Jagjit Singh

कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से
कहीं भी जाऊँ मेरे साथ-साथ चलते हैं
(बशीर बद्र)

मैं रोया परदेश में भीगा माँ का प्यार,
दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार

निदा फाज़ली के ही दोहे –

छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार,
आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार

ये दौलत भी ले लो
ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी

मोहल्ले की सबसे पुरानी निशानी
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी
वो नानी की बातों में परियों का डेरा
वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा
भुलाये नहीं भूल सकता है कोई
वो छोटी सी रातें
वो लम्बी कहानी

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना
वो गुड़िया की शादी पे
लड़ना झगड़ना
वो झुलों से गिरना
वो गिर के संभलना
वो पीतल के छल्लों के प्यारे से तोहफे
वो टूटी हुयी चूड़ियों की निशानी
वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी

बचपन में किये कृत्यों के विम्ब तमाम उम्र मन-मस्तिष्क से नहीं मिटते। बचपन में सिर्फ किये जा रहे कार्य में ही सारी ऊर्जा लगी रहती है इसलिये उन कार्यों की, उन खेलों की, उन शरारतों की और इन सबमें शामिल साथियों की स्मृतियाँ अमिट बन जाती है। उन्हे लौट कर फिर फिर देखना मानव जीवन का एक अभिन्न अंग होता है।

कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना
घरोंदे बनाना बना के मिटाना
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी
वो ख्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी
ना दुनिया का ग़म था ना रिश्तों का बंधन
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िंदगानी

कमोबेश हरेक मानव बचपन में इन सब कृत्यों और खेलों में शामिल रहता है और बचपन के इन विम्बों को बुलाया नहीं जा सकता और कहना फिजूल ही लगता है कि सुदर्शन फाकिर और जगजीत सिंह के इस गीत को कभी नहीं भुलाया जा सकता।

ऑडियो संस्करण

फिल्मी संस्करण जो महेश भट्ट की लगभग अज्ञात रह गयी फिल्म आज में प्रयुक्त किया गया था।

और इसी अनूठे गीत को श्रोताओं के सामने प्रस्तुत करते जगजीत सिंह

…[राकेश]


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