खोजें

Cine Manthan

माह

सितम्बर 2013

मेरा जूता है जापानी (Shri 420) : बिगड़े दिल फक्कड़ शहज़ादों की ठसक

“I do not want my house to be walled in on all sides and my windows to be stuffed. I want the cultures of all the lands to be blown about my house as freely as possible. But I refuse... Continue Reading →

कहीं बेख्याल होकर यूँ ही छू लिया किसी ने (Teen Deviyan 1965)

ऐसा कोई भारतीय संगीत प्रेमी ढ़ूँढ़े से न मिल पायेगा जो देव आनंद अभिनीत तीन देवियाँ फिल्म के, मो. रफी की नाजुक और मखमली गायिकी से सजे इस गीत को सुने और इसे पसंद न करे। इस गीत को पहली... Continue Reading →

लिखा है तेरी आँखों में (Teen Deviyan 1965) : किशोर कुमार के अद्भुत दौर की शुरुआत

इस गीत से किशोर कुमार हिन्दी फिल्मों में गायन की अपनी दूसरी एवं आधुनिक पारी के श्रीगणेश का शंखनाद करते हैं| हालांकि किशोर कुमार की गायिकी के आधुनिक काल में प्रवेश की झलक Mr. X in Bombay (1964) के गीत... Continue Reading →

Teen Deviyan (1965) : जब कुछ नहीं तो ये इशारे क्यों

टैगोर ने कभी लिखा था - A Lad there is and I am that poor groom That is fallen in love knows not with whom यह किशोरावस्था से युवावस्था की दहलीज पर खड़े युवाओं में से कुछ की मनोस्थिति को... Continue Reading →

Prahaar(1991): जय जवान जय ईमान

नाना पाटेकर द्वारा निर्देशित इकलौती हिंदी फिल्म- प्रहार, दर्शक को झिंझोड़ कर रख देती है। भारतीय सैनिकों पर बनी चंद श्रेष्ठ फिल्मों के समूह में प्रहार भी एक सम्मानित सदस्य बन चुकी है। कम बजट की बाधाओं के बावजूद मिलिट्री... Continue Reading →

Dharm(2007) : दिल न मंदिर, न मस्जिद, न गिरजा, न गुरुद्वारा

अदब आमोज़ है मयखाने का जर्रा-जर्रा सैंकड़ों तरह से आ जाता है सिजदा करना इश्क पाबंदे वफा है न कि पाबंदे रसूम सर झुकाने को नहीं कहते हैं सिजदा करना। बड़ा फर्क है सम्प्रदाय, जिसे लोग गलती से धर्म भी... Continue Reading →

Janam(1985): महेश भट्ट की शानदार आत्मकथात्मक प्रस्तुती

यूँ तो महेश भट्ट ने इंसानी जीवन में जटिल रिश्तों की मौजूदगी पर हमेशा बेहतरीन फिल्में बनायी हैं जिनमें अर्थ, सारांश, जनम, नाम, काश, डैडी, तमन्ना और जख्म आदि महत्वपूर्ण हैं। इनमें भी अर्थ, जनम और जख्म को उनके अपने... Continue Reading →

दुनिया रंग रंगीली बाबा (धरती माता 1938) – के.एल.सहगल की कस्तूरी

पिछली सदी के तीस और चालीस के दशक में समूचा भारत कुंदनलाल सहगल की आवाज़ के मोहपाश में यूँ ही नहीं बंध गया था। के.एल सहगल की संवेदना से भरपूर भावप्रवण गायिकी और गंगोत्री में गंगा के जल जैसा शब्दों... Continue Reading →

Breezy (1973): प्रौढ़ पुरुष के मरू ह्रदय में प्रेम जन्माती किशोरी की प्रेमकथा

निर्देशन के क्षेत्र में Clint Eastwood का तीसरा प्रयास थी Breezy, और Clint Eastwood  पहली बार Western और Thriller  वर्ग की फिल्मों से दूर जाकर पूरी तरह से रोमांटिक फिल्म बना रहे थे। लार्जर- देन-लाइफ वर्ग की फिल्मों के स्टार... Continue Reading →

