मार्च 4, 2016

Shalimar (1978) : हॉलीवुड और हिन्दी सिनेमा के संगम की भव्यता से बनी फिल्म की निर्माणगाथा

Shalimar2-001हॉलीवुड के अभिनेताओं Rex Harrison एवं John Saxon तथा ग्लैमर की प्रतीक अभिनेत्री Gina Lollobrigida, और प्रसिद्ध सिनेमेटोग्राफर Harvey Genkins को बम्बई लाकर अगर कोई निर्देशक इस बात की घोषणा करे कि इन विश्व प्रसिद्ध सितारों और हिन्दी सिनेमा के तत्कालीन प्रसिद्ध बड़े सितारों को लेकर वह एक बड़े बजट की फ़िल्म दो भाषाओं, हिन्दी एवं अंग्रेजी में बनाने जा रहा है, तो हिन्दी सिनेमा के उधोग में बवंडर मचना स्वाभाविक है| सन 1977 के साल हिन्दी सिने-संसार में उत्तेजना और हलचल मचाने वाले थे हॉलीवुड से बम्बई पधारे युवा फिल्मकार, नाटककार और लेखक कृष्णा शाह, जो कि अमेरिका में Yale और University of California जैसे उच्च कोटि के शिक्षण संस्थानों से शिक्षा प्राप्त करके नाटक और फ़िल्म बनाकर ख्याति प्राप्त कर चुके थे| 1976 में बनाई उनकी फ़िल्म The River Niger ने विभिन्न अन्तराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में कई पुरस्कार जीते थे और ब्रोडवे में भी उनके द्वार लिखित एवं निर्देशित नाटक की धूम मची हुयी थी|

ऐसी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के साथ जब वे हॉलीवुड और हिन्दी सिनेमा के संगम से एक फ़िल्म बनाने का सपना लेकर बम्बई पहुंचे तो उनके आगमन से हिन्दी सिने उधोग में बहुत से लोग इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के साथ जुड़ने के लिए प्रयासरत हो गये और एक-दूसरे का पत्ता काटने की साजिशें शुरू हो गयीं|

हॉलीवुड के उपरोक्त अभिनेताओं को कृष्णा शाह इस प्रोजेक्ट के लिए अनुबंधित कर चुके थे| कृष्णा शाह उस वक्त हिन्दी फिल्मों के सबसे चर्चित सितारों अभिनेता अमिताभ बच्चन और अभिनेत्री जीनत अमान को मुख्य भूमिकाओं में लेना चाहते थे| वे शम्मी कपूर, प्रेमनाथ और ओ.पी रल्हन को भी पहले ही अनुबंधित कर चुके थे| परन्तु कुछ दिनों की सुगबुगाहट के बाद चर्चा चली कि अमिताभ बच्चन ने कृष्णा शाह की फ़िल्म में कम करने से इंकार कर दिया| कृष्णा शाह ने वक्त न गंवाते हुए मुख्य भूमिका के लिए धर्मेन्द्र को अनुबंधित कर लिया|

मुहूर्त शॉट के बाद एक शानदार पार्टी का आयोजन किया गया था जिसमें हिन्दी सिनेमा की सभी महत्वपूर्ण हस्तियाँ आमंत्रित की गयी थीं| ऐसा कहा जाता है कि पार्टी में हॉलीवुड की ग्लैमरस अभिनेत्री Gina Lollobrigida का मुकाबला उस वक्त हिन्दी सिनेमा में ग्लैमर की प्रतीक बन चुकी जीनत अमान से हो गया और तीस साल से कम उम्र की जीनत ने पचास साल की उम्र पार कर चुकी Gina Lollobrigida को पछाड़ कर उस शाम बाजी जीत ली| कुछ ऐसा हुआ जिसे Gina Lollobrigida बर्दाश्त नहीं कर पाईं और अमेरिका वापिस चली गयीं और उन्होंने फ़िल्म छोड़ देने की सूचना कृष्णा शाह तक पहुंचा दी| कृष्णा शाह Gina Lollobrigida को मनाने अमेरिका चले गये पर जब कुछ समय बाद वे भारत लौटे तो Gina Lollobrigida के बदले वे उस भूमिका में Sylvia Miles को अनुबंधित करके आए थे जो कि  Gina Lollobrigida के मुकाबले एक कम जाना हुआ नाम था और ग्लैमर और स्क्रीन प्रेजेंस में भी वे Gina Lollobrigida के मुकाबले में नहीं ठहरती थीं|

उस वक्त की फ़िल्मी पत्रिकायें फ़िल्म से जुडी छोटी बड़ी सभी ख़बरें प्रकाशित कर रही थीं| ऐसा कहा गया कि Rex Harrison जब अपनी गर्लफ्रेंड के साथ बम्बई एयरपोर्ट पर आए तो उनके साथ उनके सामान से भरे चालीस से ज्यादा सूटकेस थे जो कि कस्टम ने अपने कब्जे में ले लिए| कस्टम के इस कदम से Rex Harrison आग बबूला हो गये और उन्होंने वापिस अमेरिका जाने की जिद पकड़ ली| कृष्णा शाह ने भागदौड करके उनका सामान वापिस दिलवाया| कृष्णा शाह की मुश्किल को बढाते हुए ओ.पी रल्हन न केवल Rex Harrison से ज्यादा सूटकेस लेकर शूटिंग स्थल पर पहुंचे बल्कि उन्होंने अपनी करतूत की खबर बाकायदा प्रेस को देकर इस बात को छपवाया भी और सुनिश्चित किया कि इस खबर से लैस पत्रिका Rex Harrison के कमरे में जरुर पहुंचे|

फ़िल्मी पत्रिकाएं फ़िल्म, जिसे शालीमार शीर्षक दिया गया था, के निर्माण से जुडी ख़बरें और गॉसिप लगातार छाप रही थीं|

हॉलीवुड की तर्ज पर कृष्णा शाह ने यह भी तय किया कि फ़िल्म स्क्रिप्ट को एक उपन्यास का रूप भी दिया जायेगा और फ़िल्म के प्रदर्शन के साथ ही उपन्यास को भी प्रकाशित किया जायेगा और उपन्यास के प्रकाशन और उसकी मार्केटिंग का सारा खर्च भी कृष्णा शाह ने खुद ही उठाना तय किया| स्क्रिप्ट के आधार पर उपन्यास लिखने के लिए बड़े बड़े लेखकों से संपर्क साधा गया जिनमें आर.के. नारायण भी सम्मिलित थे जिन्होने यह काम करने से इंकार कर दिया| अंत में मनोहर मुलगांवकर को यह प्रोजेक्ट सौंपा गया और इस कम के एवज में उन्हें एकमुश्त एक बड़ी रकम का भुगतान लेखन आरम्भ करने से पहले ही किया गया| कहते हैं इतनी बड़ी रकम भारत में कभी किसी लेखक को नहीं दी गई थी| मनोहर मुलगांवकर को फ़िल्मी सितारों के साथ उनके ही होटल में ठहराया गया| यह भी तय किया गया कि अंग्रेजी में लिखे जा रहे उपन्यास का अनुवाद हिन्दी और उर्दू में भी छापा जायेगा और प्रत्येक भाषा में 20,000 प्रतियां छापने का निश्चय किया गया| फ़िल्म का प्रोजेक्ट नई नई योजनाओं से एक बेहद महत्वाकांक्षी रूप लेता जा रहा था और पैसा पानी की तरह बह रहा था|

ऐसी योजना बनाई गयी कि परंपरागत पुस्तक विक्रेताओं के अलावा अन्य स्थानों के दवारा भी पुस्तक जनता के समक्ष लाई जायेगी| इंडियन ऑयल के साथ करार किया गया कि उनके सभी स्टेशनों पर शालीमार पुस्तक को प्रदर्शित और बेचा जायेगा|

फ़िल्म के प्रीमियर के साथ ही एक भव्य समारोह में दिल्ली में इंडियन ऑयल के स्टेशन पर शालीमार उपन्यास को भी प्रदर्शित किया गया|

एक फ़िल्म के रूप में शालीमार भारत में नहीं चल पाई और इस पर आधारित उपन्यास की हजारों प्रतियों के ढेर रद्दी में दिए गये|

फ़िल्म को एकमात्र सांत्वना इसके संगीत की सफलता से मिली जिसके लिए फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार (राहुलदेव बर्मन), पार्श्व गायक (किशोर कुमार) और पार्श्व गायिका (ऊषा उत्थुप) की श्रेणियों में फिल्मफेयर पुरस्कारों के लिए नामांकित किया गया|

एक बहुत बड़े प्रोजेक्ट की परिणति असफलता में हुयी| अगर फ़िल्म हिन्दी या अंग्रेजी किसी भी वर्जन में सफल हो जाती तो हॉलीवुड और हिन्दी सिनेमा के मध्य सार्थक गठबंधन के रास्ते सत्तर के दशक में ही खुल जाते|

…[राकेश]

दिसम्बर 3, 2015

Tere Ghar Ke Samne (1963) : सर्दियों की नर्म धूप

TGKS1अगर ‘तेरे घर के सामने’ को हिंदी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ रोमांटिक कॉमेडी ड्रामाटिक फिल्म न भी माना जाए तो इस श्रेणी की सर्वश्रेष्ठ पांच फिल्मों में इसे शुमार किया जाना किसी भी तरह के संदेह से परे हैं| ‘तेरे घर के सामने’ में रोमांस. कॉमेडी और ड्रामा का सर्वोचित मिश्रण है| न तो हास्य भोंडेपन से भरी जोकरी में शरण लेता है और न ही रोमांस अतिनाटकीयता की ओर जाकर उस वक्त आंसुओं के सैलाब में डूब जाता है जब प्रेमीगण कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं और जुदाई को सहन कर रहे हैं| फिल्म दर्शकों की भावनाओं का शोषण करने का प्रयास नहीं करती|

तेरे घर के सामने’ सर्दियों की नर्म धूप जैसी आंच और स्पर्श दर्शकों को देती है| सर्दियों के आगमन के समय और जब सर्दियों के जाने पर बसंत ऋतु का आगमन होता है तब इस शानदार फिल्म की याद आना स्वाभाविक से बात है| भारत जैसे सामान्यतः गरम देश में साल के ये दो समय लोगों को अच्छा मौसम देते हैं और उन्हें खुशगवार बनाते हैं, धूप के साथ उनकी मैत्री हो जाती है, चरों तरफ फूलों की बहार आने लगती है, खाने की वस्तुओं में भांति-भांति की किस्में समाहित हो जाती हैं|

1963 में फिल्म के प्रदर्शन के वक्त इसकी सार्थकता देश में उस वक्त के माहौल से भी बढ़ जाती है|

भारत 1962 में चीन का आक्रमण झेल कर उससे सैन्य युद्ध हार चुका था और देश का मनोबल इस हिंसक हमले से घायल और टूटा हुआ था| देश इस बात से भी दुखी था कि देश के प्रधानमंत्री के भारत-चीन संबंधों पर इतना जोर देने और पंचशील के सिद्धांतों को गढ़ने के बावजूद चीन ने भारत और नेहरु को धोखा दिया और एक अहिंसक राष्ट्र भारत पर आक्रमण कर दिया| फिल्म भी पंचशील सिद्धांतों का सन्दर्भ छेड़ती है|

1962 की त्रासदी झेल चुके देश में 1963 में ‘तेरे घर के सामने’ जैसी फिल्म दर्शकों को मानसिक अवसाद से छुटकारा दिलवा कर तनावरहित क्षणों में आनंद प्रदान करवाने वाली और पड़ोसियों से मेल-मिलाप से रहने के सिद्धांत पर भरोसा कायम करवाने वाली थी|

फिल्म के चरित्रों के लिए, राकेश (Dev Anand) और मदन (Rashid Khan) को छोड़ कर, फिल्म में एक रहस्य बरकरार रहता है और नायक राकेश, नायिका सुरेखा (Nutan) पर भी अपना राज फिल्म के लगभग अंतिम समय में ही जाहिर करता है| दर्शकों के लिए रोमांच इस बात का है कि कैसे राकेश और सुरेखा के माता-पिता पूरी स्थिति को लेते हैं जहां कि व्यापार और सामाजिक परिवेश में वे न केवल एक दूसरे के प्रतिद्वंदी हैं बल्कि एक दूसरे को सख्त नापसंद भी करते हैं और ऐसे लोगों की संतानों का आपस में प्रेम हो जाता है| दर्शक फिल्म के अंत का अंदाजा तो लगा सकता है पर उसे उस लक्ष्य तक पहुँचने के मार्ग की भनक नहीं लग पाती और उसके लिए उस राह को देख पाना ही रोचक है|

संक्षेप में फिल्म की पृष्ठभूमि ऐसी है –

राकेश (देव आनंद) एक आर्किटेक्ट है जो अमेरिका से पढकर भारत वापिस आया है पर अपने पिता (ओम प्रकाश) के पुरातनपंथी विचारों से उसकी पटरी नहीं खाती सो वह अपने पिता का घर छोड़ (उसके पिता ने भी उसे घर से निकाल रखा है, सो उसका घर छोड़ना और घर से निकाला जाना दोनों एक साथ की घटनाएं हैं जिन्हें पिता-पुत्र अपनी सुविधानुसार याद कर सकते हैं) राकेश की माँ (मुमताज़ बेगम) अलबत्ता राकेश के घर से अलग रहने से दुखी रहती है, दुखी पिता भी है पर अपने अहंकार के समक्ष इस भाव को जाहिर नहीं होने देता|

बहरहाल राकेश की आर्किटेक्ट फर्म उसे एक रईस (हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय) के घर भेजती है, जहां वह अपने सहायक मदन (राशिद खान) के साथ जाता है और वहाँ उन दोनों की मुठभेड़ हो जाती है सुलेखा (नूतन) से, जो कि उन्हें आवारा समझ घर से भगा देती है| सुलेखा को विश्वास है कि जैसा बागला वह और उसके पिता बनवाना चाहते हैं वैसा कोई अनुभवी आर्किटेक्ट ही बनवा सकता है, और राकेश को वह नातजुर्बेकार आर्किटेक्ट समझती है| खैर थोड़ी नोकझोंक के पश्चात राकेश को काम मिल जाता है और उसके और सुलेखा के मध्य सुलह भी हो जाती है|

राकेश को यह पता नहीं है कि उसके पिता और सुलेखा के पिता एक दूसरे को सख्त नापसंद करते हैं और एक तरह से एक दूसरे के दुश्मन हैं और दोनों एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते| राकेश के बदकिस्मती से उसके पिता और सुलेखा के पिता अडोस पड़ोस के दो प्लॉट खरीद लेते हैं और दोनों ही राकेश को काम सौंप देते हैं कि वही वहाँ उनके बंगले बनवाएगा और प्रत्येक का बांग्ला ऐसा बनना चाहिए जिससे कि दूसरा बांग्ला उसके बंगले के सामने घटिया लगे| राकेश के पिता और सुलेखा के पिता को नहीं पता कि राकेश के पास दोनों बंगलों का काम है| इस बीच राकेश और सुलेखा में आपस में प्रेम पनप जाता है| सुलेखा को भी नहीं पता कि पड़ोस वाले प्लॉट क मालिक असल में राकेश के पिता ही हैं| राकेश किसी से भी सच्चाई बयान नहीं कर सकता| न वह अपने पिता से कह सकता है कि वह सुलेखा के पिता का बांग्ला भी बनवा रहा है, न ही वह सुलेखा और उसके पिता से अपनी असली पहचान बता सकता है कि वह किसका बेटा है|

एक तरह उसके पिता एवं सुलेखा के पिता के मध्य दुश्मनी है और दूसरी तरफ उसका और सुलेखा का प्रेम है| वह दुधारी तलवार पर चल रहा है, या नत की भांति दो बहुत ऊंची इमारतों की छतों से बंधी रस्सी पर चल रहा है जहाँ संतुलन के लिए उसके पास बांस तक नहीं है|

राकेश किस गति को प्राप्त होगा, यही फिल्म का रहस्य है|

यह पहली फिल्म होनी चाहिए जहां नायक, नायिका से कहता है,

” हमारे माता-पिता ने हमें पालपोस कर बड़ा किया है, हमें ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे उन्हें ठेस लगे| हम घर से भाग कर अपने माता-पिता पर बदनामी के दाग नहीं लगा सकते और हम उनके आशीर्वाद से ही आपस में शादी करेंगें और हम तब तक इंतजार करेंगें जब तक कि उनका आशीर्वाद हमें न मिल जाए|”

बाद में बहुत से हिंदी फिल्मों में इस संवाद को दुहराया गया|

फ़िल्में केवल इसलिए नहीं बनतीं कि जो समाज में हो रहा है उसे दिखा दें, बल्कि कुछ फ़िल्में ये भी बता सकती हैं कि क्या होना चाहिए? कभी-कभी चरित्र या चरित्रों में उपस्थित आदर्शवाद फिल्म में जान डाल देता है| अलग कहानी में अलग किस्म के चरित्र कुछ और राह अपना सकते हैं जो वहाँ फबता हुआ जान पड़े किन्तु यहाँ इस फिल्म की कथा में इसके चरित्रों का यह रुख विश्वसनीय दिखाई देता है|

फिल्म की अपील बड़ी व्यापक है और फिल्म किसी भी आयु वर्ग के दर्शक को आनंदित कर सकती है| इस फिल्म में ऐसा बहुत कुछ है जो हर किस्म की फिल्म देखने वालों को अपनी ओर आकर्षित करता है|

निस्संदेह फिल्म का कलेवर शहरी है| फिल्म का ट्रीटमेंट ऐसा है कि यह दर्शक को हल्के फुल्के मूड में रखता है और फिल्म समाप्त होने के बाद भी दर्शक के मुख पर मुस्कान छोड़ जाता है| फिल्म शुरू से ही छोटे छोटे प्रसंगों, जिनका संबंध आम जन को जीवन से जुड़ा लगता है, के मध्यम से फिल्म दर्शक से जुड़ाव बना कर उसे आनंदित करना प्रारंभ कर देती है और पूरी फिल्म में एक भी बोझिल क्षण ऐसा नहीं आता जबकि दर्शक बोरियत महसूस करे और ध्यान फिल्म से कहीं और भटक जाए|

फिल्म के चरित्र ऐसे लगते हैं जैसे हम अपने जीवन में देखते हैं लेकिन अभिनेताओं ने उन्हें अपनी उपस्थिति एवं बेहतरीन अभिनय से इतना रोचक बना दिया है कि वे भरपूर आकर्षक चरित्र लगते हैं|

फिल्म में बहुत सी अच्छाइयां हैं| इस खूबसूरत रोमांटिक कॉमेडी में निर्देशक विजय आनंद के पसंदीदा तत्व, रहस्य का पुट भी मिश्रित है|

TGKS2कथा और पटकथा दोनों बेहद प्रभावशाली हैं| देव आनंद और नूतन की तो बात ही क्या, उन्होंने परदे पर जादू बिखेरा है| परदे पर देव आनंद और नूतन के मध्य के दृश्य बेहद विश्वसनीय लगते हैं| देव आनंद की अधिकतर फिल्मों में नारी से उनके रिश्ते, भले ही वह परदे पर अपने चरित्र की माँ, बहन, प्रेमिका या पत्नी, बेटी या सहकर्मी के साथ हों, बेहद विश्वसनीय लगते रहे हैं|

अन्य सभी अभिनेताओं ने भी जबर्दस्त अभिनय का प्रदर्शन किया है| हर उस अभिनेता का काम उल्लेखनीय है जिसने भी पांच मिनट से ज्यादा परदे पर अपनी उपस्थिति दिखाई है| ओम प्रकाश, हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय, राजेन्द्र नाथ, प्रतिमा देवी, मुमताज़ बेगम, और राशिद खान सभी चरित्र अभिनेताओं ने फिल्म में उच्च कोटि का अभिनय करके फिल्म में जान डाल दी है|

जब राजेन्द्र नाथ एक बेहद लाउड कामेडियन के रूप में प्रसिद्ध और टाइप-कास्ट होने लगे थे, तब इस फिल्म ने उन्हें एक अलग किस्म की भूमिका दी और विजय आनंद ने उनकी उछल कूद करके हास्य करने की शैली पर पूरी तरह अंकुश लगवा कर उनसे चरित्र की सीमाओं में रहकर अभिनय करवाया|

एस.डी.बर्मन दवारा रचा संगीत बेहतरीन है और गायकों ने भी अपनी पूरी कला गीतों में समर्पित कर दी है| अगर रफ़ी ने अपनी दैवीय गायिकी प्रतिभा का इस्तेमाल करके दिल का भंवर और तू कहाँ ये बता, दोनों गीतों में जादू भरा है तो लता मंगेशकर और आशा भोसले ने भी अपनी गायिकी से गीतों में कर्णप्रिय मिश्री घोलकर श्रोताओं के लिए गीतों में भरपूर आनंद भर दिया है|

यह आश्चर्य का विषय है कि इतनी बढ़िया रोमांटिक कथा, पटकथा और संवाद लिखने वाले विजय आनंद ने वास्तव में कहानियां लिख कर छपवाई नहीं| जो लेखक इतने बढ़िया रोमांटिक दृश्य गढ़ सकता है उसकी कल्पना अवश्य ही बेहतरीन कहानियां साहित्य को देती| विजय आनंद के पास रोमांटिक दृश्य रचने और प्रेमियों या संभावित प्रेमियों के मध्य बेहद जीवंत वार्तालाप रचने और प्रेमियों के इर्दगिर्द एक सजीव वातावरण रचने की अदभुत क्षमता थी|

फिल्म में एक प्रसंग है :-

राकेश (देव आनंद) सुलेखा (नूतन) को लेकर दिल्ली के पास किसी गाँव में जाता है और वहाँ वे गाँव की एक वृद्धा की झोंपडी के बाहर बैठ कर वृद्धा दवारा परोसे गये भोजन का लुत्फ़ उठा रहे हैं| राकेश को भोजन बेहद स्वादिष्ट लगता है और वह वृद्धा के खाना बनाने की तारीफ़ करते हुए कहता है,

” माँ, ऐसा तीखा अचार मैंने जीवन में कभी नहीं खाया| माँ तेरे बच्चे जियें और तरक्की करें|”

वृद्धा पूछती है कि क्या राकेश और सुलेखा का अभी विवाह हुआ है|

राकेश सुलेखा की ओर देख कर पूछता है,” बताओ क्या कहूँ?”

सुलेखा मुस्करा कर चिड़ाने के अंदाज में कहती है,”बको, बातें बनाने और झूठ बोलने में तो महारत हासिल है तुम्हे|”

राकेश कहता है, “माँ अभी तक शादी नहीं हुयी, पर अगर मेरे माता पिता ने चाहा और इसके माता पिता ने चाहा और हम सबके माता पिता ने चाहा तो बहुत जल्दी हमारी शादी हो जायेगी|”

भोजन समाप्त करके राकेश हाथ धोता है और वृद्धा को कुछ रूपये देने का प्रयास करता है| वृद्धा रूपये लेने से इंकार कर देती है| राकेश सुलेखा के पास जाता है और गरीब वृद्धा की दरियादिली की तारीफ़ करता है और वापिस आकर वृद्धा से कहता है,

” माँ ये पैसे तेरे लिए नहीं है, जो दिया तू जलाती है ना पूजा के लिए उसमें तेल डालने के लिए हैं…”

ऐसा विलक्षण दृश्य सिर्फ विजय आनंद ही रच सकते थे और अपने चरित्र से अंजान एक वृद्ध स्त्री के साथ ऐसा जादू परदे पर सिर्फ देव आनंद ही जगा सकते थे|

जादू आगे भी कायम रहता है|

राकेश की इच्छा है कि वह सुलेखा के सामने विवाह का प्रस्ताव रखे और उसकी मनोकांक्षा भांप कर सुलेखा की इच्छा उससे छेड़छाड़ करने की है|

राकेश कहता है,”लेख अब हमें शादी कर लेनी चाहिए|”

सुलेखा कहती है,”क्यों अचानक ये ख्याल क्यों?”

राकेश गंभीरता से कहता है,” शराफत का तकाजा है कि मैं इससे आगे तभी बढूँ जब मैं तुमसे शादी कर रहा हूँ|”

सुलेखा भी गंभीर मुद्रा बना कर कहती है,” तुम पिता जी से बात कर लो|”

राकेश कुछ असहज हो कर कहता है,” तुम नहीं कर सकतीं?”

सुलेखा बात टालने के अंदाज में कहती है,” नहीं, मैं उनका सामना नहीं कर सकती|”

राकेश धैर्य खोकर कहता है,” पर मेरा साथ तो दे सकती हो|”

सुलेखा लापरवाही से कहती है,” नहीं बाबा, मैं पिता जी के सामने नहीं जाऊंगीं| तुम उनका गुस्सा नहीं जानते|”

राकेश आश्चर्य से कहता है,”तो तुम मेरा साथ नहीं दोगी|”

सुलेखा अपना निर्णय दुहराते हुए,”नहीं|”

राकेश खीज कर दुखी स्वर में,” तो मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ, चला क्यों नहीं जाता?”

सुलेखा इस अंदाज में जैसे उसे राकेश के जाने की कोई परवाह नहीं, कहती है,” चले जाओ, रोका किसने है?”

एक व्यक्ति, जो अपने प्रेमी के समर्थन की आस लगाए बैठा है, ऐसे ठंडे जवाब पाकर कुंठित और क्रोधित हो जायेगा और राकेश भी ऐसी मनोदशा में वहाँ से जाने लगता है|

कैमरा सुलेखा के चेहरे को पकडता है जो राकेश की कुंठा पर मंद मंद मुस्करा रही है|

विजय आनंद जैसे काबिल निर्देशक के लिए यह एक आदर्श स्थिति है एक मनभावन गीत परदे पर उतारने के लिए और वे ऐसा करते भी हैं आर दर्शक – ये तन्हाई हाय रे हाय, गीत का लुत्फ़ उठाते हैं|

यह पूरा प्रसंग, भोजन करने से लेकर इस गीत तक, फिल्म का सबसे बेहतरीन प्रसंग है और यकीनन ऐसा प्रसंग विजय आनंद और देव आनंद की किसी फिल्म में ही पाया जा सकता है| जिन्होने फिल्म नहीं देखी वे इस प्रसंग को देखे बिना इससे प्राप्त हो सकने वाले आनंद की कल्पना पूरे तौर पर नहीं कर पायेंगें| इसके रसपान के लिए इसे देखा जाना जरूरी है|

यह प्रसंग, लेखकों, अभिनेताओं, कैमरामैन, एडिटर, संगीत निर्देशक, गायकों, एवं निर्देशक की टीम की अनूठे प्रतिभा का परिणाम है| यह प्रसंग भारतीय सिनेमा की उच्च स्तरीय फिल्म की झलकी भी देता है, ऐसा प्रसंग जो कि अदभुत कल्पनाशक्ति का फल है और भारतीयता में पगा हुआ भी है|

देव आनंद के नवकेतन बैनर्स की ‘तेरे घर के सामने’ न केवल इस प्रतिष्ठित बैनर की बल्कि समूचे हिंदी सिनेमा की एक क्लासिक फिल्म है जिसकी आयु कालातीत है| इसे नहीं देखा तो रोमांटिक कॉमेडी फिल्मों की फेहरिस्त में बेहद महत्वपूर्ण नाम तो छूट ही गया|

…[राकेश]

दिसम्बर 2, 2015

Nayantara’s Necklace (2015) : अपने वर्तमान से ऊबे, थके और परेशान हुए लोग

Nayantaraदो स्त्रियों एवं एक पुरुष चरित्र के माध्यम से एक स्त्री की कहानी दिखाने वाली तकरीबन बीस मिनट की अवधि की यह लघु फिल्म, लघु फिल्मों को बनाए जाने की महत्ता को स्थापित करती है और यह भी स्थापित करती है कि हर कहानी अपने ऊपर बनने वाली फिल्म की अवधि स्वंय निर्धारित करती है| एक अन्य पुरुष चरित्र भी फिल्म में है पर उसे हमेशा सोते हुए ही दिखाया गया है|

नयनतारा (Konkana Sen Sharma), और अलका (Tillotama Shome) के अलग-अलग और साझा जीवन के प्रसंग फिल्म में सिलेसिलवार तरीके से न दिखाए जाकर उन्हें आगे पीछे दिखाया गया है और फ्लैश बैक तकनीक के माध्यम से फिल्म के प्रदर्शन में रोचकता लाई गयी है और इसी लिहाज से जो एक समय कुछ घटित होता दिखाई देता है उसका अर्थ दर्शक के सामने पूरी तरह से कुछ मिनटों बाद खुलता है|

अपने आज से ऊबे, थके और परेशान लोगों को अक्सर दूसरों के जीवन या उनके जीवन की दिखावट प्रभावित कर जाती है और अगर दिखावट करने वाला ऊबे हुए व्यक्ति के दिमाग में यह हीन भावना भी भर दे कि उसे अपने को बदलने की जरुरत है क्योंकि जैसा वह है वह बेहद अनाकर्षक व्यव्क्तित्व का नमूना है तब तो व्यक्ति शीघ्रातिशीघ्र ही अपने व्यक्तित्व के ऊपर अपने तत्कालीन रोल मॉडल के व्यक्तित्व से उधार पाई छवियों का मुलम्मा चढ़ा लेना चाहता है|

दो स्त्री किरदारों, नयनतारा एवं अलका और एक पुरुष किरदार – गिरीश (Gulshan Devaiah), तीनों अपने अपने वर्तमान के जीवन से ऊबे हुए चरित्र हैं| रूटीन जीवन ऊब लाता ही है, पर तीनों की ऊब के कारण अलग अलग हो सकते हैं बल्कि फिल्म दिखाती है कि ऐसा है भी|

फिल्म की शुरुआत में नयनतारा और अलका ही सामने आते हैं और उनकी बातों के माध्यम से गिरीश का जिक्र दर्शकों के समक्ष होता है|

नयनतारा, ऐसा बताया जाता है, हाल ही में अपने पति और बेटे के साथ दुबई से भारत में रहने आई है और उसकी मित्रता अलका से हो जाती है| अलका किसी भी तरह उसके स्तर की नहीं है और यह मित्रता नयनतारा के वहाँ नया होने और स्थानीय बातों की जानकारी न होने और नयनतारा के बेटे समर और अलका के बेटे धीरज के एक ही स्कूल में पढ़ने के कारण हुयी है|

चूँकि फिल्म एक लघु फिल्म है मितव्यता बरतते हुए कम दृश्यों और न्यूनतम संवादों के माध्यम से ही अपनी बात संप्रेषित करती है| दुबई के ऐश्वर्यपूर्ण जीवन का बखान करती हुयी नयनतारा से अलका सहजता से पूछती है कि वहाँ का सुख-साधनों वाला जीवन छोड़ कर वह भारत में थोड़ा संघर्ष वाला जीवन जीने क्यों चली आई? नयनतारा थोड़ा खीज कर कहती है कि लोग बाहर से भारत भी वापिस आ रहे हैं और वह सेकेण्ड क्लास सिटिजन बन कर कहीं नहीं रह सकती|

इतना सा दृश्य जताने के लिए काफी है कि नयनतारा के जीवन में सच नहीं दिखावट ज्यादा है और जो वह है वह उसे प्रदर्शित नहीं करती| अलका के सीधे दिमाग के लिए ऐसी बारीकियां पकड़ना मुश्किल है, वह तो नयनतारा के प्रभावशाली व्यक्तित्व, दुनिया-जहान की बातों, और उसके अपने को प्रदर्शित करने के सलीके के सम्मोहन से बंधी हुयी है और नयनतारा के समक्ष उसकी अपनी हीन- भावनाएं और ज्यादा मुखर हो जाती हैं और उसे लगता है कि वह गुणी नहीं है| नयनतारा के जाने के बाद एक बार अलका अपने घर में उस कुर्सी पर जाकर बैठ कर उस कुर्सी को देखती है जिस पर वह कुछ पल पहले स्वंय बैठी थी और अपने को नयनतारा समझने की कल्पना करती है|

नयनतारा को समय काटने के लिए अलका से सीधी-सादी स्त्री का साथ मिलना मुश्किल है क्योंकि अन्य चतुर स्त्रियाँ उसकी दिखावट को, उसके झूठों को पकड़ लेंगी और उसे वह सम्मान नहीं मिलेगा जो अलका से उसे मिलता है| अलका के साथ रहने से कहीं न कहीं नयनतारा के अहं की संतुष्टि होती है|

नयनतारा और अलका की दैनिक बैठकें भी एकरूपी हैं जहां नयनतारा की बातों से, अलका सोचती है उसका कुछ ज्ञानवर्द्धन हो रहा है वरना वह तो कुछ नहीं जानती और नयनतारा के लिए अलका की बातें बेहद उबाऊ हैं, मसलन नयनतारा के अपने पति से वीडियो कॉल करने पर अलका टिप्पणी करती है कि महाभारत में भी ऐसा ही था, विदुर जी दूर से महाभारत का युद्ध देख लेते थे टीवी के माध्यम से और तब होती थी शल्य चिकित्सा और अब होता है ऑपरेशन, तब होता था उड़नखटोला और अब होता है एयरोप्लेन|

अलका और नयनतारा की नियमित बैठकों में एक नये विषय का प्रवेश होता है अलका दवारा यह बात साझा करने से कि दसवीं तक उसके साथ पढ़ा गिरीश उसे हाल ही में फेसबुक पर मिला है और कुछ दिनों की चैटिंग के बाद अब उससे मिलना चाहता है और मलेशिया से भारत केवल उससे मिलने ही आ रहा है|

अलका के रूटीन जीवन में गिरीश प्रकरण एक रोमांटिक भाव लाता है| वह रोमांचित है| स्कूल में दसवीं में वह भी उसे पसंद करती थी पर अब अपने वैवाहिक जीवन के दायित्वों के बोझ तले दब कर, नयनतारा के पूछने पर वह यह भी व्याख्या नहीं कर पाती कि रोमांस क्या होता है?

रोमांस के बारे में सोचते हुए वह अपने जीवन में झाँकने की कोशिश करती है जहां रात में अगर वह अपने पति से दिल खोल कर बात भी करना चाहे तो थका-मांदा पति सोया रहता है| सुबह उठते ही बेटे को स्कूल और पति को ऑफिस भेजने की तैयारियों में वह व्यस्त हो जाती है, उन दोनों के जाने के बाद घर के बाकी काम करती है| शायद ब्यूटीशन के रूप में कभीकभार छोटामोटा काम ले लेती हो या शायद पहले यह कम करती हो और छोड़ दिया हो| फिल्म उसे हमेशा घरेलू कार्यों में व्यस्त ही दिखाती है या नयनतारा के संग बैठे या घूमते दिखाती है| कहीं न कहीं नयनतारा के अंदर अलका के सादेपन और बोरियत भरे जीवन के बावजूद अपने जीवन के प्रति एक निश्चिन्तता और महत्वाकांक्षा से परे संतोष के भाव अलका के प्रति उसके मन में हल्की ईर्ष्या जगाते हैं| अलका आर्थिक और स्टेटस के मामले में महत्वाकांक्षी नहीं है और यह बात नयनतारा को कहीं न कहीं विचलन देती है|

अलका के बोरियत भरे रूटीन जीवन में गिरीश का, फेसबुक के माध्यम से ही सही, आगमन उसके जीवन में ऊर्जा लाता है| गिरिश के बारे में भी वह नयनतारा से सलाह मशविरा करती है| वह ऊपर से दिखाती तो है कि उसकी खास इच्छा नहीं गिरीश से मेलजोल बढाने में पर अंदर से वह उससे मिलने के लिए बेहद उत्सुक है और नयनतारा यह भांप लेती है|

नयनतारा, अलका को गिरीश से मिलने के लिए तैयार करती है, और मेकअप दवारा उसे बिल्कुल आधुनिक स्त्री के रूप में इस कदर परिवर्तित कर देती है कि अलका स्वयं अपने नये रूप पर मोहित हो जाती है| नयनतारा उसे अपना मोतियों का नेकलेस भी देती है, जिसे पहन कर अलका बेहद प्रसन्न होती है|

अलका गिरीश से मिलने होटल पहुँच जाती है| टैक्सी में वह खिड़की का शीशा खोलकर और चेहरे पर हवा के झोंके सहन करती जाती है| नयनतारा इतने मेकअप के बाद ऐसा नहीं करती पर अलका अपने अकेलेपन में इन सब बातों से बहुत दूर है|

होटल में गिर्ष के सामने बैठी अलका का चेहरा मोहरा तो अलका ही है पर बातें करने वाली स्त्री अलका न होकर नयनतारा है| अलका यहाँ नयनतारा बन कर वही सब बातें बोलती है जो नयनतारा उससे बोला करती है| यहाँ तक कि अपने बेटे धीरज को वह समर नाम दे देती है जो कि नयनतारा के बेटे का नाम है|

धीरज अपने व्यवसाय के नतीजों से प्राप्त जीवन शैली से ऊब चुका है| उसकी नौकरी उसे उच्च स्तरीय जीवन शैली देती है पर वह एक घरेलू सीधे-सादे जीवन की तलाश में है| और शायद यही तलाश उसे अलका से मिलवाने मलेशिया से भारत लाई है| उसके जेहन में शायद अलका वही सीधी-सादी लड़की है जो उसके साथ दसवें तक पढ़ती थी| पर अब बरसों बाद मिलने पर वह अलका के रूप में नयनतारा को पाता है (जिसे वह नहीं जानता पर किसी अजनबी की छाया वह अलका पर आरोपित हुयी महसूस कर सकता है) और उसकी बड़ी-बड़ी बनावटी बातों को सुन और दिखावट भरे व्यवहार को देख असहज महसूस करता है|

पुराने साथियों, जिनसे मिले जमाना हो गया हो, से बरसों बाद मिलना ऐसे झटके अक्सर ले आता है| समय बदल जाता है और समय के संग लोग भी बदल जाते हैं बस कई बार ये बदलाव इतने ज्यादा हो जाते हैं कि वे व्यक्ति की पुरानी छवि के बिल्कुल उलट लगते हैं और मिलने आने वाले को स्तब्ध छोड़ जाते हैं|

ऐश्वर्यपूर्ण जीवन की जिन बातों से गिरीश ऊब चुका है वही सब बातें अलका अपनी पसंद की बातें बताती है, और गिरीश का मोहभंग कर जाती हैं|

अपनी निगाहों में नयनतारा के रूप में परिवर्तित अलका जब यह सोचती हुयी लौटती है कि उसने गिरीश के सामने मोर्चा जीत लिया तब नयनतारा के घर की ओर उससे मिलने जाते हुए उसे अपने जीवन का सबसे बड़ा झटका लगता है|

उधार का जीवन अपने काम नहीं आ सकता| दूसरों जैसा बन कर अपना जीवन आनंद से नहीं गुजारा जा सकता| अपना स्वभाव छोड़कर दूसरे को अपने ऊपर आरोपित करने से जीवन सुगम नहीं बन सकता| कब तक इंसान अभिनय करेगा?

इमारत के नीचे नयनतारा की कार में नयनतारा के नेकलेस को रखकर जाती दुखी अलका यही सब सोच रही होगी|

नयनतारा के जीवन की असलियत जान कर अलका का स्तब्ध रह जाना स्वाभाविक है|

लघु फ़िल्में अक्सर बहुत से प्रश्न और बहुत सी संभावनाएं जगा देती हैं|

क्या सच्चाई को जानकर अलका अपने असल जीवन से मित्रता कर बैठी?

क्या उसने फेसबुक पर गिरीश से फिर संपर्क साध अपने असली रूप को दिखाया?

