वर्तमान में गुलज़ार साब की फिल्मों को जब जब देखा जाता है, तब तब उनके अपने सिनेमाई क्लब के तीन सदस्यों क्रमशः संजीव कुमार, किशोर कुमार और राहुल देव बर्मन, का फ़िल्मी परिदृश्य पर न होना बेहद खलता है| गुलज़ार की फिल्मों से इतर भी तीनों के अपने अपने क्षेत्रों में महान अस्तित्व थे और तीनों जब जब साथ हुए तब तो उन क्षणों में आसमान से बस नगीने ही बरसे|

फ़िल्म नमकीन ( https://cinemanthan.com/2013/11/01/namkeen1982/ ) के दो वैकल्पिक अंत हैं और एक संस्करण में इस गीत के साथ ही फ़िल्म समाप्त हो जाती है| और दूसरे संस्करण में इस गीत के बाद भी नायक गेरुलाल (संजीव कुमार) के जीवन की कुछ और घटनाएं सामने आती हैं| दोनों ही अंत आकर्षक लगते हैं|

राह पे रहते हैं यादों पे बसर करते हैं

खुश रहो अहले वतन

हम तो सफर करते हैं

गीतकार गुलज़ार का उनके ही द्वारा निर्देशित फ़िल्म नमकीन के लिए लिखा गीत – राह पे रहते हैं, एक बहुउपयोगी किस्म का है| इसका मुखड़ा इसे आसानी से यात्रा करते भगत सिंह या सुभाष चन्द्र बोस जैसे महान क्रांतिकारी द्वारा अपने मनोभावों को प्रकट करने के लिए गाया गीत बनाता है, और यह जीवन में प्रेमभाव के कारण चोट खाए नवकेतन की फ़िल्म – हम दोनों, के नायक का गीत भी हो सकता है जब वह सेना में भर्ती हो गया है,  यह नवकेतन की एक अन्य कालजयी फ़िल्म – गाइड, में जेल से निरुद्देश्य भटकते और विरक्ति के भावों से जूझ रहे राजू का भी गीत हो सकता है और आसानी से “वहां कौन है तेरा” के बदले वहां बस सकता है|

इसे फ़िल्म हीर रांझा में विवाह करके दूर चली गई हीर की याद में यहाँ वहां भटकते रांझा का गीत भी बनाया जा सकता है और इसके कारण “ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं” की कमी महसूस नहीं होगी|

वैसे भी एक प्रेमी, एक सैनिक, एक क्रांतिकारी और संन्यास की ओर मुड़े व्यक्ति के मानसिक भावों में बस एक धागे भर का अंतर होता है| एक कदम की बात होती है और इन चारों श्रेणियों में इंसान का आवागमन हो सकता है| अक्सर ही एक क्रान्तिकारी, जो अपने उद्देश्य में सफलता न प्राप्त कर पा रहा हो, प्रेमी बन जाता है| एक प्रेमी घायल मन के कारण एक योद्धा के भाव से भरकर किसी संघर्ष की ओर मुड़ जाता है और यह संघर्ष उसे क्रान्ति या संन्यास की ओर बड़ी आसानी से ले जा सकता है| ज़िंदगी द्वारा दिखाई कलाओं से दिल-जले और दिल-भरे भावों से गुज़र रहे चरित्र का गीत है यह|

पहाड़ के इस छोटे से गाँव के केवल महिलाओं वाले घर में गेरुलाल के कुछ महीनों के लिए किरायेदार बन कर आने से पहले भी परिवार जी ही रहा था| दुखों का ढेर उनके जीवन पर बोझ बने बैठा रहता था| गेरुलाल की भी कोई अपेक्षा इस घर में आकर रहने से पहले नहीं थी| कुछ ऐसे तार मिले गेरुलाल और इस घर के माहौल के बीच कि दोनों पक्षों में कितने सपने जन्मने लगे और अब गेरुलाल की अचानक विदाई की बेला ने वियोग और दुःख का आक्रमण गेरुलाल और तीन स्त्रियों के जीवन पर ऐसे किया कि चारों लोग हतप्रभ रह गए दिखाई देते हैं।

अक्सर ही जाने वाले के सामने कुछ कर्तव्य होते हैं और वे उस कर्तव्य के निर्वाह के कारण अपने मनोभावों को नियंत्रित करके आगे चलते जाते हैं| पीछे छूट जाने वाले व्यक्तियों के दुःख हदों से बाहर निकल जाते हैं लेकिन यहाँ निर्देशक गुलज़ार ने निश्चित किया कि इस परिस्थिति का वर्णन वे गेरुलाल के मनोभावों के द्वारा करें|

गेरुलाल एक ट्रक ड्राइवर है और जिसका काम ही यात्रा करना रहा है| इस गाँव में चंद महीनों के प्रवास से पूर्व शायद उसे इस काम और अपने जीवन से इतनी समस्या न हुयी हो जैसी इस बार हो गयी है| अनवरत यात्रा करते मुसाफिर के खाते में ठहराव के क्षण दर्ज हो जाएँ तो उसके जीवन और इसे जीने के दर्शन में परिवर्तन आना अनपेक्षित नहीं है|

