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Cine Manthan

माह

अक्टूबर 2013

यही मेरी ज़िंदगी है (Dev D 2009): MMS के ग्रहण से अंधकार में डूबी चन्दा

देव डी फिल्म का यह गीत अपने आप में एक सम्पूर्ण फिल्म है और यह फिल्म के तीन मुख्य पात्रों में से एक लैनी (Kalki Koechlin) की जीवनकथा को संक्षेप में बयान कर देता है। यह गीत जिस तरह से... Continue Reading →

Dus Tola (2010) : गुलज़ार की सोने की खान से कुछ स्वर्ण-मुद्राएं

दस तोला फिल्म की ज्यादा चर्चा नहीं हुयी पर गुलज़ार साब द्वारा इस सीधी सादी कहानी वाली रोचक फिल्म के लिये ऊँचे स्तर वाले लिखे गये गीत भरपूर ध्यान माँगते हैं। संदेश शांडिल्य ने आकर्षक धुनों से गीतों को ध्वनियाँ... Continue Reading →

Jagte Raho (1956): न जागा है न जागेगा “भारत”

जागते रहो, पूर्वज फिल्म है जाने भी दो यारों और इस जैसी अन्य फिल्मों की। जागते रहो में जाने भी दो यारों की तरह स्पष्ट हास्य भले ही हर फ्रेम में बिखरा हुआ न हो पर जागते रहो का असर... Continue Reading →

Maya (2001) : गढी हुयी सामाजिक कुरीति के नाम कन्या की बलि चढाती फिल्म

सिनेमा एक बेहद सशक्त्त माध्यम है और लिखे अक्षर से एकदम अंजान बिल्कुल अनपढ़ किस्म के व्यक्ति भी इस माध्यम के द्वारा संदेश ग्रहण कर सकते हैं और दिखाये हुये की अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर व्याख्या कर... Continue Reading →

रांझा रांझा (Raavan 2010) : सूफी अद्वैत से फ़िल्मी द्वैत तक

पहुँचे हुये संतो, सिद्धों और सूफियों ने हमेशा अपने और प्रभु के बीच अद्वैत की कल्पना की है या बात की है या दुनिया को बताया है कि आत्मा परमात्मा के साथ एकाकार हो गयी है। वे लगातार स्तुति से,... Continue Reading →

तुम जहाँ हो वहाँ क्या ये मौसम नहीं (Road To Sikkim 1969): प्रेम में शिकायत से तडपते ह्रदय की भावनाएं व्यक्त करते मुकेश

यह बात निर्विवाद रुप से सत्य है कि प्रेमी ह्रदय के उदगार, चाहे वे खुशी से भरे हों या ग़म से, उन्हे प्रकट करने में मुकेश को फिल्मों में गायिकी आरम्भ करने के काल से ही महारत हासिल रही। दुखी... Continue Reading →

तुम महकती जवां चाँदनी हो (प्यासे दिल 1974) : मुकेश के सिरमौर रत्नों में से एक

एक उम्दा गीत हरेक विभाग में उम्दा होता है। बढ़िया बोल, जिन्हे सुनकर श्रोता के अंदर वे कल्पनायें जन्म लेनें लगें जो कि गीत के शब्द उकेरे दे रहे हैं और कर्णप्रिय धुन और गायिकी, जिन्हे सुन श्रोता का मन... Continue Reading →

Road to Sangam (2010) : गाँधी कलश यात्रा

महात्मा गाँधी की अस्थियों से भरा एक कलश उड़ीसा के एक बैंक के लॉकर में रखा रह जाता है और इकसठ बासठ सालों तक कोई उसकी सुध नहीं लेता और अंत में गाँधी जी के परपौत्र तुषार गाँधी कलश को... Continue Reading →

Khela(2008): ऋतुपर्णो घोष, नये अंदाज में

सपनों के पीछे दीवानगी की हद तक भागना जरुरी नहीं कि अच्छे कर्म ही कराये और कई बार “पैशन” ऐसे काम करने के लिये विवश कर देता है जो अगर अनैतिक न भी लगें पर कम से कम किसी देश... Continue Reading →

Well Done Abba (2010): गरीबी और सिलिकॉन इम्प्लान्ट्स के बाजार के बीच फंसे देश की हास्यास्पद स्थिति

“वेल डन अब्बा“ अभाव और समृद्धि के निर्लज्ज प्रदर्शन के दो विरोधी पाटों के बीच पिसते भारत पर व्यंग्य करती एक कहानी को दिखाती है। श्याम बेनेगल इस फिल्म में भ्रष्ट भारतीय समाज में समस्यायों से दो चार होते एक... Continue Reading →