असल में तो कहानी ऐसे मोड़ के बाद ही गहराई पाती है|

कोंकणा और तिलोत्तमा के बेहतरीन अभिनय ने फिल्म को स्तरीय बनाया है| Monsoon Wedding, Shanghai और Qissa के बाद इस लघु फिल्म में भी तिलोत्तमा ने स्वय के एक बेहतरीन अभिनेत्री होने का सुबूत दिया है| कोंकणा के साथ तो बरसों के उच्च स्तरीय अभिनय प्रदर्शन की साख है ही|

फिल्म में एक छोटी सी गलती संवाद के स्तर पर नज़र आती है| नयनतारा से बात करते हुए भी अलका धीरज के कराटे क्लास में जाने की बात बताते हुए धीरज को समर कह जाती है|

बहरहाल जयदीप सरकार की यह लघु फिल्म एक रोचक फिल्म है और भारत में लघु फिल्मों की परम्परा को विकसित करती है और उन्हें एक साख देती है|

…[राकेश]

 

दिसम्बर 1, 2015

Tamasha (2015) : बचपन ओ’ मोहब्बत को दिल से न जुदा करना

Tamasha-001बचपन, बचपन से मोहब्बत और बचपन की मोहब्बतें तीनों का इंसान के जीवन में बहुत बड़ा शायद सबसे बड़ा स्थान है| बचपन की मोहब्बतों में आवश्यक नहीं कि यह किसी इंसान से ही मोहब्बत का मामला हो, यह किसी विधा से, किसी स्थान से, किसी बात से, मनुष्य जीवन में प्रकृति में उपस्थित किसी भी बात से हो सकता है और इस मोहब्बत का जज्बा ताउम्र कायम रहे तो मनुष्य कभी बूढ़ा नहीं होता, वह वही रहता है जो वह बचपन में था|

फिर युवावस्था का प्रेम, जिसके अंकुर दरअसल किशोरावस्था में ही फूटने लगते हैं, भी है जो मनुष्य को बहुत कुछ ऐसा सिखाता है जो प्रेम की अनुपस्थिति में मनुष्य कभी सीख नहीं पाता| प्रेम ही वह पहलू है जब प्रेमी, कुछ समय के लिए ही सही, व्यक्ति के लिए स्वयं से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, प्रेमी की उपस्थिति के कारण और उसके प्रेम के कारण और प्रेमी के कारण अपने भीतर जन्में प्रेम के कारण व्यक्ति अपने अस्तित्व को एक अलग उजाले में पहली बार देख पाता है|

अगर आप महान हिंदी लेखक दिवंगत श्री मनोहर श्याम जोशी की धर्मपत्नी भगवती जी की भांति प्रेम-कहानियों के भयंकर प्रशंसक हैं और जिनकी इस पाठकीय-इच्छा की खातिर जोशी जी ने ‘कसप’ सरीखा कालजयी प्रेम-उपन्यास रच डाला, और फिल्म तो काफी बाद में वेद के माध्यम से इस बात को बताती है पर अगर फिल्म के पहले बीस-पच्चीस मिनट में ही आपको अपने बचपन के प्रति रस उमड़ आए, बचपन के प्रति एक नॉस्टेल्जिया आपको घेर ले, तो फिल्म आपसे संबंध स्थापित कर लेगी और अंततः फिल्म के दोनों तत्व – बचपन और प्रेम, आपको अपने सम्मोहन में बांध लेंगें और फिल्म के साथ आपकी यात्रा लुभावनी और अतरंगी हो जायेगी| अगर दोनों ही बातें आपके साथ घटित नहीं होतीं तो संदेह है कि फिल्म के दिल और आपके दिल के बीच कोई संगम हो सकेगा|

बचपन को थोड़ा बाद के लिए छोड़ कर पहले प्रेम के पहलू को देख लें|

फ्रांस में स्थित और इटली से नजदीक कोर्सिका में घूमने आई हुयी एक परेशान भारतीय युवती, जो कि इसलिए परेशान है क्योंकि उस का बैग चोरी हो गया है या खो गया है और जिसमें उस का पासपोर्ट, सारे पैसे और अन्य जरूरी कागजात थे, से एक भारतीय युवक मिलता है|

युवक दवारा थोड़ी सहायता करने से हल्की सी सहज हुयी युवती जब युवक से अपना परिचय देने की शुरुआत ही कर रही है तभी युवक उसे रोक देता है और कहता है कि अगर हम दोनों ने आपस में परिचय कर लिया तो हो सकता है भारत में हम दोनों के मध्य कुछ ऐसा समान परिचय निकल आए और हम प्रगाढ़ता के ओर बढ़ जाएँ पर तब वह वही सब कुछ नहीं कर पायेगा जिसे करने वह भारत से कोर्सिका आया है, जहां उसे कोई नहीं जानता कि वह कौन है, और यहाँ वह कुछ भी बिना किसी हिचक के, बिना किसी ऐसे दबाव के कर सकता है कि लोग देखेंगें तो क्या लहेंगें, और इसी असामान्य भाषण के पश्चात बेहद नाटकीय फ़िल्मी अंदाज में वह अपने को ‘डॉन’ कहता है, जिसके पीछे बारह मुल्कों की पुलिस पड़ी हुयी है और वह कोर्सिका में तेजा का सोना लेने आया है| युवती भी ‘मोना डार्लिंग’ बन जाती है, और यह युगल कोर्सिका में एक दूसरे की असली पहचान एक दूसरे से ही छिपाकर कुछ दिन स्वछन्द, खिलंदड़ा, जिजीविषा से भरा, गीत-संगीत- और नृत्य से भरा आनंददायक समय व्यतीत करते हैं| कोर्सिका दोनों को कैथार्सिस करने का मौक़ा देता है|

दोनों के मध्य एक करार होता है कि दोनों एक दूसरे से अपने अपने बारे में सिर्फ झूठ ही बोलेंगें और कोर्सिका से जाने के बाद कभी आपस में नहीं मिलेंगें|

पर कहने और अमल करने में अंतर होता है| कहा दिमाग से जाता है और अमल दिल करवाता है| दिमाग ने जो वादे किये उनसे उनके दिल, कम से कम युवती का दिल अछूता ही रहा| कोर्सिका में उसके साथ असामान्य ही घटा| न तो वह पहले कभी ‘डॉन’ जैसे युवक से मिली थी और न ही जीवन में ऐसा समय व्यतीत किया था जिस बेलौस अंदाज में उसने ‘डॉन’ के साथ कोर्सिका में व्यतीत किया| युवती ही नहीं हर दर्शक को ‘डॉन’ बने युवक के देव आनंद रूपी हास्य-और रोमांस वाले अंदाज अपने साथ बहा ले जाते हैं|

अचानक लोगों को

प्यार हो जाता है

किसी भी घड़ी

या रास्ते से गुजरते हुए

मगर लोग मानने के लिए तैयार नहीं होते

कि हम एक ही रास्ते से गुजर रहे हैं| (दिनकर कुमार)

युवक के सामने तो लक्ष्य निश्चित था कि वह वहाँ एक अंजाने की तरह समय व्यतीत करने आया था, पर युवती बचपन से फ्रेंच Asterix comics की दीवानी रही है और उसी मोह के नाते एक बार कोर्सिका आना चाहती थी और उसे इच्छा की पूर्ति के लिए वहाँ आई है| युवक का अपने भावों के प्रति, अपने इच्छाओं के ऊपर एक नियंत्रण दिखाई देता है| युवती, युवक के जाने बिना ही अपने को ढ़ीला छोड़ देती है और दोनों के मध्य हुए करार का पालन ऊपरी तौर पर करते रहने के बावजूद अंदर से अपने को बहाव के साथ बहने देती है| युवती को विश्वास है कि युवक अपने प्रतिज्ञाओं पर, जो भले ही उसने हँसी-मजाक के अंदाज में कही हों, दृढ़ रहेगा|

यात्राओं को समाप्त होना होता है और यात्रे घर वापिस आ जाते हैं| युवती भी भारत आने के लिए चल पड़ती है पर जीवन में फिर कभी ‘डॉन’ से न मिल पाने की कसक इतनी तेवर आवेग वाली है कि भारत चलने से कुछ क्षण पहले ही वह अपनी ओर से किया वादा तोड़ देती है|

बाअदब, बामुलाहिजा, होशियार! जब जीवन में प्रेम का आगमन होता है तो मनुष्य का अस्तित्व, उसकी समझ, उस का जीवन जीने के प्रति दृष्टिकोण, भावों और भावनाओं को महसूस करने की क्षमता सभी कुछ बदलता है| और सबसे ज्यादा बदलता है अपने प्रेमी के सिवा अपने संपर्क में आने वाले अन्य व्यक्तियों के साथ उसका होना, या बर्ताव करना|

कवि नीरज ने देव आनंद के चरित्र के लिए प्रेमपुजारी में लिखा था, – याद तू आए, मन हो जाए, भीड़ के बीच अकेला,

लेखक और निर्देशक इम्तियाज अली ने प्रेम रस का अन्वेषण और विश्लेषण भली भांति किया है| प्रेम रस के रसिया दर्शक एक पार्टी में अकेली खड़ी युवती की ओर हसरत भरे अंदाज में बढ़े चले आ रहे युवक को हाथ के इशारे से रोकती हुयी और फिर अपने किये पर हँसती और बाद में अपने घर के एकांत में अंदर उमड़ रहे प्रेम के अतिरेक में नृत्य करती युवती को देखें!

युवती दवारा स्वयं को प्रेम में पड़ जाने के अहसास को जीते हुए दिखाते हुए पार्श्व में चलते गीत – हीर तो बड़ी सैड है, का प्रदर्शन फिल्म बड़े जीवंत और भव्य अंदाज में करती है और बताती है कि अब जो खूबसूरती का अर्थ सैक्स अपील में सिमट कर रह गया है वह कितनी भोंडी परिभाषा खूबसूरती को नये युग ने दे दी है| इस गीत पर थिरकते वृद्ध के सामने के दातं टूटे होने के बावजूद उसके चेहरे के आनंद में एक आकर्षक खूबसूरती है, जो बाहरी रूप की नहीं अंदुरनी आनंद की है|

प्रेम में जब कोई व्यक्ति हो जाए तो जो उस के साथ होता जाता है बस वही सब कुछ युवती के साथ होता है| कुछ बरस बीत जाते हैं, अन्यों के साथ रोजाना मिलने के बावजूद युवती हरदम उस युवक के साथ ही रहती है जिसे उसने कोर्सिका में ‘डॉन’ के रूप में जाना था| ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होए... प्रेम के रस में सरोबार होकर युवती परिस्थितियाँ स्वयं गढ़ती है और दिल्ली आ जाती है जहां युवक रहता है|

युवक एवं युवती ने तो कोर्सिका में एक दूसरे से वादा किया था कि वे बाद में कभी एक दूसरे से नहीं मिलेंगें पर युवती तो ऐसी स्थितियां निर्मित करती है जिससे युवक उससे मिलना टाल ही न सके|

भारत में सामान्यतः लड़कियों के लिए तय आयु सीमा पार कर चुकी और शोध कार्य में जुटी एक युवती ने ऐसे ही समय काटते क्षणों में हल्की फुल्की बातचीत में एक बार अपने साथियों से कहा था, काश वह टीवी पर तारा सीरियल और फिल्मों में लम्हे उस वक्त देख लेती जब उसे इनसे मिली सीख की सख्त जरुरत थी तो उसके जीवन की दिशा कुछ और ही होती और जीवन इस तरह नीरस सा और मशीनी न होता|

फिल्म की नायिका पहल करना जानती है और वह – तुम ही पहल करो न, की झिझक से परे आ चुकी आधुनिका है| वह युवक के प्रति अपने प्रेम का इजहार करती है|

युवक अब वेद (वर्द्धन साहनी) और युवती तारा (माहेश्वरी) के अपने असली नामों के साथ एक दूसरे से मुखातिब हैं| नाम तो उनके असली सामने आते हैं पर क्या रूप भी असली हैं| खासकर वेद का?

तारा थोड़ा देर से और दर्शक इस भाग के शुरू से ही वेद के नये रूप को देख आश्चर्य में रहते हैं| दर्शक को लगता है वह अभी भी अभिनय कर रहा है| उसके दवारा मशीनी अंदाज में अपनी सारी दिनचर्या को निबटाते देखना ऊबाऊ है और लगता ही नहीँ कि यही वेद कोर्सिका वाला डॉन है|

तारा इस अंतर को थोड़ा देर से जान, पहचान और समझ पाती है और जब तक ऐसा होता है उससे मिलना वेद की आदतों में सहार हो जाता है| औसत व्यक्ति के जीवन की परिपाटी के अनुसार वेद, तारा से विवाह करने की ओर कदम उठाकर उसे अंगूठी पहनाकर शादी का प्रस्ताव उसके सम्मुख रखना चाहता है| औसत व्यक्ति के जीवन में संबंध की यही परिणति है, पर वेद में डॉन ढूँढ रही तारा के समक्ष यह पल जागृति वाला बन जाता है, वसह सहसा नींद से जागती है और वेद से ही पूछती है कि डॉन कहाँ है?

अक्सर क्या यह हमेशा होने वाली बात है कि किसी संबंध में व्यक्ति अपने साथी की कोई छवि अपने मन में निर्मित कर लेता है और उस छवि के सहारे उस व्यक्ति के प्रति अपने अंदर प्रेम को पालता-पोसता रहता है| कथित प्रेमविवाहों में तो हमेशा ही कुछ अरसे बाद मोहभंग की स्थिति आती है और किसी एक का या दोनों को ही लगता है कि उनका प्रेमी वही तो नहीं जो तब था जब प्रेम के झूले हिंडोले ले रहे थे| अब विवाह बाद तो यह कोई और ही शख्स बन गया है|

ऐसा नहीं कि अब उनसे मोहब्बत नहीं रही

बस जज्बात में पहले सी शिद्दत न रही

और शिद्दत के बिना तो कुछ भे जीवित नहीं बचता| शिद्दत बिना जीवन एक रस्म है, जीने का तरीका नहीं| और जज्बात में शिद्दत प्रेम भी एक रस्म भर है, एक जीवंत संबंध नहीं|

रूटीन जीवन जीते अपने व्यवसाय में धीमी किन्तु सधी गति से सफलता की सीढ़ी चढ़ रहे आधुनिक वेद के लिए तारा की बातें ऐसी धारदार साबित होती हैं जिनकी चोट वह कुछ समय पश्चात महसूस करने लगता है|

उसका अंतर्मन डॉन की भांति स्पष्ट न होकर जटिल है| अब उसकी लड़ाई अपने स्वयं से है और इसमें वह बिखरने लगता है|

कहने को वह तारा को या तारा के प्रति अपने मित्रों से कहता है –

तेरे बगैर किसी चीज की कमी तो नहीं

पर अंदर से शेर की दूसरी पंक्ति उसके लिए ज्यादा सत्य है

हाँ, तेरे बगैर दिल उदास रहता है|

प्रेम का कांटा उसके अंदर धंस चुका है, प्रेम में सफलता और असफलता दोनों ही व्यक्ति के अंदर खलबलाहट मचा देती है|

वेद की जटिल प्रकृति के पीछे कुछ कारण है| तारा उससे कहती भी है कि स्मार्टनेस में उसने वेद के अंदर उपस्थित किसी कॉम्प्लेक्स को छू दिया|

वेद के कॉम्प्लेक्स के पीछे शायद उसका बचपन हो!

बचपन से ही कम से कम लगभग हरेक भारतीय एक बात सुनता हुआ बड़ा होता है कि – बचपना छोड़ो| और बच्चों से यह कहने वालों को यह अहसास तक नहीं होता कि बहुधा वे बच्चों को उनके बचपन ही छोड़ देने को कह रहे हैं और ऐसा करना हरेक बच्चे के लिए अपने स्वाभाविक विकास की संभावनाओं के पर कुतरने जैसा ही होता है| आर्थिक रूप से समाज के हर वर्ग के बच्चों पर उनके माता-पिता अपनी इच्छाएं आरोपित करते हैं और चाहते हैं कि उनके बच्चे वे बन जाएँ जो वे अपनी अनुभवी उम्र और आँखों से देख पा रहे हैं कि ऐसा बनकर उनके जीवन सुख-साधनों से सम्पन्न रहेंगें और आराम से बिना अकिसी आर्थिक संघर्ष के वे अपने जीवन व्यतीत कर सकेंगें| वे अपने अनुसार अपने बच्चों के भले के लिए ही बच्चों के लिए सपने जन्माते हैं, उस राह पर चलाने के लिए बेहद मेहनत करते हैं, खूब खर्च करते हैं, और गरीब और निमं-मध्यवर्गीय लोग तो अक्सर ही अपनी आर्थिक सीमाओं से बहुत दूर या ऊपर जाकर अक्सर अपने बच्चों के सुखद भविष्य के लिए धन खर्च करते हैं, बहुत से इस लकीर पर चलकर सुख-साधनों से सम्पन्न जीवन पा भी जाते हैं और आगे वे अपने बच्चों के साथ इसी लकीर का पालन करना शुरू कर देते हैं| लेकिन बहुत से बच्चे ऐसे भी हैं जो अपने माता-पिता दवारा गढे गये लक्ष्य की पूर्ति हेतु मार्ग पर चलने के कारण अपनी स्वाभाविक विकास की संभावनाओं को निरंतर कुचलते रहने के कारण अपने भीतर दो हिस्सों में बंट जाते हैं और एक वह हिस्सा है जो अपने लिए प्रकृति दवारा निर्धारित मार्ग पर चलकर खिल सकता था पर अब सुप्तावस्था में ही पड़ा रहता है, और एक दूसरा हिस्सा है जो मुखर है, और जिसके बाहरी विकास की खातिर इंसान को बचपन से ही अपने लिए उपलब्ध ऊर्जा का सबसे बड़ा हिस्सा खर्चना अपद्ता है और बहुत से इस अंदुरनी संघर्ष में बुझ जाते हैं, बहुत से जीवन भर थके हुए से काम करते हैं और एक दिन रिटायर होकर अपने घर कुर्सी पर बैठ सोचा करते हैं – क्या खोया क्या पाया, बहुत से इस संघर्ष के दौरान ही हरिवंश राय बच्चन की पंक्ति गुनगुनाया करते हैं –

 

जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला

कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ,

जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

जिसमें जो गुण स्वाभाविक रूप से है और आगे पनप कर उसके व्यक्तित्व को पूर्णतया खिला सकता है और उसे आत्मिक संतोष दे सकता है, उसे बचपन से दबाकर, दूसरों को देखकर गोद लिए गुण विकसित करने में अपने पूरे व्यक्तित्व को और इसकी उर्जा को लगा देना ऐसा ही है कि जो व्यक्ति वटवृक्ष बन सकता था वह बोन्साई ही बन कर रह गया| फिर व्यक्ति मशीन जैसा बन जाता है और कुछ सालों या दशकों तक एक मशीन की भांति रूटीन जीवन व्यतीत करके काम से अवकाश प्राप्ति ग्रहण करता है और शायद अपने मरने का इंतज़ार करता है| अपने स्वाभाविक गुणों के साथ जीकर जो जीवन एक उत्सव बन सकता था वह एक मजबूरी बन कर रह जाता है|

फिल्म- तमाशा, का वेद (रणबीर कपूर) एक ऐसा ही युवा है जिसे बचपन से पिता के निर्देशों पर अपनी स्वंय की इच्छाओं के बलि चढ़ानी पड़ी है| वह गणित पसंद नहीं करता पर पिता उसे जबरदस्ती गणित पढ़वाते हैं ताकि वह इंजीनियरिंग कर सके| वेद कहानियों को सुनने, उनकी कल्पना करने का रसिया है| पर इस एक बात से उसके लिए कैसे भविष्य की कल्पना उसके पिता कर सकते हैं? वे उसे बताते हैं कि जीवन जीने में सिर्फ अपनी इच्छा और पसंद से ही काम नहीं चलता अगर वेद के दादाजी ने भी बंटवारे के बड़ा पाकिस्तान से भारत आने पर अपनी पसंद की ही बात की होते तो वे परिवार को पाल नहीं सकते थे और तब उनका वंश समाप्त हो जाता| उन्होंने अपने ऊपर परिवार की जिम्मेदारियों को देखते हुए एक फैक्ट्री में काम किया और परिवार का पालन पोषण किया|

अपने पिता दवारा बनाई गयी राह पर चल वेद मशीनी हो जाता है पर गाहे-बेगाहे वेद की कहानियों के प्रति रूचि और कल्पना करने की क्षमता हिलोरें मारती रहती है| और यह रूचि तारा से दूरी के बाद अपने अस्तित्व की सार्थकता को खोजते वेद के भीतर फिर से सिर उठाने लगती है|

उसका अंदुरनी संघर्ष प्रेम का तप पाकर ही शांति को प्राप्त हो सकता है| वेद को भी प्रेम को जानने और पहचानने के दौर से गुजरना है|

प्रेम एक अंतहीन रहस्य है

क्योंकि इसे समझाने के लिए

उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है

प्रेम को स्वीकारने के बाद ही वेद के अंदर का द्वैत समाप्त होता है और अंदर बाहर वह एक बन जाता है|

फिल्म में केवल वेद और तारा मध्य ही रोचक दृश्य नहीं है बल्कि अन्य किरदारों के साथ भी अच्छे दृश्य रचे गये हैं| तारा के घर पर बवाल काट कर ऑटो में लौट रहे वेद द्वारा कुढ़कर ऑटोवाले का मजाक बनाते हुए उससे संवाद स्थापित करना और बाद में दोनों का वार्तालाप और उसके बाद ढ़ाबे का दृश्य जहां ऑटो वाले के गाने की प्रतिभा के प्रदर्शन से वेद के अंदर कहानी कहने की अपनी अंदुरनी प्रतिभा को फिर से बाहर निकालने की प्रेरणा मिलती है, ये सब बेहद रोचक दृश्य हैं|

तारा दवारा वेद की हालत देख न सकने की हालत में उसके सामने रेस्त्रां में लगभग गिडगिडाने वाला पूरा भाग दीपिका पादुकोणे को बेहद समर्थ अभिनेत्री के रूप में प्रदर्शित करता है| दीपिका ने इस फिल्म में मिले तारा की भूमिका का पूरा लाभ उठाया है और ‘फाइंडिंग फैनी’ और ‘पीकू’ के बाद अपनी बेहतरीन होती अभिनय प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया है| इम्तियाज अली की ‘लव आज-कल’ ही वह फिल्म थी जिसके भावनाओं से भरे दृश्यों में दीपिका की अभिनय प्रतिभा उभर कर सामने आई थी| इससे बेहतर ‘तारा’ की भूमिका का निर्वाह करने वाली अभिनेत्री आज के दौर में फिल्म को शायद ही मिलती|

रणबीर कपूर न केवल अपनी फिल्मों के चयन बल्कि निरंतर निखार पाती अपनी अभिनय क्षमता से लगभग हमेशा ही चौंकाते हैं| डॉन और वेद के दो बिल्कुल अलहदा चरित्रों और फिर दोनों को एक साथ साधने वाले, और इस दौरान भ्रमित और कुंठित युवक की भूमिका, जो अपने सच और अपने वास्तविक अस्तित्व की तलाश में है, की जिम्मेदारी उन्होने बखूबी निभाई है| देव आनंद की मिमिक्री करते हुए लोग असल में उस अभिनेता की मिमिक्री करते हैं जो देव आनंद की मिमिक्री करके अपना अभिनय जीवन चलाता रहा है| रणबीर ने इस सिलसिले को तोड़ने का प्रयास किया है वे, बिल्कुल परफेक्ट तो सिद्ध नहीं होते और पूर्णतया सफल भी नहीं होते पर औरों से अलग इस बात का जिम्मा वे उठा ले गये हैं| वैसे सच यही है कि देव आनंद की नक़ल करते हुए परदे पर वैसा खूबसूरत और वैसा प्रभाशाली दिखना लगभग असंभव बात है, चाहे कोई कितना ही बढ़िया अभिनेता क्यों न हो, देव की नक़ल करते हुए हास्य की ओर जाना ही पड़ेगा, उनकी गंभीर नक़ल कोई अभिनेता न कर पायेगा| ऐसा देव के अन्य दो साथियों राज कपूर और दिलीप कुमार के लिए भी सच है| अभिनेताओं और निर्देशकों की भलाई इसी में है कि वे ऐसे प्रयास न ही करें|

फिल्म के लिए अच्छा संगीत रचा गया है और संगीत का इस्तेमाल भी बेहतरीन हुआ है|

इम्तियाज अली ने यूं तो कई सफल फ़िल्में बनाई हैं और मूलतः वे प्रेम कहानी हे कहते हैं पर प्रेम कहानी की मासूमियत जैसी वे अपनी पहली फिल्म – सोचा न था, में बरकरार रख पाए वैसा बाद की फिल्मों में नहीं हो पाया और उनमें फ़िल्मी लटके झटके प्रवेश कर गये| अब ‘तमाशा’ में उन्होंने फिर से एक प्रेमकथा को एक अलग अंदाज में दिखाने का कार्य सफलतापूर्वक किया है|

तमाशा’ देखकर दर्शक के सम्मुख इसकी कथा के हिस्सों के एकरेखीय अंदाज में न लाना और फ्लैश बैक में भी दृश्यों अक आगे-पीछे लाये जाने की योजना के मद्देनज़र यह तो महसूस होता ही है कि अगर निर्देशक फिल्म को कोर्सिका के उस दृश्य से ही शुरू करते जहां तारा, रेस्त्रां वाले से फोन करने के लिए प्रार्थना कर रही है तो फिल्म में एक अलग ही ऊर्जा दर्शक के साथ संबंध बनाती| अभी शुरू के पन्द्रह मिनट दर्शक से एक मजबूत संबंध नहीं बना पाते बल्कि उसे उबाते ज्यादा है और जब आगाज अच्छा न हो तो दर्शक फिल्म से इतर बातें सोचने लगते हैं| वेद के बचपन के दृश्य फिल्माए गये हैं यह हिंदी सिनेमा के लिए सुखद स्थिति है लेकिन फिल्म में उनकी प्लेसमेंट बेहतर हो सकती थी|

दूसरी बात जो खटकती है वह है तारा और वेद के मध्य दूरी आ जाने के पश्चात बहुत सारे दृश्य अकेले वेद पर केंद्रित किये गये हैं, जबकि फिल्म की जन उन्ही दृश्यों में ज्यादा बसती है जहां वेद या तो तारा के साथ है या अन्य किसी रोचक किरदार के साथ|

पर कुल मिलाकर ‘तमाशा’ एक अच्छी, भिन्न (हिंदी की तत्कालीन रोमांटिक कॉमेडी फिल्मो से) एवं रोचक फिल्म है, और प्रेमकथाओं के रसिकों के लिए एक अच्छी सामग्री!

…[राकेश]

 

 

 

 

 

 

 

नवम्बर 21, 2015

Bawarchi (1972): दिल चोर बावर्ची!

bavarchiसन 1972 से पहले ही भारत में हिंदी फिल्म उधोग के सुपर स्टार के रूप में राजेश खन्ना की अनूठी सफलता की चमक हिंदी सिनेमा के संसार को चुंधियाने लगी थी| आराधना के बाद राजेश खन्ना की लगभग हर फिल्म सुपर हिट रही और उनका नाम हिंदी फिल्म जगत के सबसे ज्यादा सफल सितारे का पर्याय बन गया था| | इतने बड़े और सफल सितारे को, जिसकी छवि एक रोमांटिक नायक की हो, एक बावर्ची कम घरेलु सहायक के ग्लैमरहीन और गैर-रोमांटिक रूप में दिखाना कम साहस का काम नहीं| यह साहस हृषिकेश मुकर्जी ने तो किया ही पर उनसे बड़ा दुस्साहस स्वयं राजेश खन्ना ने यह फिल्म करके दिखाया| उस वक्त राजेश खन्ना रोमांटिक फिल्मों के बेताज बादशाह बन चुके थे और देश भर के युवाओं के दिलों पर राज करते थे| रोमांटिक भूमिकाओं में उनकी खास अदाओं से भरी अदाकारी युवाओं पर फिल्म दर फिल्म कहर बरपा रही थी और युवा दर्शक राजेश खन्ना के सम्मोहन में पूरी तरह से कैद हो चुके थे| ऐसे में एक ऐसी फिल्म करना, जिसमें उनकी भूमिका एक खाना बंनाने वाले, बर्तन धोने वाले और साफ़-सफाई करने वाले घरेलू सहायक की हो और जिसमें पूरी फिल्म में उन्हें एक ही वेशभूषा में (पूरी फिल्म में स्काउट के कैडेट की भांति खाकी कमीज और हॉफ पैंट और सिर पर गांधी टोपी पहने रहकर उन्हें रहना था) रहकर काम करना था और जहां वे अपनी चिर परिचित रोमांटिक अदाएं नहीं दिखा सकते थे, एक सुपर स्टार के लिए हिम्मत की बात तो थी ही|

गौर तलब है कि हृषिकेश मुकर्जी ने निर्देशक तपन सिन्हा दवारा 1966 में बंगाली में बनाई गई फिल्म – Golpo Holeo Sotti, का ही रिमेक हिंदी में ‘बावर्ची’ नाम से बनाया और मूल बंगाली फिल्म में बंगाली अभिनेता रोबी घोष ने नायक की भूमिका निभाई थी| अगर यह बंगाली में उत्तम कुमार को नायक की भूमिका में लेकर बनाई जाती तब भी समझ में आने वाली बात थी कि बंगाली फिल्मों के एक बड़े सितारे की फिल्म को हिंदी में बनाया जा रहा था| राजेश खन्ना ने फिल्म में कटेंट देख कर ही फिल्म करने के लिए हामी भरी होगी और आराधना के बाद के चंद बरसों में उन्होंने बेहतर विषयों वाली फ़िल्में कीं जिन्होने उन्हें सुपर स्टार बनाए रखने के साथ साथ उनको अच्छा अभिनय कर सकने के भरपूर अवसर भी प्रदान किये|

फिल्म का 95% हिस्सा एक साधारण से मकान के भीतर व्यतीत होता है| साधारण सी कथा को साधारण से आम लोगों जैसे चरित्रों के माध्यम से, ग्लैमर से कोसों दूर साधारण तरीके से फिल्मा कर दिखाया गया है और हर बात में यही साधारणता फिल्म को असाधारण रूप से रोचक बनाती है और दर्शक क्षण भर को भी फिल्म से दूर जाने में या फिल्म से ध्यान हटाने में अपने को असमर्थ पाता है|

बावर्ची में बहुत कुछ है – भावनाएं, हास्य, भावुकता,व्यंग्य के बाण, खुली हँसी, आंसू, चिड़ाना, मीठे झूठ, संयुक्त परिवार की जटिलताएं, परिवार के सदस्यों के मध्य पनपी गलतफहमियां, मद्यपान जैसी बुराई, पीढ़ियों का अंतर, घर के अनाथ सदस्य के प्रति भेदभाव, और घरेलू सहायक के इर्दगिर्द छाया रहस्य का वातावरण! 43 साल के लंबे अरसे के बाद भी फिल्म न केवल जीवित है बल्कि आज भी दर्शकों को बांधती है अतः इसे क्लासिक का दर्जा देना तो एक सहज बात है| यह काल खंड से ऊपर उठ चुकी फिल्म है|

बावर्ची हिंदी सिनेमा के उन निर्देशकों के लिए एक मास्टर क्लास का भी कार्य करती है जो निम्न-मध्यवर्गीय चरित्रों को लेकर बनाई गई फिल्म में भी भव्यता पर करोड़ों खर्च कर देते हैं और फिल्म की आत्मा को मारकर शरीर को महंगे वस्त्रों में प्रस्तुत करके फिल्म की ऐसी तैसी कर देते हैं|

फिल्म की आत्मा कायदे से गुरुदेव टैगोर के एक कथन में वास करती है जिसे फिल्म का नायक रघु (राजेश खन्ना) एक चरित्र से कहता भी है – ‘It is very simple to be happy, but it is very difficult to be simple.’

bavarchi1बावर्ची की कथा कुछ इस प्रकार है – किसी शहर में एक मकान है – शान्ति निवास, जहां वृद्ध शिव नाथ शर्मा (Harindranath Chattopadhyay) अपने तीन बेटों, दो बहुओं, दो पोतियों एवं एक पोते के संग रहते हैं| घर का नाम बस नाम को ही शांति-निवास है क्योंकि हरदम तो वहाँ अशांति का ही वास रहता है| घर के सभी सदस्यों की आदतें एक दूसरे से इतनी अलग अलग हैं और वे अपने आप कोई काम नहीं करना चाहते और उनकी चिल्ल पों के कारण ही कोई भी नौकर एवं बावर्ची उनके यहाँ महीने भर भी नहीं टिक पाता| अगर घर में शिवनाथ शर्मा के एक दिवंगत बेटे की बेटी कृष्णा (जया भादुड़ी) न हो तो घर में किसी को बेड ती तो छोड़ दीजिए, नाश्ता और खाना तक न मिले| बिना अमां-बाप के लड़की कृष्णा ही ऐसी है जो अपनी पढ़ाई के साथ साथ बाकी घरवालों की खिदमत में लगी रहती है| सिर्फ दादा शिव नाथ को ही कृष्णा की भावनाओं की परवाह है और कृष्णा के ताऊ, ताईयां और चाचा और चचेरी बहन के लिए उसके प्रयासों का कोई मोल नहीं| बावर्ची और घरेलू सहायक की अनुपस्थिति में शांति निवास में सुबह से ही घर के सदस्यों में झगड़े होने प्रारम्भ हो जाते हैं और जब तक शिव नाथ अपने कमरे एन अपने बिस्तर पर बैठे बैठे चिल्ला कर सबको शांत नहीं कराटे तब तक घर मछली बाजारा जैसा अशांत बना रहता है| बावर्ची के बिना बूढ़े शिवनाथ को अपने खाने के लिए भी चिल्ला कर बताना पड़ता है कि घंटों की देरी हो गई है, पर उनकी बहुएं अपना अपना रोना लेकर बैठ जाती हैं| शिवनाथ के दोनों बेटे, बड़ा रामनाथ शर्मा (A.K.Hangal) और छोटा काशीनाथ शर्मा (Kali Banerjee), दोनों अपने अपने दफ्तर देरी से पहुंचा करते हैं और अपने अधिकारियों से डाट खाया करते हैं| रामनाथ एक प्राइवेट कम्पनी में हेड क्लर्क हैं और काशीनाथ स्कूल में पढ़ाते हैं| रामनाथ को शाम को शराब पीने की आदत है और वे शाम को दफ्तर से लौटते हुए सब्जी लाना तो भूल जाते हैं पर शराब की बोतल लाना कभी नहीं भूलते| शराब के मुददे पर रामनाथ और काशीनाथ में अक्सर झगडा होता है क्योंकि काशी को लगता है कि उनका बेटा, अपने ताऊ को शराब पीते देख बिगड सकता है| रामनाथ की पत्नी है सीता (Durga Khote) और काशी की पत्नी है शोभा (Usha Kiran)| सीता और शोभा के मध्य भी दरार चौड़ी हो चुकी है और दोनों एक दूसरे को नापसंद करने के दौर से गुजर रही हैं| शिवनाथ का तीसरा बेटा है अविवाहित विश्वनाथ शर्मा (Asrani), जो कि फिल्मों में संगीतकार बनने की फिराक में है और जहां बाकी घर के सदस्य उसे व्यर्थ का आदमी समझते हैं अपने स्वयं के बारे में उसके विचार बेहद उच्च हैं और वह अपने आप को बहुत बड़ा संगीतकार मानता है और घर के किसी भी काम करने को वह समय और उर्जा का अपव्यय मानता है और दिन भर पश्चिमी गीतों की नक़ल अपने टेप पर रिकार्ड किया करता है|

रामनाथ की बेटी कालेज में पढ़ती है और उसे घर के कामकाज में कतई कोई रूचि नहीं है, कालेज से आकर वह नृत्य का अभ्यास करती है और शाम को उसके गुरु (Paintal) उसे नृत्य सिखाने घर पर ही आते हैं|

तो ऐसे माहौल में एक सुबह जबकि शांति निवास के बाशिंदे सोकर भी नहीं उठे हैं, घर की घंटी बजती है, और कृष्णा के दरवाजा खोलने पर पता चलता है कि नया बावर्ची आया है| नया बावर्ची इस घर के लोगों के लिए ईश्वरीय वरदान से कम नहीं और सारा घर बावर्ची को देखने के लिए जैसे उस पर टूट पड़ता है| और तब तो इस घर के सदस्यों के आश्चर्य का कोई ठिकाना हे नहीं रहता जब नया बावर्ची – रघु, उनसे पहले बावर्ची को दिए जाने वाले वेतन से काफी कम वेतन की मांग यह कह कर करता है, कि मंहगाई के दौर में ज्यादा वेतन देने से ऐसे बड़े परिवार का काम कैसे चलेगा?

परिवार के सदस्यों को अपनी मीठी बातों से लुभाते हुए रघु की निगाहें वृद्ध शिवनाथ के बिस्तर के नीचे रखे लोहे के संदूक पर जा ठहरती है, जिस पर एक बड़ा सा ताला लगा है|

रघु घर के सभी सदस्यों को केवल बेहद स्वादिष्ट खाना समय पर खिलाकर ही उनके दिल नहीं जीतता बल्कि वह घर के हरेक सदस्य के निजी गुण को उदघृत करके उसकी कमियों की आलोचना न करके उसका विश्वास जीतता है और घर के सदस्यों के बिखरते हुए आपसी संबंधों में भी मिठास भरता है, उन्हें एक दूसरे के नजदीक लाता है, इसमें उसे छोटे छोटे झूठ भी बोलने पड़ते हैं| बावर्ची दर्शाती है कि नेक काम के लिए बोले गये छोटे स्तर के झूठ से कोई हर्जा नहीं होता| बावर्ची मीठा बोलने, नैतिकता और पारिवारिक मूल्यों की बात करती है|

जब लगता है कि शांति-निवास वाकई स्वर्ग जैसा घर हो गया है जहां सुख-शांति का वास स्थायी रूप से हो गया है, तभी कृष्णा के जीवन में एक हलचल उठती है और उसकी स्थिति घर में सबसे नाजुक है यह बात और ज्यादा स्पष्ट हो जाती है| रघु इस मामले को भी संभालता है, पर अगली सुबह जब घर के सदस्य देर से सोकर उठते हैं तो यह जानकर घर में भूचाल आ जाता है कि उनके दिलों को लूटने वाला बावर्ची – रघु गायब है, और वह अकेला गायब नहीं है बल्कि शिवनाथ के कमरे से लोहे के बक्से से जेवरात भी गायब हैं|

अब घर के लोग उल्टी गणना करते हैं कि रघु वास्तव में चोरी के इरादे से ही उनके घर में बावर्ची बन कर आया था वरना ऐसा गुणी आदमी जो खाना बनाना जानता हो, जिसका हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, बांग्ला, मराठी और अनेक भाषाओं पर अधिकार हो, जो शास्त्रीय संगीत और नृत्य में भी पारंगत हो, जो गणित का अच्छा ज्ञान रखता हो, जो मानवीय प्रबंधन में इतना कुशल हो, जो मनुष्य के मनोविज्ञान को इतनी गहराई से समझता हो, वह केवल एक बावर्ची कैसे हो सकता है| घर के सभी सदस्य जो रघु के आने से पहले एक दूसरे को पसंद नहीं करते थे, इस एक बात पर एकमत हो जाते हैं कि रघु ठग था, यहाँ तक कि शिवनाथ, जिनकी सबसे ज्यादा सेवा रघु ने की होगी, भी ऐसे ही विचार के पक्ष में हो जाते हैं| केवल कृष्णा ही ऐसी है जो इस बात को मानने से इंकार करती है कि रघु चोर और ठग हो सकता है|

दर्शक को भी सर्वगुणसम्पन्न रघु के बावर्ची के काम करने पर अब संदेह होने लगता है और उसे भी एकबारगी यही प्रतीत होता है कि रघु एक ठग ही था जो मीठी बातें करके लोगों का भरोसा जीत कर उन्हें ठग कर अपने अगले लक्ष्य की ओर निकल जाता है| लेकिन फिर संदेह उठता है कि इतने गुणों के मालिक रघु को क्या जरुरत है इतनी छोटी चोरियां करने की| अपने किसी भी गुण से वह लाखों कमा सकता है|

सच्चाई क्या है?

