीवन में पीछे मुड़कर देखता हूँ तो अवसरों भरे उन कुछ दिनों पर निगाहें ठहरती हैं जो  संयोग, सौहार्द और सिनेमाई उम्मीदों से भरे हुए रहे हैं| जैसे 2 अक्टूबर 1976 का चमकीला दिन! उस दिन बॉम्बे के फ़िल्म... Continue Reading →

नसीम बानो : मंटो की निगाह और लेखनी से

सआदत हसन मंटो ने 'गंजे फ़रिश्ते' शीर्षक से एक किताब लिखी थी जिसमें उनके द्वारा हिंदी सिनेमा में बिठाये वक्त के दौरान संपर्क में आये फ़िल्मी दुनिया के लोगों के बारे में संस्मरण थे| कुछ साल पहले पेंग्विन, इण्डिया ने... Continue Reading →

हिंदी – अबू धाबी में न्यायालय की तीसरी भाषा बन ही गई

यशपाल और कम्यूनिज़्म : ओशो

मेरे एक कम्यूनिस्ट मित्र थे- वे वास्तव में बड़े बौद्धिक थे| उन्होंने बहुत सारी किताबें लिखीं, सौ के आसपास, और सारी की सारी कम्यूनिस्ट थीम से भरी हुई, पर अपरोक्ष रूप से ही, वे उपन्यासों के माध्यम से यह करते... Continue Reading →

रंगीले बाबू : दुःख और वेदना पर अट्ठाहस लगाता मानव

बाबू रसिकलाल को मैं उस वक्त से जानता हूं, जब वे लॉ कॉलेज में पढ़ते थे। मेरे सामने ही वकील हुए और आनन-फानन चमके। देखते-देखते बंगला बन गया, जमीन खरीद ली और शहर के रईसों में शुमार में शुमार होने... Continue Reading →

छैनू, श्याम आ गया है !

छैनू के भरोसे पतुनिया के लोगों ने श्याम के एक डेरे पर आक्रमण कर दिया और मार-काट मचाकर कई पुरुषों की ह्त्या कर, स्त्रियों को धमकी दे गए - श्याम को बता देना कि छैनू आया था, बहुत गर्मी है... Continue Reading →

Operation Sindoor : बाल ठाकरे होते तो !

भारत की अतिलोकप्रिय फ़िल्म "शोले" में गब्बर सिंह द्वारा उनके परिवार पर आतंकी हमले के कुछ अरसा बाद बदले की भावना से पीड़ित व परिजनों के सामूहिक क़त्ल के दुःख से कुंठित ठाकुर बलदेव सिंह अपनी सर्द आवाज़ में कहते... Continue Reading →

Operation Sindoor : भारत की विजय या हार !

ऑपरेशन सिन्दूर : भारत कहाँ जीता कहाँ हारा और जहाँ हारा वहां क्यों हारा ? यह एक महत्वपूर्ण स्थिति है| ----------------भारतीय सेना द्वारा सटीक लक्ष्यभेदी पराक्रम दिखाने के बावजूद भारत कहाँ पिछड़ा?भारत कुछ मायनों में पिछड़ गया यह स्पष्ट ही... Continue Reading →

1965 भारत-पाक युद्ध : FTII, ऋत्विक घटक का इस्तीफ़ा, शत्रुघ्न सिन्हा की खिचड़ी

1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान FTII (तब FII) में बेहद कठिन परिस्थितियों में आपसी संबंध पनपने का दौर: एक संस्मरण (HK Verma) [नोट : यह लेख श्री एच के वर्मा के अंगरेजी में लिखे लेख का हिंदी अनुवाद है| HK Verma,... Continue Reading →

महात्मा गांधी : कायरता और हिंसा के बीच चुनाव!

