ग़ालिब पारंपरिक रूप से धार्मिक नहीं हैं और न ही जड़ता ने उनके दिलो दिमाग पर कोई असर ही डाला है| अपने एक हिन्दू मित्र के घर अन्य हिन्दू साथियों के संग वे दीवाली के अवसर पर चौसर खेल रहे हैं| मित्र के बेटे द्वारा अपने पिता से अनार जलाने के लिए कहने आने पर ग़ालिब का मित्र तो नहीं जाता पर ग़ालिब को भेज देता है और ग़ालिब खुशी खुशी जाकर मित्र के बेटे को अनार जलाने में सहायता करते हैं और इसी बहाने अपने बचपन की यादों में पहुँच जाते हैं जब उन्होंने शरारतन अपनी बेग़म की चुन्नी में पटाखों की लड़ी बाँध कर उसमें आग लगा दी थी|

अपने एक मित्र के उन्हें छेड़ने पर कि वे किसी रस्मो रिवाज को नहीं मानते, ग़ालिब कहते हैं

“मैं हर रस्मो रिवाज को मानता हूँ इसलिए किसी एक का कायल नहीं हूँ”

सबको टीका लगाने आए पंडित से ग़ालिब कहते हैं

“अरे भाई पुरोहित जी, हम पूजा नहीं करते लक्ष्मी देवी की, पर उसके कायल तो हैं, तिलक हमारे भी लगा दीजिये, बड़ी जरूरत है उसके आशीर्वाद की”

एक मित्र कहता है कि तिलक लगा कर बड़े हसीन लग रहे हैं मिर्ज़ा नौशा| ग़ालिब तपाक से कहते हैं|

पूरा हिन्दुस्तानी लग रहा हूँ| बचपन में मैं बंसीधर के घर पूरियाँ खाने हर पूजा में पहुँच जाया करता था| तिलक लगा कर बंसीधर से ज्यादा हिन्दू दिखता था|

अपने घर किसी हिन्दू मित्र द्वारा भेजी मिठाई देकर वापिस जाते मित्र के सेवकों से रास्ते में ग़ालिब बात करते हैं और उन्हें दीवाली की बख्शीश देते हैं तो सड़क पर चारपाई डाले बैठा एक वृद्ध कहता है,

मिर्ज़ा दीवाली की मिठाई खाएँगे?

जी बर्फी है आप खाएँगे?

मुसलमान होकर?

बर्फी हिन्दू है?

और क्या, मुसलमान है, शिया है सुन्नी है?

और जलेबी? वो किस ज़ात की है? खत्री है या शिया है या सुन्नी?

 

ग़ालिब की पारिवारिक पेंशन का मसला अभी उलझा हुआ है और उस पर अपनी दावेदारी करने वाले ग़ालिब के चचेरे भाई शम्स (परीक्षित साहनी) और इसी पेंशन पर अपना हक जताने वाले हाजी से पहली बार दर्शकों की मुलाक़ात होती है| हाजी और शम्स की मिली भगत भी सामने आती है| दुनियादारी से बेखबर ग़ालिब हाजी द्वारा तैयार दस्तावेजों पर शम्स के कहने पर दस्तखत कर देते हैं| अपनी बेग़म द्वारा इस हरकत पर आपत्ति जताने और दुनियादारी सीखने की सलाह पर ग़ालिब कहते हैं

उनका ईमान वो जानें मैं क्यों अपना ईमान खराब करूँ वो भी एक बटेर चोर के पीछे

बेग़म द्वारा सूचित किए जाने पर कि ईद के दिन उनके बच्चे का जन्म हो सकता है ग़ालिब खुश हो जाते हैं और कक्ष से बाहर निकलते हुये पिंजरे में बैठे तोते से मज़ाक करते हैं

मिट्ठू मियां, तुम्हारे न जोरू न बच्चे तुम क्यों मुंह लटकाए बैठे हो|

शम्स और हाजी ग़ालिब को कुल साढ़े सात सौ रूपये देते हैं| चालबाजी न सोचने समझने वाले ग़ालिब उनमें से साढ़े तीन सौ की थैली हाजी को दे देते हैं इस ताकीद के साथ कि इन रुपयों को वह आगरा में उनके छोटे भाई युसुफ को दे दे|

इस बात पर भी बेग़म ग़ालिब को कहती हैं कि हाजी उस पैसे को हड़प जाएगा और युसुफ को नहीं देगा| ग़ालिब कहते हैं

अरे भाई जब देने में खयानत नहीं की तो पहुंचाने में क्यों करेगा?