तू कहाँ ये बता इस नशीली रात में [तेरे घर के सामने(1963)]: एक नशीला रोमांटिक गीत

विजय आनंद द्वारा निर्देशित फिल्म- तेरे घर के सामने, के नायक- राकेश (देव आनंद) और नायिका- सुलेखा (नूतन) द्वारा आपस में प्रेम में होने की आपसी समझ विकसित होने के बाद परस्पर प्रेम के शुरुआती दौर में जब नायिका अपनी... Continue Reading →

The Yellow Handkerchief (2010) : कल, आज और कल को खंगालती प्रेम कहानी

जीवन में प्रेम एक बहुत बड़ी अनुभूति है पर जीवन के अन्य तत्वों या अनुभूतियों की तरह प्रेम में भी सब कुछ स्थायी नहीं होता और इसमें भी उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। एक कला जो नहीं बदलती वह खुद प्रेम... Continue Reading →

सुहाना सफर (मधुमती 1957): प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत कलाकार के उदगार

हरे-भरे वृक्षों की भरपूर जीवंत उपस्थिति से हिलोरें मारते पर्वतीय जंगल, मस्तक ऊँचा ताने खड़ी पर्वत की चोटियाँ, रहस्यमयी गहरी खाइयां, खुशगवार मौसम, गुगुदाकर जाती ठंडी हवाएं, कहीं तो चेहरे को छू-छू जाते बादल के टुकड़े, और कहीं ऊपर साफ... Continue Reading →

Crash(2004): रंगभेद और भेदभाव से भरे समाज की गाथा

ऑस्कर विजेता फिल्म क्रैश रेसिज्म का दंश झेलते अमेरिकी समाज में, जहाँ पात्र गोरे, काले और प्रवासियों के खानों में बँटे हुये हैं, पनप रही कहानियाँ दिखाती है। अपने तनावग्रस्त जीवन में सारे चरित्र कहीं न कहीं किसी न किसी... Continue Reading →

हे मैने कसम ली: मधुमास के सौन्दर्य का प्रतिनिधि गीत

गीत फिल्म बनाने के लिये कतई जरुरी नहीं हैं, न अच्छी फिल्म बनाने के लिये और न सामान्य स्तर वाली या एक बुरी फिल्म बनाने के लिये। ये और बात है कि 40 के दशक से ही हिन्दी फिल्मों में... Continue Reading →

Little Fugitive(1953) : बचपन के दिन और बाल मन

बच्चे वर्तमान में जीते हैं और एक समय में उनका जो भाव होता है वह इतनी अधिक तीव्रता और गहरायी लिये हुये होता है कि उन्हे और कुछ सूझता ही नहीं। एक उम्र होती है जब बच्चे को अगर वह... Continue Reading →

नसीम(1995): अनेकता में एकता की विरासत पर हमले की दास्तान

सईद मिर्जा की फिल्म नसीम कई मायनों में एक महत्वपूर्ण फिल्म है। यह समकालीन समस्यायों पर अपना ध्यान केंद्रित करने से नहीं हिचकिचाती। यह फिल्म एक खास माहौल में जन्मे घटनाचक्रों को अपने कथानक में समेटती हुयी आगे बढ़ती है... Continue Reading →

Achanak (1973) : गुलज़ार का थ्रिलर लैंड

गुलज़ार साब की अपनी बनायी फिल्मों में "लेकिन" और "अचानक" दो ही थ्रिलर हैं। अचानक में गुलज़ार समाज में साधारणतया बसने वाली बेवफाई, कत्ल, नैतिकता और मौत की सजा आदि की परिभाषाओं को खंगालते हैं। "सैंकड़ों को वहाँ जंग में... Continue Reading →

WordPress.com पर ब्लॉग.

Up ↑