Road Movie (2010): जीना है ज़िन्दगी का धर्म और मर्म

प्रेम को जानने के लिये प्रेम को अपने जीवन में महसूस करना जरुरी है और केवल पढ़ कर या सुनकर इसके बारे में ढ़ंग से नहीं जाना जा सकता। प्रेम को जीकर ही जाना जा सकता है। ज्यादातर मानवीय भावनायें... Continue Reading →

City of Gold (2010) : गरीबी को पटखनी देती अमीरी

महेश मांजरेकर की फिल्म City of Gold अमीरी गरीबी के बीच संघर्ष की राजनीति को दिखाती है। उदारीकरण के बाद से हिन्दी सिनेमा ने गरीब और अमीर के बीच के अन्तर को दर्शाती हुयी फिल्में बनाना बंद कर दिया था... Continue Reading →

Swami (1977): प्रेम का धागा पति से टूटे या प्रेमी से?

नरेन्द्र (विक्रम) और मामा जी (उत्पल दत्त) जीवन में मनुष्य की स्वतंत्रता और जीवन दर्शन पर बातें कर रहे हैं। एक विषय पर मामाजी अपनी पुत्री सरीखी भानजी सौदामिनी (शबाना आजमी), जिसे सब मिनी कह कर सम्बोधित करते हैं, को... Continue Reading →

Peepli Live(2010): न्यू इंडिया और इसके मीडिया के मुँह पर तमाचा लगाता गरीब देहाती हिन्दुस्तान

प्रसिद्ध कवि रामावतार त्यागी की एक कविता की पंक्त्तियाँ हैं जी रहे हो जिस कला का नाम ले ले कुछ पता भी है कि वह कैसे बची है? सभ्यता की जिस अटारी पर खड़े हो, वही हम बदनाम लोगों ने... Continue Reading →

Life Goes On (2009) : यादों और सांस्कृतिक टकराव के चक्रव्यूह

किसी भी परिवार के मुखिया की पत्नी उस घर की धुरी बन जाती है। मुखिया, उसकी संताने सभी लोग उस एक महिला के कारण आपस में जुड़ाव महसूस करते हैं। उन लोगों के आपस में एक दूसरे से अलग विचारधारायें... Continue Reading →

Yeh Saali Zindagi (2011): प्रेम की ख्वाहिश पे दम निकले

ऐसा हो जाता है कि कुछ रचते हुये उस ताने-बाने के कुछ रेशे रचियता को पसंद आ जाते हैं और वह उन्हे बाद में किसी और चीज के बुनने के लिये रख लेता है। उन पुराने रेशों से नये में... Continue Reading →

Tickets(2005): तीन निर्देशक और तीन कहानियां एक ट्रेन में

Tickets की एक खूबी है कि पूरी फिल्म ट्रेन के अंदर फिल्मायी गयी है और इसमें तीन कहानियों का समावेश है जो क्रमशः तीन अलग अलग निर्देशकों, Ermanno Olmi, Abbas Kiarostami और Ken Loach द्वारा निर्देशित की गयी हैं। तीनों... Continue Reading →

Offside (2006) : जीत सिनेमा और स्वतंत्रता की

धरती पर मनुष्य की आबादी का आधा हिस्सा, स्त्रियाँ, भी पुरुषों की तरह जीवन जीने का अधिकार रखती हैं या नहीं? या सारी लोक लाज, सारी नैतिकता, सारे नियम कायदे स्त्री वर्ग के ऊपर ही मढ़ दिये गये हैं और... Continue Reading →

दिल तो बच्चा है जी (Ishqiya 2010) : पाजी दिल के करिश्मे

ये कहना अतिशयोक्ति न होगी कि फ़िल्म की सिचुएशन के हिसाब से ” दिल तो बच्चा है जी ” दशक के सबसे अच्छे दस गीतों में से एक है| एक लिहाज से ये गीत पचास और साठ के दशक के... Continue Reading →

Haat The Weekly Bazaar : सामंतवादी पुरुष समाज में चीरहरण सहने को विवश स्त्री शक्त्ति की विजय गाथा

औरत ने जनम दिया मरदों को, मरदों ने उसे बाज़ार दिया जब जी चाहा मसला कुचला, जब जी चाहा धुत्कार दिया तुलती है कही दिनारो में, बिकती है कही बाजारों में नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में ये... Continue Reading →

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