ईद पर बंसीधर ग़ालिब से मिलने आए हैं| पर उनके पास ग़ालिब को देने के लिए खुशखबरी नहीं है| ग़ालिब को अपने बच्चे के जन्म के साथ अपनी किताब के छपने की खबर का भी बड़ी बेसब्री से इंतजार था| किताब का छ्पना और किसी प्रतिष्ठित प्रकाशक के यहाँ छ्पना किसी लेखक के लिए उसके यहाँ बच्चे के जन्म लेने जैसा ही भाव लेकर आता है|

ग़ालिब को पहली बुरी खबर मिली है कि कोई भी प्रकाशक उनका दीवान छापने को तैयार नहीं है| ग़ालिब गहरे दुःख से घिर गए हैं| सकते में आ गए व्यक्ति की भांति वे बुत से बने, नीचे आँगन में बच्चे के जन्म लेने संबंधी प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक वस्तुओं की आवाजाही बेग़म के कमरे में होते देखते रहते हैं| जब खड़े-खड़े थक जाते हैं तो बंसीधर के पास आकर कुर्सी पर बैठ जाते हैं| दोनों मित्रों को अब बच्चे के जन्म की प्रतीक्षा है| एक चीख की आवाज सुनाई देती है तो दोनों मित्र सहसा मुस्करा उठाते हैं| ग़ालिब भागकर नीचे पहुँचते हैं|

पर नीचे पहुँचते पहुँचते सारा वातावरण बादल चुका होता है| बेग़म के कमरे के बाहर दीवार से लगी दाई रोटी दिखाई देती है| घबराए ग़ालिब पूछते हैं क्या हुआ|

दाई बताती है कि बच्चा मुर्दा पैदा हुआ, हालांकि बेग़म ठीक हैं|

ग़ालिब पर मानों टनों गाज गिर जाती है| अपने दीवान के बारे में बुरी खबर के बाद बच्चे के बारे में इस मनहूस खबर ने ग़ालिब को गहन दुःख की खाई में धकेल दिया है|

आँगन में खड़े बंसीधर के पास एक पल को ठिठक कर वे ऊपरी मंजिल पर चले जाते हैं| तेज हवा के झौंके से ऊपर मेज़ पर रखे उनके हस्त लिखित दीवान के पन्ने उड़ जाते हैं| एक पन्ने को ग़ालिब अपने हाथों से पकड़ कर उसे देखते रहते हैं|

 

इतने गहरे दुःख में कोई सांत्वना काम नहीं करती, न मित्र द्वारा दी गई न ही किसी करीबी संबंधी द्वारा बँधाया गया ढांढस ही सहारा बन पाता है| ऐसे क्षणों में टूटे दिल को किसी बात से सहारा नहीं मिलता|

वक्त ही धीरे-धीरे जीवन को पटरी पर लेकर आता है|

गहन मित्र होने के नाते बंसीधर इस कडवे सच को समझते हैं| गहरे अवसाद में घिरे ग़ालिब से थोड़ी दूर तो वे बैठे रहते हैं पर पास जाकर ग़ालिब की तंद्रा भंग नहीं करना चाहते| ग़ालिब अपने अंदर छाए अंधेरे से लड़ रहे हैं| दुख, कुंठा और रोष के दैत्य उन पर आक्रमण कर रहे हैं और ग़ालिब उनसे पार पाने की कोशिश में खड़े हैं और उनके टूटे दिल से उद्गार निकलते हैं –

 

दिल ही तो है, न संग-ओ-ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यों

रोएंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों

दिल ईंट पत्थर की इमारत तो है नहीं कि उस पर किसी बात का कोई असर न हो| ज़िंदा व्यक्ति का दिल तो दर्द से कराहेगा ही, रोएगा ही, जीवन में अपने आप ही इतने दुःख आते हैं कि आदमी बार-बार रोये| फिर किसी और को व्यक्ति को सताने की जरूरत ही क्या है| |