हास्य और भावनाओं से भरी इस फिल्म में कलाकारों के उत्कृष्ट अभिनय प्रदर्शन के साथ साथ चुटीले संवादों की भरमार है| गुलज़ार ने हास्य-व्यंग्य और भावनाओं से भरे तीनों किस्म के संवादों में श्रेष्ठता दर्शाई है|

हास्य महीन स्तर पर कातता हुआ दर्शक के समक्ष आता है| एक द्रश्य है जिसमें शिवनाथ के पास उनका बड़ा बेटा रामनाथ आता है| रामनाथ का घर का नाम मुन्ना है जो अपने आप में ही हास्य उत्पन्न करता है क्योंकि रामनाथ नौकरी से अवकाश ग्रहण करने की आयु में हैं|

शिवनाथ – मुन्ना, सालों से कह रहा हूँ, कि सुबह जल्दी उठने की आदत डाल लो|

रामनाथ – कोशिश कर रहा हूँ बाबू जी, पड़ जायेगी आदत|

यह संभवतः पहली फिल्म होगी जिसमें ए.के. हंगल ने हास्य भूमिका को बेहतर ढंग से निभा सकने की काबिलियत प्रदर्शित की|

अमिताभ बच्चन की कमेंटरी से शुरू होने वाली, कैफ़ी आज़मी के गीतों से और मदन मोहन के संगीत से सजी, हृषिकेश मुकर्जी के कुशल निर्देशन में गढी गई यह फिल्म भी राजेश खन्ना की चंद कालजयी फिल्मों में से एक है| नाटकीय अंदाज में और अपने आकर्षक व्यवहार से अपने इर्दगिर्द के लोगों के दिल जीतने वाले की भूमिका में राजेश खन्ना का कोई सानी नहीं| उनकी दो अन्य फ़िल्में आनंद और नमकहराम भी इस कथन के समर्थन में मजबूत गवाही प्रस्तुत करती हैं|

…[राकेश]

अक्टूबर 6, 2015

Talvar (2015) : पुलिस की अक्षम और आपत्तिजनक तहकीकात पर श्वेत पत्र

Talvar-001 सीबीआई निदेशक अपने कनिष्ठ अधिकारी से कहता है –

‘अश्विन, तुमने इंसाफ की मूर्ति देखा है, उसके हाथ में तराजू है, आँखों पे पट्टी, अक्सर लोग देखना चूक जाते हैं कि उस मूर्ति के हाथ में एक तलवार भी है, इंसाफ के हाथों की वो तलवार हम हैं पुलिस वाले, मगर पिछले साठ सालों में उस पर जंग लग गया है और जब तक वो जंग साफ़ नहीं होता तक तक यही होगा और यूँ ही होगा’|

मेघना गुलज़ार दवारा निर्देशित और विशाल भारद्वाज दवारा लिखी गई फिल्म ‘तलवार’ का शीर्षक पुलिस रूपी तलवार पर ही रखा गया है| चूँकि यह फिल्म नोयडा के बहुचर्चित आरुषि तलवार और हेमराज के दोहरे हत्याकांड पर आधारित है अतः फिल्म का शीर्षक ‘तलवार परिवार’ के जातिगत नाम से जुड़ा दिखाने के लिए भी रखा गया हो सकता है| फिल्म देखने से पहले तो हर दर्शक इसे ‘तलवार परिवार’ के नाम से ही फिल्म के शीर्षक को जोड़ेगा| फिल्म में तलवार परिवार के आधार पर टंडन परिवार को रचा गया है और फिल्म उनके परिवार में घटे हत्याकांड की कहानी दिखाती है|

इंसाफ की देवी न्यायालय में न्यायाधीश के माध्यम से न्याय करती है और न्याय के मंदिर के दरवाजे तक मामले की बारीकियां लेकर जाने का काम पुलिस का है, पुलिस ठोस सुबूत एकत्रित करके, न्यायालय पहुँचती है जहां वकील उन सुबूतों के पक्ष और विपक्ष में विश्लेषण प्रस्तुत करके उनकी सच्चाई निर्धारित करते हैं और उन सच्चे सिद्ध हो चुके सुबूतों के आधार पर न्यायाधीश मुकदमों का फैसला सुनाया करते हैं| अगर पुलिस अपना काम सही नहीं कर पाई और अनमने और अटपटे ढंग से सुबूत जुटा कर अदालत में पहुँच गई तो बहुत संभावना इसी बात की है कि न्याय कतई नहीं हो सकता, क्योंकि जज को तो अदालत में प्रस्तुत किये गये तथ्य और सुबूत के आधार पर ही निर्णय देना है| अगर मुकदमा क़त्ल का है तो मामला पेचीदा हो जाता है और पुलिस की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है| अगर वारदात के स्थल पर से पुलिस ने सुबूतों को कायदे से चुन चुन कर नहीं उठाया और फोरेंसिक विज्ञान दवारा उपलब्ध कराई गई आधुनिक और बेहतरीन सुविधाओं का भरपूर उपयोग नहीं किया तो सच का सामने आना कठिन हो जाता है|

तलवार’ फिल्म में यही होता है और एक रात टंडन परिवार के घर में टंडन दंपत्ति की इकलौती बेटी- चौदह साल की श्रुति, की ह्त्या उसी के शयनकक्ष में कर दी जाती है और तफ्तीश करने आई नोयडा पुलिस के अधिकारी श्रुति के कमरे में पड़ोसियों, रिश्तेदारों और मीडिया के लोगों की आवाजाही ऐसे होने देते हैं जैसे बहुत मामूली अपराध हुआ हो और वे बिना सुबूतों को मौक़ा-ए-वारदात से एकत्रित किये ही चुटकी बजाते ही मामले का समाधान ढूँढ लेंगें और हत्यारे को दबोच लेंगें और अदालत में उसका जुर्म भी साबित कर देंगें| पुलिस की लापरवाही इस मामले पर भारी पड़ती है और पुलिस की जांच टीम अपनी भावी असफलता को देख कर ह्त्या का आरोप श्रुति के माता-पिता के ऊपर मढ़ कर इस मामले से फारिग हो जाना चाहती है| और श्रुति और उसके माता-पिता के चरित्रों का हनन करके पुलिस श्रुति के माता पिता को हत्यारा घोषित करते हुए चार्जशीट दाखिल कर देती है|

मामला सी.बी.आई के पास जांच के लिए जाता है और सी.बी.आई का काबिल अधिकारी अश्विन (इरफ़ान खान) इस मामले की जांच शुरू कर देता है और उसे यह देख कर ताज्जुब होता है लोकल पुलिस के जांच अधिकारियों ने इस मामले के साथ बलात्कार किया है और उन्होंने जितने सुबूत जुटाये नहीं उससे ज्यादा नष्ट कर दिए| लोकल पुलिस की तफ्तीश ने हत्याकांड को इतना उलझा दिया है कि अब सीबीआई के लिए इसमें से झूठ को बाहर फेंक कर सच को सामने लाना टेढी खीर बन चुका है|

तलवार’ दिखाती है कि अगर पुलिस ऐसे ही ह्त्या जैसे संगीन जुर्म के मामलों की तफ्तीश इस लापरवाह अंदाज में करती है तब पीड़ित पक्ष को न्याय पाने की उम्मीद छोड़ ही देनी चाहिए| न तो पुलिस वालों को आधुनिक तौर तरीकों की ट्रेनिंग ही प्राप्त है और न ही उनका मन जांच में लगता है| वे पचास और कामों के साथ जांच भी निबटा दिया करते हैं| उनमें ऐसी लगन नहीं है कि अब यह मामला सामने आया है तो जब तक वे सच्चाई का पता नहीं लगा लेते तब तक उन्हें चैन नहीं आ सकता| ‘तलवार’ फिल्म पुलिस की कार्यप्रणाली पर बेहद गंभीर सवाल उठाती है| पुलिस जिसे चाहे छोड़ सकती है और जिसे चाहे अपराधी ठहरा सकती है| जब तक पुलिस अधिकारी की प्रगति रपट से उसे दिए गये मामलों की सफलता को जोड़ा नहीं जायेगा तब तक पुलिस ऐसे ही अकर्मण्यता और अक्षमता का परिचय बार-बार देती रहेगी|

स्थानीय पुलिस के मुख्य अधिकारी का मित्र और उसका बैचमेट सीबीआई का नया निदेशक बन जाता है और अपने मित्र का बचाव करने और सीबीआई के पुराने निदेशक से प्रतिद्वंद्विता रखने के कारण उससे पुराने हिसाब चुकता करने की दबी लालसा के कारण नया निदेशक, अश्विन के सहायक को अपनी ओर मिलाकर, अश्विन दवारा बेहद मेहनत से संजोयी हुयी जांच को संदिग्ध बनवा देता है और उसे बट्टे खाते में डाल कर नई टीम से नये सिरे से जांच शुरू करने का निर्णय लेता है और अश्विन को सीबीआई से बाहर निकलवा देता है| नई टीम का काम अश्विन दवारा की गई जांच के उलट मामले को करवट दिलवाना है| अश्विन की जांच टंडन दंपत्ति को बेक़सूर और उनके नौकर खेमपाल के साथियों कन्हैया और राजपाल को ह्त्या का दोषी ठहरा रही थी और नया जांच दल कन्हैया और राजपाल को निर्दोष और टंडन दम्पत्ति को श्रुति और खेमपाल की हत्याओं का दोषी ठहरा कर सुबूत इस दिशा में इकट्ठे कर रहा था| सीबीआई के नये निदेशक की कृपादृष्टि पाने के लिए नया जांच दल इस निर्णय को पहले निश्चित कर लेता है कि श्रुति की ह्त्या उसी के माता पिता ने की थी और अब बस उन्हें सुबूत भर जुटाने हैं जिससे टंडन दम्पति पर कानून का शिकंजा कसा जा सके|

फिल्म डराती है कि किस तरह पुलिस ह्त्या जैसे मामलों में भी लापरवाही दर्शा सकती है, कैसे पुलिस अधिकारियों की अक्षमता, अकर्मण्यता और उनकी आपसी प्रतिद्वंदिता किसी मामले को प्रभावित कर सकती है और बेगुनाहों को क़ानून की नजरों में दोषी करार दे सकती है|

फिल्म दोनों जांच दलों के पक्ष को दिखाती तो है लेकिन फिल्म स्पष्टतया यह स्थापित करती है कि अश्विन की जाँच सही दिशा में थी और स्थानीय पुलिस और सीबीआई की दूसरी जांच पक्षपात से परिपूर्ण थी| फिल्म में बिल्कुल ऐसा नहीं है जैसा अकीरा कुरोसावा की रशोमन में था कि तीन अलग अलग कोणों से एक ही घटना को देखने पर हर कोण सही लगे| ‘तलवार’ में बिल्कुल साफ़ तरीके से अश्विन की जांच को सही और दूसरे दल की जांच को पक्षपातपूर्ण और गलत दिखाया गया है| सो रशोमन से इस फिल्म की तनिक सी भी तुलना पूर्णतया गलत है| दोनों फिल्मों में कोई सामंजस्य नहीं है| ‘तलवार’ अगर रशोमन की भांति यह उद्देश्य लेकर चली थी कि दो अलग अलग दिशाओं से जांच दिखाकर दर्शक के ऊपर निर्णय को छोड़ देगी तो इसमें फिल्म असफल रही है| फिल्म कतई भी दर्शक के ऊपर निर्णय को नहीं छोड़ पाती|

कुछ साल पहले खोजी पत्रिका ‘तहलका’ की पत्रकार शोमा चौधरी ने आरुषि हत्याकांड में अदालत का निर्णय आने पर अपनी तरफ से खोज की थी और अपने लेख (विस्तृत लेख यहाँ पढ़ा जा सकता है और शोमा दवारा खुलासा किये जाना वाला वीडियो यहाँ देखा जा सकता है) में उपलब्ध सुबूतों के आधार पर विश्लेषण करते हुए यह सिद्ध किया था कि कैसे पुलिस और सीबीआई ने कोई सुबूत न होते हुए भी तलवार दंपत्ति को अपनी ही बेटी के ह्त्या का आरोपी ठहरा दिया और कैसे गंभीर सुबूतों के होते हुए भी उनके नौकर हेमराज के साथियों को जांच से बाहर रखकर मामले से सच को बिल्कुल ही बाहर निकाल दिया|

पत्रकार अविरुक सेन की किताब ‘आरुषि’ भी ऐसे ही निर्णय पर पहुँचती है| विशाल भारद्वाज दवारा लिखी गई कथा-पटकथा में और शोमा चौधरी के शोधपरक लेख के निष्कर्षों काफी समानताएं हैं बल्कि ऐसा ही लगता है कि शोमा चौधरी के लेख के ऊपर ही फिल्म के लेखन को आधारित किया गया है| अगर देखने में भूल न हुयी हो तो फिल्म शोमा चौधरी के शोधपरक लेख को कोई क्रेडिट नहीं देती|

सत्य घटनाओं, और वह भी हाल ही में घटी घटनाओं, पर आधारित फिल्मों को देखने में दर्शकों को परेशानी आती है क्योंकि वे स्वयं भी आखबार और इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से मामले से परिचित होते रहते हैं और चरित्रों को वे असली जीवन के व्यक्ति समझ कर ही फिल्म को देख पाते हैं| अगर घटना भूतकाल में घटी हो और बीच में काफी साल बीत गये हों तो दर्शक का घटना से अंतराल बढ़ जाता है और विषय से यह दूरी उसे घटित के कल्पित रूप को देखने में आसानी से देखने और हर बात को पचा पाने में सहायता प्रदान करती है|

तलवार’ में भले ही नाम बदल दिए गये हों पर शीर्षक और अन्य बातों के सामंजस्य के कारण सभी दर्शकों को फिल्म देखते हुए यह बोध रहता है कि यह फिल्म आरुषि तलवार हत्याकांड पर आधारित है और उस हत्याकांड और उसकी जांच प्रक्रिया को तफसील से दिखा रही है|

अब इस सेटअप में कायदे से नायक तो कोई भी नहीं हो सकता लेकिन किन्ही अज्ञात कारणों से फिल्म अश्विन (इरफ़ान खान) के चरित्र के निजी पहलुओं को भी दिखाती है| पति पत्नी या प्रेमी और प्रेमिका का रिश्ता गुलज़ार की फिल्मों का एक अहम हिस्सा रहा है और उस लिहाज से यहाँ भी सबसे ज्यादा परतदार हिस्सा अश्विन और उसकी पत्नी रीमा (तबू) के बीच के रिश्ते को दिखाने वाला हिस्सा ही है लेकिन फिल्म के मुख्य कथानक से इस हिस्से का कोई सीधा ताल्लुक है नहीं| अगर दूसरे जांच दल के अधिकारी के बेटे को छोड़ दें तो किसी और चरित्र के निजी जीवन को फिल्म में दिखाया भी नहीं गया है| इरफ़ान के आकर्षक अभिनय (जिसे जरूरी नहीं भूमिका की हदों में रहने वाला प्रभावशाली अभिनय माना जाए) और तबू के दमदार अभिनय के बावजूद उनके जीवन का कोण फिल्म के मुख्य फार्मेट से भिन्न फार्मेट दे देता है और श्रुति नहीं बल्कि अश्विन फिल्म का मुख्य चरित्र बन जाता है| अश्विन और रीमा के मध्य बिगड़ते-बनते रिश्ते की झलकियां फिल्म में एक अन्य, जो कि अच्छा भी लगता है, स्वाद तो लेकर आती हैं और वे इस ओर भी इंगित करती हैं कि मेघना गुलज़ार ऐसे रिश्ते पर बेहद संवेदनशील और बेहतरीन फिल्म बना सकती हैं, लेकिन कहीं न कहीं यह कोण फिल्म को एक काल्पनिकता का पुट देकर इसे सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्म और काल्पनिकता से बुनी फिल्म के घालमेल में फंसा देता है और फिल्म के वर्ग की आदर्श स्थिति में यह कोण एक तरह से मिलावट का काम करती है|

और इस मिलावट के लिहाज से देखें तो जहां बाकी कलाकार बेहद सहज नज़र आते हैं और हरेक ने अपनी उपस्थिति अभिनेता होने से ज्यादा चरित्र ही होने में दर्शाई है, वहीं इरफ़ान को एक स्टार की भांति उभारा गया है| गजराज राव जहां उ.प्रदेश पुलिस के एक खांटी पुलिस अधिकारी का प्रतिनिधित्व सफलतापूर्वक कर पाते हैं, कोंकणा सेन और नीरज कबी, श्रुति के ग़मगीन माता-पिता के चरित्रों को बेहद ईमानदारी और प्रभावी तरीके से परदे पर उतार पाते हैं, अन्य अभिनेता भी अपनी अपनी भूमिकाओं की हदों में सफलता पूर्वक रहते हैं वहीं इरफ़ान थोड़ा सा स्टारडम की ओर ज्यादा चले गये हैं| केस से अलग हटाये जाने और अपने सहायक से मारपीट करके हाथ में चोट लगवाकर घर वापिस आने पर तबू के सामने विवशता में क्रंदन करते हुए दृश्य को तो वे बिल्कुल ही बिगाड़ देते हैं| इरफ़ान जैसे जहीन कलाकार के लिए तलवार एक खतरे की घंटी है| सहज अभिनय उनकी विशेषता राही है अगर वे स्टार की भांति उभरा हुआ अभिनय करने के जंजाल में फंस जायेगें तो दुनिया बेहद प्रतिभाशाली इरफ़ान के चमत्कारी अभिनय प्रदर्शन से वंचित रहती जायेगी| यह फिल्म बिल्कुल ही कपोलकल्पित फिल्म नहीं है| यह हाल के बरसों के बेहद चर्चित मामले पर आधारित है और इसमें वास्तविकता का पुट होना जरूरी था|

अश्विन-रीमा और इजाज़त :-

बहरहाल इस एक बात से हटें और अश्विन और रीमा के व्यक्तिगत रिश्ते को कल्पित फिल्म का हिस्सा स्वीकार कर फिल्म देखें तो इसमें मेघना गुलज़ार और विशाल भारद्वाज की जोड़ी ने गुलज़ार की बेहद अच्छी फिल्म इजाज़त का इस्तेमाल ख़ूबसूरती से पार्श्व में किया है जिसके असर थोड़ा गहराई से देखने पर संकेतों में सामने नज़र आते हैं| गुलज़ार की इजाज़त ने दिखाया था कि स्त्री-पुरुष के मध्य रिश्ते में वही सच नहीं होता जो आँखों से दिखाई दे रहा है और किसी घटित के पीछे कुछ ऐसे कारण अवश्य  ही हो सकते हैं जो दूसरे पक्ष को दिखाई नहीं दे रहे और इसीलिए एक पक्ष आधे अधूरे तथ्य को देख अपना पक्ष तय कर लेता है ऐसे निर्णय ले लेता है जो दो नजदीकी लोगों के मध्य रिश्ते को समाप्त कर देता है| फिल्म में सुधा (रेखा), अपने पति महेंद्र (नसीरुद्दीन शाह) और माया (अनुराधा पटेल) के रिश्ते को लेकर भ्रमित हो जाती है और महेंद्र की जीवन से दूर चली जाती है, जब रिश्ते को पुनर्जीवित करने के अंतिम प्रयास के रूप में महेंद्र को फोन करती है तो फोन माया उठाती है और सुधा सोचती है कि अब माया महेंद्र के साथ ही रहती है और अब महेंद्र को उसकी कोई जरुरत नहीं है, और वह इस रिश्ते को तोड़ देने का निर्णय कर लेती है (सच्चाई उसे बाद में पता चलती है कि महेंद्र को दिल का दौरा पड़ा था और माया महेंद्र की देखभाल के लिए वहाँ रुकी हुयी थी, बाद में ही उसे पता चलता है कि माया कुछ समय बाद एक्सीडेंट में मारी गयी| और अब उसने खुद ही दूसरी शादी कर ली है, तो सुधा और महेंद्र का जो रिश्ता पूरा सच जानने से बच सकता था उसका अंजाम ऐसी स्थायी जुदाई में होता है)|

अश्विन इजाज़त फिल्म को पसंद करता है और शायद उसके कथानक से प्रेरणा भी पाता है, किसी मामले को सुलझाने में भी यह दृष्टि उसकी सहायता करती है और रीमा के साथ बिगड़ते जा रहे निजी रिश्ते में भी इजाज़त ही उन दोनों की सहायता करती है| तलाक लेने पर आमदा रीमा इजाज़त देख कर ही इस बात को समझ पाती है कि अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करने में बेहद मितव्ययी अश्विन का भी कोई पक्ष हो सकता है जहां वह सच्चा है| अश्विन नहीं चाहता कि उसका रीमा से रिश्ता बिगड़े लेकिन वह उसे सुधारने की इच्छा रखने के अतिरिक्त सतह पर कुछ ऐसा नहीं करता जिससे बात बने| वह चाहता है रीमा खुद ही बात को समझ जाए| और इस स्थिति में इजाज़त उसकी सहायता करती है| रीमा के माइग्रेन के लिए डाक्टर दवारा दी गयी दवाई का नाम बताने वाला लम्हा ऐसा है जब रीमा को महसूस होता है कि जिस दवा का नाम वह खुद भूल गयी उसका नाम अश्विन को याद है और वह संकेत ग्रहण कर लेती है कि अश्विन को उसकी परवाह है, उसके मामलों की परवाह है, भले ही ऊपर से वह लापरवाही दर्शाता हो|

अश्विन रीमा का कोण एक पूरी फिल्म की सामग्री है| अपनी खूबसूरती और गहराई के बावजूद यहाँ ‘तलवार’ में यह पूरा हिस्सा एक तरह से फिल्म के साथ अजनबी प्रतीत होता है| अच्छा होता विशाल भारद्वाज और मेघना गुलज़ार इस कोण को इस विस्तार से न दिखाते और इरफ़ान को एक चरित्र के रूप में ही प्रस्तुत करते, न कि एक स्टार की तरह|

आकर्षक लेकिन फ़िल्मी अंदाज़ न अपना कर अगर अंडर प्ले का सहारा लिया जाता तो उनकी भूमिका अविस्मरणीय बनती|

आरुषि तलवार हत्याकांड के सभी पहलुओं से लोग परिचित रहे हैं और इस तथ्य को मद्देनज़र रखते हुए इस बात की एहसास फिल्म देखने का बाद होता है कि जज दवारा टंडन दंपत्ति पर ह्त्या का मुकदमा चलाये जाने, सीबीआई के दूसरे जांच दल की तफ्तीश और सर्वप्रथम लोकल पुलिस दवारा की गई जांच को एक साथ जोड़कर बाद में अश्विन का पक्ष दिखाया जाना चाहिए था जिससे दर्शकों को यह भान रहता कि एक अन्य पहलू भी था जांच का और कैसे सीबीआई ने खुद ही उसे दरकिनार कर दिया| अब पुलिस के बाद सिलेसिलेवार तरीके से अश्विन और बाद में दूसरा जांच दल सामने आता है और चूँकि अश्विन की जांच से दर्शक जुड़ चुका होता है तो दूसरे जांच दल की जांच में शुरू से दर्शक के मन में यह भाव रहता है कि ये लोग अश्विन को गलत ठहराने के लिए जांच कर रहे हैं| रहस्य वाला भाव गायब हो जाता है|

फिल्म के ऐसे प्रस्तुतीकरण के बाद यह कहना कि सभी पक्षों को ऐसे दिखाया गया है कि दर्शक खुद निर्णय ले लें, और कि रशोमन की भांति अलग अलग कोण से एक ही घटना को दिखाया गया है, सही प्रतीत नहीं होता| फिल्म तलवार, का निश्चित मत है कि आरुषि तलवार हत्याकांड में तलवार दंपत्ति निर्दोष हैं और उनके घरेलू सहायक  के मित्रों ने दोनों हत्याकांडों को अंजाम दिया|

ऐसा पक्ष बनाना कोई गलत बात नहीं है, यह एक पक्ष है पर तब ऐसा सच कहकर ही फिल्म को प्रचारित किया जाना चाहिए|

आखिर सच तो यह भी है कि जेल में सजा काट रहे तलवार दंपत्ति ने अगर वाकई अपनी बेटी की ह्त्या की होती तो इतने बरसों में अब तक उन्हें अपराध बोध न हुआ होता? अब उनके जीवन में बचा क्या है जिसके कारण वे इससे चिपके रहें और अपराध करने के बावजूद अपने को निर्दोष साबित करने के लिए जेल से ही प्रयास करते रहें? चौदह साल जिस बेटी को दिन रात बड़े होते देखा, जिससे जीवन की इतनी यादें जुड़ गयीं, क्या उसकी ह्त्या करने के बाद एक पल को भी ऐसा नहीं महसूस होगा कि स्वीकार कर लें अपना अपराध और अपने जी को हल्का कर लें| अब तक ऐसा नहीं हुआ यही बहुत कुछ बताता है कि उन्होंने यह अपराध नहीं किया था| जिस तरह से उन्होंने स्वयं ही पुलिस को ला लाकर सुबूत दिए वह कोई अपराधी नहीं करता|

शोमा चौधरी के शोध, अविरुक सेन की किताब और विशाल भारद्वाज और मेघना गुलज़ार की फिल्म ‘तलवार’ को सही मानें तो देश ने, और इसके क़ानून ने तलवार दंपत्ति के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है और यह मामला देश की क़ानून व्यवस्था पर एक सवालिया निशान की भांति चस्पा है, देश और सर्वोच्च न्यायालय को स्वयं ही इस मामले का संज्ञान लेकर न्याय की स्थापना करनी चाहिए|

…[राकेश]

 

सितम्बर 27, 2015

Bombai ka Babu(1960) : सुचित्रा सेन के लिए देव आनंद सगा भाई है, पर देव सुचित्रा में प्रेमिका खोजता है

BombaikaBabu-001देव आनंद अभिनीत राज खोसला दवारा निर्देशित बम्बई का बाबू फिल्म की कहानी में राजिंदर बेदी और एम.आर कामथ ने O Henry की कहानी A Double Dyed Deceiver से प्रेरित प्रसंगों को रखा और इसमें इनसेस्ट के कोण का मिश्रण करके हिंदी सिनेमा के लिए इसे एक बिल्कुल भिन्न फिल्म बना दिया जिसके कथानक की बराबारी न तो इससे पहले बनने वाली हिंदी फ़िल्में कर सकती हैं न बाद में बनने वाली| सत्तर के दशक में जब बी.आर.चोपडा के सुपुत्र रवि चोपडा ने निर्देशन की कमान संभाली तो उन्होंने बम्बई का बाबू के कथानक को कम तनाव उत्पन्न करने वाला बनाकर अमिताभ और सायरा बानो को लेकर जमीर फिल्म का निर्माण किया|

भाई बहन के आदर्श रूप पर जाएँ तो सतह पर फिल्म में इनसेस्ट का पुट है लेकिन यह फिल्म का मकसद नहीं कि हॉलीवुड की फिल्मों The Cement Garden और Desire Under the Elms की भांति इनसेस्ट को खंगालें, बल्कि यहाँ फिल्म नायक नायिका के मध्य एक गलतफहमी, जिसे नायक तो जानता है अतः उसके दिमाग में सब कुछ स्पष्ट है, परन्तु नायिका सच से अनभिज्ञ है अतः तनावग्रस्त है, के कारण उपजी तनावग्रस्त स्थितियों में उनके मानसिक संघर्षों को दर्शाने का लक्ष्य लेकर चलती है|

ऐसा मानसिक द्वंद पहले एल.वी प्रसाद की राजकपूर और मीना कुमारी अभिनीत फिल्म – शारदा में दिखाई दिया था पर वहाँ आधुनिकता का अभाव था| बम्बई का बाबू एक अलग ही राह लेकर चलती है और दर्शकों के दिमाग को मथती हुयी आखिर के 10-15 मिनटों में तो दर्शक को एक तनाव के एक तीव्र आवेग से भर देती है जहां दर्शक फिल्म का ही सक्रिय हिस्सा बनकर नायक नायिका के साथ क्या होगा इसकी चिंता से भर जाता है|

फिल्म की सिनेमेटोग्राफी इसका एक बेहतरीन पहलू है| फिल्म के शुरुआत में जैसे ही बाबू (देव आनंद) जेल से बाहर आकर बाली (जगदीश राज) के साथ कार में बैठता है, कैमरा दर्शक को एक रोमांचकारी यात्रा पर ले जाता है और दर्शक को ऐसा प्रतीत होता है वह भी बाबू और बाली के साथ उस कार में ही बैठ गया है और कार के सीमित स्पेस से ही वह बाहर की दुनिया को देख रहा है| |

कलाकारों और फिल्म निर्माण से जुडी टीम के अन्य सदस्यों के नाम परदे पर कार की विंड स्क्रीन के ऊपर और नीचे उभरते रहते हैं और विंड स्क्रीन के जरिये दर्शक को बम्बई की चौड़ी सड़कों और ऊँची इमारतों को कैमरा दिखाता रहता है|

एक बेसमेंट में पहुँच कर जबकि ऐसा लगने लगता है कि अब सारे अपराधी किस्म के तत्व मौज मस्ती में मशगूल हैं सो शायद एक क्लब जैसा गीत यहाँ उभरेगा, अचानक ही स्थितियां करवट लेती हैं और हंगामे को सहन करने के जब दर्शक को साँस लेने की फुर्सत मिलती है तब बाबू पुलिस से बचने के लिए भाग रहा है, उस पर एक ह्त्या करने का आरोप लग चुका है|

परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि पुलिस से बचते बचाते वह एक ऐसे पहाड़ी गाँव में पहुँच जाता है जहां एक भगत (Rashid Khan) नाक का शातिर उसकी सच्चाई भांप कर उसे अपने जाल में फंसा लेता है और उसे ब्लैकमेल करके उसे अपनी योजना का हिस्सा बनाकर गाँव के मुखिया शाह जी (Najir Hussain) और उनकी अंधी हो चुकी पत्नी रुक्मणि (Achala Sachdev) का खोया हुआ बेटा- कुंदन, बनाकर गाँव में भेज देता है| कुंदन जब 5 साल का था तब गायब हो गया था और अब 20 साल बाद वह वापिस आया है| कुंदन (देव आनंद) के कहानी गढ़कर सब गाँव वालों को सुना देता है और उन्हें विश्वास दिला देता है कि वही कुंदन है| कुंदन का प्रयोजन धनवान शाह जी की तिजोरी से रुपया और जेवरात आदि चुराकर वहाँ से चले जाना है| पर नियति को अभी कुछ और भी उसके जीवन में लाना है!

कुंदन के दिमाग में सिर्फ शाह जी की धन-संपत्ति पर हाथ साफ़ करने की बात है पर उसके विचारों को झटका लगता है जब वह शाह जी की बेटी माया (Suchitra Sen) से मिलता है जो बीस साल बाद अपने भाई को देखकर अति प्रसन्न है|

अब शाह दंपत्ति और माया के लिए तो कुंदन माया का सगा भाई है लेकिन सच तो बाबू को पता है कि वह कुंदन नहीं है और इसीलिये वह अपने अंदर माया के प्रति उत्पन्न प्रेम के भावों को रोक नहीं पाता|

उसके मन के अंदर संघर्ष चलने लगते हैं| माया तो उसके साथ जंगल पहाड़ों में मुक्त रूप से यह सोचकर विचरण करती है कि वह उसका भाई है, जिसकी कमी उसे बचपन से खलती राही है और कुंदन माया की शारीरिक सुंदरता को और उसकी नजदीकी को और ही निगाहों से देखता है और महसूस करता है और उसका स्पर्श वह एक प्रेमी की तरह ही करता है| इससे पूर्व हिंदी फिल्मों में कैमरे ने नायक को नायिका के शारीरिक सौंदर्य को इस तरह निहारते और महसूस करते कभी नहीं दिखाया था और उस जमाने के प्रचलन के लिहाज से यह एक बोल्ड कदम था|

स्त्री पुरुष के देखने और उसके दवारा स्पर्श किये जाने के अंतर को पहचानने में कभी कभी ही भूल कर सकती है अन्यथा वह तुरंत पहचान लेती है कि उसे देखने वाली निगाहें कैसे हैं और उसे किया गया स्पर्श किन भावों से भरा हुआ है| कुंदन की निगाहें और उसके स्पर्श उसे अजीब लगते हैं लेकिन वह नजरंदाज करती है इन संदेहों को|

घर पर भी कुंदन माया के संग वे सब हरकतें करता है जो एक प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ करता है और यहाँ तक कि माया दवारा उसे राखी बांधे जाने के प्रयास को भी वह विफल कर देता है, और माया पर दबाव डालता है कि वह उसे भईया न कह कर उसका नाम लेकर उसे संबोधित किया करे| ऐसा नहीं कि वह अंदर से बदल नहीं रहा| माया के प्रति प्रेम, और वृद्ध शाह दंपत्ति दवारा उसे निश्छल प्रेम दिए जाने और उस पर अति विश्वास किये जाने से वह वही बाबू नहीं बचता जिसे भगत ने कुंदन बना कर एक योजना के तहत गाँव में भेजा था|

माया के प्रति उसकी दीवानगी बढ़ती जाती है और शाह जी दवारा उससे माया के विवाह की बात किये जाना उसके सब्र का प्याला छलका देता है| उसके अंतर्द्वंद की तीव्रता तब और बढ़ जाती है जब उसे पता लगता है कि असली कुंदन की मौत उसी के हाथों बम्बई में हुयी थी!

वह बहुत गहरे मानसिक संघर्षों में उलझ जाता है जिससे उसे अपना अस्तित्व ही हिलता हुआ दिखाई देता है|

क्या वह माया और उसके वृद्ध माता-पिता को सच्चाई बताएगा कि वह कुंदन नहीं बल्कि उसका हत्यारा है?

क्या माया से एक प्रेमी की तरह प्रेम करने की खातिर वह माया का विवाह कहीं और होने से रोकेगा?

वह क्या करेगा?

और सच्चाई खुल कर बताने से माया उसे प्रेमी के रूप में स्वीकारेगी? खासकर इस सच्चाई को जानने के बाद कि वही उसके खोये हुए भाई का हत्यारा है?

आजकल जिस तरह की बंदिशें, नैतिकता के नाम पर फ़िल्मी दुनिया पर समाज के स्वयंभू ठेकेदारों ने लाद दी हैं उससे यह संभव नहीं लगता कि आजऐसी बोल्ड थीम पर फिल्म बने तो उसे सेंसर का प्रमाणपत्र लेने दिया जायेगा या अगर मिल भी जाए तो उसे थियेटर में आसानी से चलने दिया जायेगा|

पचास और साठ के दशक के सुपर स्टार देव आनंद ने उन दशकों में फिल्म के कथानकों के हिसाब से कई मर्तबा नई परिपाटी पर चलने का साहस दिखाया था और यही उनकी फिल्मोग्राफी को अपने से ज्यादा समर्थ अभिनेता दिलीप कुमार के समक्ष मुकाबले में ला खड़ा करता है| नैतिकता और प्रेम के बेच संघर्ष में मानसिक द्वंदों से जूझ रहे इंसान के चरित्र को बहुत प्रभावी ढंग से देव आनंद ने परदे पर साकार कर दिया है| बम्बई का बाबू में अपराध, सजा और पश्चाताप के मकडजाल में फंसे बाबू/कुंदन के चरित्र में देव आनंद ने वह सब कुछ फिल्म को समर्पित किया है जो इस जटिल चरित्र को परदे पर साकार करने के लिए आवश्यक था|

सुचित्रा सेन ने बहुत कम हिंदी फ़िल्में कीं पर जब भी कीं वे उन्हें एक महान अभिनेत्री ठहराने का सुबूत ही बन कर उभरीं| हिंदी फिल्मों में उनकी उपस्थिति से हिंदी फिल्मों का इतिहास ही समृद्ध हुआ| सुचित्रा सेन ने परदे पर अपने किरदार में वह दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है जिस पर कि यह विश्वास सहज ही हो जाता है कि बाबू/कुंदन इस स्त्री के लिए सामाजिक परिभाषाओं को आसानी से चुनौती दे सकता है|

राजिंदर बेदी ने देव आनंद और सुचित्रा सेन के मध्य ऐसे दृश्य और ऐसे संवाद रचे हैं कि वे फिल्म की रीढ़ बन जाते हैं| एक उदाहरण –

जंगल में माया के साथ विचरते हुए कुन्दन फूल तोड़कर माया के बालों में लगा देता है| माया चौंक जाती है और ठिठक कर दूर होकर शिकायत करती है,”तुम कैसे अपनी बहन के बालों में फूल लगा सकते हो?”

कुंदन- पर तुम एक स्त्री भी तो हो और स्त्री का सौंदर्य बालों में फूल लगाकर और बढ़ जाता है|

क्रोधित माया- स्त्री और बहन में अंतर नहीं होता?