मैं एक पूरी जाति को नष्ट करने का जोखिम उठाने की अपेक्षा हजार बार हिंसा का जोखिम उठाने को तैयार हूँ। हिंसा ही विकल्प : मैं यह मानता हूं कि जहां कायरता और हिंसा के बीच ही चुनाव करना हो,... Continue Reading →

‘कारगिल’ और भारत-पाक शांति प्रयास

पिछली सदी में नब्बे के दशक के अंत में जब भारत और पाकिस्तान अपने अपने परमाणु अभियानों क्रमश: “शक्ति” और “गौरी” की आँच से तप रहे थे तो ग़ालिब के दो सदी बाद मनाये जाने वाले जयंती समारोह “अंदाज-ए.बयां” की मार्फत मशहूर... Continue Reading →

वतन पर खतरे के समय फ़िल्म उद्योग के कर्त्तव्य

सन 1962 में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरु की वैश्विक शांति में आस्था पर चोट करते हुए उनके पंचशील के सिद्धांत को ठुकराते हुए पड़ोसी चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया| अंगरेजी हुकूमत से आज़ादी मिले डेढ़ दशक... Continue Reading →

अशोक और कलिंग युद्ध

एक ही काल, समय और स्थान पर उपस्थित सभी मानवों के ऊपर एक ही बात का असर एक जैसा नहीं होता| एक ही कृत्य में सम्मिलित सभी कर्मियों का योगदान एक समान नहीं होता, बाहर से भले ही एक जैसा... Continue Reading →

जाने वाले सिपाही से पूछो (उसने कहा था 1960) – गीतकार शैलेन्द्र या मख़दूम?

बिमल रॉय निर्मित और मोनी भट्टाचार्जी निर्देशित फ़िल्म - उसने कहा था, हिंदी के लेखक चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' की एकमात्र उपलब्ध कहानी - उसने कहा था, पर आधारित है| सलिल चौधरी के मधुर एवं आकर्षक संगीत से सजी इस फ़िल्म... Continue Reading →

भारत में सिनेमा का पहला विज्ञापन!

जब स्वामी विवेकानंद बाद में बेहद प्रसिद्द हो जाने वाली शिकागो की यात्रा हेतु भारत से शिकागो वाया वैंकुवर पहुँच रहे होंगे तब भारत में सिनेमा अपनी पहली मुंह दिखाई कर रहा था| July 1896 के पहले सप्ताह में जब... Continue Reading →

‘एकाक्षर’ और ‘द्वयक्षर’ श्लोक :  अदभुत कल्पनाशक्ति

सारे जहां का दर्द : प्रधानमंत्रियों की विदेश यात्रा

देश के लिए यह सौभाग्य की बात है या दुर्भाग्य की, मगर यह सच है कि भारत के प्रधानमंत्री के पद का दर्जा कुछ महीनों से बहुत तेजी से उठ गया है। जो साधारण सड़कछाप वोटर इस गलतफहमी में थे... Continue Reading →

जयप्रकाश नारायण का पत्र प्रधानमंत्री पंडित नेहरु के नाम

सन 1962 के सितम्बर माह में कॉमनवेल्थ प्रधानमंत्रियों के सम्मलेन (Commonwealth Prime Ministers' Conference, September 10 to 19, 1962) में भाग लेने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु लन्दन गए थे| उससे कुछ दिन पहले जय प्रकाश नारायण... Continue Reading →

पुरस्कार : दुश्मन राष्ट्र के नागरिक से प्रेम

आर्द्रा नक्षत्र आकाश में काले काले बादलों की घूमड़, जिसमें देव-दुंदुभी का गंभीर घोष। प्राची के एक निरभ्र कोने से स्वर्ण पुरुष झांकने लगा था। देखने लगा महाराज की सवारी। शैलमाला के अंचल में समतल उर्वरा भूमि से सोंधी बास... Continue Reading →

1 मई ‘मज़दूर दिवस’ वाली माँ

सभी माताएं महान होती हैं, अपने बच्चों के लिए वे नाना प्रकार के त्याग करती हैं, अपने बच्चों के लिए वे अपने जीवन को, और अपनी अभिलाषाओं को, काट-छांट कर सीमित बना देती हैं| अपने बच्चों के भविष्य को गढ़ने... Continue Reading →

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