गेरुलाल गाँव छोड़ कर जा रहे हैं और पीछे रोती हुयी मिट्ठु (शबाना आजमी) और दुखी लेकिन क्षुब्ध चिनकी (किरण वैराले) और गहन दुःख के कारण छिपी सी खड़ी निमकी (शर्मिला टैगोर) को छोड़ कर आये हैं|

गेरुलाल ऐसे ही चले जा रहे हैं जैसे घर की बड़ी बड़ी जिम्मेदारियों के बावजूद घर आये किसी सैनिक को तुरंत ड्यूटी पर रिपोर्ट करने का आदेश मिले और उसे जाना पड़े| मजबूरियों के बोझ तले दबे व्यक्तियों को भी अपने सपनों को अलग हटा कर भी जीवन को आगे चलाना होता है। दिल भले ही  दुख, रंज, कुछ न कर पाने की विवशता, जीवन के विराट प्रदर्शन के समक्ष अपने बौने अस्तित्व की स्वीकार्यता आदि से भरा हो लेकिन आगे तो बढना ही होता है। पैर भले ही टनों बोझ से लदे और बोझिल लगें लेकिन तब भी चलना होता ही है|

दिल तो गेरुलाल का इतना भरा हुआ लगता है कि या तो कोई ज़रा सा हाल पूछ ले तो रोना शुरू कर दें या कहीं एकांत में ट्रक खड़ा करके ईश्वर से शिकायत करता रुदन ओढ़ ले| गेरुलाल के ऐसे  भावों को संजीव कुमार ने प्रदर्शित भी पूरी गहनता से किया है| संजीव कुमार को यहाँ एक पढ़े लिखे या शायद लगभग अनपढ़ ड्राइवर की भूमिका में इतना रमा देख आसानी से विश्वास नहीं होता कि इसी अभिनेता ने गुलज़ार की पिछली तीन फिल्मों परिचय, आंधी और मौसम में कितने अलग किस्म के चरित्र निभाये थे|

जल गये जो धूप में तो साया हो गये

आसमां का कोई कोना ओढ़ा सो गये

जो गुज़र जाती है बस उसपे गुज़र करते हैं

राह पे रहते हैं यादों पे बसर करते हैं…

दो अनपेक्षित या पहले से न सोची जा सकने वाली वस्तुओं/छवियों की तुलना या उपमा गढ़ने में गुलज़ार एक लाजवाब गीतकार हैं|

जल गए जो धूप में तो साया हो गए

मुसाफिर/यात्री का सामना प्रकृति के आवरणहीन रूपों से न हो ऐसा संभव नहीं| धूप या रोशनी की उपस्थिति में ही सायों का जन्म होता है| धूप में धरती पर खड़े पेड़ छाँव का जो निर्माण करते हैं वे उनके साए ही हैं| खुद धूप की तपिश झेल कर पेड़ जीव जंतुओं के लिए छाँव निर्मित करते हैं| ऐसी ही एक छवि गुलज़ार गढ़ते हैं| उनकी रची पंक्तियाँ बहुधा बहुअर्थी ही होती हैं| इस पंक्ति को शब्दश: भी लिया जा सकता है और विभिन्न अर्थ भी पाठक/श्रोता/दर्शक, अपने अपने अनुभव अनुसार खोज सकता है|

आसमां का कोई कोना ओढ़ा सो गये

यात्री राह में कहाँ थकान से चूर होकर निद्रा की शरण में चला जाए यह निश्चित नहीं होता और बहुत बार उसे खुले आसमान के नीचे भी सोना पड़ सकता है| उसी एक छवि को बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति देते हैं, और आसमां का कोना ओढ़ कर सोने की छवि गढ़ते हैं|

जो गुज़र जाती है बस उसपे गुज़र करते हैं

यात्री का जीवन सीमितताओं और अनिश्चितताओं से भरा होता है और अगर कोई नए व अनपेक्षित को स्वीकृति न दे पाए तो ऐसा रूढ़ व्यक्ति यात्री नहीं बन सकता| यूँ तो एक यात्री का अनुभव कोष विशाल होता है लेकिन ठहराव वाला जो एकत्रित एक गृहस्थ या एक जगह जमे व्यक्ति के पास होता है उससे कह वंचित रहता है| उसके पास अनुभव का जो खजाना होता है वह छोटे छोटे समय खण्डों से उपजी यादों का भण्डार होता है| उसका अपना नियंत्रण उन घटनाओं पर बेहद कम होता है जिनसे उसके अनुभाव उपजते हैं और यादें बनते जाते हैं| जो उसके साथ घटता जाता है वही उसकी यादें बनता जाता है| कुछ यादें दिल के करीब हो जाती हैं जिनके भरोसे जीवन आगे चलता रहता है|  