जाल मिस्त्री का कैमरा प्रकाश और छाया के साथ बहुत से प्रयोग करता है और वातावरण के विभिन्न भावों को प्रस्तुत करता है| भगत के किरदार का असर बढाने के लिए उसे हमेशा ही बादलों जैसे वातावरण के पीछे छिपाकर प्रस्तुत किया गया है|

फिल्म के संगीत की तो बात क्या की जाए, मजरूह सुल्तानपुरी ने गजब गीत लिखे और सचिन देब बर्मन ने ऐसी धुनें बनाई हैं जो पचास साल भी ताजगी की एहसास फिजां में घोल देती हैं| यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में सबसे अच्छे कुछ कोरस गीतों में बम्बई का बाबू के दो गीत शामिल हैं| मुकेश, मुहम्मद रफ़ी और आशा भोसले को उल्लेखनीय गीत मिले और उन्होंने महान प्रस्तुतियाँ दीं|

राज खोसला ने ऐसी शानदार फिल्म बनाई कि इस गैर-सामान्य कथानक और सिनेमाई ट्रीटमेंट फिल्म के चाहने वाले इसे बार बार देखना पसंद करते हैं और जो एक बार भी देख ले इसका मुरीद बन कर रह जाता है|

…[राकेश]

सितम्बर 25, 2015

Anand (1971) : जीने का अंदाज अंकुरित कर जाने वाला जिंदादिल

Anand-001हृषिकेश मुकर्जी की उल्लेखनीय फिल्म – आनंद, का शीर्षक फिल्म के एक मुख्य किरदार आनंद (राजेश खन्ना) के नाम पर रखा गया है, जो अपने जीवन के गमों और अपनी परेशानियों को दरकिनार करके अपना जीवन इस ईश्वरीय वरदान वाले अंदाज में जीता रहा कि उसके संपर्क में आने वाले हर इंसान को उसकी उपस्थिति से आनंद ही प्राप्त हुआ| पर आनंद फिल्म का मुख्य किरदार नहीं है, फिल्म का मुख्य किरदार है बम्बई का डा. भास्कर बनर्जी (अमिताभ बच्चन), जिसकी लिखी किताब के हवाले से दर्शक आनंद को जान पाते हैं, देख पाते हैं और आनंद के जीवन दर्शन के दवारा आनंद प्राप्त कर पाते हैं|

भास्कर एक गंभीर इंसान है जो मेडिकल प्रोफेशन में निरंतर फैलते भ्रष्टाचार, चारों और विस्तार पाती भूख, गरीबी और बीमारियों के कारण और ज्यादा शुष्क मिजाज का हो गया है और उसके अंदर नाकारा तंत्र के प्रति नाराजगी भरी रहती है| उसके जीवन में प्रसन्नता और आनंद के लक्षण तक दिखाई नहीं देते| अंतर्मुखी भास्कर का जीवन बस यूँ ही अपनी डाक्टरी से जुडी व्यस्तताओं से भरा एक रूटीन सा जीवन है| उसमें किसी प्रकार का कोई रस नहीं है| ईमानदारी से वह अपना काम करना चाहता है| पर एक अकेला वह नक्कारखाने में तूती की आवाज है|

वह फिल्म का नायक है पर उसके जीवन पर बनी फिल्म भयंकर बोरियत दर्शकों को प्रदान करेगी| या तो वह चिकित्सा के क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध जंग कर रहा हो तब कोई रोचक फिल्म उसके जीवन पर बन सकती है, या उसके जीवन में ऐसे वाकये गुजरते हों जो रोचक फिल्म की सामग्री प्रदान करते हों| यहाँ दूसरी संभावना जाग्रत होती है और उसके जीवन में बदलाव आता है दिल्ली से बम्बई आने वाले आनंद के आ जाने से| आनंद, भास्कर से बड़े नायक के तौर पर उभर कर आता है| आनंद को समझने के लिए और उसकी सार्थकता को जानने के लिए भास्कर को जानना, पहचानना और समझना जरूरी है|

फिल्म डा. प्रकाश (रमेश देव) की मार्फ़त भास्कर और दर्शकों को बताती है कि दिल्ली से उन दोनों के मेडिकल कालेज के मित्र डा. त्रिवेदी का एक मरीज जो उसका मित्र भी है, आनंद, बम्बई में प्रकाश और भास्कर के पास आने वाला है| आनंद को आँतों का कैंसर है और आनंद का एक्स-रे देखते हुए भास्कर बड़े ही कैजुअल तरीके से टिप्पणी करता है कि इसमें देखना क्या है, यह आदमी हद से हद चार- छह महीने ही जी पायेगा|

यह टिप्पणी और इसे करने का अंदाज बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये दोनों बातें भास्कर के चरित्र को दर्शाती हैं| मरीज और मर्ज को देखने का उसका तरीका तकनीकी है| जिस मरीज के पास संसाधन नहेने हैं, ऐसे गरीब मरीजों के लिए उसके मन में हमदर्दी जरुर है लेकिन सामान्यतः उसका दृष्टिकोण वैज्ञानिक ज्यादा है| पिता के जमाने के अपने वृद्ध नौकर के सिवा उसके घर कोई अन्य इंसान दिखाई नहीं देता| उसके माता-पिता का कोई जिक्र फिल्म में नहीं है| लगता है उसका कोई नजदीकी रिश्तेदार भी नहीं है और हृषिकेश मुकर्जी की कुछ अन्य फिल्मों की तरह वह नितांत अकेला इंसान है| मशीनी दिनचर्या के कारण भी और उसकी जीवन शैली और उसके प्रकृति के कारण भी उसका जीवन नीरस है| उसे अकेले रहा अच्छा लगता है या अकेलापन उसने अपने पर थोप लिया है, एकबारगी इसका पता दर्शक को शुरू में नहीं लग पाता| वह डाक्टर होने के अपने कर्तव्य का निर्वाह तो भली भांति करता है पर इससे इतर उसके जीवन में कुछ भी दिखाई नहीं देता| चूँकि कोई नाते रिश्तेदार दिखाई नहीं देते सो किसी से उसका दिल का रिश्ता भी निगाहों में नहीं आता| प्रकाश से ही उसकी मित्रता है पर वह कितनी अतरंग है इसका कोई सुराग नहीं मिलता| भास्कर रिजर्व किस्म का इंसान है सो दूसरे को ही पहल करनी होगी ऐसे इंसान से गहरा रिश्ता बनाने में|

संक्षेप में कह सकते हैं कि व्यवसाय में डूबे भास्कर के पास ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ की कुंजी नहीं है| वह प्रसन्नचित इंसान नहीं है| भावनाओं के समुद्र में तैरना तो दूर उसने अभी टखने तक पाँव भी नहीं भिगोये हैं| वह जीवित है, सवेंदनशील भी लगता है पर जीने की कीमिया से वह अंजान है| जीवन की कोमलता से उत्पन्न कलाओं से वह अनभिज्ञ है|

उसमें जो कुछ स्वभावगत कमियां हैं, जिन्हें स्वस्थ जीवन की परिभाषा के तहत बीमारियाँ भी कह सकते हैं उनका एंटीडोट बनकर आनंद का प्रवेश उसके जीवन में होता है| आनंद वह सब कुछ है जो भास्कर नहीं है|

आनंद प्रेम का दूसरा नाम है| वह जीवन को और जीने के अंदाज को परिभाषित करने वाला इंसान है| आनंद एक निर्मल और निश्छल उपस्थिति है जो अपने इर्दगिर्द सिर्फ और सिर्फ प्रसन्नता का विकिरण हर समय करता रहता है| उसके भौतिक शरीर का क्षय बहुत तेजी से हो रहा है लेकिन उसके आत्मिक बल, और वर्तमान के लम्हों को भरपूर जी लेने की अदम्य इच्छा, इच्छाशक्ति और सामर्थ्य की तीव्रता अदभुत है| ऐसा कोई नहीं जो उसके संपर्क में आकर उसके साथ चंद लम्हे गुजार ले और उसके साथ प्रेम में न पड़े| दर्शक के लिए भी ऐसा कर पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है| वह न केवल फिल्म के चरित्रों के दिलों में जगह बनाता है बल्कि परदे पर आने के चंद पलों के बाद ही दर्शक के दिल और दिमाग का एक हिस्सा बन जाता है| उसके सुख दुख दर्शक के भी सुख दुख बन जाते हैं|

एक दर्शक पचास बार आनंद फिल्म देख ले| चाहे तो एक दिन में लगातार पांच बार देख ले और भले ही उसे फिल्म का अंत भली भांति पता हो पर यह असम्भव है कि आनंद की प्रसन्नता से संक्रमित होकर वह प्रफुल्लता से हँसे नहीं और आनंद के कारण उपजे दुख से उसकी आँखों में नमी न तैर जाए| यह सरासर असंभव बात है|

आनंद मानों भास्कर को जीना सिखाने के लिए ही अपने जीवन के अंतिम कुछ माह व्यतीत करने बम्बई आया है| जिस भास्कर का किसी भी शख्स से गहरा नाता नहीं था वह आनंद की मैत्री में जीने के बाद उसे खोने के डर से रातों को सो नहीं पता, और दिन भर बेचैन रहता है| जिस डा. भास्कर को मरीज का इलाज करने से अलग उससे कोई संबंध रखने में कोई रूचि नहीं थी उसका जीवन दर्शन आनंद पलट कर रख देता है और भास्कर एक अच्छा डाक्टर होने के साथ एक अच्छा और संवेदनशील और पहले से बेहतर इंसान बन जाता है|

यह आनंद ही है जो भास्कर के लगभग वीरान जीवन में जीने के बेहतर तरीकों के अंकुर उगाता है| भास्कर के दिल की तहों में अँधेरे में दबे कुचले प्रेम को न केवल ऊपर सतह पर लाता है बल्कि उससे भास्कर के जीवन को इस कदर महकाता है कि इसकी सुगंध दूर से ही भास्कर के व्यक्तित्व और उसके जीवन में महसूस होने लगती है|

आनंद जब भास्कर को कायदे से जीना सिखा देता है तब प्रकृति उन घड़ियों को ले आती है जब आनंद को धरा से विदा लेनी है| जिस आदमी का कोई वजूद छह माह पहले भास्कर, और प्रकाश और उनके नजदीकी लोगों में नहीं था वही सब लोग अब आनंद की पास आती मृत्यु से भयभीत हैं| प्रकाश और भास्कर तो डाक्टर हैं और मरीजों को मरते हुए दैनिक स्तर पर देखते रहे हैं पर आनंद की मृत्यु उनकी सहनशीलता से बाहर की बात है| दर्शक के लिए भी आनंद को मरते देखना दुख की बेला से गुजरना है| ऐसे इंसान की आदत हो जाना स्वाभाविक है| वह एक तरह से भास्कर और अन्य चरित्रों के लिए ही नहीं बल्कि दर्शक के लिए भी ‘जीवन कैसे जियें’ इस रहस्य को सिखाने वाला गुरु है और गुरु के साथ रहते एक सुरक्षा कवच को लोग महसूस करके सहजता से जीते हैं पर गुरु से वियोग की बात उन्हें कमजोर बना डालती है क्योंकि अब वे अपने जीवन के स्वयं जी खेवनहार हैं और अब उन्हें स्वंय ही जीवन को उस तरह से जीना है जैसा गुरु ने उन्हें सिखाया है|

आनंद की प्रतीक्षित मौत के बाद उपजे शून्य ने भास्कर के मन को मथा होगा उसे बेहद प्रताड़ित किया होगा और तब किन्ही क्षणों में वह वास्तविकता को स्वीकार कर पाया होगा|

आनंद को लेकर भास्कर के लिए दो विरोधाभासी भावों का सामना करना पूरी तरह स्वाभाविक है| जहां आनंद ने उसके जीवन में जो रस घोला है, उसे जीवन जीने की कला जो सिखाई है उसकी स्मृतियाँ उसे आनंद और उसके साथ व्यतीत किये समय के प्रति शुक्रगुजार ठहराती होंगी –

 

बीते वक्त का हर लम्हा याद है मुझे

मैं गुजरे वक्त का एहसानमंद हूँ

लेकिन इसी के साथ जब उसे एहसास होता होगा कि आनंद उसे छोड़ कर चला गया है और अब भौतिक रूप से वह आनंद के साथ होने का आनंद कभी नहीं उठा पायेगा तब इस एहसास के दुख से उसका अंतर्मन बुरी तरह प्रताड़ित होता होगा|

 

गुजरते वक्त की हर चाप से डरता हूँ

न जाने कौन सा लम्हा उदास कर जाए

और स्मृतियों के अच्छे और दुखमयी पहलुओं से गुजरते हुए ही वह आनंद के साथ व्यतीत किये गये समय को लेखनीबद्ध करके जब किताब का रूप देता है तो कभी उसे यह एहसास हो गया होगा कि आनंद और जैसे जीवन से भरपूर लोग कभी नहीं मरते क्योंकि वे हमेशा जिंदा रहते हैं उनके प्रेम में सराबोर हो चुके लोगों के दिलों में|

जब खुल कर जीते नहीं तब इंसान एक तरह से संग्रहकर्ता बन जाते हैं और इच्छाएं संग्रहित करते रहते हैं कि ऐसा हो जाए इसके बाद ये करूँ, वैसा हो जाए तो वह करूँ और अतृप्त इच्छाएं उनके मन-मानस पर बोझ डालकर उन्हें मृत्यु के प्रति अति-भयभीत बना डालती हैं| अभी कितना कुछ नहीं कर पाए अभी कैसे मर जाएँ!

जब भरपूर जी लिए और अतृप्त तमन्नाएं न रहें क्योंकि जैसा जीवन में सामने आया उसे वैसा देखा, समझा और उसके पार हो लिए के सिद्धांत से मन पर कोई बोझ नहीं रहता और तब इंसान मृत्यु से भयभीत नहीं होता| आनंद भी ऐसा ही है, जब जिस बात को करने का कहने का भाव मन में उठा तब वह कर दिया, कह दिया| उसका बंधन भी किसी से नहीं है| अंत में भी वह अपने लिए नहीं भास्कर के लिए थोड़ा और जीना चाहता है क्योंकि उसे पता है कि बाहर से कठोर दिखने वाला भास्कर अंदर से कमजोर है और अब आनंद के साथ मैत्री के प्रेमपूर्ण बंधन में बंधने के  पश्चात उसके लिए आनंद से हमेशा के लिए जुदाई सहन नहीं हो पायेगी|

आनंद लोगों को जीना सिखा जाते हैं और यह कारवां यूं जी आगे बढ़ता चला जाता है और इंसान के अस्तित्व में प्रेम और जीवन को सही ढंग से जीने का ज्ञान भी संरक्षित और संप्रेषित होता चला जाता है|

आनंद, हर दृष्टि से राजेश खन्ना की फिल्म है| अमिताभ बच्चन फिल्म में कुपोषण का शिकार लगते हैं और बीमार व्यक्ति की भूमिका में शारीरिक रूप से ज्यादा सटीक लगते और कैंसर से ग्रसित राजेश खन्ना खाते पीते व्यक्ति नज़र आते हैं तब भी राजेश खन्ना के बेहतरीन अभिनय को देखकर एक भी दृश्य में ऐसा नहीं लगता कि कोई और, कोई भी और अभिनेता उस दौर में, उससे पहले दौर में या उसके बाद के दौर में आनंद की भूमिका को राजेश खन्ना से अच्छा निभा पाता| जबकि पहले और बाद में भी राजेश खन्ना से बेहतरीन अन्य अभिनेता हुए हैं पर यह भूमिका राजेश खन्ना ने सारे अभिनेताओं से हमेशा के लिए छीन ली है और कोई अन्य अभिनेता इसे निभाने की चेष्टा भी करेगा तो वह राजेश खन्ना के अभिनय की स्मृति के स्तर को बढाने का ही काम करेगा|

खासा समय गुजर जाने के बाद राजेश खन्ना के चरित्र आनंद का प्रवेश फिल्म में होता है और अंत में आनंद मर भी जाता है, और उसकी कहानी हमें अमिताभ बच्चन के चरित्र के हवाले से दिखाई जाती है तब भी पूरे समय दर्शक के मानस पर आनंद और इस भूमिका में राजेश खन्ना ही छाये रहते हैं| सिर्फ एक दृश्य में सूट में नज़र आने वाले राजेश खन्ना ने पूरी फिल्म में साधारण कुर्ते पायजामे ही पहने हैं, उनके चेहरे पर मुंहासों की भरमार दिखाई देती है और यह उनके अभिनय का ही कमाल है कि पिछले चार दशकों से ज्यादा समय से यह फिल्म हिन्दुस्तानी दर्शकों को पीढ़ी दर पीढ़ी लुभाती आ रही है| परदे पर वे आनंद ही हैं| अभिनेता और चरित्र के भेद को उन्होंने इस फिल्म में मिटा दिया है|

फिल्म के एक दृश्य में आनंद दुर्गा खोटे के चरित्र से मिलने जाता है और चंद पलों में ही उनका दिल जीत लेता है| बिल्कुल यही काम आनंद की मार्फ़त राजेश खन्ना दर्शकों के साथ करते हैं|

गुलज़ार के संवादों और योगेश एवं गुलज़ार के रचे गीतों की सहायता से आनंद के चरित्र को एक आभामंडल मिलता है जिसका भरपूर लाभ राजेश खन्ना उठाते हैं|

हृषिकेश मुकर्जी ने 1979 में गोलमाल तक एक से बढ़कर एक फ़िल्में बनाई लेकिन यह बिना वजह नहीं कि आनंद हृषिकेश मुकर्जी की फिल्मोग्राफी में सबसे ज्यादा देखी और सराही जाने वाली फिल्म है| उनके दवारा बनायी गई उच्च स्तरीय फिल्मों की भीड़ में भी आनंद दर्शक से एक सहज और गहरा रिश्ता बना लेती है और यह आनंद की भूमिका के कारण ही संभव हो पाता है| राजेश खन्ना भाग्यशाली थे कि उन्हें ऐसा एक कालजयी किरदार उस वक्त निभाने को मिला जब उनकी रचनात्मक ऊर्जा अपने उरूज पर थी|

…[राकेश]

सितम्बर 19, 2015

Katha (1983) : सीधा-सच्चा, आदर्शवादी और अंतर्मुखी पुरुष बनाम जालसाज, झांसेबाज छलिया !

Kathaफिल्म ‘कथा’ केवल खरगोश और कछुए की कहानी का मानवीय दृश्यात्मक रूपांतरण नहीं है| ‘कथा’ के मूल में एक कहावत है – हर चमकती चीज सोना नहीं होती| जो अच्छा दिखाई दे रहा हो, जरूरी नहीं वह वास्तव में अच्छा हो भी| और यह बात फिल्म को सार्वभौमिकता प्रदान करती है| किसी भी देश में किसी भी भाषा में यह परिकल्पना काम कर जायेगी|

मनुष्य की इच्छाएं और सपने, जो कि अभी पूरे होने बाकी हैं, उसे उस वक्त अक्ल का अंधा बना देते हैं जब ऐसी कोई चीज सामने आ जाए जिसे वह अरसे से चाह रहा हो| लंबे समय से इच्छित वस्तु की अकस्मात उपलब्धि समझने की शक्ति क्षीण कर देती है| कहते हैं कि स्त्री, चाहे वह संसार की किसी भी जगह की क्यों न हो, के मन में एक ऐसे पुरुष से विवाह करने की इच्छा रहती है, जो सर्वगुण सम्पन हो, दिखने में आकर्षक हो, और धनी हो, और ऐसा गुण भी रखता हो कि न केवल अपनी भावनाओं को आराम से व्यक्त कर सके बल्कि उसके भावों और उसकी भावनाओं को भी बिना उसके द्वारा व्यक्त किये ही समझ ले| अक्सर ऐसे पुरुष जो अंतर्मुखी, शर्मीले, और सीधे, सादे दिल वाले हों और जो हमेशा दूसरों को प्रभावित करने में नहीं लगे रहते, स्त्रियों दवारा भोंदू की संज्ञा पाते हैं| गरीब और विकासशील देश में निम्न-मध्यवर्गीय लोगों में बहुतायत ऐसे लोगों की होती है जहां माता-पिता अपनी संतानों को सभी सुख सुविधाएँ मुहैया नहीं करा पाते और बचपन से ही बच्चों के मन में जो नहीं मिल पा रहा है, उसका एक अलग कमरा बनता चला जाता है जहां मौक़ा मिलते ही इन सब सुख सुविधाओं का उपभोग कर लेने की इच्छाएं एकत्रित होती चली जाती हैं| भारत जैसे देश में जहां लड़की शादी के बाद पति के घर चली जाती है, लड़कियों के मन में ऐसा भाव होना स्वाभाविक है कि जो माता-पिता के घर में न मिला वह सब पति के घर उसे मिल जाना चाहिए| माता-पिता भी अपनी लड़की की शादी ऐसे वर से तो करना ही चाहते हैं जो धन-संपत्ति और हैसियत में उनसे बढ़कर हो| लड़का अपने से कम संपत्ति और शैक्षिक और अन्य योग्यताओं वाली लड़की से विवाह कर सकता है, करते हैं पर लड़कियों के लिए ऐसा करना उनके सपनों पर कुठाराघात करने के बराबर होता है| मध्य-वर्ग में ऐसा कम देखने को मिलता है कि लड़की ने अपने से कम आर्थिक हैसियत वाले लड़के से विवाह किया हो| सच्ची योग्यताएं और सच्चे गुण ऐसे में पीछे चले जाते हैं और खोखली मान्यताएं सतह पर आकर जीवन को संचालित करने लगती हैं|

कथा’ ऐसी ही पृष्ठभूमि पर बनी एक बेहतरीन फिल्म है| फिल्म की नायिका भी खालिस सोने को नजरंदाज करके पीतल को सोना समझ गले लगाती है और जीवन का सबसे बड़ा धोखा खाती है|

साधारण कहानी का सादा फिल्मांकन फिल्म की खासियत बन जाता है| फिल्म सीधे-सादे तरीके से कहानी को आगे बढाती हुयी इंसानी मनोविज्ञान को भली भांति परदे पर प्रस्तुत करती है, और दर्शक को उसका विश्लेषण करने का अवसर देती है|

कहानी के स्तर पर देखें तो यह एक साधारण सी कहानी है| राजाराम पु. जोशी अर्थात राजाराम पुरषोत्तम जोशी (नसीरुद्दीन शाह) बम्बई में एक चाल में अकेला रहता है और जूते की एक कम्पनी में क्लर्क का काम करता है| राजाराम बेहद सीधा सादा, ईमानदार और बला का परिश्रमी व्यक्ति है| वह पड़ोस के घर में रहने वाली संध्या (दीप्ति नवल) से प्रेम तो करता है पर उससे अपने प्रेम का इजहार करने की हिम्मत उसके पास नहीं है| वह सोचता रहता है कि एक बार उसे प्रमोशन मिल जाए तो वह संध्या के माता-पिता से बात करे| संध्या के माता-पिता ही नहीं चाल में सभी लोग राजाराम की भलमनसाहत के कारण उसे पसंद करते हैं, पर बहुधा लोग उसके सादे व्यवहार के कारण उसका शोषण भी करते रहते हैं| राजाराम इन बातों का बुरा नहीं मानता और इन छिटपुट घटनाओं के कारण अपना मूल व्यवहार और स्वभाव नहीं बदलता| संध्या किसी रोज उसके घर आ जाए तो वह दिन राजाराम के लिए उत्सवमयी हो जाता है| एकांत में वह अपने मन में संध्या से खूब बातें किया करता है पर संध्या के सामने आने पर उससे अपने मन की बात कहने की उसकी सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाती हैं| दफ्तर में भी राजाराम का शोषण उसके साथ के कमर्चारी करते रहते हैं और इधर उधर के बहाने गढ़ कर अपने काम का बोझा भी राजाराम के सिर डालते रहते हैं| राजाराम भी बिना शिकायत करे अपने काम के साथ इन लोगों का काम भी निबटा दिया करता है| वह किस किस्म का आदर्शवादी है यह इस एक दृश्य से पता चल जाता है|

एक शाम दफ्तर से वह थका हारा लौटा है, बस स्टॉप पर वह कायदे से लोगों की लाइन में खड़ा होता है पर बस आने पर अन्य लोग तो धक्का मुक्की लगा कर बस में चढ़ जाते हैं, नियम कायदे मानने वाला राजाराम सड़क पर ही खड़ा रह जाता है| दो-तीन बसें आकर चली जाती हैं और राजाराम को बस में घुसने का मौका नहीं मिलता| छीनाझपटी करके वह कोई चीज ले नहीं सकता| टैक्सी से जाने लायक खर्चा करने का उसने सोचा भी नहीं, उसके लिए बहुत महंगा है टैक्सी से जाना| तभी एक आदमी बस स्टॉप पर आता है उसके हाथ में चलता हुआ ट्रांजिस्टर है, जिसमें राजाराम सुनता है कि किसी जरुरतमंद को आपाता स्थिति में अस्पताल में ओ-निगेटिव ग्रुप का रक्त चाहिए| वह सड़क पर चिल्लाने लगता है कि उसका खून इसे विशेष ग्रुप का है, वह एक टैक्सी रोकता है और उसे मुंहमांगी रकम पर अस्पताल जाने के लिए राजी कर देता है और खुशी से चिल्लाता हुआ अस्पताल चला जाता है| देर से घर लौटता है डिनर तैयार करता है ताकि खाकर ढंग से सो सके और अगले दिन दफ्तर जा सके|

लोगों के लिए राजाराम एक भावनात्मक और आदर्शवादी मूर्ख है पर वह सच्ची मानवता में भरोसा रखता है और उसे विश्वास है कि जब वह दिल से अच्छा है तो अन्य लोग भी ऐसे ही भले होंगें और क्यों बिना मतलब अन्य लोगों को संदेह की दृष्टि से देखा जाए|

राजाराम की मंथर गति से चलती रूटीन ज़िंदगी में सहसा गत्यात्मक परिवर्तन आते हैं उसके उसके स्कूल सहपाठी बासु (फारुख शेख) के उसके घर में लगभग जबरदस्ती घुस आने से| चलता पुर्जा बासु राजाराम को विवश कर देता है उसे अपने घर में ठहराने के लिए| चतुर बासु शीघ्र ही राजाराम की सारी स्थिति, चाल में रहने वालों की प्रवृतियाँ समझ लेता है और सबको अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से चूना लगाने लगता है| वह इतना घाघ है कि सीढ़ी चढ़ रहे बुजुर्ग को सामान सहित सीढियां चढ़ने देता है और बिल्कुल अंतिम पायदान पर सामान उनसे ले लेता है कि उसके रहते वे बोझ कैसे उठा सकते हैं और बुजुर्गवार का दिल जीत लेता है| वह सुबह का नाश्ता किसी के घर, दुपहर का खाना कहीं और, शाम की चाय कोई उसे राजाराम के यहाँ दे जाता है और फिर रात के खाने के समय उसकी दावत किसी और के घर होती है| संध्या को देखते ही वह उसकी सपनीली प्रकृति को भांप लेता है और समझ जाता है कि उसके मन में उसकी वर्तमान ज़िंदगी से बेहतर ज़िंदगी पाने की तमन्ना है| संध्या के माता-पिता की संध्या के विवाह को लेकर लालसा को भी वह देख लेता है| संध्या और उसके माता-पिता सोचते हैं कि उसकी अच्छी जगह शादी हो जाने से संध्या को वह सब कुछ मिल सकेगा जो अभी वे लोग जुटा नहीं पाते|

राजाराम और बासु में जमीन आसमान का अंतर है| राजाराम के लिए प्रेम करना या प्रेम में होना एक पवित्र बात है जबकि बासु के लिए लड़की पटाना और उसे घुमाना फिरना, उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित करना ही प्रेम है| चालबाज बासु को अच्छे से पता है कि मानव प्रशंसा से बहुत जल्दी पिघलता है| निठल्ला बासु राजाराम से उसके बॉस के बारे में कुछ जानकारियाँ लेकर उसका पीछा करना शुरू कर देता है और ऐसा चक्कर चलाता है कि पचास तरह के झूठ बोलकर राजाराम की कम्पनी में मैनेजर की नौकरी पा जाता है|

लोगों को झांसा देना बासु की फितरत है| बॉस के घर पार्टी में जाने पर वह भांप जाता है कि उसके बॉस और बॉस की पत्नी- अनुराधा (मल्लिका साराभाई) की उम्र में काफी अंतर है| बस इसी का फायदा उठा वह अनुराधा पर भी डोरे डालने लगता है| बॉस की बेटी को देखता है, तो उसे भी शीशे में उतारने की चेष्टा करता है| राजाराम की चाल में वह संध्या को भी अपने जाल में फंसाना चाहता है| संध्या से सच्चा प्रेम करने वाला राजाराम बासु की ऐसी हरकतें सहन नहीं कर पाता और बासु को समझाता है कि संध्या ऐसी लड़की नहीं है और अगर वह वाकई उससे प्रेम करता है तभी उसे संध्या को अपने प्रेम में डालना चाहिए और अगर वह उसकी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहा है तो उसे यह खेल यहीं रोक देना चाहिए|

राजाराम की शराफत, उसका अंतर्मुखी होना, और उसका शर्मीलापन उसे संध्या को चेताने से रोकने पर बासु से जलने वाले की संज्ञा दे जाता है|

बासु एक ही समय में संध्या और अनुराधा से प्रेम की पींगें बढ़ा रहा है और अंतर्मुखी राजाराम के सपने को पैर तले रौंद कर उसी के घर में डेरा डाले बैठा है|

क्या बासु का भेद संध्या और अनुराधा पर खुलेगा?

क्या राजाराम के मौन प्रेम को संध्या समझ और सम्मान दे पायेगी|

जीवन में क्या सच्चा इंसान राजाराम जीतेगा या चलतापुर्जा बासु?

और वास्तव में किसे जीतना चाहिए? ‘कथा’ का सार और संघर्ष यही है|

यह आश्चर्य का विषय है कि अस्सी के दशक में ‘कथा’ के बनने से पहले से ही और उसके बाद तो खासकर हिंदी फिल्मों के नायक बासु जैसे चरित्र के ही हैं, जो नायिका को पटाकर (भांति भांति के तौर तरीके अपनाकर) प्रेम में होने के दावे किया करते हैं और राजाराम जैसे नायक तो ‘कथा’ के बाद हिंदी फिल्मों के धरातल से गायब ही हो गये|

मुख्य कलाकारों जैसे नसीरुद्दीन शाह, फारुख शेख, दीप्ती नवल, मल्लिका साराभाई और विनी परांजपे के बहुत अच्छे अभिनय से फिल्म का स्तर कई गुना बढ़ जाता है| और साहयक भूमिकाओं में नियुक्त अभिनेतागण भी फिल्म को वास्तविक और असरदार बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते| बम्बई की एक असली चाल में फिल्म को शूट करने से और वहीं के रहने वाले कुछ लोगों को फिल्म में भूमिकाएं देने से फिल्म में वास्तविकता का पुट आ गया है|

सई परांजपे ने बेहतरीन अभिनेताओं का चुनाव अपनी फिल्म के लिए किया| इस फिल्म से पहले तक फारुख शेख सामान्यतः सीधे और साधारण आदमी के किरदार निभाते आए थे और ‘कथा’ में उन्हें चतुर और शातिर फ्लर्ट के रूप में प्रस्तुत किया गया और उन्होंने इस आकषर्क भूमिका में अपने व्यक्तित्व के आकर्षण को बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल किया| अकार्शक व्यक्तित्व और लुभावने अंदाज में बोलने वाले चालाक व्यक्ति की भूमिका में फारुख शेख ने शानदार अभिनय किया और परदे पर उनके द्वारा लोगों का दिल जीतते हुए देखना भरपूर विश्वसनीय लगता है|

नसीरुद्दीन शाह ने राजाराम की भूमिका को आत्मिक गहराई के साथ परदे पर साकार कर दिया| और यह उनके सर्वश्रेष्ठ अभिनय प्रदर्शनों में से एक है| उनके चरित्र के पास कोई भी ऐसा संवाद नहीं जिससे वे हिंदी फिल्मों के नियमित नायकों जैसे सर्वशक्तिमान लगें| राजाराम के मनोविज्ञान और उसकी भावनाओं को, उनकी हिचकिचाहट भरी अभिव्यक्ति को, उसके मौन को, उसकी छोटी छोटी खुशियों को, उसके आदर्शवाद को, उसकी ईमानदारी को, उसके मूक प्रेम को, और जिससे उसे प्रेम है उसके संकट काल में उसके साथ दृढता से खड़े होने के आत्मिक बल को, और अन्य बहुत सारे तत्वों को उन्होंने परदे पर एक कुशल जादूगर की भांति प्रस्तुत करके जादू रचा है

दीप्ती नवल ने संध्या का अभिनय नहीं किया वरन वे परदे पर संध्या का जीवन जीती हुयी प्रतीत होती हैं| दीप्ती नवल तो कहीं पीछे रह जाती हैं और दर्शकों को संध्या ही दिखाई देती रहती है|

मल्लिका साराभाई को अमीर, आकर्षक और वक्त पड़ने पर फ्लर्ट का सहारा लेने वाली अनुराधा की भूमिका देकर सई परांजपे ने इस छोटी सी भूमिका को महत्वपूर्ण बना दिया

राजकमल का संगीत अच्छा है, खासकर ‘कौन आया कौन आया’ कोरस गीत तो खासा प्रसिद्द रहा है| कार्टून विधा का फिल्म में रोचक ढंग से इस्तेमाल किया गया है|

सई परांजपे को तीन महत्वपूर्ण हिंदी फिल्मों के निर्देशन के लिए हमेशा ही याद रखा जायेगा| दर्शकों को संवेदना के स्तर पर भीतर तक स्पर्श कर सकने की क्षमता वाली “स्पर्श” और दर्शकों को गुदगुदाकर हंसाने वाली ‘कथा’ और ‘चश्मे-बद्दूर’ तीनों ही फिल्मों को हिंदी सिनेमा की सर्वकालिक अच्छी फिल्मों में शामिल किया जाता रहेगा|

…[राकेश]

 

सितम्बर 14, 2015

Absurdistan(2008) : No Water No Sex

absurdistan-001फिल्म बड़ी कुशलता से वर्तमान युग की समस्या- पानी की कमी, को जादुई, परीकथा, दंतकथा और सुपरमैन जैसी कथाओं के अंदाज देकर रोचक अंदाज में दर्शक के सम्मुख प्रस्तुत करती है|
यदि भगीरथ की कथा को छोड़ दें, जिसने कथित रूप से गंगा को धरती पर उतारा तब भी फरहाद की कथा ऐसी है जो दुनिया के किसी भी देश में फब जायेगी| ऐसा बहुधा होता है जब प्रेमावस्था में जी रहा व्यक्ति अपने प्रेम के वास्ते, और अपने प्रेमी की मांग और उसके कथन के सम्मान या प्रेमी का प्रेम पाने, या प्रेमी की नजदीकी पाने के वास्ते महान कार्य सम्पन्न कर जाता है| उसे समझ आ जाता है कि प्रेमी के साथ बिना और उसके प्रेम बिना सब बेमानी है और उसे प्रेम के बिना अपना अस्तित्व बचाए रखना असंभव लगने लगता है|

यदि प्रेमी इस विचार के साथ गहरे में जुड़ गये हैं कि वे एक दूसरे के लिए ही अस्तित्व में आए हैं और अलग रहना उन्हें कष्टदायक लगता है पर स्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि उन्हें कुछ समय के लिए क दूसरे से अलग दूर दूर रहना पड़ जाता है| वे इस दूरी को इस नाते सहन करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि यह अस्थायी अलगाव अमुक समयावधि के बाद समाप्त हो जायेगा और उनका मिलन फिर से हो जायेगा| लेकिन जब अलगाव के अवधि समाप्त होने के बाद प्रेमी अपने मूल स्थान पर प्रेमिका से मिलने की खुशी से लबरेज होकर लौटता है तो पाता है अब कुछ नई परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई हैं और जब वह प्रेमिका से मिलने, उसे पाने, उसके प्रेम को पाने का प्रयास करता है तो उसके ये प्रयास आदर्शवादी प्रेमिका को खुदगर्जी से भरे हुए लगते हैं और वह उसे लताडती है और उसके सामने गाँव के सभे एलोगों के भले के लिए कुछ कर दिखाने की चुनौती देती है जिससे गाँव उजड़े नहीं और वहाँ जीवन बसा रहे

और इस कार्य को साधने के लिए उसके समक्ष एक बेहद कठिन काम है और यह सब करने के लिए उसके पास सिर्फ पांच दिन का समय है|

Absurdistan एक ऐसी जगह है, जिस पर कोई देश अधिकार नहीं जताना चाहता| सभी देश इसे नजरअंदाज कर चुके हैं|

यहाँ रहने वाले पुरुष, हद दर्जे के आलसी हैं और सारा काम यहाँ की स्त्रियाँ करती हैं और जीवन यापन के साधन जुटाती हैं| पुरुष साधारणतया मंडली में समय व्यतीत करते हैं, पब में शराब पीते हैं और घर लौट कर अपनी अपनी पत्नियों से शारीरिक संबंध कायम करके सो जाते हैं| ज्यादातर इतने कामुक हैं कि शारीरिक क्षुधा शांत करने के लिए वे अपनी स्त्रियों पर उनके कार्यस्थल पर भी धावा बोल देते हैं|

काम करने में पुरुषों की रूचि नहीं लेकिन तब भी वे एक पितृसत्तात्मक व्यवस्था कायम रखना चाहते हैं जहां अंतिम निर्णय करने के अधिकार उनके पास हों और स्त्रियाँ उनके आदेश का पालन करें|

ऐसे स्थल पर एक अस्पताल में एक कमरे में एक ही समय, आसपास के बिस्तर पर एक लड़के और एक लड़की का जन्म होता है| बचपन से ही अपने जीवन का हर पल वे साथ रहकर व्यतीत करते हैं और बड़े होते हैं| एक दूसरे से अलग जीवन की कल्पना भी कभी उनके दिमाग से होकर नहीं गुजरी| कहने को वे दो अलग अलग इंसान हैं पर आत्मिक रूप से वे संयुक्त अस्तित्व हैं|

बड़े होने पर उनके जीवन में वही सब शारीरिक और मानसिक इच्छाएं जाग्रत होती हैं जिनसे उनकी उम्र के अन्य युवा गुजरते हैं| लेकिन अन्य युवाओं की भांति उनके लिए मिलन का रास्ता इतना सरल नहीं है| उनके मिलन के लिए एक खास वक्त मुक़र्रर है| और जब बहुत अरसा इतंजार करने के बाद उनके मिलन के लिए उपयुक्त वक्त आता है तब तक परिस्थितिवश उनका गाँव पानी की गंभीर समस्या से घिर चुका है और वहाँ पानी पहुंचाने वाला एकमात्र स्रोत लगभग सूख चुका है और कभी-कभार बूँद बूँद टपकते हुए पानी के दर्शन थोड़ी देर के लिए हो जाते हैं| गाँव के लोग इस बारे में कुछ कर पाने में असमर्थ हैं और जहां पुरुष अपने को नई परिस्थितियों के अनुकूल ढालने में लग जाते हैं स्त्रियाँ इस स्थिति को स्वीकार नहीं कर सकतीं| उन्हें तो घर चलाने हैं और भांति भांति के काम निबटाने हैं और इतने कम पानी से उनका काम नहीं चल सकता| पुरुष ऐसी विकट स्थिति में भी मनोरंजन में व्यस्त रहते हैं और चाहते हैं कि पहले की तरह उनका जीवन खाने, पीने, खेलने और सैक्स करने में व्यतीत होता रहे| वहाँ स्त्रियों और पुरुषों के बीच पानी को लेकर गंभीर मतभेद उत्पन्न हो जाते हैं|

ऐसे समाज में जहां महिलायें ही सारे काम करती हैं और पुरुष अनर्गल गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं, स्त्रियाँ ही निर्णय लेने का अधिकार भी अपने पास रखती हैं और जीवन को नियंत्रित करने का प्रयास करती हैं|

चिपको’ जैसा आंदोलन भी देखा गया है जहां नारी शक्ति ने आगे बढ़कर पहल करके समाज को दिशा दी है| स्त्री में शक्ति है कि वे सामाजिक बुराइयों का सक्रिय विरोध कर सकें, फिर चाहे वह शराब या नशे का मामला हो, लाटरी का हो या दहेज का, अगर महिला शक्ति ठान ले तो इन बुराइयों को दूर कर सकती है| समाज को उनकी सामूहिक शक्ति के समक्ष झुकना ही होता है क्योंकि वे बुराई को समाप्त करने, अपने परिवार को बचाने और समाज को सुधारने के लिए आगे आती हैं|

इसी नाते कहा भी जाता है कि अगर एक स्त्री को जाग्रत कर दिया जाए तो पूरा घर जाग्रत हो जाता है|

इस गाँव में स्त्रियाँ भी पानी की विकट समस्या के कारण तो परेशान हैं हीँ साथ ही साथ पुरुषों की अकर्मण्यता के कारण भी परेशान हैं| ऐसे में नायिका उन्हें रास्ता दिखाती है जब वह अपने पति बन गये प्रेमी के समक्ष गाँव में पानी लाने की चुनौती देती है और कहती है कि उनका विवाह तभी फलीभूत हो पायेगा और वह तभी उसके नजदीक आ पायेगा और उसे स्पर्श कर पायेगा जब वह गाँव में पानी ला पाने में सफल हो जायेगा और विधि के विधान के अनुसार उनकी शादी के बाद उनके शारीरिक मिलन में केवल पांच दिन का समय बाकी है और इन पांच दिनों में अगर वह पानी नहीं ला पाया तो प्रेमिका को नहीं पा पायेगा

युवक एक सच्चा प्रेमी है, बुद्धिमान है, परिश्रमी है पर क्या वह इस कठिन परीक्षा में सफल हो पायेगा?

पानी की कमी या अनुपलब्धता समाज में बहुत बड़ी समस्याओं को जन्म दे सकता है| पानी बिना तो कुछ भी नहीं किया जा सकता| Absurdistan हास-परिहास के माध्यम से पानी की महत्ता को दर्शाती है|

गांव की सभी स्त्रियाँ नवयुवती के पथ का अनुसरण करती हैं और पुरुषों को स्पष्ट शब्दों में चेता देती हैं और उनके समक्ष नारा लगाती हैं – ” No Water No Sex “.

