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Asha Bhosle

Tere Ghar Ke Samne (1963) : सर्दियों की नर्म धूप

अगर ‘तेरे घर के सामने’ को हिंदी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ रोमांटिक कॉमेडी ड्रामाटिक फिल्म न भी माना जाए तो इस श्रेणी की सर्वश्रेष्ठ पांच फिल्मों में इसे शुमार किया जाना किसी भी तरह के संदेह से परे हैं| ‘तेरे घर... Continue Reading →

Bombai ka Babu(1960) : सुचित्रा सेन के लिए देव आनंद सगा भाई है, पर देव सुचित्रा में प्रेमिका खोजता है

देव आनंद अभिनीत राज खोसला दवारा निर्देशित बम्बई का बाबू फिल्म की कहानी में राजिंदर बेदी और एम.आर कामथ ने O Henry की कहानी A Double Dyed Deceiver से प्रेरित प्रसंगों को रखा और इसमें इनसेस्ट के कोण का मिश्रण... Continue Reading →

Khushboo (1975) : रिश्ते में प्रेम, त्याग, इंतजार, दुख और अधिकार की मिली-जुली खुशबू

शरत चंद्र चटर्जी की कहानी पर आधारित खुशबू, एक पीरियड फिल्म है और फिल्म देखते हुए इस बात को ध्यान में रखना जरुरी है क्योंकि आधुनिक दौर की परिभाषाएँ ऐसी फिल्मों पर लागू नहीं होतीं और हो नहीं सकतीं क्योंकि... Continue Reading →

किशोर कुमार : सवेरे वाली कुनमुनी, कुरमुरी लालिमा की छुअन जैसा गायन

चाहे हिमालय के भव्य अस्तित्व का श्रंगार करती हुयी सूरज की किरणें हों या एल्प्स की वादियों की गोद को धीमी नाजुक आँच से मदमाती हुयी सूरज की किरणें हों, सुबह के सूरज की लालिमा के सौंदर्य का कहीं कोई... Continue Reading →

Mausam(2011) : काश अच्छे आगाज़ की तरह अंजाम भी बेहतर दे देते पंकज कपूर

आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता जब जुल्फ की कालिख में घुल जाये कोई राही बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता हँस-हँस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टूकड़े... Continue Reading →

Shaan(1980): शोले की आन, बान और शान में घटोत्तरी

सत्तर का दशक बीत चुका था, अस्सी का दशक धड़ल्ले से आगमन कर गया था। अमिताभ बच्चन सफलता के पुष्पक विमान पर उड़ान भरते हुये हिन्दी सिनेमा में देवाधिदेव होने का मुकाम हासिल कर चुके थे। दर्शक उनकी हर नई... Continue Reading →

एक सौ सोलह चाँद की रातें एक तुम्हारे काँधे का तिल (Ijaazat 1987)

फिक्र तौसवीं ने क्या कभी सोचा होगा कि उनकी कृति प्याज के छिलके का शीर्षक एक फिल्मी गीत के लिये एक रुपक का काम करेगा? पर ऐसा तो सदियों से सिद्ध होता रहा है कि जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ... Continue Reading →

Kissa Kursi Ka : हिंदी सिनेमा की सबसे ज्यादा विवादास्पद फिल्म का इतिहास

हाल ही में दिवंगत श्री राजेन्द्र यादव, हंस पत्रिका के यशस्वी संपादक और प्रसिद्द हिंदी लेखक और चिन्तक, ने कहीं लिखा था कि अब तो अमृत नाहटा इस बात से ही इनकार करते हैं कि उन्होंने कभी "किस्सा कुर्सी का"... Continue Reading →

Ijaazat (1987) : कोहरे में जमीं और आसमां के बीच भीगती ज़िंदगी

इजाज़त के शुरु के कुछ मिनट और कतरा कतरा गाने का फिल्मांकन , दोनों बेहद जिम्मेदारी से भारतीय पर्यटन को बढ़ावा देने का काम कर सकते हैं। हरियाली, पेड़, फूल पत्ते, पहाड़, चटटाने, नदी, आकाश, बादल, सूरज, उजाला, छाया, विम्ब,... Continue Reading →

नमकीन (1982) : चौरंगी में झांकी चली

नमकीन में कहानी के क्षेत्र में गुलज़ार को एक उम्दा कहानी समरेश बसु की तरफ से मिल गयी थी और उस कहानी को उन्होने बड़े ही मोहक, रोचक और प्रभावी अंदाज में दृष्यात्मक बनाकर दर्शकों के सामने एक संवेदनशील फिल्म... Continue Reading →

Swami (1977): प्रेम का धागा पति से टूटे या प्रेमी से?

नरेन्द्र (विक्रम) और मामा जी (उत्पल दत्त) जीवन में मनुष्य की स्वतंत्रता और जीवन दर्शन पर बातें कर रहे हैं। एक विषय पर मामाजी अपनी पुत्री सरीखी भानजी सौदामिनी (शबाना आजमी), जिसे सब मिनी कह कर सम्बोधित करते हैं, को... Continue Reading →

जैसे हो गूँजता सुरीला सुर किसी सितार का (Naulakha Haar 1953) : आशा भोसले के स्वर तो गूंजने ही थे

शुरु से ही आशा भोसले की गायिकी उस ऊँचाई पर उड़ती रही है जहाँ से वह हरेक दौर में सक्रिय बड़े से बड़े संगीतकार को इठलाकर जताती रही है कि जनाब सृष्टि में हम भी श्रेष्ठ गायकों के साथ उपस्थित... Continue Reading →

Angoor (1982) : विशुद्ध हास्य की मधुशाला

करीब सवा चार सदी पहले विश्व प्रसिद्ध लेखक विलियम शेक्सपियर द्वारा रोपे गये अंगूरों के बाग (  Comedy of Errors) से बीसवीं सदी के अस्सी के दशक में अंगूर लेकर गुलज़ार ने अपनी लेखकीय, निर्देशकीय और हास्य-बोध की प्रतिभा के... Continue Reading →

मुरली मेरे श्याम की(1985): कान्हा की मधुर बांसुरी का रस्सावादन वाया गुलज़ार एवम रघुनाथ सेठ

बांसुरी का तन बिल्कुल सीधा है, मन में बड़े बल हैं, कितनी बल खाती भावनाओं का कितनी तरह उच्चारण करती है, गीता के बोल तो बाद में सुने लोगों ने, पहले बांसुरी ने ही श्याम के अधरों से लग के... Continue Reading →

Saudagar (1973): चाहत भी जब व्यापार बन जाये

नारी बिचारी है पुरुष की मारी है तन से क्षुधित है मन से मुदित है लपककर झपककर अंत में चित्त है (रघुवीर सहाय) पतझड़ को ही मौसम की स्थायी अवस्था मानकर विधवा माजू बी (नूतन) किसी तरह जीवन काट रही... Continue Reading →

Teen Deviyan (1965) : जब कुछ नहीं तो ये इशारे क्यों

टैगोर ने कभी लिखा था - A Lad there is and I am that poor groom That is fallen in love knows not with whom यह किशोरावस्था से युवावस्था की दहलीज पर खड़े युवाओं में से कुछ की मनोस्थिति को... Continue Reading →

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