उड़ते पैरों के तले जब बहती है ज़मीन

मुड़के हमने कोई मंज़िल देखी ही नहीं

रात दिन राहों पे हम शामो सहर करते हैं

राह पे रहते हैं यादों पे बसर करते हैं…

तेज गति से दौड़ते वाहन पर बैठ सामने देखने पर ऐसा ही लगता है कि ज़मीन पीछे बहती जा रही है और वाहन उड़ा चला जा रहा है| यात्री पीछे छूटती मंजिलों से इसलिए नहीं बंध पाता क्योंकि उसे अपने कर्म का पूरा आभास होता है कि उसका काम ही चलते जाना है| यात्री के लिए कहाँ शाम होती है और कहाँ वह पौ फटे पर जा पहुंचता है इस बात के कोई मायने नहीं होते वह बस चलता जाता है और ये पड़ाव आते रहते हैं| कहीं, उसके पहुँचने के लक्ष्य निर्धारित होने के कारण उसका सारा ध्यान उस तरफ रहता है कहाँ रात गुजारी कहाँ सवेरा हुआ जैसी बातें कम महत्त्व की हो जाती हैं|

ऐसे उजड़े आशियाने तिनके उड़ गये

बस्तियों तक आते आते रस्ते मुड़ गये

हम ठहर जायें जहाँ उसको शहर कहते हैं

यात्री के पड़ाव इतने कम समय के होते हैं कि उन्हें वह रमना भी नहीं कह सकता, घर या आशियाना बसाने की बात तो कैसे कहे| एक पंछी तिनके तिनके ला लाकर अपना घोंसला बनाता है और कभी कभी आंधी तूफ़ान उसके आशियाने को नष्ट कर देता है और तिनके जो उसने बड़े श्रम से एकत्रित किये थे यहाँ वहां उड़ कर बिखर जाते हैं| अगर गेरुलाल के मन ने इस गाँव में कोई आशियाना बना या बसा लिया था तो वक्त के थपेड़े ने उसे तोड़ दिया है|

यात्री इतना चलता है और कहीं भी इतने कम समय के लिए ठहरता है कि बस्तियों तक उसकी राह नहीं पहुँचती और इससे पहले कि बस्ती से उसका परिचय हो उसे कहीं और जाने के लिए चल देना होता है| इसे चित्र में चित्रित करना हो तो बस्ती के बाहर से निकला रास्ता, जिसे बायपास के रूप में परिभाषित करना श्रेष्ठ होगा, एक मोड़ के रूप में अंकित करना होगा| बस्ती आई और थोड़ा पहले ही राह मुड़ गयी|  

यात्री तो जहां ठहर जाए वही उसके लिए शहर होता है|

राह पे रहते हैं यादों पे बसर करते हैं

खुश रहो अहले वतन हो हम तो सफर करते हैं

गाँव में केवल चार स्त्रियों वाले घर में इतना ज्यादा ठहराव है कि वह पुरातन तालाब लगता है जबकि गेरुलाल का जीवन एक बहता दरिया है जिसने ठहरना सीखा ही नहीं और जब इन दो स्थितियों का संगम होता है तो स्थिर तालाब में भी विक्षोभ उत्पन्न होता है और बहते दरिया का बहाव भी बाधित होता है| प्रवाह के बाधित होने से प्रभावित मनोभावों को यह गीत प्रभावशाली अभिव्यक्ति प्रदान करता है|

अपने दुःख और ख्यालों में खोये हुए ट्रक चलाते गेरुलाल को संजीव कुमार बड़ी शिद्दत से परदे पर प्रस्तुत करते हैं| स्टीयरिंग व्हील पर यांत्रिक तरीके से चलते गेरुलाल के हाथ और मन का कहीं खोया रहना, जहां आँखें देखती तो बाहर हैं पास असल में वे भीतर कुछ देख रही होती हैं, इन हरकतों को प्रदर्शित करने में इतनी सच्चाई है कि इस बात को स्वीकारने में मुश्किल होती है कि संजीव कुमार वास्तव में अभिनय कर रहे हैं| जिस तरह से वे एकदम से होश से में आकर सामने देखते हैं वह उनकी अभिनय कला की उंचाई को दर्शाता है|

पहाड़ की बल खाती सड़क, बहती नदी, पनचक्की, पहाड़ और खाइयां, और टूट चुकी सड़क, जिस पर रोड़ी दिखाई दे, पर डगमग चलते ट्रक को देख पहाड़ का जीवन जीवंत हो उठता है| निर्देशक गुलज़ार के अन्दर एक सच्चे पर्वत प्रेमी कलाकार की आत्मा का वास है ऐसा उनकी सभी फ़िल्में दर्शाती हैं|

किशोर कुमार ने खुले गले से इस गीत को इस अंदाज़ में गाया है कि यात्री के जीवन के रोमांच और उसके दुःख दोनों का समावेश उनकी गायिकी में स्पष्ट दिखाई देता है|

कलाकार गुलज़ार की यात्रा के सहयात्री संजीव कुमार, किशोर कुमार और पंचम अगर तब उनका साथ न छोड़ते जब उन्होंने छोड़ा तो गुलज़ार साब का यात्रानामा बहुत ज्यादा समृद्ध होता ही होता|

…[राकेश]