स्त्री का अपनी देह पर नियंत्रण और वह भी वैवाहिक संबंध में पुरुष को विचलित कर जाता है| जो पुरुष विवाह पूर्व अपनी प्रेमिका की बहुत सी इच्छाओं का सम्मान करता है क्योंकि प्रेमिका से उसकी नजदीकी बहुत कुछ परिस्थितियों और बहुत कुछ प्रेमिका की इच्छा पर निर्भर करती है परन्तु विवाह के पश्चात पत्नी पर वह अपना पूर्ण नियंत्रण समझने लगता है| इतिहास गवाह है कि जहां आम्रपाली जैसी नगरवधुओं के समक्ष पुरुष नतमस्तक रहे वहीं घर की वधू को उन्होंने अपनी इच्छा की दासी बनाया और समझा|

फिल्म में गाँव के पुरुष बेहद कामुक हैं और अपनी पत्नियों को अपनी दासी समझते हैं परन्तु एक कम उम्र की स्त्री के दिशा निर्देश में सारी स्त्रियाँ पुरुषों को दिखा देती हैं कि अपने जीवन की वे खुद स्वामिनी हैं और उनका बराबर का साथ भी पाने के लिए पुरुषों को उनके कंधे से कंधा मिलाकर काम करना पड़ेगा| सुस्त और आरामतलब पुरुष चिंतित होते हैं, परेशान होते हैं पर परिश्रम करना वे भुला चुके हैं| कठिन काम का बीडा उठाता है कम उम्र की स्त्री का प्रेमी जो प्रेम के वशीभूत सारे गाँव को पानी मुहैया करवाने के लिए कमर कास लेता है|

Absurdistan एक बेहद रोचक और अच्छी फिल्म है और यह दर्शक को वैसा संतोष देकर समाप्त होती है जैसा उसे बचपन में कोई अच्छी सी परीकथा या कोमिक्स पढ़ने से या किशोरावस्था में एक बेहतर रोमांटिक किताब पढ़ने से और वयस्क होने पर एक अच्छी सी किताब पढ़ने से मिलता रहा| यह फिल्म बहुत सारे तत्व मिलकर एक खूबसूरत सृजन का नतीजा है

Absurdistan, को यदि संक्षेप में कहा जाए तो यह मुल्ला नसरुद्दीन के बेहतरीन चुटकले जैसी है, जो बुद्धिमत्ता, हास्य और व्यंग्य का मिश्रण होता है| फिल्म के चरित्र चुटकले में दिखाए चरित्रों जैसे मूर्ख लगेंगे पर अंत में दर्शक को महसूस होता है हास-परिहास के मध्यम से उसके पास कुछ मामलों में बुद्धिमत्ता का आगमन हुआ है|

यह आश्चर्य का विषय होता है कि अपने देश के अलावा दूर देशों में भी लोग जीते हैं, ऐसे ही दैनिक महत्व की समस्याओं से दो चार होते हैं जैसे हमारे देश के लोग| उनके पास कहने, लिखने और दिखाने के लिए रोचक कहानियां हैं| वहाँ ऐसे निर्देशक हैं जिनके पास इन रोचक कहानियों को दृश्यात्मक बनाने के खूबसूरत अंदाज हैं|

सिनेमा के क्राफ्ट पर उनकी मजबूत पकड़ है| उनके पास कहानी को फिल्म में परिवर्तित करने के लिए हास्य का जबर्दस्त बोध है और वे हर दूसरे दृश्य में दर्शक को हंसाते हंसाते भी बड़ी सीख दे जाते हैं और दर्शक गंभीर समस्याओं से परिचित होते जाते हैं| फिल्म में वॉयस ओवर का उपयोग इतने प्रभावी तरीके से हुआ है कि दर्शक को इसका आभास भी नहीं हो पाता|

फिल्म में मौजूद स्थल फिल्म की कहानी से इस तरह एकाकार हो जाते हैं कि लगता है फिल्म में दिखाई घटनाएं बस यहीं घटी होंगी| और कैमरे का काम इतना खूबसूरत कि फिल्म में खूबसूरत दृश्यों की भरमार है और उनका असर ऐसा लुभावना कि इमेजरी की स्मृतियाँ सालों दर्शक के जेहन में संरक्षित रहेंगी| संवाद तभी आते हैं जब लगता है अब इनके बिना भावों का सम्प्रेषण नहीं हो पायेगा वरना फिल्म में बिना बोले ही चरित्रों से भावों का सम्प्रेषण करवाया गया है|

निर्देशक Veit Helmer ने दर्शनीय और याद रखने लायक फिल्म बनाई है|

…[राकेश]

 

सितम्बर 10, 2015

Pratidwandi(1970) : वास्तविक समस्याएं जीवन में समझौते करने का दबाव बनाती हैं!

Pratidvandi-001जीवन हमेशा ही पलक झपकते ही अपना रुख बदल लेता है| बस एक क्षण का समय ही पर्याप्त होता है जीवन की दिशा बदलने वाली घटना के घटित होने के लिए| आसानी से चल रहा जीवन एक तीव्र मोड़ ले लेता है जब भी कुछ अनपेक्षित घट जाता है|

सत्यजीत रे की फिल्म -‘प्रतिद्वंदी’ सिद्धार्थ नामक युवक का जीवन दिखाती है| सिद्धार्थ राजकुमार सिद्धार्थ की भांति ऐसी परिस्थितियों का सामना करता है जो उसके विचारों और जीवन के प्रति दृष्टिकोण को परिवर्तित कर देती हैं| परिस्थितियों से पिट पिट कर, मध्यम मार्ग का अनुसरण करता हुआ वह एक ऐसी स्थिति में पहुँच जाता है जहां वह तैयार हो जाता है जीवन को उसी रूप में स्वीकारने के लिए जिस रूप में वह उसके सामने आता है|

सिद्धार्थ के आसानी से चलते जीवन को बहुत बड़ा झटका लगता है उसके पिता के अचानक हुए देहांत से| इस अनायास आई विपदा से उसका परिवार घोर आर्थिक विपत्तियों से जूझने लगता है और उसे आर्थिक अभाव के कारण मेडिकल की पढ़ाई बीच में छोड़ देनी पड़ती है| पिता की मृत्यु की अकेली घटना उसके अच्छे और स्थिर व्यावसायिक जीवन जीने के सपने को तोड़ देती है|

सुनील गंगोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित कथा पर सत्यजीत रे ने बेहद प्रभावशाली फिल्म बनाई| सिद्धार्थ को नियमित फ़िल्मी परिभाषाओं से नायक का दर्जा दे पाना मुश्किल है| एक साधारण घर के संघर्षरत युवा के जीवन का सूक्ष्म विश्लेषण गहराई और विस्तार से फिल्म दिखाती है|

पिता की मृत्यु घर के तीन जवान सदस्यों को अलग-अलग ढंग से प्रभावित करती है| सिद्धार्थ मेडिकल की पढ़ाई बीच में छोड़कर नौकरी ढूँढने लग जाता है जिससे परिवार का भरण पोषण कर सके| उसका भाई नक्सल आंदोलन से जुड़ जाता है इस आशा में कि हिंसक क्रान्ति से समाज में वांछित बदलाव आयेंगें| सिद्धार्थ की माँ उससे शिकायत करती है कि उसकी बहन का दफ्तर में अपने बॉस से चक्कर चल रहा है| वह बेटी के लिए चिंतित है और सिद्धार्थ बहन के देर से घर लौटने पर उससे इस बात को करने में परेशानी महसूस करता है पर हिम्मत जुटाकर वह इतना बोल देता है कि शायद उसका बॉस अपनी पोजीशन का लाभ उठाकर उसका शोषण कर रहा है| बहन उसकी बातों को महत्व न देते हुए उसे अपने बॉस से जाकर मिलने के लिए कहती है जिससे कि वह सिद्धार्थ की नौकरी कहीं लगवाने में सहायता कर सके|

सिद्धार्थ का चरित्रचित्रण फिल्म की जान है| उसकी बुद्धिमत्ता, उसके परेशानी से भरे जीवन, उसके जीवन के बीते हुए वाक्यों से ग्रसित उसका आज का जीवन, सब कुछ विस्तार से, गहराई से और रोचक ढंग से दर्शाया गया है|

सिद्धार्थ फिल्म के शुरुआत के पलों में एक साक्षात्कार देने जाता है और वहाँ उसे बहुत से आवेदकों की भीड़ मिलती है| कोई उससे कहता है कि उसका नंबर आने में कम से कम 3-4 घंटे तो लग ही जायेंगें| सिद्धार्थ इमारत से बाहर आकर दर्जी की तलाश करने लगता है जो उसकी पैंट की मरम्मत कर सके|

अभी हाल ही में उसके जीवन में बड़े बदलाव आए हैं और अब उसे नौकरी की तलाश है ताकि वह अपने परिवार की जिम्मेदारी उठा सके| पर अभी उसमें उर्जा अहै और आशा है कि उसे योग्य नौकरी मिल जायेगी|

बुद्धिमत्ता के हिसाब से वह इस नौकरी के लिए जरुरत से ज्यादा गुणी है| साक्षात्कार में बुद्धिमत्ता और सजग दिमाग से दिए गये उसके उत्तर साक्षात्कारकर्ताओं को स्तब्ध कर देते हैं|

जब एक साक्षात्कर्ता उससे पूछता है कि स्वतंत्रता के समय इंग्लैंड का प्रधानमंत्री कौन था तो सिद्धार्थ पहले पूछता है – किसी स्वतंत्रता सर!

साक्षात्कर्ता स्पष्टतः हैरान परेशान है ऐसे प्रश्न पूछे जाने से और स्पष्ट करता है कि भारत की स्वतंत्रता|

अन्य साक्षात्कर्ता पूछता है कि पिछले दशक की सबसे बड़ी घटना वह किसे समझता है?

सिद्धार्थ – विएतनाम युद्ध!

साक्षात्कर्ता – तुम क्यों समझते हो कि विएतनाम युद्ध मनुष्य के चाँद पर जा पहुँचने से बड़ी घटना है?

सिद्धार्थ – विज्ञान की प्रगति से मनुष्य का चाँद पर जाना अपेक्षित था लकिन विएतनाम में जिस तरह वहाँ के साधारण नागरिकों ने जीवट दिखाकर संघर्ष किया उससे वह अचंभित रहा कि साधारण मनुष्य उस स्तर का प्रतिरोध भी कर सकते हैं|

साक्षात्कर्ता – क्या तुम कम्यूनिस्ट हो?

सिद्धार्थ – मैं किसी पार्टी का सदस्य नहीं हूँ|

स्पष्टतया उसे नौकरी नहीं मिलनी और नहीं ही मिलती|

ऐसे ही संघर्षरत दिनों में किसी रोज बोरियत से जूझता और कुंठा से भरा सिद्धार्थ फिल्म देखने जाता है पर सिनेमाघर में बम फटता है भगदड़ में उसकी घड़ी टूट जाती है और जब वह उसकी मरम्मत कराने घड़ी की दुकान पर जाता है तो पाता है उसके पास घड़ी की मरम्मत के लिए पैसे ही नहीं हैं| ये सब छोटे छोटे दृश्य सिद्धार्थ के चरित्र चित्रण में बड़ी भूमिकाएं निभाते हैं|

सिद्धार्थ के मन में शान्ति नहीं है और उसका दिमाग तनावों से ग्रस्त रहता है| तनावग्रस्त मानसिकता में वह सड़क पर खड़ा है और एक खूबसूरत महिला को अपनी ओर आते देखता है| महिला को देखकर वह अपने जीवन के भूतकाल में पहुँच जाता है जहां उसके मेडिकल के प्रोफ़ेसर क्लासरूम में स्त्री की शारीरिक संरचना के संबंध में व्याख्यान दे रहे हैं| मेडिकल की पढ़ाई बीच में छोड़ देने का मलाल उसे हमेशा कचोटता है| यदि उसकी ज़िंदगी में सब कुछ सामान्य होता तो उसकी उम्र में एक महिला का शारीरिक सौंदर्य उसके भीतर कुछ अन्य भाव जगाता न कि मेडिकल की किताबों में समाया स्त्री-संरचना का तकनीकि ज्ञान उसके जेहन में कौंधता|

यह बहुत बार होता है जब वह मेडिकल की अपनी क्लास में वापिस पहुँच जाता है| उसका अधूरा सपना और बीता जीवन उसे हमेशा परेशान करते हैं| मेडिकल कालेज छोड़ने के बावजूद भी वह होस्टल जाकर पाने पुराने साथियों के यहाँ जाकर वक्त व्यतीत किया करता है| उसका दोस्त उसे परेशान देख उसे एक नर्स के पास ले जाता है जो वेश्यावृत्ति में लिप्त है पर सिद्धार्थ का मन वहाँ भी नहीं रमता|

वापसी में एक युवती उसे सड़क पर मापने घर के सामने खड़ी मिलती है| युवती उससे सहायता मांगती है| उसके घर की बिजली चली गई है, सिद्धार्थ फ्यूज ठीक करके बिजली वापिस ले आता है| युवती, क्या, उसकी मित्र बन जाती है और धीरे धीरे दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगते हैं और प्रेम भी करने लगते हैं पर उनके जीवन की परिस्थितियाँ उन्हें परस्पर प्रेम को स्वीकारने से रोकती हैं|

आखिर एक खाली पेट भजन में तो राम नहीं सकता| और एक संघर्षरत व्यक्ति जिसका जीवन तनावों से घिरा हुआ हो, प्रेम संबंध में पड़ने की छूट ले नहीं सकता| सिद्धार्थ के सामने यक्ष प्रश्न है एक अदद कायदे की नौकरी पाने का जिससे वह परिवार क भरण पोषण कर सके|

जीवन सिद्धार्थ को हाथों से फिसलता दिखाई देता है| घर पर अपनी बहन को मॉडलिंग करने के फितूर से सावधान करते हुए वह चेताता है कि मॉडलिंग में देह-प्रदर्शन की मांग हो सकती है और उससे यह उत्तर सुनकर कि उसकी फिगर अच्छी है, वह अपने को अपनी बहन को रक पाने में असमर्थ पाता है|

वह इतने सारे संघर्ष एक साथ नहीं कर सकता कि हर बात की परवाह करे, हरेक को अपने अनुसार चला सके| धीरे धीरे समस्याएं एक नये सिद्धार्थ को गढती जाती हैं, जो सच को स्वीकारने के लिए तैयार है|

सिद्धार्थ को सेल्समैन की नौकरी मिलती है लेकिन कलकत्ता से दूर एक छोटी जगह| वह आशा रखता है कि वहाँ जगह मिलते ही वह पता ठिकाना क्या को लिख देगा जिससे वे दोनों नियमित रूप से पत्र-व्यवहार के माध्यम से एक दूसरे के संपर्क में रहें|

धृतमान चटर्जी ने सिद्धार्थ की भूमिका में प्रभावशाली अभिनय का प्रदर्शन किया है|

सत्यजीत रे क निर्देशन तो जीनियस होता ही है, इस फिल्म में उनके दो सिनेमेटोग्राफर्स – सोमेंदू राय , पूर्णेंदू बोस का फिल्मांकन गजब का है, जिनके काम की सहायता से सत्यजीत रे ने सिद्धार्थ की मनोवैज्ञानिक यात्रा और उसके भ्रमों और उसके दिमाग में उत्पन्न मायाजलों को बखूबी परदे पर उतारा है| सुनील गंगोपाध्याय के उपन्यास को उन्होंने बड़ी ही कलात्मकता के साथ दृश्यात्मक बना दिया है| उस दौर के कलकत्ता और उस दौर में युवाओं के जीवन और उनकी परेशानियों को उन्होंने परदे पर साकार कर दिया है| उन्होंने सिद्ध कर दिया कि समकालीन मुद्दों पर वृतचित्र के चरित्र से अलग हट कर रोचक फिल्म बनाई जा सकती है जो समकालीन समस्याओं का गहराई से विश्लेषण कर सके|

बेरोजगारी और युवाओं की समस्याएं 1970 के दशक से आज के दौर तक कतई कम नहीं हुयी हैं| आज भी ज्यादा योग्यता वाले युवा अपने से कमतर योग्यता वाली नौकरी निकलने पर उस पर टूट पड़ते हैं क्योंकि उन्हें जीवन यापन का साधन जुटाना है| आज भी मंहगाई के दौर में भी निजी शिक्षण संस्थानों को छोड़ भी दें तो सरकारी शिक्षण संस्थान अलग अलग प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करते हैं, आवेदकों से अच्छी फीस अवीदन पत्रों के बदले वसूलते हैं, छात्रों को कई बार भिन्न भिन्न शहरों में प्रवेश परीक्षाएं देने जाना पड़ता है, तब जाकर उनहे प्रवेश मिलता है| जबकि सरकार आराम से यह कर सकती है कि अखिल भारतीय परीक्षा हो जिसके स्कोर के आधार पर हर शिक्षण संस्थान अपने यहाँ आवेदकों को प्रवेश दे|

बेरोजगारी, मंहगाई, देश में यहाँ वहाँ तरह तरह के जातीय या सम्प्रदायिक तनाव, आतंकवाद, हिंसात्मक राजनीतिक आंदोलन, सब कुछ ऐसा ही है जैसा सत्तर के दशक में था और इस नाते भी सत्यजीत रे की फिल्म “प्रतिद्वंदी” न केवल अपनी कलात्मक गुणवत्ता बल्कि अपनी विषय वस्तु के आधार पर आज तक प्रासंगिक बनी हुयी है|

यह फिल्म इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उस जमाने में युवाओं की समस्याओं को लेकर सत्यजीत रे ने इतनी श्रेष्ठ फिल्म बना दी पर हिंदी सिनेमा क्या बना रहा था?

…[राकेश]

सितम्बर 7, 2015

Mammo (1994) : भारत के बंटवारे और ‘दो राष्ट्र’ के जिद्दी प्रयोग में दबी कुचली ज़िंदगी

Mammo1994-001मम्मो अकेली इंसान नहीं थी जिसकी ज़िंदगी मुहम्मद अली जिन्ना के पाकिस्तान बनाने के कारण पटरी से उतर गई, उस जैसे लाखों लोग 1947 के बाद दो राष्ट्र के सनकी प्रयोग के कारण टूटी फूटी ज़िंदगी जीने के लिए विवश रहे और जो कीमती जीवन के बहुमूल्य सुखों से वंचित रहे|

इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि पाकिस्तान भले ही बन गया हो पर सम्प्रदाय के आधार पर दो राष्ट्र का सिद्धांत बुरी तरह समय के हाथों पिटा| अगर सम्प्रदाय (रिलीजन) के आधार पर पाकिस्तान मुसलमानों के लिए बनाया गया था तो पाकिस्तान बनने के तेईस साल बनने के भीतर ही पाकिस्तान से संघर्ष करके इसे तोड़कर बांग्लादेश का जन्म क्यों हुआ? आखिर बांग्लादेश भी तो मुस्लिम देश ही है| सच्चाई तो यह है कि बांग्लादेश के अस्तित्व में आने से जिन्ना के रिलीजन के आधार पर दो राष्ट्र के सिद्धांत का उपहास अपने आप उड़ा|

कहते हैं कि रक्तपात को रोकने के लिए देश के बंटवारे को स्वीकार किया गया पर क्या बंटवारे से रक्तपात रुक पाया? दस लाख से ज्यादा लोग मारे गये बंटवारे के कारण उत्पन्न दंगों में और दंगे भी इतने वीभत्स कि मानवता हमेशा शरमायेगी उनकी याद में| जिस बात से डर रहे थे वह तो होकर रहा फिर बंटवारे को स्वीकारने का औचित्य क्या था?

पाकिस्तान का शैशवकाल ही खून, सामूहिक हत्याकांडों और अमानवीय हरकतों से भरा हुआ था और तब से कुछ भी तो बदला नहीं दिखाई देता वहाँ|

पाकिस्तान के जन्म ने भारतीय समाज को भी हमेशा के लिए बाँट दिया है और इसके मनोविज्ञान को हमेशा के लिए प्रभावित कर दिया है| भारतीय समाज इस अजीब प्रयोग से घायल है और हालत यह है कि यह न उगलते बनता है न निगलते| क्रोध में बहुत से लोगों दवारा ऐसा कहा जाना कभी कभी अस्वाभाविक भी नहीं लगता कि अगर धर्म/सम्प्रदाय के आधार पर ही बंटवारा हुआ था तो सारे के सारे मुस्लिम पाकिस्तान क्यों न चले गये? लेकिन तथ्य यह भी है कि जिन्होने बंटवारे के वक्त भारत को अपना मुल्क चुना उनसे यह सवाल करना या उन पर यह सवाल उठाना गैर-वाजिब है और सरासर गलत है|

ऐसा नहीं कि पाकिस्तान बनने के बाद भारत ने साम्प्रादायिक दंगे नहीं देखे या झेले परन्तु यह तथ्य बंटवारे के विरोध में ही बैठता है| जब दंगे नियमित रूप से होते रहे हैं तब पाकिस्तान बनाने की जिद के सामने झुकने का क्या अर्थ था?

एकीकृत भारत ज्यादा मजबूत, ज्यादा समर्थ, ज्यादा धनी और विकसित होता और सम्प्रदायिक दंगों के अस्तित्व के बावजूद अब से ज्यादा तरक्की कर चुका होता|

बंटवारा एक बहुत बड़ी गलती थी| यह न हुआ होता तो भारत की बहुत सारी ऊर्जा, बहुत से संसाधन और ढेर सारे निवासी देश के विकास के काम में इस्तेमाल किये जा सकते था|

यह अच्छा निर्णय हो सकता था यदि पाकिस्तान एक स्वस्थ और कुंठा मुक्त देश बन सकता पर यह नहीं हो पाया और पाकिस्तान में कट्टरपंथी आम जनता और उदार प्रवृत्ति के लोगों की एक नहीं चलने देते और भारत से से एक स्वस्थ रिश्ता कायम नहीं करने देते|

बंटवारे के वक्त अगर पाकिस्तान की आबादी में लगभग 15% हिंदू बचे थे तो अब वे 2% से भी कम प्रतिशत में बचे हैं| बंगलादेश में भी, जिसके निर्माण में भारत की महती भूमिका रही, वहाँ की कुल आबादी का 10% से भी कम हिंदुओं का प्रतिशत है| और 1992 के बाद तो हिंदुओं को वहाँ बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ा है|

लेकिन ‘मम्मो’ ऐसी तथ्यात्मक और कानूनी जिरह्बाजी से ऊपर उठकर बंटवारे की व्यर्थता को दर्शाती है और बंटवारे के कारण दिलों के बिछड़ने की पीड़ा को भी और इस कारण खाद बने जीवनों को भी|

मम्मो’ अतिवादी सोच की परतें उघाड़ कर मानवीय सरोकारों को परदे पर उकेरती है| क़ानून की परिभाषा में मम्मो एक पाकिस्तानी है लेकिन हिन्दुस्तानी, चाहे उसे पाकिस्तान के प्रति कितनी ही नापसंदगी क्यों न हो, मम्मो के भारत में ही ठहरने की इच्छा अपने अंदर पाता है| दिलों के बीच क़ानून नहीं आता| ऐसी फिल्म हिन्दुस्तान (चाहे इसे बंटवारे से पहले, बल्कि उससे भी पहले अंग्रेजों के समय का वृहद भारत कह लें) की धरती पर ही बन सकती है| यूरोप, अमेरिका में नहीं, क्योंकि वहाँ बातें कानूनी पहलुओं से तय होती हैं और नागरिक भी उसी परिधि में सोचते विचारते हैं|

करोड़ों लोग भारत में जन्में और वे पाकिस्तान चले गये| भारत और पाकिस्तान अच्छे पड़ोसी देश बन कर रह सकते थे यदि पाकिस्तान अपने अस्तित्व के साथ संतुष्ट और प्रसन्न रहता| लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और पाकिस्तान ने हमेशा ही भारत के साथ दुश्मनी का बर्ताव किया और इसी अदावत का नतीजा हैं मम्मो जैसे लोगों के प्रताड़ित जीवन|

भारत और पाक के मध्य शत्रुता के कारण वे लोग कष्ट भोगते हैं जो भारत और पाक के बीच बिना किसी समस्या के आना जाना चाहते हैं| दोनों देशों के संसाधन और लोगों के जीवन इसी शत्रुता के कारण बलि चढ़ रहे हैं| और व्यर्थ की यह शत्रुता बरसों बरस बढ़ ही रही है| ढेर सारे ऐसे परिवार हैं जिनके आधे सदस्य भारत में रह गये और आधे पाकिस्तान चले गये| ऐसी तकसीम से दिल तो बंट नहीं जाते| अपने नजदीकी लोगों की स्मृतियाँ तो कभी भी भुलाई नहीं जाती| और रिश्तेदार ही क्यों ऐसे भी लोग थे जिनके जिगरी दोस्त इस बंटवारे में दूसरे देश के हो गये और दोस्तों के मध्य दो देशों की सीमा रेखाएं आ खड़ी हो गयीं| भौतिक दूरियां उत्पन्न हो गयीं| भारत पाकिस्तान के बहुत से लोग बंटवारे के बाद से ही पीड़ा में जीते रहे हैं|

भारत का बंटवारा न हुआ होता तो ‘मम्मो’ और हाल ही में प्रदर्शित ‘बजरंगी भाईजान’ जैसी फ़िल्में वजूद में ही न आने पातीं| इनका मूल आधार देश के बंटवारे से बने दो मुल्कों के बीच की शत्रुता ही है|

मम्मो’ लोगों के बीच का खोया हुआ संबंध है| वह धन और शक्ति के भूखे तंत्र और लोगों की प्रताडना की शिकार है|

पाकिस्तान में पति के मरने के बाद मम्मो (फरीदा जलाल) को उसके ससुराल वाले घर से बेदखल कर देते हैं| वह भारत आ जाती है और अपनी बहन फय्याजी (सुरेखा सीकरी), जो अपने पोते रियाज के संग रहती है, के घर शरण लेती है| यहाँ से भी उसे फय्याजी निकाल देती है| भारत से उसे पुलिस भगा देती है और पाकिस्तान भेज देती है| कुछ सालों तक उसका कोई पता नहीं कि वह कहाँ है| बहुत सालों बाद वह पुनः भारत आती है, इस बार क़ानून तोड़कर क्योंकि उसे कुदरती मौत आने तक जीवन बसर करना है|

पक्षी आकाश का बंटवारा नहीं करते| वे धरती पर मानव दवारा खिंची सीमाएं लांघते हैं जब मौसम की दशा उनके जीने के विपरीत हो जाती हैं|

मम्मो क़ानून तोड़ने के लिए विवश है| उसे समझ नहीं आता कि वह उस देश में क्यों नहीं रह सकती जहां उसका जन्म हुआ था? सिर्फ इसलिए वह भारत में नहीं रह सकती क्योंकि वह पाकिस्तान चली गई जो अब एक अलग मुल्क है!

कागजों पर भारत और पाकिस्तान के अधिकारियों के लिए वह मृत है| वह रियाज और फय्याजी संग रहने लगती है|

लेकिन कब तक ऐसा चल सकता है? शायद तब तक जब तक कि कोई उसके बारे में शिकायत न करे| फिल्म तो एक खुशनुमा अंत के साथ समाप्त हो जाती है जहां वह वापिस आ गई है बहन और उसके पोते के साथ रहने| पर असल जिंदगी में तो ऐसा होता नहीं है|

नवमान मालिक ने दूरदर्शन के लिए विलायत जाफरी की कहानी पर राही मासूम रज़ा दवारा विकसित धारावाहिक निर्मित किया था – नीम का पेड़, जिसमें पंकज कपूर ने नायक, जो कि एक बंधुआ मजदूर है, बुधई राम, का किरदार बेहद शिद्दत से निभाया था| इस धारावाहिक में बुधई का दोस्त पाकिस्तान से वापिस आ जाता है अपने पुराने गाँव में रहने| बुधई का विधायक ही अवसर को अपने पक्ष में भुनाने के लिए अपने पिता के पाकिस्तानी दोस्त की शिकायत कर देता है और पुलिस उसे गिरफ्तार करके पाकिस्तान वापिस भेज देती है|

मम्मो उस पीढ़ी के लोगों का प्रतिनिधित्व करती है जो अपने संपर्क में आने वाले व्यक्तियों से संबंध साधने में रूचि रखती है| मम्मो के व्यक्तिगत दुख उसे हमेशा के लिए दुखी बना कर नहीं छोड़ पाते और वह कड़वाहट और कुंठा को अपने चरित्र और स्वभाव को बिगाड़ने नहीं देती| उसके पति की स्मृतियाँ उसके साथ रहती हैं पर वह अपने जीवन में घटे दुख का बोझा लेकर नहीं घूमती और उनके बावजूद खुश होना और रहना जानती है|

उसे वर्तमान में जीने की कला आती है| पर उसके संपर्क में आने वाले अन्य लोग तो उस जैसे नहीं हैं वे उसे नहीं समझते और उसे अपने जैसे निचले स्तर पर खींच लाने का प्रयास करते रहते हैं, उसका अपमान करते रहते हैं| पर वह नीचे गिरने का प्रतिरोध अपनी शक्ति भर करती है|

केवल कानूनी पहलुओं की ही बात नहीं बल्कि सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में भी लोगों का बहुमत अपने बीच खुशनुमा व्यक्ति को बर्दाशत नहीं कर पाते क्योंकि ऐसा निश्छल व्यक्ति उन्हें कुंठित करता है, उनकी कमजोरियों को सिर्फ अपने प्राकृतिक रूप से होने से ही उजागर कर देता है| वह अन्य लोगों जैसी क्यों नहीं है, एक बड़ा प्रश्न बन जाता है|

चाहे उसकी बहन हो या बहन का पोता या उसकी ससुराल वाले, मम्मो सभी के हाथों अपमानित की जाती है और बार बार की जाती है क्योंकि वह उन लोगों की तरह सिर्फ स्वहित की परिधि में घिरी शख्सियत नहीं है|

प्रेम और इस नाते जकड़कर रखने और व्यक्ति पर हक जमाने की भावनाएं अक्सर साथ-साथ चलती हैं और हक की बीमारी ईर्ष्या और अन्य कमजोरियों की आमद बुलाती ही बुलाती है|

फय्याजी को भय है कि कहीं मम्मो अपने खुशनुमा स्वभाव से रियाज को उससे न छीन ले| और जब उसे लगता है कि रियाज मम्मो को पसंद करने लगा है वह मम्मो के प्रति हिंसक हो जाती है|

जब रियाज गुस्से में मम्मो का अपमान करता है तो फय्याजी को अंदर से प्रसन्नता होती है और वह भी बहती गंगा में हाथ ढोते हुए अपनी कुंठा के कारण मम्मो पर आक्रमण करती है और उससे जलील करती है|

फय्याजी और मम्मो सगी बहने हैं लेकिन वक्त उस मोड़ पर उन्हें ले आता है जहां फय्याजी मम्मो से कहती है,” इन छोटे फ्लैटों में इतनी जगह कहाँ होती है?”|और बाद में मम्मो का अपमान करते हुए कहती है,” ये तुम्हारी शुरू से कमी रही है कि तुम जहां जाती हो वहाँ अपना हक जताने लगती हो| तुम यहाँ मेहमान हो|”

मम्मो बड़े दिल वाली महिला है और वह फय्याजी के कहने का बुरा न मानते हुए उसे शांत करने का प्रयास करती है यह कहते हुए कि गुस्से से उसकी तबियत नासाज हो जायेगी|

सगी बहन होने के नाते फय्याजी मम्मो की सहायता तो करना चाहती है पर यह उसे पसंद नहीं कि रियाज मम्मो से भी उतना जी प्रेम करे जैसा वह उससे करता है| यही भय उसके अंदर द्वंद को जन्म देता है और उसकी भावनाओं का बंटवारा कर देता है|

बड़े दिल वाली प्रसन्नचित्त ‘मम्मो’ के केन्द्रीय किरदार में फरीदा जलाल लाजवाब हैं| फ़िल्मी जीवन की उनकी पहली पारी में उन्हें हमेशा ही नायक या नायिका की चुलबुली बहन की भूमिकाएं मिलती थीं| बाद में अभिनय जीवन की दूसरी पारी में वे नायक या नायिका की माँ की भूमिका में फिल्मों में नज़र आने लगीं| टीवी धारावाहिक ‘देख भाई देख’ ने उनके हास्य अभिनय करने की क्षमता का भरपूर दोहन और प्रदर्शन किया|

मम्मो’ में फरीदा जलाल को उनके अभिनय जीवन का प्रतिनिधि किरदार मिला और उन्होंने सुनहरे अवसर का भरपूर उपयोग किया| यह कहा जा सकता है कि उनकी पहले की सभी फ़िल्में एक तरह से अभिनय के क्षेत्र में उनके लिए अभ्यास मात्र थीं, इस भूमिका में महान प्रदर्शन करने के लिए| नियति उन्हें इस भूमिका के लिए तैयार कर रही थी|

मम्मो’ और ‘फरीदा जलाल’ का वही संबंध आपस में है जो ‘बलराज साहनी’ और ‘गर्म हवा’ का आपस में रहा है| दोनों ही अभिनेता अपनी अपनी फिल्म के साथ इस तरह जुड़ गये हैं कि फिल्म उनके अभिनय जीवन का प्रतिनिधित्व करती है और वे इन फिल्मों का|

फरीदा जलाल’ के अभिनय जीवन की गुणवत्ता पर रत्ती भर भी फर्क नहीं पडता अगर वे ‘मम्मो’ के बाद अभिनय जीवन को तिलांजलि दे देतीं क्योंकि वे अपना सर्वश्रेष्ठ अभिनय प्रदर्शन इस फिल्म में दिखा चुकी हैं| पूर्णकालिक अभिनेता को जीविकोपार्जन के लिए भी फ़िल्में करनी पड़ती हैं पर यह बेहद मुश्किल है कि फरीदा जलाल को फिर ऐसी क्षमता वाली केन्द्रीय भूमिका वाली फिल्म मिल जाए|

श्याम बेनेगल का दक्ष निर्देशन एक साधारण प्रतीत होने वाली कहानी को एक प्रभावशाली फिल्म में परिवर्तित कर देता है| अपनी अन्य फिल्मों की भांति ‘मम्मो’ में भी श्याम बाबू विभिन्न परिस्थितियों में मानव के व्यवहार का असरदार फिल्मांकन करते हैं|

एक दृश्य है जो मम्मो के चरित्र पर और मानवीय स्वभाव पर रोशनी डालने के लिए उपयुक्त है| मीठी बातों और अच्छे व्यवहार के बूते मम्मो पुलिस अधिकारी के मन में अपने प्रति सहानुभूति उत्पन्न करना चाहती है| पुलिस अधिकारी मम्मो के पार्टी नरम नहीं होना चाहता क्योंकि वह पाकिस्तान से आई है, लेकिन मम्मो के अनवरत प्रयास उसे अंत में मुस्कराने पर विवश कर ही देते हैं|

…[राकेश]

 

अगस्त 27, 2015

Kalyug (1981) : महाभारत के संघर्ष आधुनिक परिवेश में

Kalyug1981-001‘कुलटा’…, बेटा जोर से अपनी माँ को गाली देकर वार करने के लिए उसकी ओर दौडता है|

* * * * * *
लोगों के लिए कितना आसान होता है पढ़ना, देखना या सुनना कि कुंती कर्ण के पास जाती है और उसे बताती है कि कर्ण उसका ज्येष्ठतम पुत्र है और वह उससे आग्रह करती है कि शक्तिशाली योद्धा कर्ण युद्ध में पांडू पुत्रों – पांडव भाइयों, की जान न ले, क्योंकि हैं तो वे कर्ण के अनुज ही, भले ही उनके पिता वही नहीं हैं जो कर्ण के थे|

यह पढ़ना, देखना और सुनना भी आसान है कि कर्ण का जन्म कुंती के पांडू से विवाह से पहले ही हो चुका था और इसीलिए लोकलाज के भय से कुंती को कर्ण को जन्मते ही त्यागना पड़ा| यह सब जानना भी कितनी आसानी से हो जाता है लोगों के लिए कि पांडव भाइयों को बाद में पता लगा कि कर्ण उनका ज्येष्ठ भ्राता था|

दूर घटती घटनाओं को पचाना आसान होता है क्योंकि वे किसी और के साथ घट रही हैं, तभी साहित्य आदि में मनुष्य कुछ भी पचा लेता है पर जिस बात को वह साहित्य में सराहता है उसी को वास्तविक जीवन में नकारता है, उसकी निंदा करता है| दूर और दूसरों के साथ घटी बात तो कथा है! लेकिन यदि यही बात अपने साथ या नजदीकी व्यक्ति के साथ घटे तो सहने में पूरा व्यक्तित्व हिल जाता है, मानसिक संतुलन बिगड जाता है|

मनुष्य के दिमाग को बचपन से ही एक खास किस्म की कंडीशनिंग मिलती है और इसीलिये वह उन्ही सीमित दायरों में सोचता और व्यवहार करता है|

कोई भी मनुष्य (स्त्री या पुरुष) अपने संपर्क में आने वाले हर उस तीसरे चौथे इंसान से शारीरिक संपर्क स्थापित करने की इच्छा रख सकता है जो उसके मन को भा जाए और ऐसा करते भी हैं लोग लेकिन ऐसी इच्छा रखने वाले इंसान गुस्से में पागल हो जाते हैं अगर ऐसे ही कदम उनके माता या पिता या भाई और बहन उठा रहे हों या उनकी संतान उठा रही हो और उन्हें इस बात का पता लग जाए|

* * * * *
सावित्री (सुषमा सेठ) कमरे में प्रवेश करती है, अंदर उसके बेटे और उनकी पत्नियां किशन चंद (अमरीश पुरी) के साथ बातचीत में व्यस्त है|

गजब का दृश्य है यह!