ग़ालिब अपने हाथ से पकड़े दीवान के पन्ने को हवा में छोड़ देते हैं|

क़ैद-ए-हयात-ओ-बन्द-ए-ग़म, अस्ल में दोनों एक हैं

मौत से पहले, आदमी ग़म से निजात पाए क्यों

दुःख के लगातार आगमन से जीवन न केवल इसके बंधन से बंधा प्रतीत होता है बल्कि जीवन एक कैदखाने का बंदी लगने लगता है| ग़ालिब एक कड़वे सच की स्वीकृति को बयान करते हैं कि जब तक जीवन है तब तक संघर्ष और दुःख आते ही रहेंगे और अंत तक इनसे व्यक्ति को निजात नहीं मिल पाती|

ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बग़ैर, कौन-से काम बन्द हैं

रोइये ज़ार ज़ार क्या, कीजिये हाय हाय क्यों

दुःखी और टूटे हुये ग़ालिब के बिना भी दुनिया में किसका काम रुकेगा, किसको परवाह होगी कि दुनिया के एक कोने में रहते ग़ालिब पर क्या बीत रही है| दुनिया का कारोबार चलता ही रहेगा| ग़ालिब चाहे फूट फूट कर ही क्यों न रोने लगे, उसकी हाय तौबा से न तो दुनिया और न ही इसे बनाने वाले खुदा को कोई फर्क पड़ने वाला है|

ग़ालिब मोहभंग की स्थिति में हैं| इतने बड़े दुःख की घड़ी से अपने दिल और दिमाग को बिना खँरोच के बाहर निकाल लाने के लिए विकट साहस, स्थिर-प्रज्ञा की स्थिति और हर हालत में संयम और संतुलन बनाए रखने और निरपेक्ष बने रहने का जीवन दर्शन चाहिए| जो बिरले ही किसी मानव में मिल सकता है और जो आध्यात्मिक रास्तों पर न चलता हो ऐसे साधारण मानव में मिलना तो असंभव बात है|

मुंशी प्रेमचंद ने साधारण मनुष्यों में एक ऐसा चरित्र अपनी एक कहानी “रँगीले बाबू” में गढ़ने का प्रयास किया है| वह साहसी तो लगता है पर हठधर्मी भी लगता है जो प्रकृति को चुनौती देता है कि वह कितने ही दुखों को उस पर लाद दे वह हँसते हँसते हर दुःख सह जाएगा|

ग़ालिब रँगीले बाबू सरीखे नहीं हैं| ग़ालिब अपने ऊपर टूट पड़े दुःख के पहाड़ों की सच्चाईयों के सामने विवशता महसूस करते हैं और अपनी भावनाओं को शायरी के माध्यम से व्यक्त करते हैं|

दुःख की इन कठिन घड़ियों से जूझते ग़ालिब के दुःख को नसीरुद्दीन शाह ने बड़ी शिद्दत से प्रदर्शित किया है| उनके द्वारा प्रदर्शित दुःख बेहद वास्तविक प्रतीत होता है|

इस कड़ी में परीक्षित साहनी पहली बार नज़र आते हैं| और हिन्दी फ़िल्मों में अपनाई गई अपनी विचित्र सी संवाद अदायगी की शैली को छोड़ कर यहाँ वे प्रभावशाली अभिनय शैली से शम्स के चरित्र की धूर्तता को मुखरता प्रदान कर देते हैं| जैसा अभिनय वे गुलज़ार के निर्देशन में मिर्ज़ा ग़ालिब में दिखा पाये हैं वैसा अगर अगर अपने अभिनय जीवन की शुरुआत से निरंतर ही फ़िल्मों में दिखाते रहते तो उनकी साख कुछ और ही होती और तब वे बेहतरीन अभिनेता बलराज साहनी की अभिनय विरासत के सुयोग्य उत्तराधिकारी कहलाते|

 

 

…[राकेश]

 

…ज़ारी

मिर्ज़ा ग़ालिब (1988-89) : ‘ग़ालिब का बयान’ वाया गुलज़ार – अध्याय 1

Mirza Ghalib (1988-89): बंसीधर, ज़ौक़ और शहज़ादा ज़फ़र – ईमानदारी और चापलूसी के बीच घिरे ग़ालिब (अध्याय 2)

Mirza Ghalib (1988-89): रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ‘ग़ालिब’ (अध्याय 3)