अपनी पीड़ा ही पीड़ा है यह सोच कभी भी ठीक नहीं इस दुनिया में है कौन बचा पीड़ा जिसके नजदीक नहीं सुख याद नहीं रहता सच है युग भी उसमें पल बन जाता पर दुख की फितरत ही ऐसी आता... Continue Reading →
अपनी राहों पर लौट गए मुझसे प्रेमिल मिलने वाले वो रुकते भी तो क्या रुकते मौसम में थे खिलने वाले । वो मिले अचानक साथ चले मौसम था फूले और फले फिर मौसम जैसे बीत गया मिट गए कि जैसे... Continue Reading →
क्षार क्षार होना पड़ता है ज़ार ज़ार रोना पड़ता है कंचन काया का रूप हमेशा दरपन से बाहर था अंटता नहीं किसी आंख में जलवा इतना नाहर था राख हुई उस काया को भी अंजुरी में ढोना पड़ता है पल... Continue Reading →
हर वक्त वक्त को मत कोसो यह एक समान नहीं रहता तुम देखो उसके हाथों में कब तीर कमान नही रहता फिर राह बनाओ अपनी तुम स्वप्निल अरमान नहीं रहता । इससे अच्छा जग में बोलो कोई मरहम कब मिला... Continue Reading →
सही मार्ग पर चलने वाले, ईमानदारी से जीवन व्यतीत करने वाले, अच्छे गुणों के आधार पर अन्य लोगों को पसंद और बुरे गुणों के आधार पर नापसंद करने वाले, और एक व्यक्ति किस तरह का व्यवहार अन्यों से करता है,... Continue Reading →
बहुत प्यार पाया बहुत प्यार खोया बहुत मुस्कराया बहुत बार रोया मगर ज़िंदगी से शिकायत नहीं की। जिसे चाहता था वही खो गया किसी और का वो कहीं हो गया मगर एक बिरवा मुझे दे गया आकाश पीड़ा का... Continue Reading →
समर्थ घर में जन्म न हो तो स्त्री का सौंदर्य उसके लिए सदा वरदान सिद्ध नहीं होता बल्कि बहुधा रूप उसके लिए जीवन पर ग्रहण भी लगा देता है| उम्र भर उसकी बहुत सारी ऊर्जा अपने रूप के कारण स्वयं... Continue Reading →
© कृष्ण बिहारी पेंटिंग : Pierre Bonnard
First Published in - हमारे युग का खलनायक राजेंद्र यादव (संपादक - भारत भारद्वाज, साधना अग्रवाल), 2003 © कृष्ण बिहारी
मृत्य की दौड़ में है धरा पर हर चीज, हर भाव, जीवन में सभी कुछ अनिश्चित है निश्चित है बस एक मृत्यु | कल कल बहती नदियाँ भी सूख जायेंगीं स्थिर दिखाई देतीं चट्टानें रेत बन कर बह जायेंगीं नदियों... Continue Reading →
हिन्दी की प्रसिद्द पत्रिका - निकट, का नया अंक (जनवरी - अप्रैल 2026) "आत्मकथात्मक प्रेम-कथा विशेषांक" है और इसमें सुप्रसिद्ध लेखक प्रियंवद की प्रेमकथा - उस रात की वर्षा में, को भी सम्मिलित किया गया है| प्रियंवद उन लेखकों में... Continue Reading →
कुछ कहानियां पाठक को सन्नाटे के बियाबान में ले जाकर छोड़ देती हैं, जहाँ से उसे अपनी क्षमता के अनुसार इसके प्रभाव से बाहर आने में सफलता मिल पाती है| हिंसा के बारे में हरेक के किसी न किसी किस्म... Continue Reading →
सारे दिन उदास रहने के बादशाम भी अगर उदासी में गुजर जायेऔर हर पलअपनी खामोशी मेंठहर जायेतो लगता है किज़िंदगी का सबसे संवेदनशील हिस्साबगैर छटपटाए मर गया हैया फिरज़िंदगी की नस-नस मेंतेज ज़हर भर गया है। मैं नहीं जानता मेरे... Continue Reading →
कहानी आधारित प्रसिद्द त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका - निकट, ने बीते साल 2024 का अपना अंतिम अंक प्रसिद्द साहित्यकार 'प्रियंवद' के रचनाकर्म पर आधारित किया है| हिंदी साहित्य पढने वालों में से बहुतों ने शायद प्रियंवद का रचा पढ़ा न हो... Continue Reading →
छुआ है जिस दिन से तुमनेमेरा मनसमा गयी है उष्णता तुम्हारीमुझमें। यह गरमी और इस आँच की खुश्बूकहाँ जाये?यह उम्र झूठ बोलने की नहीं हैपैंतालिस की उम्र मेंप्लेटॉनिक/ अदभुत प्रेमहोता नहींऔर जो होता हैलाख कोशिशों के बावजूदसोता नहीं।चाहता है एकांत... Continue Reading →
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