सावित्री कहती है – मुझे तुम लोगों से बात करनी है|

स्पष्टत: वह अपने बेटों से बात करना चाहती है|

सुभद्रा (सुप्रिया पाठक), किरण (रीमा लागू) और किशन चंद इस संकेत को स्वीकार कर कमरे से बाहर निकलने लगते हैं लेकिन सुप्रिया (रेखा) बाहर जाने में हिचकिचाहट दिखाती है, इसे सास – बहू के मध्य का तनाव भी कहा जा सकता है, और सुप्रिया के मजबूत व्यक्तित्व का धोतक भी क्योंकि घर में वह सबसे शक्तिशाली और सक्रिय पुरुष – अपने देवर, भरत, पर भी नियंत्रण रखती है| वह अपने शारीरिक हाव-भाव से दर्शा देती है कि उसे यह बात पसंद नहीं आई|

सावित्री दृढ स्वर में कहती है – मुझे अपने बेटों से बात करनी है|

किशन चंद अपनी बहन सुप्रिया की बांह पकड़ कर कमरे से बाहर ले जाता है और अपने पीछे कमरे का दरवाजा बंद कर देता है|

अंदर सावित्री अपने बेटों से कहती है – करण (शशि कपूर) मारा गया … करण भी मेरा ही बेटा था, तुम सबसे बड़ा|

करण उनकी माँ का ही बेटा था यह राज जानकर तीनों भाइयों धरम राज (राज बब्बर), बलराज (कुलभूषण खरबंदा) और भरत राज (अनंत नाग) पर वज्रपात हो जाता है| धरम राज स्तब्ध है, पर जल्दी ही अपने को संभाल लेता है, बल राज, दुखी हो कर इस अंदाज में मुस्कराता है जिससे उसके चेहरे पर निराशा और व्यंग्य के भाव उमड़ आते हैं|

लेकिन यह रहस्योद्घाटन सबसे ज्यादा विचलत भरत को करता है जो क्रोध में अपनी माँ को ‘कुलटा’ कहकर उसे मारने दौडता है|

धरम राज भरत को रोकता है|

कमरे में एक माँ के तीन बेटों में से तीनों अलग अलग ढंग से इस राज को ग्रहण करते हैं और जो उनके अंदुरनी स्वभाव को भी दर्शाता है| केवल धरम राज ऐसा है जो अपनी माँ के दुख को समझ पा रहा अहै और सांत्वना देने उसके पास जाता है|

जिस उम्दा तरीके से दृश्यों का सिलसिला परदे पर आता है वह इस बात की गवाही देता है कि इस बोल्ड फिल्म में शानदार गुणों का समावेश किया गया है|

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पूरी फिल्म के दौरान ऐसे कई क्षण आते हैं जो दर्शक के मानस पर भारी चोट करते हैं और उसे विचार करने या आत्मविश्लेषण की यात्रा पर भेज देते हैं|
कर्ण की व्यथा जिस जबर्दस्त तरीके से इस फिल्म में सामने आई है वह अति नाटकीय टीवी धारावाहिकों या ओवर द टॉप किस्म की मिथक फिल्मों में संभव नहीं| करण को जब सावित्री यह बताती है कि वह भी उसी का बेटा है तो करण को कई झटके एक साथ लगते हैं|

उसे एहसास होता है कि उसके मित्र धन राज ने उसे उसके ही भाइयों के खिलाफ इस्तेमाल किया है और धनराज के षड्यंत्र की वजह से ही बलराज का पुत्र मारा गया, हालांकि धनराज भरत को मारना चाहता था| करण को भली भांति ज्ञात है कि उसका छोटा भाई भरत उससे बेपनाह घृणा करता है| वह इसलिए भी सच को जानकर कुंठित है क्योंकि उसे बचपन से एक अनाथ की तरह से जीना पड़ा है| उसे इस बात से भी कोफ़्त है कि यूं तो धनराज उससे हर मामले में सलाह करता है पर धनराज ने उसे अँधेरे में रखकर भरत को मारने की योजना बनाई|

कुंठित होकर वह भीष्मचंद (ए.के. हंगल) के पास जाता है, जो निर्वासित जीवन जी रहे हैं और उनसे कहता है कि वह आत्महत्या करना चाहता है|

भीष्म चंद ने करण को बचपन से अपने संरक्षण में पाला है, वे सच पहले से जानते हैं, और एक ही परिवार के दो भागों में आपसी मुकाबले से पहले ही कुंठित हैं और करण का यह कथन उन्हें और ज्यादा कुंठित कर जाता है और वे कहते हैं – कौन रोकता है तुम्हे, करो जो करना है|

उस समय करण को कहाँ पता है कि उसके खिलाफ क्या षड्यंत्र रचा जा चुका है|

विचार कार्यों को प्रभावित करते हैं और इसलिए घटनाएं आकार ले लेती हैं लेकिन इन कार्यों के परिणामस्वरूप जो फल मिलते हैं वे स्तब्ध छोड़ देने वाले भी हो सकते हैं और अगर गलती का एहसास हो जाए और जीवन में हुयी हानि का मूल्यांकन हो जाए कि कुछ क्षतियों की पूर्ति नहीं की जा सकती तो पछतावे की मात्रा की कोई सीमा नहीं और व्यक्ति कैसा भी फैसला ले सकता है|

फिल्म के चरित्र ही नहीं बल्कि दर्शक भी एक घराने की दो धाराओं के बीच हिंसात्मक प्रतिद्वन्दिता से उपजी हानि को देख दुख महसूस करते हैं पर जीवन को आगे चलना होता है और जब बड़े वृक्ष धराशायी हो जाएँ तो नई पौध को उपवन की जिम्मेदारी संभालनी होती है| जिन दो धाराओं ने आपस में इतनी मार काट मचाई उनके हितों को संभालने वाला कोई जिम्मेदार वयस्क जब नहीं बचता तब आशा नई पौध को सिंचित करके परिपक्व बनाने में आशा की किरण दिखाई देती है| जीने का सबब दिखाई देता है|

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फिल्म कलयुग, महाभारत की कथा से प्रेरित तो है पर उस कथा के तत्वों को आधुनिक काल में अंकुरित किया गया है और उन अंकुरों से अपनी खुद की पौध निकली है| महाभारत का असर तो है और देखने पर वही असर आता है पर यह महाभारत की नक़ल का नाट्य रूपांतरण नहीं है|

बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि जिस महाभारत को लोग जानते हैं यह उसकी नये किस्म की व्याख्या है, उस पर नये अंदाज की टिप्पणी है| कलयुग, महाभारत को आज के युग में समझने का प्रयास है| यह उन परिस्थितियों को और उन परिस्थितियों में घिरे मनुष्यों के मनोविज्ञान को समझने का प्रयास है| यह इतना अलग लगता है महाभारत से कि ऐसा अंदाजा लगाया जाना मुश्किल नहीं कि पिछले पच्चीस सालों में उभरे कट्टर हिन्दुत्ववादी संगठनों की हर मामले में दखलंदाजी को देखते हुए यदि यह फिल्म आजकल के दौर में सफलतापूर्वक तो प्रदर्शित भी नहीं हो पाती और कोई न कोई व्यक्ति या संगठन इसका विरोध करता ही कि इसने महाभारत की कथा को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया है|

श्याम बेनेगल ने प. सत्यदेव दुबे और गिरीश कर्नाड के साथ मिलकर महाभारत की कथा में नये मोड़ दिए हैं| इतने बेहतरीन लेखकों से यह उम्मीद करना भी नाइंसाफी है कि वे फोटोकॉपी मशीन की तरह काम करेंगे और महाभारत की जानी पहचानी कथा को दर्शक के सामने प्रस्तुत कर देंगें| यह तो तय ही है कि वे भागवत और रामायण के कथावाचकों जैसे नहीं हैं| उन्होंने पूरा शोध करके इस कलयुगी महाभारत को रचा है जो आज के युग में सार्थक और अर्थपूर्ण लगती है|

महाभारत की कथा दर्शाती है कि हम सब मनुष्यों के जीवन वही सब दुहरा रहे हैं जो इस महाग्रंथ में वर्णित हैं| हम सब वही गलतियाँ दुहराते चले जाते हैं जो इस महागाथा के चरित्रों ने की थीं| हजारों साल बीत गये हैं पर मनुष्य ऐसा संभव नहीं कर पाया है कि इस कथा में की गई गलतियों को न दुहराए| ईर्ष्या और घृणा के वशीभूत होकर लोग वही सब कुछ करते हैं जो इस किताब में लिखा गया है| ऐसा लगता है मानों किताब ने मनुष्य जीवन के इर्दगिर्द एक घेरा खींच दिया है और मनुष्य किताब में दर्शाई भूलभुलैया से बाहर निकल पाने में असमर्थ है मनुष्य बेहद कमजोर सिद्ध होता है इस चक्रव्यूह को तोड़ पाने के लिए|

कलयुग में महाभारत के कई चरित्रों के रंग किसी एक चरित्र में भर दिए गये हैं और घटनाओं को भी मिश्रित किया गया है| और कुछ भी सीधे सीधे वैसा का वैसा नहीं रखा गया है|

यदि कलयुग महाभारत की सीधी नक़ल होती तो दर्शक के सामने स्पष्ट रहता कि कब क्या होने वाला है और तब वह अपने मन में बसे खास चरित्रों की छवि के अनुरूप ही अभिनेताओं को अभिनय करते हुए देखना चाहता क्योंकि तब उसे यही लगता कि वह तो खासा परिचित है इन चरित्रों से| लेकिन कलयुग दर्शक की अपेक्षाओं से एक कदम आगे रखकर उसे आश्चर्य में डालती चली जाती है| फिल्म दर्शक को आसान निष्कर्ष और चरित्रों के बारे में पहले से जानी समझी बात प्रदान नहीं करती|

करण का चरित्र महाभारत के कर्ण से मिलता है पर यहाँ उसे भीष्म ने पाला है और सावित्री को शुरू से पता है कि करण उसका बेटा है|

फिल्म- कलयुग, मिथकीय चरित्रों का साधारणीकरणकरण और मानवीयकरण मात्र ही नहीं है वरन चरित्रों और घटनाओं का समर्थ विश्लेषण भी है|

इस नयी महाभारत की समझ यह भी दर्शाती है कि अगर कौरव न भी होते परिदृश्य पर तो पाँचों पांडव भाई मूल बातों – ज़र, जोरू और जमीन के आधारभूत मुद्दों पर आपस में ही लड़ते , क्योंकि वे भी एक माँ की संतान तो थे नहीं, उनकी माएँ अलग थीं| तो सगे भाई आपस में न भी लड़ते, पर दो पांडव एक तरफ और तीन पांडव दूसरी तरफ तो हो ही सकते थे| ‘कलयुग’ में तीन भाई सावित्री के बेटे हैं और दो भाई देवकी (विजया मेहता) के|

कलयुग, महाभारत के चरित्रों का सीधा फिल्मीकरण नहीं है, बल्कि यह आधुनिक मानव के मनोविज्ञान का अध्ययन है| यहाँ हर चरित्र गलतियाँ करता है और उसे किसी भी तरह से श्वेत श्याम रंगों में परिभाषित नहीं किया जा सकता| यहाँ वे करता हैं| वैसे भी मिथकों का फिल्मीकरण इसलिए बहुत सहायक सिद्ध नहीं होता क्योंकि उनकी कथा और उनके चरित्रों का चित्रण हमें मालूम होता है|

कलयुग के चरित्र हम लोगों में से ही उठाकर परदे पर प्रक्षेपित किये गये हैं| महाभारत देखते समय हम दूरी बना सकते हैं क्योंकि हमें पता है कि सब कुछ महाभारत पर आधारित है और जहां की सब घटनाएं हजारों साल पहले घटीं और सबको पहले से ज्ञात हैं| कलयुग से बचाव नहीं क्योंकि यह आज के मानव को दिखाती है|

भाइयों के मध्य ईर्ष्या का वास है और वे एक दूसरे से लड़ रहे हैं| संयुक्त परिवार में अंदर षड्यंत्र रचे जा रहे हैं एक दूसरे के खिलाफ| हर कोई अपने ही सगे संबंधी की छाती पर पैर रख आगे बढ़ना चाहता है|

कलयुग आधुनिक मानव के व्यवहार का अध्ययन है| महाभारत हमेशा समकालीन लगती है क्योंकि मानव इसकी कथा के चरित्रों जैसा ही व्यवहार करता है जब उनके जैसी परिस्थितियों में फंसता है| मानव जीवन भावनाओं, एहसासों और विचारों से नियंत्रित होता है और तीनों का आपस में एक अन्तर्निहित संबंध है| जब भी इस संबंध में संतुलन बिगड जाता है, मानव विनाश की ओर बढ़ जाता है

कलयुग, मानव के व्यवहार और उसके मनोविज्ञान को गहराई से खंगालने में सफल रहती है| मनुष्य का दिमाग अँधेरे बंद कोनों में भी विचरण करता है और मनुष्य का दिमाग एक रहस्यमयी बात है| पलक झपकते ही मनुष्य के दिमाग की कलाएं बदल जाती हैं और एक संत का दिमाग शैतान का दिमाग बन जाता है|

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ऐसा कहते हैं कि पिछली सदी के बेहद चर्चित उपन्यासकार बाबू देवकीनंदन खत्री, जिन्होने बहुत ही प्रसिद्ध रही किताबों की रचना की, जिनमें भूतनाथ श्रंखला और चंद्रकांता एवं चन्द्रकान्ता संतति आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, को ताश खेलने का बेहद शौक था| वे अलग अलग कागजों पर लिखा करते थे और जब चन्द्रकान्ता संतति छप रही थी तो कई मर्तबा ऐसा हुआ कि प्रिंटिंग प्रेस वाला उनके पास आता कि फलां फलां पन्ना संख्या मिल नहीं रही है उनके लिखे कागजों के पुलिंदे में और बाबू देवकीनंदन खत्री ताश खेलते खेलते ही पिछला पन्ना पढते और वहीं पर गायब पन्ने की कथा लिख डालते| अब जिन्होने चन्द्रकान्ता और चन्द्रकान्ता संतति पढ़ी है वे इस प्रसंग में छिपे करिश्मे को भली भांति जान और समझ जायेंगें क्योंकि उस श्रंखला की किताबों में सारी कथा जलेबी की तरह घुमावदार है और दुनिया की सबसे ज्यादा रहस्यमयी भूल-भुलैया से ज्यादा रहस्यमयी, इस वृहत कथा श्रंखला की पुस्तक संख्या एक में यदि किसी रहस्य का विवरण एक पहेली की तरह पन्ना नंबर चौंतीस पर दिया गया है तो बहुत संभव है कि वह रहस्य श्रंखला की दूसरी, तीसरी या चौथी पुस्तक के पन्ना संख्या पैंसठ पर पाठक के समक्ष सुलझाया जायेगा| ऐसे में बाबू देवकीनंदन खत्री की विलक्षण स्मृति तो अनूठे गुण का उदाहरण है ही, इन पुस्तकों का भरपूर आनंद लेने के लिए पाठक की स्मृति भी बहुत अच्छी होनी चाहिए|

श्याम बाबू की कलयुग का वही स्थान हिंदी सिनेमा में माना जाना चाहिए जो चन्द्रकान्ता संतति का हिंदी साहित्य में है क्योंकि इस फिल्म में भी निर्देशक शुरू से ही छोटे छोटे सुबूत छोडता जाता है और बाद में ही इस बात का पता चलता है कि उस चरित्र के इस व्यवहार विशेष के पीछे राज क्या था?

किसी विशेष चरित्र दवारा शुरुआती दृश्यों में किसी को खास तरीके से देखे जाने का राज फिल्म के बाद के हिस्सों में दर्शक को समझ में आता है| फिल्म में इतनी परतें हैं कि इसका भरपूर आनंद लेने के लिए दर्शक को फिल्म बेहद ध्यान से देखनी पड़ती है और तब भी कुछ न कुछ उसके ध्यान से फिसल सकता है|

कलयुग, महाभारत में वर्णित बातों का विश्लेषण करती है इसके उदाहरणार्थ फिल्म में भरत और सुप्रिया के आपसी संबंध को प्रस्तुत किया जा सकता है| कुछ दृश्यों का उल्लेख करना सार्थक रहेगा|

पहले दृश्य में, भरत, सुप्रिया और परिवार के अन्य सदस्य भीष्म के घर पर आयोजित पार्टी में हिस्सा लेकर घर लौट कर आए हैं| पार्टी में धनराज (विक्टर बनर्जी) और भीष्म ने सबको यह बताया कि धनराज और करण को एक बहुत बड़ा कांट्रेक्ट मिल गया है और यह उन्हें इसलिए मिला है क्योंकि उन्होंने विदेश से बेहद महत्वपूर्ण मशीनें आयात कीं जिनकी सहायता से वे उत्पाद के निर्माण की कीमत कम रखने में कामयाब रहे हैं|

वह दौर व्यापार पर सरकारी नियंत्रण का दौर था|

यह सब जानकर भरत क्रोधित है, वह बलराज के बेटे को सुप्रिया के बड़े भाई किशन चंद को फोन मिलाने के लिए कहता है| सुप्रिया कहती है,’रुको मैं मिलाती हूँ|’

वह अपनी जगह से उठती है और उस सोफे पर आकर बैठ जाती है जहां भरत बैठा है| सुप्रिया के बैठते समय भरत उसके शरीर को देखता है| सुप्रिया उसके बड़े भाई धरम राज की पत्नी है| इस वक्त दर्शक भरत दवारा सुप्रिया को इस तरह देखने को नहीं समझ पाते लेकिन जिस चाह से वह कसी हुयी साड़ी में लिपटे सुप्रिया के शरीर को देखता है वह जरुर ध्यान से देख रहे दर्शक के नोटिस में आता है|

सुप्रिया के फोन मिलाते वक्त, कुंठित भरत गुस्से में बोलता है,’ डैम, ये करण को इतने आइडियाज आते कहाँ से हैं?’

सुप्रिया- जानते हो भरत, करण मुझसे शादी करना चाहता था|

भरत- वो अकेला ही थोड़े लाइन में रहा होगा|

सुप्रिया के चेहरे पर आए हाव भाव सिद्ध कर देते हैं कि अगर रेखा को श्याम बेनेगल जैसे काबिल निर्देशक मिलें तो वे क्या अदभुत अभिनय करके दिखा सकती हैं!

इसी तरह के कुछ अन्य दृश्य हैं जो कुछ और संकेत दर्शकों को देते हैं|

सुप्रिया एक बार भरत से कहती है – भरत, तुम ये मूंछे काट दो|

भरत हँस कर कहता है – क्यों मूंछे काटने से कांट्रेक्ट वापिस मिल जायेगा?

लेकिन बाद में वह मूंछे साफ़ करके क्लीन शेवन चेहरा लिए सबके सामने आता है|

भरत सुप्रिया की सलाह को बहुत महत्व देता है| भरत स्वतंत्र विचारों वाला महत्वाकांक्षी और शक्ति को अपने पास केंद्रित करने वाला पुरुष है| सुप्रिया को भी अपने पति से ज्यादा भरत की योग्यताओं और उसके प्रबंधन पर भरोसा है| इन्कम टैक्स की रेड के समय वह अपने पति को नहीं बल्कि भरत को आवाज देती है जब इन्कम टैक्स वाले अलमारी से उसके कपड़ों को निकालने लगते हैं| सुप्रिया अपने भाई का विरोध करती है जो भरत के साथ अपनी बेटी का विवाह करने का प्रस्ताव रखता है|

फिल्म के अंत से कुछ पहले के भरत और सुप्रिया के साथ वाले अंतिम दृश्य से ही दर्शक को पता चल पाता है कि फिल्म में भरत और सुप्रिया के मध्य रिश्ते के बारे में दिए गये पहले के संकेतों का क्या अर्थ था?

सुप्रिया के चरित्र को बोलने के लिए बहुत थोड़े से संवाद मिले हैं, पर उसका चरित्र इस तरीक से विकसित किया गया है कि वह ऐसी महत्वाकांक्षी स्त्री है जो अपने आसपास के वातावरण में शक्ति की बागडोर अपने हाथ में रखना चाहती है| वह अपने अधिकार के लिए, या जिसे वह अपना अधिकार समझती है उसके लिए, किसी से भी लड़ सकती है| अपने पति, धरमराज, की तरह उसका सांसारिक बातों से मोह भंग नहीं हुआ है और वह भरपूर जीना चाहती है, पति की सांसारिक बातों और शक्ति अपने हाथों में केंद्रित करने की प्रवृत्ति से विमुख होने के कारण उसके लिए भरत ज्यादा गुणी पुरुष है जो उसी की प्रकृति का है, और सुप्रिया को लगता है भरत में दम है हर तरह की बाजियां जीत लेने का

धरम राज, एक संतोषी इंसान है और बहुत हद तक संन्यासी किस्म का पुरुष है| वह शांत प्रकृति का, भले दिल का पुरुष है जिसकी उर्जा आपनी रुचियों को संवर्धित करने और अध्यात्म की खोज क अपालन करने में लगती है| वह व्यापार में गला-काट प्रतियोगिता को नापसंद करता है और उसकी रूचि इस बता में है कि सीधे सादे तरीकों से अन्यों को नुकसान पहुंचाए बिना व्यापार चलता रहे और विकसित होता रहे, क्योंकि तब उसे व्यापार चलाने में खास दिक्कत नहीं है| वह शातिर व्यापारियों के समक्ष सफल नहीं हो सकता पर वह इस बात को भली -भांति समझता है और उसे इस बात को स्वीकारने में संकोच नहीं| वह अंदर से सन्तुष व्यक्ति है| वह प्रतिक्रियावादी नहीं है| लेकिन उसकी पत्नी सुप्रिया उसके उलट स्वभाव की है और उसका सभी सांसारिक मामलों में जीतने का विश्वास है| वह केन्द्रीय भूमिका में रहना चाहती है| वह अपने इत्द-गिर्द के संसार को नियंत्रित करना चाहता है|

एक दृश्य में, सुप्रिया इसलिए नाराज है क्योंकि उसे पता लगा है कि धरम राज और सावित्री ने भरत की शादी सुभद्रा से तय कर दी है, जो कि उसके भाई की बेटी है|

बिना किसी भूमिका के, अपने शयनकक्ष में वह धरम राज से कहती है,” अभी तो वो बच्ची है|”

पहले तो स्पष्टतः धरम राज उसकी बात समझ नहीं पाता लेकिन बाद में वह उसका आशय समझ जाता है और शान्ति से कहता है,” लेकिन उसके पिता ने कुछ सोच कर इस संबंध का प्रस्ताव रखा होगा|”

सुप्रिया उसकी ऐसी प्रतिक्रया से और क्रोधित हो जाती है और अपने बिस्तर पर जा बैठती है| धरम राज दोनों के बिस्तर के बीच में रखे लैम्प को जला देता है ताकि वह लेट कर किताब पढ़ सके| सुप्रिया गुस्से में लैम्प बद कर देती है और अपने बिस्तर पर लेट जाती है| धरम राज आराम से अपने बिस्तर पर लेट जाता है वह सुप्रिया की आवेग से भरी प्रकृति के उत्तर में कोई प्रतिक्रया नहीं देता|

सुप्रिया अक्सर धरम राज की पसंदगी का उपहास किया करती है जैसे उसकी घुड़सवारी के शौक का| सुप्रिया के अंदर अभी युवावस्था की भरपूर उर्जा है और वह युवा अंदाज में ही जीवन जीना चाहती है जबकि धरम राज परिपक्वता से भरी जिंदगी क अकायल है और उसके लक्ष्य भिन्न हैं जीवन में|

सुप्रिया, द्रौपदी जैसी स्त्री है, और उसका आकर्षण भरत की तरफ है| भरत भी उसकी ओर आकर्षित है न केवल शारीरिक रूप से बल्कि उसके गुणों के कारण भी| दोनों की पसंदगी परस्पर है| भरत, अर्जुन जैसा चरित्र है| फिल्म दर्शाने की चेष्टा करती है कि जब हिंदुओं में पौलीएंड्री (बहु-पति या बहु-पत्नी) कानूनी रूप से मान्य नहीं है तब कैसे एक स्त्री दो या अधिक भाइयों से संबंध रख सकती है| फिल्म आजकल के परिवेश में सारी परिस्थिति का विश्लेषण करने का प्रयास करती है और यह भी समझने का प्रयास करती है कि कोई इंसान क्यों अपने विवाह से बाहर जाकर अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति का विकल्प तलाशता है|

सतह पर बाहर के लोगों को ही नहीं बल्कि परिवार के सदस्यों को भी धरम राज और सुप्रिया के एक सफल और सुखी दंपत्ति होने का भ्रम है| किरण अपने पति बलराज से कहती भी है,” दीदी और भाईसाहब का देखो कितना अच्छा है, दोनों कितना पढते रहते हैं|”

बलराज का विश्वास बढ़िया खाने और ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जीने में है| उसका और किरण का एक किशोर उम्र का बेटा है पर दोनों हनीमून काल बिता रहे दंपत्ति जैसा व्यवहार एक दूसरे से करते हैं| बलराज के अंदर अपने सौतेले भाइयों के प्रति कोई नफरत नहीं है और वह धनराज के छोटे भाई संदीप राज के साथ बैठ शराब पिया करता है|

असली प्रतिद्वंदिता है धनराज और भरत के मध्य और धनराज इस लड़ाई में करण का इस्तेमाल अपनी तरफ से सेनापति के रूप में करता है| व्यापार में वह करण के ऊपर बहुत निर्भर रहता है किन्तु उसे भी वह हवा नहीं लगने देता कि उसने भरत की ह्त्या के लिए एक हत्यारे को भेजा है|

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ऐसा कहा जाता रहा है कि जो कुछ भी महाभारत में वर्णित किया गया है वह सब कुछ जगत में कहीं न कहीं हमेशा ही घटित होता रहता है और कलयुग फिल्म भी उसी परिकल्पना को सिद्ध करने का प्रयास है|
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कलयुग चरित्रों के व्यवहार को बारीकी से प्रस्तुत करती है| उदाहरणार्थ ओम पुरी के चरित्र – भवानी पांडे, को देखें| अपने शुरुआती दृश्यों में जहां भवानी अपने मजदूर साथियों को संबोधित कर रहा है, वहाँ उससे चीख चीख कर बुलवाया गया है ताकि वह मजदूरों के नेता के रूप में उभर कर अपने साथियों में जोश भर सके| भवानी एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति है जो मजदूर संघों का नेता बनने की ख्वाहिश रखता है| वैसे भी सोफिस्टिकेटेड चरित्रों की भीड़ में एक मजदूर संघ का नेता लाउड प्रतीत होगा ही| लेकिन मिल मालिकों के साथ अंदर कमरे में मीटिंग के लिए कमरे में प्रवेश करते ही भवानी के चरित्र के हाव-भाव बदल कर फिल्म के स्वभाव के मुताबिक़ बारीक हो जाते हैं| भरत के कथन – सीधे मुददे की बात करें-, के जवाब में सामने मेज पर अपना धूप का चश्मा रखते हुए भवानी कहता है – वक्त बचेगा|

कलयुग, मानव की भावनाओं को प्रदर्शित करने में मितव्ययिता का सहारा लेती है और अतिवादी भावनाओं और प्रतिक्रियाओं से बचा गया है|

एक परिपक्व दर्शक, फिल्म देखते हुए निष्पक्ष या अक्रिय नहीं रह सकता| फिल्म उसे झकझोरती है और सोचने पर विवश करती है|

अच्छी कहानी और पटकथा, संवाद, सिनेमेटोग्राफी (गोविन्द निहालानी) और अन्य तकनीकी क्षेत्रों, और अभिनय प्रदर्शन तथा निर्देशन, फिल्म निर्माण के सभी क्षेत्रों में कलयुग धनी है| निर्देशक श्याम बेनेगल ने काबिले तारीफ़ अभिनय प्रदर्शन करवाया है अभिनेताओं से|

कलयुग में व्यावसायिक सितारे शशि कपूर (जो कि फिल्म के निर्माता भी हैं) और रेखा हैं पर कैमरा केवल उन्ही दोनों या किन्ही खास चरित्रों से ही नहीं चिपका रहता|

विजया मेहता को फिल्म में बमुश्किल चार संवाद मिलें हैं बोलने को पर तब भी उनका मौन रहने वाला चरित्र अपनी मजबूत स्थिति दर्ज करता है|

सेट डिजायनिंग से लेकर फ्रेमिंग पर इतनी बारीकी से काम किया अगया है कि फिल्म का हर फ्रेम उत्कृष्ट कला का नमूना लगता है|

एक दृश्य है जिसमें सारी स्त्रियाँ सफ़ेद वस्त्र पहने खड़ी हैं, यह दृश्य ऐसा लगता है जैसे अमृता शेरगिल की पेंटिंग हो|

हुसैन की घोड़ों वाली पेंटिंग्स दीवारों पर सजी रहती हैं|

सारा परिदृश्य इतना विश्वसनीय दिखाई देता है कि संदेह होता है कि श्याम बेनेगल और फिल्म के लेखकों ने किसी वास्तविक व्यापारिक घराने के ऊपर इस फिल्म को सेट किया है|

कलयुग ऐसी फिल्म है जिसकी बारीकियों पर एक पूरी पुस्तक लिखी जा सके| यह हिंदी सिनेमा में बनी बेहतरीन फिल्मों में से एक है|

…[राकेश]

 

 

 

अगस्त 23, 2015

Manjhi : The Mountain Man (2015) – जुनूनी आशिक की दास्तान है प्यारे

Manjhiअपने ‘मैं’ को खोकर जिसे पाते

वह सौगात

‘प्रेम’ की!

प्रेम में पहले दूसरा स्वयं से महत्वपूर्ण हो जाता है फिर दोनों के ‘मैं’ कुछ समय के लिए एक हो जाते हैं और एक समय आता है जब व्यक्ति को उस ‘प्रेम’ से प्यार हो जाता है जिसे वह अपने प्रियतम के प्रति महसूस करता है| तब प्रियतम से बड़ा उसके प्रति प्रेम हो जाता है|

दशरथ मांझी (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) इस फिल्म मांझी- द माउंटेन मैन, में उस अवस्था को पहुँच गया है, जहां उसे अपनी पत्नी फगुनिया (राधिका आप्टे) से हुए प्रेम से इस कदर अटूट प्रेम हो जाता है कि वह धरती के उस दुर्गम ग्रामीण अंचल, जो कि बड़ी-बड़ी चट्टानों से बनी पथरीली पहाड़ियों से घिरा है, के भूखंड को, फगुनिया के पहाड़ से गिरा कर घायल होकर मरने से, फगुनिया का समाधिस्थल मान कर तब भी वहाँ से नहीं हटता जब सारा गाँव अकाल के कारण किसी दूसरी जगह चला जाता है| फगुनिया की भौतिक अनुपस्थिति भी दशरथ के लिए बाधक नहीं बनती और उस जगह के चप्पे चप्पे पर उसे फगुनिया के अपने साथ होने का एहसास रहता है| उसके अपने बच्चे भी उसकी साधना में बाधक नहीं हैं| अगर ऊँचे पहाड़ न होते उसके गाँव आने के रास्ते में तो फगुनिया जिंदा रहती, और अगर रास्ता होता तो वह समय से उसे अस्पताल पहुंचा सकता था|

मोहनदास करमचंद गांधी को दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों ने अपमानित करके टिकट होने के बावजूद जबरदस्ती फर्स्ट क्लास की बोगी से निकाल दिया और रेल के डिब्बे से नीचे रेलवे प्लेटफार्म पर ढकेल दिया| अपमानित गांधी के मानस में ऐसी सघन पीड़ा और उससे ऐसी उर्जा उत्पन्न हुयी कि फिर उसके बाद ब्रिटिश साम्राज्य कम से कम उस जगह चैन की साँस नहीं ले सका जहां गांधी या तो स्वयं उपस्थित थे या वह उनसे प्रभावित क्षेत्र था| गांधी ने उन अंग्रेजों से बदला लेने के लिए पिस्तौल नहीं उठा ली जिन्होने उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अपमानित किया था बल्कि उन्होंने उस अहंकार के मूल, अंग्रेजी साम्राज्य पर निशाना साधा जिससे भारतीय उनके दास न बने रहें, बल्कि स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक बन कर राजनीतिक और सामजिक रूप से अपना जीवन अपने तरीके से जियें|

ऐसे ही व्यक्तिगत हित से उपजे जनहित के विचार की खातिर कभी भगीरथ पहाड़ों में ही फंसी गंगा को मैदानी इलाकों में उतार कर लाये|

फरहाद ने राजकुमारी शीरी के प्रति उपजे प्रेम की खातिर चट्टानों में नहर बनाने का असंभव कार्य हाथ में ले लिया, परन्तु उसके सामने भी आशा का एक ज्योति पुंज जल रहा था अकी अगर वह नहर बनाकर उसमें पानी बहा सकता है तो राजा अपनी पुत्री शीरी का विवाह उसके साथ कर देगा|

पर दशरथ मांझी तो अपने प्रेम के स्रोत, अपनी प्रियतमा, अपनी पत्नी का भौतिक साथ खोने के बाद संकल्प करता है पहाड़ों को तोड़, चट्टानों को काट कर, पत्थरों को चकनाचूर करके रास्ता बनाने का जिससे कभी किसी और के प्रियजनों को अस्पताल ले जाने में देरी न हो|

अगर शाहजहां ने वास्तव में अपने बेगम मुमताज की यद् में ताजमहल बनवाया तो भी उस खूबसूरत इमारत को उसकी परिकल्पना करने वाले कलाकार और हजारों मजदूरों ने बीस साल की मेहनत लगा कर बनाया| पर दशरथ मांझी ने तो बाईस साल अकेले ही काम किया और पहाड़ तोड़ रास्ता बनाया| फगुनिया से अपने प्रेम के शुरुआती दिनों में दशरथ फगुनिया को ताजमहल की अनुकृति उपहार में देता है जो घर से दशरथ के साथ भागते हुए भी वह अपने साथ लेकर भागती है|

दशरथ दवारा बनाया हुआ रास्ता फगुनिया से प्रेम की याद में बनाया ताजमहल ही है, जो वह अकेले अपने बलबूते गढता है और मेहनत के हिसाब से और इसकी उपयोगिता के हिसाब से इसकी महत्ता खूबसूरती के प्रतीक ताजमहल से ज्यादा ही बैठती है|

इस असंभव काम, जिसकी खातिर सब लोग उसे पागल समझते हैं, को करते हुए उसके अंदर फगुनिया के सदा उसके साथ होने का एहसास कायम रहता है| दुखी आत्मा विध्वंसकारी हो जाती है, फगुनिया के देहांत से उसका दिल भी जला हुआ है और पहाड़ के प्रति नफरत और गुस्से से उसका दिल फफक रहा है और उसी गुस्से में वह पहाड को चुनौती देता है कि वह उसके घमंड को तोड़ कर दिखायेगा| दशरथ के वचन खोखली कुंठा के परिणामस्वरूप नहीं निकले हैं बल्कि प्रियतम का भौतिक साथ खोने से उपजी ऋणात्मक ऊर्जा को वह देह-तोड़ काम में निवेशित करने अगली सुबह जब एक रस्सी, एक सब्बल, एक छैनी और एक हथौड़े के साथ वह पहाड़ की ओर कूच कर जाता और वहाँ पहुँच कर पहाड़ को शीश नवा कर एक मुस्कान के साथ काम का श्रीगणेश करते हुए एक पत्थर पर हथौड़े की पहली चोट करता है| वहाँ से अपने पशु के साथ गुजर रहा व्यक्ति उसका मंतव्य जानकर कहता है वह पागल है और यहीं मर जायेगा|

दशरथ के पिता सहित गाँव के हर व्यक्ति के लिए दशरथ पागल है| पर ऐसे काम जुनूनी दिमाग वाले व्यक्ति ही करने का स्वप्न देख सकते हैं, काम करने की ओर कदम उठा सकते हैं| सामान्य दिमाग वाला आदमी ऐसा काम हाथ में नहीं ले सकता|

पहाड़ तोडना दशरथ का यज्ञ है, उसकी तपस्या है, उसकी साधना है और उसका ध्यान है| इस कठिनतम कार्य को अकेले ही करते हुए, लोगों का उपहास और उनके ताने झेलते हुए उसके मन का बाहरी जगत से हट कर अपने अंदर ही रम जाना स्वाभाविक है भले ही लोगों के लिए वह सनकी हो पर इस नितांत अकेलेपन के श्रमसाध्य काम ने न केवल उसके मन की विचलन को हटाया होगा बल्कि उसे एक ऐसी अति-साधारण समझदारी दी होगी जो तपस्वियों के पास मिल सकती है और जो भले ही दुनियावी मामलों में अटपटी हो और एकदम अनुतीर्ण हो जाए पर जो मूल बातों में एक सटीक समाधान लेकर आती है| उसी परिवेश में रह रहे अन्य लोगों की तरह उसके मन में जातिवादी और वर्गवादी शोषण के कारण घृणा नहीं पलती| नक्सली बन गये अपने एक साथी (प्रशांत नारायण) को वह मुखिया (तिग्मांशु धूलिया) से व्यक्तिगत बदला लेने से रोकता है और सही कायदे की बात करता है|

पहाड़ तोड़ते वक्त उसके पास कई मर्तबा आने वाले पत्रकार आलोक के विवशता का रोना रोने पर कि अखबार में कोई स्वतंत्रता नहीं और अखबार का मालिक बिक चुका है और समझौते करता है, सच को छापने नहीं देता, दशरथ उससे कहता है,’अपना अखबार क्यों नहीं निकालते|’

आलोक के यह कहने पर कि अपना खुद का अखबार निकालना बहुत कठिन काम है, दशरथ उसे एक पंक्ति बोल कर निरुत्तर कर देता है,

’ क्या पहाड़ तोड़ने से भी ज्यादा मुश्किल है|’

एक अन्य मौके पर दशरथ एक अन्य चरित्र को कहता है,

’ भगवान के भरोसे मत बैठो क्या पता वो हमारे भरोसे बैठा हो|’

ऐसी दो टूक समझ शांत हो चुके और हर दुनियावी बात से स्वतंत्र हो चुके दिमाग की ही हो सकती है|

फिल्म में दशरथ का चरित्र एक आर्क लिए हुए है| बचपन में जहां दशरथ विद्रोही और उस बात को करने वाला है जो उसे अच्छा लगता है और इसलिए अपने पिता के कहने और मुखिया को वचन देने के बावजूद वह मुखिया का बंधुआ मजदूर बनना अस्वीकार कर देता है और घर से भाग जाता है, परन्तु जब सात साल बाद बड़ा होकर कोयला खान में कुछ साल काम करने के बाद वह अपने गाँव लौटता है तो फिल्म अब उसे एक विदूषक के रूप में दिखाती है| हास्य बिखेरने के बावजूद ये दृश्य फ़िल्मी लगते हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि दशरथ और फगुनिया के प्रेम के शुरुआती भाग की प्रेरणा फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी – ‘पंचलाईट’ से ली गई है|

दशरथ का चरित्र परवान चढ़ता है फगुनिया के आकस्मिक देहांत के बाद|

जब निराशाएं चारों तरह से घेर लेती हैं

और कुछ भी ऐसा नहीं हो पाता

जो सहायता कर सके

तब मैं जाता हूँ उस पत्थर तोड़ने वाले को देखने,

जो कि तन्मयता से चट्टान पर हथौड़े की चोट कर रहा होता है,

कभी कभी सौ बार हथौड़ा मारने के बाद भी चट्टान में

एक दरार तक पड़ती दिखाई नहीं देती,

लेकिन हथौड़े की एक सौ एक वीं चोट चट्टान के सीने को दो भागों में तोड़ देती है,

मुझे पता है कि इस अंतिम चोट ने ही चट्टान को नहीं तोड़ा है,

बल्कि उससे पहले की उन तमाम चोटों की भी इसमें पूरी पूरी भागीदारी रही है|

Jacob A. Riis की उपरोक्त कविता कविता के दोनों पात्रों समेत दशरथ मांझी पर सटीक बैठती है| बाईस सालों में ऐसे दौर अवश्य आयेंगें जब निराशाओं ने दशरथ को घेरा होगा, तब उनके सामने फगुनिया, उसका प्रेम, उसके प्रति प्रेम, अपनी ही पहाड़ तोडती छवि सामने आई होगे जिसने संबल प्रदान किया होगा कि फिर सवेरा हुया है नया दिन उगा है, फिर लक्ष्य पूर्ति के प्रयास में लगना है| पहाड़ तोड़ने की हिम्मत और मेहनत दशरथ की अपनी है और उसकी उर्जा है उसका प्रेम| तभी वह हुंकार भरा करता है – जब तक तोड़ेंगे नहीं तब तक छोड़ेंगे नहीं!

उसकी हिम्मत को कुछ समय के लिए तोडता है भ्रष्टाचार, और घटिया लोग जो उसकी मेहनत पर भी अपनी दुकान सजा लेटे हैं और भ्रष्ट और असंवेदनशील तंत्र जो उसे दिल्ली से बैरंग लौटा देते हैं|

दशरथ द्वारा पहाड तोड़ कर रास्ता बनाने के काम में भ्रष्टाचारियों दवारा डाली गई बाधाओं को देख दर्शक का अपने देश भारत के सरकारी तंत्र और यहाँ की सारी व्यवस्था के घटियापन पर शर्म महसूस करना स्वाभाविक है|

यह फिल्म नवाजुद्दीन सिद्दीकी की है, उनके ही मजबूत अभिनय पर टिकी हुयी है| उन्होंने दशरथ मांझी के अंदर के जुनूनी आशिक, उसके प्रेम, उसके दुख, उसकी कुंठा, उसके गुस्से, उसके शारीरिक और मानसिक बल, उसके शक्तिशाली धैर्य, उसकी धुन, उसकी सीधी-सादी बिना लाग लपेट वाली बुद्धि, उसकी साधुता, उसके अति-जुड़ाव, उसकी विरक्ति, उसके पागलपन, उसकी विवशता, उसकी कमजोरियों, और उसकी बेइंतहा जिजिविषा को इस खूबसूरती से परदे पर उतार दिया है कि उनकी फिल्म में उपस्थिति चीख चीख कर दावे कर रही है कि वे देश के ही नहीं वरन दुनिया के उन चंद अभिनेताओं में शामिल हैं जिनके ऊपर पूरी फिल्म केंद्रित की जा सकती है और जिन्हें एक-डेढ़-दो-तीन घंटे तक दर्शक पूरी तन्मयता से परदे पर निहार सकते हैं| ऐसी योग्यता बहुत अभिनेताओं में नहीं होती हालांकि वे बड़े स्टार हो सकते हैं पर तब उनके लिये फार्मूले की तरह कथाएं और पटकथाएं इस अंदाज में इकट्ठी की जाती हैं कि जो कम वे आसानी से कर सकते हैं वही फिल्म में रखा जाए| स्टार कठिन भूमिकाएं नहीं निभाया करते, अगर कोशिश करते हैं और उतनी योग्यता नहीं होती तो वे औंधे मुँह गिरते हैं और इसलिए कम से कम हिंदी सिने उधोग को तो बंदी बना कर रखा गया है स्टार सिस्टम में और गाहे बेगाहे ही कोई कायदे का अभिनेता अच्छे किरदार वाली फिल्म पा जाता है, जिसे बनाने का पैसा भी मिल जाता है और फिल्म प्रदर्शित भी हो जाती है| दशरथ मांझी के किरदार पर फिल्म बनी देखना सुखद है और यह दर्शकों को पसंद आ रही है और ऐसा बिरला ही होगा जिसे यह पसंद न आए, इस बात से नई आशा के द्वार भी खुलते हैं कि ऐसी फ़िल्में बन सकती हैं और चल सकती हैं|

नवाजुद्दीन को अभी तक सहायक भूमिकाएं ही मिलती रही हैं (गैंग्स ऑफ वासेपुर भाग दो को छोड़ दें तो) पर मांझी फिल्म से वे सिद्ध रूप में नायक बन गये हैं हिंदी फिल्मों के इतिहास में| किसी भी किरदार के रूप में एकदम ईमानदार अभिनय करने की उनकी योग्यता सराहनीय है| उनके ईमानदार अभिनय की झलक ब्लैक फ्राइडे में ही मिल गई थी, जहां यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि उस फिल्म में बड़ी भूमिकाओं वाले अभिनेताओं से ज्यादा वास्तविक उस छोटी सी भूमिका में उनका अभिनय प्रदर्शन था|

पहाड़ तोड़ने के काम में अनवरत लगे दशरथ को जब मुखिया के बेटे और सरकारी अधिकारी दवारा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी दवारा उसके काम के लिए दिए गये बीस लाख रूपये गबन किये जाने का पता चलता है और दिल्ली के लिए निकल पड़ता है प्रधानमंत्री से मिलने के लिए तो वह यात्रा उसके जीवन के अनुभवों, उसकी न्यूनतम जरूरतों और हर स्थिति में काम चला लेने की योग्यता को दर्शाने की एक बेहतरीन यात्रा बन जाती है| रेलवे का टिकट चैकर जब उसे रेल से उतार फेंकता है तो वह पैदल ही दिल्ली चल देता है| और दिल्ली में लोग उसके साथ उसके पीछे चलने लगते हैं| यह दृश्य Tom Hanks की प्रसिद्द फिल्म Forest Gump की याद दिलाता है जिसमें वह तो अपने आनंद के लिए दौड़ता है बाकी उसके साथ और उसके पीछे दौड़ने लगते हैं यह सोचकर कि वह किसी उद्देश्य के लिए दौड़ रहा है|

बोरी को चोगे के तरह पहन कर पैदल चलता दशरथ न केवल ‘पथ का दावेदार’ लगता है बल्कि सिर पर कागज़ की टोपी पहनने से फ़कीर बादशाह लगता है, जिसका वैभव और सौंदर्य अनूठा है|

दशरथ के चरित्र की इस यात्रा को पूर्ण विश्वास और बेहतरीन कलाकारी के साथ निभाते नवाजुद्दीन को देख ऐसी संभावनाएं दिखाई देती हैं कि वे परदे पर विभिन्न ऐतिहासिक चरित्रों, संन्यासियों के चरित्रों, सड़क पर बसर करने वाले विभिन्न किस्म के रोचक किरदारों को इस कदर जीवंत कर सकते हैं कि इतिहास रच दें|

मिर्च मसाला के बाद इस फिल्म में केतन मेहता फिर से गाँव की ओर गये हैं और फिर से फिल्म पर अपनी पकड़ दिखाई है|

फिल्म के बहाव के साथ राजनीतिक – सामजिक बदलावों को उन्होंने बखूबी तैरा दिया है|

कुछ बातों को छोड़ दिया जाए तो यह फिल्म उनके दवारा रचा गया रोचक प्रयास है|

जिस तरह के आधुनिक हैंडपंप को फिल्म के शुरू में दिखाया गया है वैसे हैंडपंप हद से हद अस्सी के दशक के अंत से भारत में लगने शुरू हुए और उन्हें पचास के दशक के अंत में या साठ के दशक के शुरू में दिखाना चूक है| हो सकता है बजट की सीमा की वजह से ये सब वास्तविकताएं फिल्म में लाने में दिक्कतें थीं और इसलिए जो सुविधा मिल पाई उन्ही से फिल्म बना दी गई| इस जैसी अन्य कमियों को दरकिनार कर दिया जाता तो फिल्म और ज्यादा असरदार और वास्तविकता के और नजदीक लगती|

बिहार के जिस अंचल की यह गाथा है वहाँ की बोली जानने वालों को राधिका आप्टे और नवाजुद्दीन के आंचलिक भाषा बोलने के उच्चारण में दोष दिखाई दे सकता है क्योंकि कई मौकों पर साफ़ प्रतीत हो जाता है कि वे बहुत प्रयास करके इतना आंचलिक असर ला पाए हैं|

फिल्म में सबसे बड़ी खलने वाली बात है फगुनिया (राधिका आप्टे) के चरित्र को प्रस्तुत करने का तरीका| राधिका आपटे की फिल्म में उपस्थिति में अनियमितता है| वे कभी ग्रामीण आँचल की लगती हैं और कभी आधुनिक मेकअप आदि से परिचित अभिनेत्री| विगत कुछ समय में राधिका आप्टे शारीरिक प्रदर्शन को लेकर चर्चा में रही हैं और इस फिल्म में भी उनके शरीर पर कैमरा जरुरत से ज्यादा फोकस करता है| और हालत ऐसी हो जाती है कि दशरथ के कथनानुसार उसका फगुनिया से प्रेम बहुत गहरा है पर फगुनिया के जीवित रहने तक फिल्म स्थापित यही कर पाती है कि यह दैहिक ज्यादा है|

बल्कि फगुनिया के चरित्र के अनायास देहांत के बाद ही जब परदे पर दशरथ का चरित्र अकेला रह जाता है तब नवाजुद्दीन के अपने प्रदर्शन में भी गहराई आ जाती हैं क्योंकि अब सब कुछ उनके कन्धों पर है और उन्हें अकेले ही फिल्म में अभिनय के स्तर को ऊँचा बनाए रखना है|

अकेले पड़ जाने के बावजूद दशरथ का फगुनिया से प्रेम कम नहीं होता और वह हमेशा फगुनिया के अपने साथ होने की ऊष्मा को महसूस करता है जिस तरह से दशरथ ने फगुनिया के देहांत के बाद दर्शाया है कि उसका कितना गहरा और रूहानी रिश्ता फगुनिया के साथ है, वैसा रिश्ता फिल्म तब स्थापित नहीं कर पाती दशरथ और फगुनिया के मध्य जब फगुनिया जीवित थी|

इस कोण को फिल्म कायदे से प्रदर्शित कर पाती तो फिल्म में और गहराई आ जाती|

…[राकेश]

 

 

अगस्त 19, 2015

Khushboo (1975) : रिश्ते में प्रेम, त्याग, इंतजार, दुख और अधिकार की मिली-जुली खुशबू

Khushbuशरत चंद्र चटर्जी की कहानी पर आधारित खुशबू, एक पीरियड फिल्म है और फिल्म देखते हुए इस बात को ध्यान में रखना जरुरी है क्योंकि आधुनिक दौर की परिभाषाएँ ऐसी फिल्मों पर लागू नहीं होतीं और हो नहीं सकतीं क्योंकि वे बीते दौर की कहानियाँ और किरदार दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत कर रही हैं| कहानी चुनने के पश्चात निर्देशक के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती होती है उस कथा को इस असरदार तरीके से दर्शकों के सामने प्रस्तुत करे जिससे फिल्म के सभी तत्व विश्वसनीय लगें| नये जमाने में कथा भले ही विश्वसनीय न लगे क्योंकि समय बदल चुका है लेकिन उस कहानी का प्रस्तुतीकरण विश्वसनीय लगना चाहिए| और अच्छे निर्देशकों की यही खूबी होती है कि उनकी फिल्मों में केवल कहानी ही नहीं बल्कि उसे दिखाने का तरीका कहानी से कहीं ज्यादा प्रभावशाली होता है और दर्शक परदे पर घटित हो रही सामग्री के विजुअल्स में खो कर रह जाता है और तब इस बात के कोई मायने नहीं कि नये जमाने में यह कथा सार्थक रही या नहीं|

बाल-विवाह की प्रथा अब चलन में नहीं है (अपवाद स्वरूप बाल-विवाह कहीं हो जाएँ तो अलग बात है) लेकिन इससे यह बात स्थापित नहीं होती कि अब दर्शक बाल-विवाह पर बनी फिल्मों को रुचिकर नहीं पायेगा| उसकी रूचि निर्भर करती है निर्देशक की कुशलता पर| निर्देशक के पास योग्यता, क्षमता और कल्पना होनी चाहिए जिससे कि वह दर्शक को उस वातावरण में ले जाए जिसकी कहानी उसकी फिल्म दिखा रही है|

गुलज़ार की फिल्म – खुशबू , सफलतापूर्वक उस काल में ले जाती है और परिवेश में दर्शक के ध्यान को रमा देती है जिसमें फिल्म को बुना गया है| गुलज़ार ने फिल्म की नायिका कुसुम (हेमामालिनी) के रूप में एक जबर्दस्त चरित्र गढा जिसे नारीवादी भी सराहना चाहेंगें और परम्परावादी भी|

गुलज़ार की रचनाशीलता (निर्देशन, पटकथा-संवाद-गीत लेखन), राहुलदेव बर्मन का संगीत और कुसुम का सुदृढ़ चरित्र, और मुख्य अभिनेताओं का शानदार अभिनय खुशबू फिल्म के चार मजबूत स्तंभ हैं|

साहित्य पर आधारित खुशबू, एक ऐसी युवती कुसुम के दुख भरे जीवन को दिखाती है जिसकी शादी किशोरावस्था में कदम रखते ही हो गई थी पर जिसका गौना नहीं हो पाया क्योंकि उसके पिता और होने वाले ससुर के मध्य झगडा हो गया और उसके पति के पिता ने रिश्ता तोड़ दिया| समस्या आ खड़ी होती है इस समीकरण से कि कई साल बाद भी कुसुम तो अपने विवाह को सत्य मानती है जबकि उसके कथित पति और उसके घर वाले इस बात को लगभग भुला चुके हैं|

अपनी उपस्थिति वाले पहले ही दृश्य से हेमामालिनी अपनी बेहद प्रभावशाली अदाकारी से दर्शक को चौंकाती चलती हैं| कुसुम के दुख, उसके स्वाभिमान, उसके अहंकार, उसकी जिद, उसकी स्वंय को ही हानि पहुंचाने वाली प्रवृत्ति, उसकी हर स्थिति में जीने की अदम्य इच्छाशक्ति, संघर्ष और वांछित प्रेम को पाने के लिए उसका दृढ़ आत्मविश्वास, उसके व्यक्तित्व के हर पहलू को हेमामालिनी ने बखूबी परदे पर साकार कर दिखाया है| संवाद अदायगी और मौन रह कर कुसुम के भावों को प्रदर्शित करने में हेमामालिनी ने गजब का संतुलन दिखाया है| इस बात को याद किया जाये कि शोले भी उसी समय बन रही थी जब खुशबू तो हेमामालिनी के अभिनय प्रदर्शन की चमक और बढ़ जाती है क्योंकि शोले में उन्हें अनवरत चटर-पटर बोलने वाली ग्रामीण युवती का पात्र निभाना था और यहाँ लगभग खामोश रहने वाली ग्रामीण युवती का|

कुसुम के दुख की बानगी तो सारी फिल्म में कदम कदम पर बिखरी पड़ी हैं| बिना गौने की शादी वाला उसका पति बृन्दावन (जीतेंद्र) कालान्तर में डाक्टर बन गया और उसने एक अन्य युवती लक्ष्मी (शर्मीला टैगोर) से विवाह कर लिया था और उस विवाह से उसका एक बेटा चरण (मास्टर राजू) है| लक्ष्मी का देहांत हो चुका है और बृन्दावन अब अपने बेटे और अपनी माँ (दुर्गा खोटे) के साथ रहता है| कुसुम का भाई कुञ्ज (असरानी), जो गाँव गाँव फेरी लगाकर बच्चों के खिलौने बेचा करता है अक्सर बृन्दावन के गाँव भी जाता है और चरण और उसकी दादी से मिलता रहता है| बृन्दावन तो विवाह करके गृहस्थ हो गया था मगर कुसुम को विश्वास था बृन्दावन से हुए अपने विवाह पर| हालांकि उसने अपने हाथ पर बृन्दावन के नाम का टेटू तो अपने हाथ की त्वचा को जला कर मिटा दिया था पर उसके दिल में बृन्दावन का ही नाम चस्पा था| उसका कोई संपर्क बृन्दावन या उसके घर वालों से नहीं था अपरान्तु उसे अंदर विश्वास था कि कभी न कभी उसका मिलन बृन्दावन से अवश्य ही होगा| वह अपने को विवाहित ही मानती है और जब बृन्दावन की माँ कुञ्ज से कहती है कि कुञ्ज को इतनी बड़ी उम्र की कुंवारी बहन घर में नहीं रखनी चाहिए और कुञ्ज को उसका विवाह कर देना चाहिए तो कुसुम क्रोधित हो जाती है और कुञ्ज से कहती है कि उन्हें शर्म नहीं आई मुझे कुंवारी कहते हुए|

कुसुम की समझ इतनी सीधी नहीं बल्कि जटिल है| बरसों से बृन्दावन से बचपन में हुए विवाह के भरोसे बैठी कुसुम से जब उसकी बचपन की सखी – मन्नो (फरीदा जलाल) उससे पूछती है कि अगर बृन्दावन उसके पास आए उसे ले जाने के लिए तो क्या वह चली जायेगी पति के साथ? तो वह तुनक कर कहती है,

”में क्यों जाऊंगीं? मुझसे प्यार किया होता तो किसी और से शादी क्यों करते शहर जाकर? मैं इतनी भी गयी-गुजरी नहीं हूँ| सुहाग भी लूँ तो भीख में?”

कुसुम के अंदर बृन्दावन से अपने रिश्ते को लेकर एक पूरा संसार बसा हुआ है और जिसे सिर्फ वही समझ पाती है| वह बरसों से झेल रहे दुख को समझौते करके खत्म करने के बारे में सोचने को राजी नहीं| हर आदमी उससे सहानुभूति रखता है पर उसे अपना अधिकार सम्मान के साथ चाहिए| उसकी अपेक्षा और शिकायत बृन्दावन से है और सालों से इस रिश्ते को लेकर दुख झेलने के बावजूद दुख समाप्त करने के लिए उसे अपने स्वाभिमान को दरकिनार करके निर्णय लेने से सख्त परहेज है| कुञ्ज उसे बिना बताए बृन्दावन, उसकी माँ और चरण को घर पर खाने के लिए आमंत्रित कर आता है और खुद कुसुम के भय से सुबह ही घर से गायब हो जाता है क्योंकि उसे लगता है कि कुसुम सब संभाल लेगी और बृन्दावन की माँ कुसुम को अपना लेंगीं|

वे तीनों कुसुम के घर मेहमान बन पहुँच भी जाते हैं और अंजान कुसुम इस बात से परेशानी में आ जाती है कि घर में खाना बनाने के लिए कुछ भी सामग्री नहीं है| वह पूरे अधिकार से बृन्दावन को बाजार से सामान लाने के लिए कह देती है पर उसे यह भी दर्शाना चाहती है कि कुञ्ज की जेब में सब पैसे चले गये|

कुसुम दिन भर बृन्दावन की माँ की खूब सेवा करती है पर उसे ठेस लगती है जब जाते हुए बृन्दावन की माँ उसे सोने के कंगन दे जाती हैं यह कहकर कि ये शगुन के हैं| आजकल के नारीवादी भी कुसुम के दृष्टिकोण पर अचरज प्रकट करेंगे पर वह कुञ्ज को यह कहकर कि मांजी भूल से कंगन यहाँ छोड़ गईं, कंगन वापिस भिजवा देती है और वह यह जानती है कि बृन्दावन की माँ इससे नाराज होंगीं और उससे फिर से रिश्ता जोड़ने की बात भूल जायेंगीं पर उसे अपने स्वाभिमान से समझौता पसंद नहीं| बृन्दावन इस बात को समझता है और अपनी माँ से कहता है कि उन्हें पहले कुसुम से खुलकर रिश्ते की बात करनी चाहिए थी, उसकी सहमति लेनी चाहिए थी, यूँ एकदम से कंगन नहीं देने चाहिए थे|

जिस बात के लिए कुसुम बरसों से इंतजार कर रही थी, वह घड़ी आई थी पर कुसुम ने मौके को ठुकरा दिया|

स्थितियां ऐसे ही बनती बिगड़ती रहती हैं और ऐसी स्थिति आ जाती है जहां कुसुम के दुख से उससे ज्यादा दुखी कुञ्ज अपना धैर्य खो देता है और कुसुम से कहता है,” मैं क्या करूँ… पर तू भी तो नहीं मानती… तोडती भी तो नहीं इस रिश्ते को जो पता नहीं है भी या नहीं| इससे तो अच्छा था तू विधवा हो जाती|” और वह उसकी चूड़ियाँ तोड़ देता है|
कुंठा और गुस्से में वह बृन्दावन के नौकर को कुसुम की टूटी हुयी चूडियों के टुकड़े देकर कहता है कि जाकर बृन्दावन और उसकी माँ से कह देना अब यह रिश्ता टूट गया और बृन्दावन, कुञ्ज और कुसुम के लिए मर गया|

स्तब्ध कुसुम की सारी आशाएं धूमिल होती नज़र आती हैं पर जब सब समाप्त होने लगता है तभी हल्का सा झरोखा खुलता है और आशा के सूरज का हल्का सा प्रकाश अंधकार के असर को कम करता है|

पूरी फिल्म इसी बात पर टिकी है कि क्या कुसुम और बृन्दावन का पुनर्मिलन होगा और होगा तो कैसे क्योंकि जब भी लगता है कि अब बात बन जायेगी तभी कुछ न कुछ समस्या दोनों के रिश्ते पर ग्रहण बन कर छा जाती है|

जब वह घड़ी आ जाती है जब कुसुम को पता है कि अब शायद वह बृन्दावन से कभी मिल नहीं पायेगी, तब कुसुम से रिश्ते के उतार चढ़ाव से परेशान बृन्दावन स्वयं ही कह उठता है –

कुसुम जी चाहता है एक बार फिर तुमसे साथ चलने के लिए कहूँ पर जानता हूँ तुम मना कर दोगी| पता नहीं क्या कमी है मुझमें कि तुम मुझे हर बार ठुकरा देती हो| क्या तुम बता सकती हो क्या कमी है मुझमें?

कुसुम के उत्तर में उसके बृन्दावन से रिश्ते की गाँठ बंधी है –

“हाँ अधिकार की कमी है आपमें| जिस अधिकार से मैं चरण को रोक लेती हूँ, आपको रोक लेती हूँ, उस अधिकार से आप क्यों नहीं ले जाते मुझे| क्यों नहेने अधिकार दिखाकर मेरा अहंकार चूर चूर कर देते| यदि आप अधिकार दिखाते तो मैं भला कौन हूँ जो मना कर पाती|”

अधिकार की पहल न कर पाना बहुत बार रिश्तों में उदासीनता ला देता है क्योंकि दूसरे पक्ष को लगने लगता है कि दूसरे को उसकी परवाह ही नहीं है और कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह उसके साथ है या उससे अलग| कुसुम बृन्दावन जैसी पढ़ी लिखी नहीं है पर वह रिश्ते की मूल बात उसे कह देती है|

फिल्म में भावनाओं के समंदर में रह रह कर ज्वार आता है| वह न काटी जा सकने वाली रात है जिसमें कुसुम और बृन्दावन दोनों आँखों में रात काट रहे हैं| कुसुम को क्षीण सी आशा है कि शायद बृन्दावन उसके पास आकर उससे बात करेगा और बृन्दावन को कुसुम के अनसमझे स्वाभिमान के कारण हिचक है|

फिल्म में बेहतरीन संवादों और दृश्यों का उपयोग किया गया है| कुसुम और चरण के बीच का प्रथम दृश्य बेहद रोचक है जहां कुसुम चरण को मिठाई खिलाती है और उसके पानी मांगने पर उससे कहती है –

पहले मुझे माँ कहो तब पानी दूंगीं|

जिस तरह से इस दृश्य को दृश्यांकित किया गया है ऐसा बहुधा फिल्मों में देखने को मिलता नहीं| ऐसा प्रतीत होता है हेमामालिनी और राजू को दृश्य समझाकर गुलज़ार ने उन दोनों को पूरी छूट दे दी कि वे अपने तरीके से अभिनय कर डालें और उन दोनों ने ऐसा अभिनय उस दृश्य में किया हो मानों वे कैमरे की उपस्थिति से अनभिज्ञ हों और वास्तविक जीवन में एक दूसरे से बात कर रहे हों|

ऐसे ही एक दूसरे दृश्य में चरण कुसुम से पूछता है –

माँ मैं ये खिलौना ले लूँ|

कुसुम कहती है – ले लो बेटा|

उसे तुरंत एहसास हो जाता है कि उसने पहली बार चरण को बेटा कहा है और ऐसा महसूस करके वह स्वयं से ही शर्मा जाती है|

सिंदूर देख कर चरण कुसुम से पूछता है –

यह क्या है?

कुसुम – यह सिंदूर है जब तुम्हारे बाबा मेरी मांग में इसे ऐसे भरेंगे तब मैं उनके साथ जाऊँगी|

चरण – अगर बाबा नहीं लगायेंगें तो तुम नहीं जाओगी?

कुसुम – नहीं

चरण – मैं लगा देता हूँ|

कुसुम – बदमाश मेरे सिंदूर लगायेगा…अपनी बीवी को लगाना|

कुसुम और चरण के साथ के दृश्य बेहद मनोरंजक हैं|

कुञ्ज कुसुम का बड़ा भाई है परन्तु कुसुम उससे व्यवहार करती है जैसे वह उसका छोटा भाई हो| उनके बीच के एक रोचक दृश्य को याद करें|

इस दृश्य में, जो कि न केवल कुसुम के मन में उसके बृन्दावन से रिश्ते की थाह देता है बल्कि उसके स्वाभिमान को भी दर्शाता है, कुञ्ज घर वापिस आकर कुसुम को बताता है कि आज बादल गाँव में उसकी मुलाक़ात चरण से और बृन्दावन की माँ से हुयी| और वह उसे बृन्दावन की माँ से हुयी सारी बातचीत बता है|

कुसुम गुस्से में बृन्दावन को डांटते हुए कहती है  –

उन्हें शर्म नहीं आई मुझे कुंवारी कहते हुए और तुम भी चुपचाप सुनते रहे|

कुञ्ज – पर वो तो यही मानते हैं ना कि जब गौना नहीं हुआ तो शादी पूरी कहाँ हुयी|

कुसुम – उन्होंने कह दिया और तुमने माँ लिया| क्या माँ भी ऐसा ही मानती थी| अगर मानती तो मुझे क्यों लेकर जाती उनके घर?

कुञ्ज दबे स्वर में – नहीं माँ तो नहीं मानती थी पर…

कुसुम बिफर कर – तुम क्यों गये उनके घर? क्या तुम्हे याद नहीं कैसे उन लोगों ने मुझे और माँ को घर से निकाल दिया था?

कुञ्ज समझाने के अंदाज में – कुसुम, अगर पुरानी बातों को कुरेदेंगें तो सुलह कैसे होगी?

कुसुम – सुलह! तुमसे किसने कहा था सुलह करने को?

कुञ्ज – मैं तो तेरी खातिर गया था, वरना मुझे क्या पड़ी है कि मैं उनके घर जौन|

कुसुम – तुम्हे मेरी फ़िक्र करने की जरुरत नहीं है|

कुञ्ज – तेरी समझ में तो कुछ आता है नहीं|

कुसुम – मुझे समझने की जरुरत नहीं है, और तुम्हारी जो समझ बूझ है मैं वो अच्छी तरह जानती हूँ| जिसके घर दूध मिल गया पीने को उसी की मूंछे लगा लीं|

कुञ्ज – पर…

कुसुम – रहने दो भईया लाओं गिलास दो

कुञ्ज – पर मैं तो तेरी भलाई के लिए ही…. और मैं उम्र में तुझसे बड़ा हूँ, तुझे मेरी बात सुननी चाहिए|

कुसुम – तुम रहने दो भईया| लाओं गिलास दो और हाथ धो लो|

कुञ्ज हार मानते हुए – धो लेते हैं भाई

कुसुम – और कल से बादल गाँव जानी की जरुरत नहीं है| एक बादल गाँव में सामान ना बेचने से हम भूखे नहीं मर जायेंगें|

कुसुम और बृन्दावन के बीच के सारे दृश्य भी बेहद रोचक हैं| पर एक दृश्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो इस बात को बताता है कि कैसे कुसुम के पास बृन्दावन के बारे में बातें छान कर पहुँचती रहे एहेन और उन्ही के बूते उसने बृन्दावन के प्रति विचार बना रखे हैं, जिनमें शिकायतें भी हैं|

जब बृन्दावन के सामने स्पष्ट सा ही है कि अब उसकी माँ कुसुम को स्वीकार नहीं करेगी क्योंकि कुसुम ने कंगन लौटा कर उसकी माँ का अपमान किया है तो वह कुसुम के गाँव में उसके सामने से बिना कुछ कहे ही गुजरता जाता है, वह इस न हो सकने वाले रिश्ते में आहुति डाल इसकी ज्वाला को प्रज्ज्वलित करके कुसुम की परेशानियां और नहीं बढ़ाना चाहता पर कुसुम तो और ही कुछ सोचती है| चरण भी कुसुम को देख उसकी ओर भाग जाता है| और कुसुम अपनी सखी मन्नो से कहलवा देती है कि बृन्दावन चरण को कुसुम के पास छोड़ जाए और शाम को लौटते हुए लेता जाए|

बृन्दावन जब कुसुम के घर पहुंचता है चरण को लेने तो कुसुम कहती है |

कुसुम – अंदर आ कर बैठ जाओ, चार लोग देखेंगें बाहर खड़े हुए|

बृन्दावन – चार लोग अंदर जाते हुए नहीं देखेंगें?

कुसुम – मैं दरवाजे पर खड़ी रहकर तुमसे बहस नहीं कर सकती| अंदर आकर बैठ जाओ|

बृन्दावन अंदर जाकर – कुसुम, तुम चरण को रोज रोज की आदत मत डालो| परेशानी होगी|

कुसुम – परेशानी होगी तो मेरे पास ले आना|

बृन्दावन – वो तुम्हे माँ बुलाने लगा है, बाद में पूछेगा तो क्या समझाउंगा|

कुसुम कुछ शिकायत भरे लहजे में – तो माँ ला देना उसके लिए| कोई मैं अकेली तो हूँ नहीं जिसे वो माँ बुलाता है|

बृन्दावन उत्सुकता से- और कौन है जिसे चरण माँ कहकर बुलाता है|

कुसुम- वो हैं ना बादल गाँव में, काली

बृन्दावन ठहाका लगा कर हंसता है और कहता है – काली हमारे महाराज की बेटी है और चरण की दोस्त है|

कुसुम खिसियाये स्वर में – मैं क्या जानूं| चरण कह रहा था|

बृन्दावन गंभीर स्वर में – विश्वास भी कोई चीज होती है कुसुम|

कुसुम शिकायती लहजे में- हाँ ये विश्वास ही तो था जो शहर जाकर शादी कर ली|

बृन्दावन उसे शहर में लक्ष्मी से शादी करने वाली सारी परिस्थितियों को उसे बताता है और कुसुम संतुष्ट हो जाती है|

कुसुम – चरण को यहीं छोड़ दो आज रात के लिए| मैं अकेली हूँ और चरण सो भी रहा है| कल तुम लेने आ जाना मैं चरण का हाथ पकड़ कर आ जाऊंगीं|

बृन्दावन के यह कहने पर कि कुसुम ने कंगन लौटा कर अच्छा नहीं किया, उससे माँ का अपमान हुआ| कुसुम बिफर कर कहती है – और मेरी जो बेइज्जती हुयी वो कुछ नहीं? तुम अगर मेरी बेइज्जती न करो तो मुझे मांजी के सामने छोटा होने में कोई शर्म नहीं|

बृन्दावन मुस्करा कर अपने इमान को समझाने की बात कह कर चला जाता है, कुसुम को प्रसन्न और आशा में डूबा छोड़ कर| उस वक्त दोनों को ही नहीं पता कि अभी तुषारापात होने बाकी हैं उनकी आशाओं पर|

कुसुम ने अकेलेपन में इतनी मानसिक कठिनाइयां झेली हैं कि एक तरह से वह बेहद कठोर भी हो चुकी है और कोई भी परिस्थिति उसे जीवन लीला समाप्त करने की ओर नहीं ढकेल पाती|

उसके गाँव की एक धनी बुजुर्ग महिला एके यह कहने पर कि अब तो बृन्दावन की माँ उसके लिए दूसरी पत्नी लेने गई है अब बृन्दावन कुसुम को अपना नहीं पायेगा तो वह किसके सहारे जियेगी?

कुसुम दुख से भर कर लेकिन दृढ़ स्वर में कहती है – क्यों विधवाएं नहीं जीतीं क्या?

वह ठसके में ऐसा कह तो जाती है लेकिन तुरंत ही ऐसा कहने का अर्थ भी समझ जाती है और बृन्दावन के लंबे जीवन के लिए प्रार्थना करने लगती है|

दुख से भरी कुसुम के जीवन में सुख का पड़ाव आता है जब उलझनें सुलझ जाती हैं और चरण के कहने पर बृन्दावन कुसुम की मांग में सिंदूर भर देता है|

इस दृश्य को देख रोग शैया पर पड़ा कुञ्ज भी कमरे से बाहर निकल कर कुसुम को बढ़ावा देता है-

आज पीछे मुड कर मत देखना बहन…जा अपने पति के साथ जा, पराया कर दे इस घर को आज|

कुसुम बिना पीछे मुड़े घर की चाबियाँ पीछे फेंक देती है और मन्नो की शादी के अवसर पर कही पंक्तियाँ दुहराती है –

ये तेरा घर था बाबुल, जो भी खाया पिया सब चुका कर जा रही हूँ| इस घर का कोई कर्ज मुझ पर अब नहीं है, मैं इस घर के लिए आज से पराई हो गयी|

फिल्म कुञ्ज के साथ ही शुरू होती है और अंत भी घर के दरवाजे पर अकेले खड़े कुञ्ज पर फोकस होकर समाप्त होती है| सालों से दुख झेलती आ रही छोटी बहन के जीवन में खुशियों की बहार आने के मौके से खुश और संतोष पाकर बड़ा भाई घर में अकेला खड़ा है|

कुसुम, चरण और बृन्दावन को ले जा रही गाड़ी को खींच रहे दोनों बैल भी प्रसन्नता में उछलते कूदते भागते हैं|

गुलज़ार ने एक भावुक कहानी में दुख को इस तरह से भांजा है कि फिल्म दर्शक के दिल को अंदर तक छू जाती है और दुखद प्रसंगों से भरी इस कथा में भी उन्होंने जीवन के अन्य रसों का भरपूर समावेश किया है और छोटे छोटे गुदगुदाने वाले प्रसंग दर्शक के साथ चुहलाबाजी करते जाते हैं कभी चरण के माध्यम से और कभी मन्नो के माध्यम से और कभी कुसुम और बृन्दावन की उन्मुक्त हँसी से ही प्रसन्नता विकरित हो जाती है|

गुलज़ार ने ऐसे गीत रचे हैं जो मुख्यतः कुसुम की ज़िंदगी से जुड़ाव रखते हुए उसके जीवन के प्रसंगों को गति देते हैं|

प्रसन्नता के क्षणों में मन्नो गाती है –

बेचारा दिल क्या करे सावन जले भादों जले

दो पल की राह नहीं एक पल रुके एक पल चले

गाँव गाँव में घूमे रे जोगी, रोगी चंगे करे

मेरे ही मन का ताप न जाने हाथ न धरे

तेरे वास्ते लाखों रास्ते तू जहां भी चले

मेरे लिए हैं तेरी ही राहें तू जो साथ चले

मन्नो कुसुम और बृन्दावन के रिश्ते और उनके विकल्पों को ही इस गीत में गा रही है| बृन्दावन की रहें एक कुसुम पर ही आकर नहीं रुकतीं जबकि कुसुम की एक हे राह है और वह भी बृन्दावन तक ही पहुँचती है|

एक अन्य गीत – ओ मांझी रे में गुलज़ार ने ऐसा दृश्य गीत में पिरोया है जिसे देखा तो लगभग सभी ने होगा पर इस तरह से कभी उसका रूपक के रूप में इस्तेमाल सोचा नहीं होगा|

पानियों में बह रहे हैं, कई किनारे टूटे हुए

रास्तों में मिल गये हैं सभी सहारे छूते हुए

कोई सहारा मझधार मिले जो अपना सहारा है

इस फिल्म का हर गीत रत्न सरीखा है पर दो नैनों में आंसू भरे हैं (पूरी पोस्ट यहाँ पढ़ें) तो कमाल गीत बन पड़ा है| फिल्म की परिस्थितियों से मेल खाने की बात हो या गायिकी और वाद्य यंत्रों के संयोजन की, यह गीत अदभुत है| कुसुम के भावों का सटीक चित्रण यह गीत करता है|

एक तरह से खुशबू फिल्म का सारांश या निचोड़ है यह गीत!

अभिनय के हिसाब से यह हेमामालिनी की फिल्म है|

जीतेंद्र की जम्पिंग जैक इमेज से एकदम अलग रूप में प्रस्तुत करके गुलज़ार ने उनसे काबिले तारीफ़ अभिनय करवाया| जीतेंद्र का गेट-अप फिल्म में एक तरह से वास्तविक जीवन के गुलज़ार से ही लिया गया है| जीतेंद्र के पास बहुत संवाद नहीं हैं फिल्म में और उन्होंने गुलज़ार के निर्देशन में मौन रहकर भावों का सम्प्रेषण कर पाने में भरपूर सफलता प्राप्त की|

मास्टर राजू, फरीदा जलाल, असरानी, दुर्गा खोटे और संक्षिप्त सी अतिथि भूमिका में शर्मिला टैगोर सभी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराते हैं|

शर्मिला टैगोर वाले भाग को बाद में गुलज़ार ने नमकीन ((पूरी पोस्ट) फिल्म में पूर्ण विस्तार दिया|

 …[राकेश]

अगस्त 17, 2015

भारत कुमार – गांधी + भगत सिंह के संगम से उपजाया मनोज कुमार ने यह विलक्षण सिनेमाई चरित्र

BharatKumarकुछ बातें होती हैं जो जीवन की दिशा बदल देती हैं| अभिनेता मनोज कुमार के सिनेमाई जीवन में भगत सिंह के जीवन पर फिल्म बनाने का अवसर आया और उस एक घटना ने उनके सिनेमाई जीवन की दिशा ही बदल कर रख दी| शहीद से पहले एक अभिनेता के रूप में मनोज कुमार को दिलीप कुमार के अभिनय के साये को ओढकर अभिनय करने वाला अभिनेता माना जाता था और आज तक भी मनोज कुमार को इस बात से कभी परेशानी नहीं हुयी| लेकिन शहीद में मनोज कुमार के अभिनेता का मौलिक रूप उभर कर सामने आया| न केवल उनकी शहीद, भगत सिंह के जीवन पर बनी तमाम फिल्मों में श्रेष्ठ है बल्कि मनोज का भगत सिंह के रूप में किया गया अभिनय भी उनके अभिनय जीवन का श्रेष्ठतम प्रदर्शन है| भगत सिंह तो उस अल्पायु में ही देश की स्वतंत्रता के लिए शहीद हो गये जिस उम्र में लगातार पढ़ने वाले विधार्थी अपनी शिक्षा भी समाप्त नहीं कर पाते| साठ के दशक में करोड़ो ऐसे भारतीय होंगे जिन्होने भगत सिंह की सिर्फ तस्वीरें इधर उधर छपी देखी होंगी| मनोज कुमार ने मानो भगत सिंह को शहीद के माध्यम से पूरे देश के सामने सजीव खड़ा कर दिया|

 

शहीद की सफलता और उनके अभिनय को मिली प्रशंसा ने उनके सामने रचनात्मकता के नये द्वार खोल दिए और उन्होंने ‘उपकार’ का लुभावना संसार सिनेमा के परदे पर रच डाला|

 

पर ‘उपकार’ से पूर्व उस वक्त के हिन्दुस्तान के हालात का जिक्र जरूरी है|

 

1960 के दशक का जिक्र करें तो शुरआती दौर में ही सन बासठ में चीन ने भारत के साथ धोखा करके इस अहिंसक देश पर आक्रमण किया और चीन से लड़ने के लिए सैन्य रूप से और मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार न होने के कारण भारत को एक न भूल सकने वाला घाव मिला जो उस वक्त से आज तक टीसता रहता है| सन पैंसठ में पकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया और सन इकहत्तर में फिर से भारत और पकिस्तान के मध्य बंगलादेश के मुददे पर युद्ध छिड़ा| बासठ के चीन आक्रमण से देश अभी उबार भी न पाया था कि देश के पहले प्रधानमंत्री और उस वक्त के सबसे बड़े और सबसे लोकप्रिय नेता प. जवाहर लाल नेहरु का निधन हो गया| ये सब बातें भारत के लिए बहुत बड़े झटकों का सबब थीं| लोग पूछने लगे थे कि नेहरु के बाद कैसे भारत चलेगा?

 

भाषाई सवाल पर राज्यों के बंटवारे हो रहे थे| लोग तरह के तरह के झगडों में व्यस्त थे और खासकर शातिर क्षेत्रीय नेता अपने हितों की खातिर अलगाववाद को बढ़ावा देकर अपनी अपनी राजनीतिक दुकानें चलाने में व्यस्त थे| वे भारत को एक अखंड ईकाई न मानकर इसे विभिन्न टुकड़ों में बाँट कर उसे इन टुकड़ों का संघ बनाने पर आमादा थे|

 

ब्रेन-ड्रेन की शुरुआत ने भारत को एक बड़ा झटका दिया था, पचास के दशक के शुरू से ही भारत शिक्षा और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बहुत सा धन निवेश कर रहा थ और विज्ञान, इंजीनियरिंग, मेडिकल, और अर्थ शास्त्र आदि के बहुत सारे विधार्थी उच्च शिक्षा की खातिर अमेरिका और अन्य पश्चिम देशों में जा रहे थे| पर इनमें से बहुत ही कम वापिस भारत आते थे और अधिकतर पश्चिम देशों में ही बस जाने में व्यस्त थे| (पूरब और पश्चिम का भारत कुमार लन्दन से उच्च शिक्षा प्राप्त करके वापिस भारत आकर देश की सेवा करना चाहता है)

खाद्यान्न की कमी के संकट से लड़ते भारत को अमेरिका ने दोयम दर्जे का भीगा हुआ गेहूं भेज कर एक तरह से भारत का विपत्ति में मजाक बनाया था|

 

सैन्य और खाद्यान्न संकट के दौर में उस वक्त के भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने वक्त्त की जरुरत को समझते हुए ‘जय जवान जय किसान’ का जोशीला नारा गढा था|

 

शहीद देखने के बाद फिल्म से प्रभावित होकर शास्त्री जी ने मनोज कुमार से कहा था कि क्या वे ऐसी कोई फिल्म नहीं बना सकते जो उनके नारे ‘ जय जवान जय किसान’ की मूल आत्मा से प्रेरित हो?

 

फिल्म शहीद (जिसका निर्देशन उन्होंने स्वंय किया था लेकिन निर्देशक के रूप में नाम एस.आर. शर्मा का दिया गया) बनाने के बाद मनोज कुमार रचनात्मक ऊर्जा से लबरेज थे| वे अच्छा लिखते थे और अपनी कई फिल्मों जहां वे बतौर एक अभिनेता काम करते रहे थे, उनकी ओर से उनकी कई ऐसी फिल्मों में रचनात्मक योगदान रहा करता था खासकर लेखन के क्षेत्र में, अक्सर अपने संवाद वे खुद ही लिखते थे या जरुरत के अनुसार शोधित करते थे|

 

शहीद के बाद मनोज कुमार स्वयं भी घोषित रूप से निर्देशन के क्षेत्र में उतरने के लिए लालायित थे और शास्त्री जी की इच्छा ने उन्हें और ज्यादा प्रेरित किया और वे एक ऐसी कथा की कल्पना करने में जी जान से जुट गये जो देश के किसानों और सैनिकों के जीवन को कायदे से परदे पर दिखा सके और देश के युवाओं को प्रेरित कर सके|

 

समकालीन विषयों पर एक विश्वसनीय फीचर फिल्म बनाना एक कठिन कार्य है क्योंकि बहुधा तो ऐसी फ़िल्में या तो डॉक्यूमेंट्री की प्रवृत्ति की बन जाती हैं या बेहद डल किस्म की फ़िल्में बन कर उभर पाती हैं| और यहीं मनोज कुमार की बहुविध प्रतिभा ने उनका साथ दिया और वे ‘उपकार’ जैसी सशक्त फिल्म बना पाए जो आज तक लोगों को प्रेरित ही नहीं करती बल्कि उनका मनोरंजन भी करती है और किसानों और सैनिकों के बारे में गंभीरता से सोचने और सम्मान की दृष्टि से देखने के लिए दर्शक को प्रेरित ही नहीं बल्कि विवश भी करती है|

 

हरेक रचनात्मक व्यक्ति में एक विशेष महत्व की बात होती है और इस विशेषता से प्रभावित हो सकने वाले क्षेत्रों में वह कुछ खास चमकदार कर दिखाता है| देशभक्ति से ओतप्रोत कथानक वाले क्षेत्र ऐसे थे जहां मनोज कुमार को ज्यादा चमकना था और जहां वे अन्य क्षेत्रों से ज्यादा अच्छा काम करके दिखा सकते थे और यही उन्होंने कर दिखाया, पहले ‘उपकार’ और उसके बाद ‘पूरब और पश्चिम’ जैसी दो उत्कृष्ट फ़िल्में बना कर, जो हमेशा भारतीय सिनेमा के इतिहास में सजीव रहने वाली फ़िल्में हैं|

 

उपकार’ के माध्यम से मनोज कुमार ने ‘भारत कुमार’ नामक एक विशुद्ध भारतीय चरित्र की रचना की, जो कि देशभक्त्त है जिसे अपने देश और उसकी सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक और नैतिक विरासत पर गर्व है|

भगत सिंह ने कहा था –

 

“मैँ मानव हूँ और वह सब जो मानवता को प्रभावित करे उससे मेरा सरोकार है।”

 

और

 

“मैँ महत्वाकांक्षा, आशा तथा जीवन के आर्कषण से ओत – प्रोत हूँ। परन्तू आवश्यकता पड़ने पर मैँ इन सबको त्याग सकता हूँ।”

महात्मा गांधी ने जून, 1921 में ‘यंग इंडिया’ में लिखा था-

‘‘मैं नहीं चाहता कि मेरा मकान चारों ओर दीवारों से घिरा हो और मेरी खिड़कियाँ बंद हों। मैं तो चाहता हूँ कि सभी देशों की संस्कृतियों की हवाएँ मेरे घर में जितनी भी आजादी से बह सकें, बहें। लेकिन मैं यह नहीं चाहता कि उनमें से कोई हवा मुझे मेरी जड़ों से ही उखाड़ दे।’’

 

भगत सिंह के विशाल मानवीय सरोकार और गांधी की यह सचेत मुक्तता, और दोनों की ही मानवता के हित के लिए स्वंय के जीवन को भी बलिदान देने का विकट साहस यही सब श्रेष्ठ प्रवृत्तियां ही ‘भारत कुमार’ के चरित्र को रीढ़ प्रदान करती हैं|

 

भारत कुमार को अपने देश से प्रेम है पर वह अंधी देशभक्ति का कायल नहीं वरन वह उदार है और तरह की कट्टरपंथी का विरोधी है| भारत कुमार अपने देश – भारत वर्ष, जैसा ही है; – अपने में प्रसन्न, संतोषी, जो कि दुनिया में जहां कुछ भी अच्छा है उसके प्रति उत्सुक है और न केवल उसका स्वागत करता है बल्कि वह दुनिया में कहीं भी रह रहे लोगों के प्रति भी उदारतापूर्ण और खुला व्यवहार रखता है|

 

मानवता और भारत वर्ष का इतिहास कहीं भी यह संकेत नहीं करता कि एक देश के रूप में कभी भी भारत ने अपने सीमाओं से बाहर बसे किसी अन्य देश पर आक्रमण किया हो और उसकी स्वतंत्रता को बंदी बनाना चाहा हो| विचार और व्यवहार रखता है|

 

भारत कुमार भी इसी रुख को अपनाता है| उसे अपने देश, इसकी सांस्कृतिक और अध्यात्मिक विरासत से प्रेम है लेकिन वह विश्व में अन्यत्र जहां कहीं भी अच्छा है या घटित हो रहा है, उसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा करता है और अगर वह भारतीय जीवन शैली से मेल खाता है तो उसे अपनाने में उसे कोई हर्ज नहीं दिखाई देता|

 

भारत कुमार का दृष्टिकोण न तो तालिबानी है और न ही बंद दिमाग वाले कट्टर हिंदुत्व के कीटाणुओं से ग्रसित लोगों जैसा न ही किसी भी सम्प्रदाय के कट्टर लोगों जैसा| वह एक उदार और आत्मविश्वास से लबरेज भारतीय है जो सम्प्रदाय से हिंदू है, क्योंकि उसका जन्म भारत में हिंदू सम्प्रदाय में हुआ है, और वह किसी भी अन्य सम्प्रदाय और देश के खिलाफ नहीं है| वह किसी भी व्यक्ति के सम्प्रदाय को या उसकी धार्मिक/सम्प्रदायिक पहचान को बदलने में उत्सुकता नहीं रखता| उसे अपने देश से प्रेम है परन्तु इस कारण से वह अन्य किसी भी देश को नापसंद नहीं करता| उसका देश प्रेम एक स्वतंत्र बात है, जिसका अन्य देशों से कोई संबंध नहीं है| उसका देशप्रेम प्रतिक्रियात्मक नहीं है| न तो वह आक्रमणकारी है और न ही मिशनरी दृष्टिकोण में ही उसका विश्वास है| वह अपने देश की रक्षा और अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए हथियार उठा सकता है पर अपने आप किसी पर उसे हानि पहुंचाने के लिए वार नहीं कर सकता|

 

भारत कुमार उस दौर की जरुरत था| सन साठ के दशक को हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग भी कहा जाता है| जब देश चौतरफा मुसीबतों से घिरा था तब हिंदी सिने उधोग ने एक से बढ़कर एक मधुर संगीत से भरी बेहद मनोरंजक फ़िल्में बनाईं| बल्कि पचास के दशक में देश की वास्तविक समस्यायें फिल्मों के कथानकों का हिस्सा हुआ करती थीं पर साठ के दशक में ज्यादातर फ़िल्में मनोरंजन तत्व को महत्व देने लगीं| रोमांटिक कामेडी फ़िल्में इसी दौर में सबसे ज्यादा बनीं| राजेन्द्र कुमार और शम्मी कपूर इस दशक के सफल सितारे रहे और उनकी फ़िल्में हालांकि बेहद सफल रहीं पर वे ज्यादातर हल्की फुल्की फ़िल्में हैं|

 

ऐसे दौर में एक ऐसे किरदार को गढना, जिसके सरोकार देश हित के, देश को एकता के सूत्र में पिरोने वाले और गरीबों की बात करने वाले, और उच्च मानवीय एवं नैतिक मूल्यों का पालन करने वाले हों, एक जोखिम भरा काम था पर मनोज कुमार की कल्पना ने ऐसा एक चरित्र रच दिया जिसने लोगों के ध्यान को भरकस अपनी ओर खींचा और आज तक भारत कुमार के चरित्र से सजी शुरुआती फ़िल्में लोगों को लुभाती हैं|

 

उस दौर के देश और सिनेमा की जरुरत के मुताबिक़, कलम और कल्पना के धनी मनोज कुमार ने सफलतापूर्वक भारत कुमार का चरित्र गढा| शायद यह काम मनोज कुमार के हाथों ही होना था| भगत सिंह में उनकी गहरे रूचि थी और साथ ही अन्य स्वतंत्रता सेनानियों में भी| मनोज कुमार अच्छा लिखते थे और बड़े अच्छे दृश्य गढ़ने में माहिर थे| बाद में उनकी इस विशेषता का उपयोग राज कपूर ने भी अपनी फिल्म – मेरा नाम जोकर, में किया और सत्यम शिवम सुन्दरम में उनकी सलाह ली| मेरा नाम जोकर में अपने चरित्र के संवाद मनोज कुमार ने स्वंय लिखे|

 

मनोज कुमार के पास गीतों के फिल्मांकन की एक विशेष दृष्टि थी| वे स्क्रीन प्ले में नाटकीय तत्वों का समावेश करने में भी माहिर थे| और सबसे बढ़कर उनके पास यह कला थी कि एक निर्देशक के रूप में वे देश के करोड़ों लोगों की जरुरत को समझ कर ऐसी बातें अपनी फिल्मों में डालें जो सम्पूर्ण देश में दर्शकों के मन को लुभा सके और सबको एक सूत्र में बांध सके|

पूरब और पश्चिम में दुल्हन चली पहन चली गीत को याद करें| भाषा के सवाल पर झगड़ रहे दर्शकों की भीड़ में पहले गीत एक माहौल तैयार करता है और जब गीत सबको अंदर तक छू गया है तब स्टेज से डफली दर्शकों की ओर उछलती है और जो पहले भाषा के सवाल पर दंगा फसाद कर रहे थे, उसे लपक कर गीत की धुन में राम कर नाचने लगते हैं| छोटी सी बात है पर इसे गीत का हिस्सा बनाना आज तक दर्शक को अंदर तक रोमांचित कर जाता है|

 

कहते हैं कि एक भारतीय को भारत से बाहर ले जाया सकता है पर उसकी भारतीयता को उसके अंदर से निकालना मुश्किल है| भारत कुमार ऐसे ही भारतीयों के लिए गढा गया चरित्र है जो विश्व में कहीं भी दूसरे देश में रह रहे हों पर जिनके अंदर भारत बसता है, भारत से एक अंदुरनी संबंध जीवित रहता है| भारत कुमार के चरित्र पर टिकी दो फ़िल्में ‘उपकार’ और ‘पूरब और पश्चिम’ हमेशा ऐसे भारतीयों के लिए सार्थक रहेंगीं|

 

वर्तमान में भारत धनी राष्ट्र नहीं है और इसे गरीब या हद से हद विकासशील देश कहा जा सकता है, ये और बात है कि यहाँ भी दुनिया के धनकुबेरों से टक्कर लेने वाले बड़े बड़े धन्ना सेठ बसते हैं पर आबादी के औसत के हिसाब से भारत एक गरीब देश ही है लेकिन इस गरीबी को सिर्फ आर्थिक क्षेत्र और संसाधनों के मामले तक ही सीमित रखना अहोगा क्योंकि बहुत मामलों में भारत सदियों से धनी रहा है| भारत दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक का मेजबान देश रहा है और इसकी अपनी एक सांस्कृतिक विरासत रही है| जहां पश्चिम कानूनी रूप से सोच विचार करता है और उनका पूरा समाज उसी ढर्रे से बंधा हुआ है, भारत की दृष्टि नैतिकता को धुरी बना कर इधर उधर विचरण करती है और नैतिकता एक व्यक्तिगत बात है क्योंकि यह कहना कतई ठीक होगा कि यह समाज बड़ा नैतिक है क्योंकि अपवाद हर जगह उपस्थित होते हैं|

 

जब भारत धन-धान्य से भरपूर और एक उन्नत सभ्यता को विकसित कर सकने वाला देश था तो यहाँ के ऋषि मुनि ऐसे सिद्धांत गढ़ने में अपनी वैचारिक शक्ति खर्च करते थे जो कि सम्पूर्ण मानवता के हित में थे और उनका सोच विचार ऐसा नहीं था जैसा कि वर्तमान के पश्चिम का है कि हर शोध पर पेटेंट ले लो और बाकी सबसे इसके इस्तेमाल का मूल्य वसूलो|

 

आज जब अमेरिका आदि देश विकास के सिरमौर देश हैं तो विकास केवल कुछ चुने हुए लोगों तक सीमित रह गया है और यह शोध का विषय हो सकता है कि भारत के बहुत से लोग और नेतागण अमेरिकी तौर-तरीकों का अंधा अनुसरण करने में फख्र महसूस करते हैं|

 

एक अमेरिकी व्यक्ति उतना ही अच्छा हो सकता है जितना कि एक भारतीय पर मौटे तौर पर देखा यही जायेगा कि उसका देश दुनिया में क्या फैला रहा है|

इसी तरह व्यक्तिगत स्तर पर एक चीनी आदमी बेहतरीन हो सकता है पर भारत चीन को एकल व्यक्ति के आधार पर नहीं तौलेगा बल्कि यह देखना होगा कि चीन भारत के साथ कैसा व्यवहार कर रहा है और यह कसौटी सभी अन्य उन देशों के लिए भी सच है जो किसी अन्य देश को परेशान कर रहे हैं|

कोई व्यक्ति एक कम्यूनिस्ट व्यक्ति का मित्र हो सकता है लेकिन वह व्यक्ति कम्युनिज्म के साम्राज्यवाद से प्रेरित विस्तारवादी रवैये को तो नजरअंदाज कर नहीं सकता|

जब व्यक्ति ऐसे देशों से भक्ति रख सकते है जिन्होने साम्राज्यवादी विचारधारा का पालन करते हुए दूसरे देशों पर आक्रमण करके वहाँ के अब तक स्वतंत्र रह रहे निवासियों को दास बनाया और अपने देश की भलाई के बारे में मुखर होकर सोच सकते हैं, बात कर सकते हैं, काम कर सकते हैं, और जब व्यक्ति ऐसे वादों के अंध भक्त हो सकते हाँ जिन्होने अंततः मानवता को हानि ही पहुंचाई तब भारत जैसे अहिंसक देश का निवासी देशभक्त बने तो इससे किसी को क्या हानि पहुँच सकती है?

 

भारत ने तो हमेशा ही आत्मालोचन की परम्परा का अनुसरण किया है लेकिन भारत में ब्रितानी हुकूमत के दौर में इस स्व:आलोचना का स्वरूप बदल गया और इसमें से अध्यात्मिक तत्व निकल गये और यह अपने स्वरूप में निपट भौतिक हो गया और यह आत्मघाती होकर यहाँ के निवासियों का नुकसान करने लगा क्योंकि लोगों की सापेक्ष देख पाने की क्षमता नष्ट हो गई या कर दी गई और स्वयं की अति-आलोचना से वे आत्मविश्वास खो बैठे|

प्राचीन भारत की श्रेष्ठ बातों पर गौरव महसूस करने से आज के भारत का कोई भला नहीं होने वाला लेकिन जो इस देश में श्रेष्ठ घटा है उसकी विरासत को सिरे से भूल जाना भी मूर्खता है|

 

उपकार’ और ‘पूरब और पश्चिम’ ने आत्म-विश्वास के पुनरुत्थान की लौ जलाने के काम में फिल्म उधोग की ओर से योगदान दिया| अमेरिका दवारा भेजे गये दोयम दर्जे के गेहूं के अपमान से पीड़ित देश ने जल्द ही हरित क्रान्ति को संभव कर दिखाया और ऐसे बड़े सपनों को पूरा करने में लगे उधमी लोगों के लिए ‘उपकार’ और ‘पूरब और पश्चिम’ जैसी फिल्मों ने प्रेरक तत्व होने की भूमिका तो निभाई ही होगी| इन फिल्मों को देखकर किसी का विश्वास भारत और भारतीयता से विमुख हुआ हो ऐसा तो संभव है ही नहीं|

 

दोनों ही फिल्मों की मूल आत्मा स्व: में विश्वास रखने की है| दोनों ही पश्चिम के खिलाफ नहीं हैं परन्तु भारतीयों दवारा पश्चिम की गलत परम्पराओं के दोनों फ़िल्में विशुद्ध रूप से भारतीयों के लिए हैं| भारतीयों के सरोकारों के लिये निर्मित करना और पश्चिम के विरोध के लिए रचना, दोनों बहुत अलग बातें हैं|

अंधे अनुसरण करने की प्रवृत्ति की ओर इशारा जरुर करती हैं| दोनों ही फिल्मों में भारतीयों को आत्म – विश्लेषण की यात्रा पर भेजने की सामग्री की बहुतायत थी| और आज भी दोनों फ़िल्में इस एक लक्ष्य में पूर्णतया सफल रहती हैं|

 

और दोनों फिल्मों के लक्ष्यों की मशाल लेकर चलता है भारत कुमार का चरित्र| भारत का भारत वर्ष के गुणों और नैतिक मूल्यों में अटूट विश्वास है और इसी अटूट विश्वास के बलबूते ‘पूरब और पश्चिम’ में अपनी प्रेयसी प्रीति (सायरा बानू), जो कि बचपन से लन्दन में पली बढ़ी है और अपने आचार व्यवहार और सोच विचार में पूरी तरह से ब्रितानी है, की माँ के यह कहने पर कि अगर भारत को प्रीति से विवाह करना है तो उसे लन्दन में बसाना होगा, वही कहता है कि वह इंग्लैंड में उच्च शिक्षा के लिए आया था, और शिक्षा प्राप्त करके उसे वापिस हिन्दुस्तान जाना होगा| बात बढते बढते इस मुकाम पर पहुँच जाती है जहां भारत के प्रेम को कसौटी पर रखा जाता है और वह कहता है कि वह विवाह के पश्चात लन्दन आकर रहने को तैयार है लेकिन उसकी शर्त है कि विवाह भारत में हो और प्रीति एवं अन्य सब उसके साथ भारत चलें एवं कुछ महीने वहाँ रहें और भारत घूमें|

उसे अखंड विश्वास है कि उसका प्रेम और अल्पावधि वाला भारत भ्रमण प्रीति और उसकी माँ के विचार बदल कर देगा| और ऐसा ही होता भी है| बड़े लक्ष्यों के लिए वह अपने लिए उस वक्त सबसे कीमती चीज को दांव पर लगाने से नहीं डरता|

उपकार में सौतेले छोटे भाई पूरण के खेती का हिसाब मांगने और खेती का बंटवारा करने की बात करने पर भारत एक ही पल में सारी जमीन से अपने को अलग कर देता है पर उसे पूरण के नाम न करके पूरण की संतान के नाम करता है ताकि पूरण जमीन बेच न पाए| वह पूरण से आग्रह करता है कि खेती की जमीन वह कभी न बेचे और न ही कभी खाली छोड़े और उसमें हमेशा खेती होती रहनी चाहिए| मूल्यों के लिए त्याग करना भारत का स्वभाव है| ऐसा मजबूत और नैतिक चरित्र हिंदी सिनेमा के लिए एक प्रेरणा स्त्रोत बन गया|

पूरब और पश्चिम का प्रेरणा दायक के रूप में आलम यह है कि नब्बे के दशक और नई सदी के पहले दशक में भारत और पश्चिमी विचारधारा के टकराव को बनने वाली तमाम फिल्मों – दिल वाले दुल्हनियां ले जायेंगे, परदेस, आ अब लौट चलें, और नमस्ते लन्दन, आदि सभी ने कुछ न कुछ पूरब और पश्चिम से उधार लिया है और भारत कुमार के चरित्र के कुछ रंग अपने अपने नायक के चरित्र के रंगों में मिलाए हैं|

काश कि मनोज कुमार आगे भी भारत कुमार के रोचक और नैतिक चरित्र को लेकर उपकार और पूरब और पश्चिम के उच्च स्तर की फ़िल्में बना पाते|

बहरहाल किसी भी रचनाकार को उसकी श्रेष्ठ रचनाओं के लिए जाना जाता है न कि उसके औसत या उससे कमतर काम के लिए और मनोज कुमार को भी भारत कुमार के चरित्र के निर्माण और शहीद, उपकार और पूरब और पश्चिम जैसी कालजयी फिल्मों के निर्माण के लिए जाना जाना चाहिए और जाना जायेगा|

…[राकेश]

 

 

 

 

 

 

अगस्त 13, 2015

The Pursuit of Happyness (2006) : हाशिए पर पड़े जीवन का निराशा के गर्त से उठकर उदय होना

pursuit of happiness-001सिनेमा विचित्र लगने वाले क्षेत्रों में भी अतिक्रमण कर चुका है पर अभी भी मानवीय भावनाओं को सिनेमा से अलग किया जाना संभव नहीं| रोबोट, एलियन, वैम्पायर और जोम्बिस पर आधारित फिल्मों की भीड़ में अभी भी फ़िल्में बनती हैं जो मूलतः मनुष्य और उसकी भावनाओं को उसी रूप में प्रतिनिधित्व देती हैं जैसे कि वे हैं|

सिनेमा के परदे पर इंसानी चरित्रों के साथ दर्शक हँसते हैं, रोते हैं, और दर्शक को अपने बहाव के साथ बहा ले जाने में ही ऐसी फिल्मों की सफलता बसी होती है| यदि सिनेमा ईमानदारी से इंसानी भावनाओं को दर्शा पाता है तो यह दर्शक के ह्रदय से एक गहरा रिश्ता कायम करने में सफलता प्राप्त कर लेता है|

The Pursuit of Happiness’ भी एक ऐसी ही फिल्म है जो कि इंसानी भावनाओं को बखूबी दर्शाती है और एक ऐसे आम इंसान Chris Gardner (Will Smith) के जीवन के ऐसे संघर्षपूर्ण दौर को दिखाता है जबकि उसका जीवन विनाश के कगार पर खड़ा है और एक कदम उस तरफ और वह नष्ट हो जाने वाला है और अपने जीवन के बिखरे हुए तिनकों को चुन कर एकत्रित करने के सारे प्रयास नाकाम होते जाते हैं और वह घनघोर निराशाओं में डूब जाता है|

 

ऐसा नहीं कि वह कर्मठ नहीं और कामचोर है| वह गंभीरता से अपने जीवन को संवारना चाहता है और अपनी पत्नी Linda Gardner (Thandie Newton) और बेटे Christopher Gardner Jr. (Jaden Smith) को सुखी कर पाने के सब यत्न करता अहै पर उसके सारे प्रयास भी इस दौर में उसे इतना कमाने के अवसर नहीं देते कि वह अपने परिवार का भरण पोषण कर सके| इस संघर्षपूर्ण जीवन से घबराकर उसकी पत्नी उसे और उन दोनों के बेटे को छोड़ जाती है|

 

क्रिस को अपने बेटे से अगाध स्नेह है और अब अकेले ही उसे अपने बेटे की देखभाल ऐसे समय में करनी है जबकि उसे हर तरफ से असफलताएं और निराशाएं ही मिल रही हैं और उसके भीतर बहुत कुछ टूटता जा रहा है| करनी है| लेकिन उसे सफलता पाने के लिए प्रयास तो करने ही हैं| बेटे के पालन पोषण के लिए भी उसका सफल होना बेहद आवशयक है|

 

बहुत अवसरों पर उसे एहसास होता है कि बस उसके सहने के लिए यह अंतिम सीमा है और अब वह और प्रयास नहीं कर सकता सफलता के लिए लेकिन कुछ है अभी शेष उसके अंदर जो उसे डटाए रखता है जीवन के संग्राम में|

 

 

इस दौर में नामुमकिन सा लगने लगा है तुम्हे छू पाना

थकान घर कर गई है अंदर तक तुम्हारा इंतजार करते करते

रोज सुबह धड़कनें बढ़ जाती हैं इस आशा के साथ कि

शायद आज तुम्हारा साथ मुझे मिल जाए

पर दिन मुझे मायूस करके शाम के स्लेटी रंग में दुबक जाता है

मुझे निराशा के समुद्र में डुबोकर

खुद को बहलाना चाहता हूँ

ताकि संघर्ष जारी रख सकूं

कर्मण्येवाधिकारस्ते… को अपना मंत्र बनाना चाहता हूँ

मन को कई तरीकों से समझाता भी हूँ

पर फिर इस बात का बोध सिर उठाने लगता है कि

तुम बिन जीवन की राह आगे नहीं जाती

बेहद कठिनाई से आ पाई नींद से अनायास जाग जाता हूँ

इस आशंका से घबराकर कि अगर तुम न मिलीं तो…?

क्या ऐसे दुर्गति भरे प्रारब्ध को प्राप्त हो जाना होगा मुझे?

भाग्य को कोसने लगता है मन ऐसे में|

पर थक हार कर यथास्थिति को स्वीकार करना पड़ता है

जीवित रहने के लिए स्वप्न देखने का दुस्साहस भी कर बैठने को विवश हो जाता हूँ

काश तुम्हारा साथ मिल जाए तो

इस तरीके से उस अंदाज में राहें संवारूंगा जीवन की

घोर परिश्रम करूँगा ताकि तुम्हारी उपस्थिति को अपने साथ बरकारार रख सकूं

पर तुम तो कोसों दूर हो मुझसे

तुमने अपना मुख मुझसे क्यों फेरा हुआ है?

तुम अपना हाथ भले ही न पकड़ने दो मुझे

पर इतना सच तो तय ही है कि तिनके जितना सहारा तो चाहिए ही

जीने के लिए

बार की असफलता से बिखरने लगता है मन

कब तक आशा को सहेजेगा मन?

इससे पहले कि संभावना ही न बचे मेरी तुम्हारा साथ पाने की,

दो कदम तो मेरे साथ चलो – सफलता!

 

The Legend of Bagger Vance (2000), Ali (2001) और The Pursuit of Happyness (2006) तीनों ने सिद्ध कर दिया था कि Will Smith केवल Bad Boys (1995) और Men in Black (1997) जैसी एक्शन फिल्मों के लिए ही उपयोगी अभिनेता नहीं थे वरन उनकी अभिनय रेंज बहुत बड़ी है और मानवीय भावनाओं को परदे पर उतारने में वे बहुत अच्छे अभिनेता सिद्ध होते हैं|

 

यह फिल्म उन्हें एक संवेदनशील अभिनेता के रूप में मजबूती से स्थापित करती है| इस फिल्म में उनके बेहतरीन अभिनय की बानगी देखने के लिए तीन महत्वपूर्ण हिस्सों की चर्चा आवश्यक हो जाती है|

 

उनके चरित्र क्रिस गार्डनर और उसके बेटे को जब घनघोर परेशानियों के दौर में उसकी पत्नी छोड़कर चली जाती है तो क्रिस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि कैसे वह अपने बेटे को पाले और उसे खुश रखे और यही एक इच्छा उसे अनवरत संघर्ष करने के लिए प्रेरित या विवश करते है वरना अगर वह अकेला हो तो शायद टूटकर बिखर जाए| ऐसे ही समय जब वह घर से बाहर गया हुआ है, उसका मकान मालिक घर को सील कर देता है| क्रिस का बेटा बहुत थका हुआ है और रोज की तरह अपने कमरे में जाकर अपने आरामदायक और चिर परिचित बिस्तर में लेटकर सोना चाहता है और यहाँ उसका मजबूर पिता उसे लेकर उस घर के बाहर खड़ा है जहां वह अभी तक रहता आया था| वह किराया नहीं चुका पाया है सो इस किराए के मकान में नहीं घुस सकता| ऐसी विवशता में आदमी अपनी कुंठा अपने से कमजोर पर निकालता है और इस वक्त उसकी परेशानी उसका बेटा है और उसी बेटे की लगातार जिद उसे कुंठित कर देती है और गुस्से में वह अपने बेटे पर बरस पड़ता है|

 

गुस्सा शांत होने पर उसे समझ आता है कि बेटा इतना बड़ा नहीं कि इन बातों को समझ सके| बेटे को लेकर वह एक कम्यूनिटी सेंटर जाता है पर वहाँ उसे बताया जाता है कि वहाँ केवल महिलायें और बच्चे ही ठहर सकते हैं| उसके बेटे को अंदर सोने की जगह मिल सकती है पर उसे नहीं| वह बेटे को अकेला छोड़ने से इंकार कर देता अहै और दूसरे कम्यूनिटी सेंटर जाता है जहां अंदर शरण पाने वालों की लम्बी लाइन देख उसके हौसले पस्त होने लगते हैं| जब केवल दो या तीन स्थान बचे हैं तब एक शाराबी आदमी उससे आगे निकल कर अंदर प्रवेश करने का प्रयास करता है और क्रिस के सब्र का बांध टूट पड़ता है और वह अपने अधिकार के लिए लड़ता है| व्यक्ति अपने ऊपर आई परेशानी को सहन कर सकता है पर अपने सबसे प्रिय व्यक्ति के ऊपर आई विपत्ति को नहीं, तब उसका सारा व्यवहार बदल जाता है| विवशता में बेहद अहिंसक आदमी भी हिंसात्मक दिखाई देने लगता है| अपने पर आई विपत्ति के मामले में व्यक्ति को केवल सच्चाई को स्वीकार करना होता है पर अपने प्रिय पर आई विपत्ति में वह सच्चाई को ही स्वीकार नहीं कर पाता| इसके लिए लोहे का ह्रदय चाहिए और गजब की स्थितप्रज्ञता और यह सबके बस की बात नहीं| प्रेम ऐसे समय व्यक्ति को कमजोर बनाता है| और अगर मामला बच्चों से जुड़ा हो तो बात और गंभीर हो जाती है| बेहद अहिंसक जानवर भी अपने बच्चे पर संकट आया देख जी जान से उनकी रक्षा करते हैं और इस अभियान में हिंसक होने से भी पीछे नहीं हटते|

 

दूसरे हिस्से में जब क्रिस को कहीं शरण नहीं मिलती तो वह नींद में जाते बेटे को रात भर सुलाने के लिए एक स्टेशन पर स्थित सार्वजनिक शौचालय में घुस कर दरवाजा अंदर से बंद कर लेता है और बेटा उसकी गोद में सो जाता है और वह अपने दुर्भाग्य पर चिंतित हो बैठा अरह्ता है| तभे बाहर से कोई दरवाजा खटखटाता है और क्रिस चौकन्ना हो बैठ जाता है| वह डरा हुआ है, चिंतित है, चौकन्ना है और विवश है पर उसके सामने स्पष्ट है कि उसे दरवाजा नहीं खोलना है| वह अपने बेटे को अपनी बाहों में ऐसे भर लेता है मानो सारी दुनिया से उसकी रक्षा कर रहा हो और विवशता में आंसूओं की झड़ी उसकी आँखों से बह निकलती है|

 

एक हिस्सा फिल्म के लगभग अंत में आता है| जब उसे ऐसा विश्वास हो जाता है कि उसे नौकरी नहीं मिल पायेगी क्योंकि उसे लगता है उसकी लाख कोशिशों के बावजूद भाग्य उससे रूठा हुआ है और कुछ भी अच्छा उसके साथ नहीं हो सकता| उसका तत्कालीन बॉस उसे अपने कक्ष में बुलाता है और उसके अंदर प्रवेश करने पर उससे कहता है कि उसने बड़ा अच्छा सूट पहना हुआ है|

क्रिस कहता है कि आज क्योंकि उसका इस कम्पनी में आख़िरी दिन था सो उसने सोचा कि वह अपने सबसे अच्छे कपड़े पहनकर यहाँ आएगा|

बॉस मुस्कराते हुए कहता है,” शायद! लेकिन हम लोग कल सुबह मिल रहे हैं अगर तुम्हे हमारी कम्पनी में काम करने में कोई एतराज न हो”|

 

क्रिस के दिमाग में यह संभावना पहले नहीं आई थी सो वह इस बात को सुनने के लिए तैयार नहीं था| वह अपने अंदर उमडती भावनाओं पर काबू पाने में असफल है और वह जोर जोर से रोना चाहता है , शायद ईश्वर के सामने रोकर अपना अजी हल्का करना चाहता है कि उसके जीवन का क्या हाल हो गया है, और साथ ही वह अपने सामने बैठे बॉस को अपने आंसू भी दिखाना नहीं चाहता| और इस अंदुरनी संघर्ष में वह बमुश्किल वह हल्का सा मुस्करा पाता है और आंसुओं से नाम आँखें लिए ऑफर को स्वीकृत करने के लिए अपना सिर हिलाता है|

जब वह बॉस के कक्ष से निकलने ही वाला होता है तब बॉस उसे पांच डॉलर का नोट वापिस करता है जो उसने पिछले दिनों उससे उधार लिया था|

 

ऐसे बहुत से ह्रदय विदारक दृश्य फिल्म में उपस्थित हैं जो दुख को परदे से बाहर प्रसारित करके दर्शक को छू जाते हैं और उसे बांध लेते हैं| और विल स्मिथ ने गजब की कुशलता और गहराई से ऐसे दृश्यों में जीवन भर दिया है|

जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब निराशाएं चारों ओर से आदमी को घेर लेती हैं| कुछ भी सही होते नहीं दिखता पर अगर इंसान को जीवित रहना है और उसे भरोसा है कि उसे जीना है और वह आत्मघाती नहीं है तो दो बातें जरुर होती हैं|

 

एक तो व्यक्ति अपराध की ओर नहीं जाता क्योंकि वह भी एक किस्म का आत्मघात ही है और दूसरा कोई न कोई रास्ता जरुर निकल कर आता है जो व्यक्ति को जिंदा रखने में सहायक सिद्ध होता है|

 

जब तब घनघोर परेशानियों में मेरा जीवन घिर जाता है

अपनी कमजोरियों को देख मेरी परेशानी और बढ़ जाती है

मेरा आत्मविश्वास अपनी ताकत खोता जाता है

ऐसा लगने लगता है कि मैं कहीं

बहुत गहरे और अँधेरे कुएं में गिरता जा रहा हूँ

जहां से मैं चिल्लाता तो हूँ

पर मेरी आवाज बाहर नहीं पहुँच पाती

ऐसे समय मुझे अपनी छाती पर

टनों भारी शिला का बोझ मालूम होता है

धैर्य, शान्ति, ध्यान, आत्म-विश्वास, निश्चय और धनात्मक रुख जैसे शब्दों से

बनी माला मनके मनके बिखरने लगती है

लेकिन इससे पहले कि मैं सा कुछ खो दूँ,

पूरी तरह टूट कर बिखर जाऊं

एक भाव है जो मुझे जिंदा होने का एहसास करा जाता है

जब आदि काल से हवा अबह रहे एही

सूरज अपनी रोशनी और ऊर्जा धरा पर बिखेरता आ रहा है

फूल अपनी खुशबू बिखेरते आ रहे हैं

जबकि उन्हें अल्प काल में ही मुरझा कर बिखर जाना होता है

तारे अपनी छटा से लुभाते जाते हैं मानव को

चाँद अपनी शीतलता से कवियों को प्रेरित करता चला जाता है|

तब मैं तो आखिर एक मनुष्य हूँ

संभवतः प्रकृति की श्रेष्ठ रचना

तब मुझे इस रचनात्मक कार्य में शामिल क्यों नहीं होना चाहिए

अपने जीवन को रचनात्मकता से भरपूर बना कर!

 

 

The Pursuit of Happiness जीवन का आशामयी रूप हमें दिखाती है| फिल्म Chris Gardner के वास्तविक जीवन पर आधारित है|

जीवन में कैसे ऐसे समय जब निराशाएं घर कर लें और व्यक्ति उस अवस्था में पहुँच जाये कि अब जो हो सो, मौत आती हो तो आए, पर तब भी उसकी जिजीविषा में क्षीण सी भी गुंजाइश बचे जिससे तिनके का सहारा बना कर वह फिर से जीवन को अंकुरित करके लहलहाती फसल उगा देने का जीवट दिखाए, इस प्रक्रिया को देखने के लिए इस फिल्म का देखा जाना आवश्यक है|

नौकरी मिलने के बाद भावुक क्रिस को ऑफिस की बिल्डिंग से निकल कर सड़क पर भीड़ में शामिल हो जाने के बाद अपनी विभिन्न भावनाओं को प्रदर्शित करते देख और डे-केयर जाकर अपने बेटे को गोद में उठाकर उसे गले लगाकर रोने से यही एक बात उभर कर आती है फिजां में कि – जीना तो है, कैसे भी हो जीना तो है|

…[राकेश]

अगस्त 9, 2015

Ahalya (2015) : वासना का खतरनाक प्रलोभन

Ahalyaहर बुरा भाव मनुष्य के भीतर ही बसता है, किसी भी किस्म का लालच हो वह उसके भीतर के संसार को निर्मित करता है| साधू अपने अंदर के इस कलुषित संसार का शोधन करता रहता है, उस शुद्धतम अवस्था को प्राप्त करने के लिए जहां से वह अध्यात्म की उर्ध्वाकार गति प्रारम्भ कर सकता है| बाकी सभी सनासारिक कृत्यों में राम कर जीवन व्यतीत करने वाले मनुष्य अपने अंदर की लालसाओं, भावनाओं, और तृष्णाओं पर परदे डाले रखते हैं|

क्रोध बाहर नहीं अंदर ही बसता है, बस कुछ ऐसा दिख जाए जो इसका भोजन हो और यह जाग्रत हो जाता है, यही हर किस्म के भाव के साथ है, चाहे वह प्रेम जैसा अच्छा भाव हो या घृणा जैसा बुरा भाव| इस सांसारिक संसार में मनुष्य के आदिकाल से और इसके अंत तक इन्ही भावों के कारण अपराध होते रहेंगें जो एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के खिलाफ करता रहेगा| पकडे जाने का भय न हो तो मनुष्य भांति भांति के कृत्यों में सलंग्न रहता रहे| बहुत से बहुत सारे काम, जिन्हें समाज बुरा कहता है, इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें पोल खुलने का भय रहता है पर इसका मतलब यह नहीं कि अपने अंदर के संसार में वे इन कृत्यों को नहीं करते वे अपने दिमाग में ये सारे काम करते रहते हैं|

स्वभाव बदलना सांसारिक मनुष्य के लिए संभव नहीं है| वह केवल अच्छा दिखने के लिए जो समाज को चाहिए वह मेकअप की तरह ओढकर अपने को प्रस्तुत कर सकता है|

अभी हाल में दो सौ- तीन सौ रूपये एक दिन में कमाने वाले एक गरीब रिक्शेवाले को डेढ़ लाख के आसपास रुपयों से भरा बैग मिला और उसने वह बैग पुलिस को दे दिया| यह इतनी बड़ी रकम नहीं थी कि इसके इस्तेमाल से उस पर कोई आंच आ जाती पर ईमानदारी उसका स्वभाव थी और उसने बेईमानी को अपने ऊपर हावी न होने देकर ईमानदारी को अपनाया| अपने देश में बहुमत ऐसे ही लोगों का होगा जो इस पैसे को रख लेते|

सालों से ईमानदारी का डंका पीटने वाले लोग भी इसे रख लेते क्योंकि किसी ने उन्हें इस बैग को पाते हुए देखा नहीं होता और जो देखा नहीं गया या देखा नहीं जा सकेगा वहाँ सत्कर्म की भावना संसार में बेहद कम लोगों के अंदर होती है, भारत जैसे विकाशसील देश में तो यह भावना देखना दुर्लभ है|

आनंद बख्शी के एक बेहतरीन गीत की पंक्तियाँ हैं

हम को जो ताने देते हैं हम खोये हैं इन रंगरलियों में

हमने उनको भी छुप छुप के आते देखा इन गलियों में

हिंदू मिथकों और पौराणिक कथाओं में गौतम ऋषि, उनकी अतिसुन्दर कही जाने वाली पत्नी अहिल्या और देवराज इंद्र की कहानियों के कई संस्करण मिलते हैं| सभी में एक बात समान है कि इंद्र का दिल अहिल्या की सुंदरता देख उस पर मोहित हो गया था और तडके भोर में जब गौतम ऋषि नदी में स्नान के लिए गये थे और इंद्र को पता था कि वे अब पूजा अर्चना आदि के बाद ही लौटेंगें और वह गौतम ऋषि का रूप धारण करके उनके शयन कक्ष में सोती अहिल्या के पास बिस्तर पर लेट गया और अहिल्या को शारीरिक संपर्क के लिए लुभाने लगा| उनींदी अहिल्या को दिखने में अपने पति ही दिखाई दिए पर कुछ देर बाद उसे कुछ संदेह हुआ पर तब तक देर हो चुकी थी, इंद्र उस पर हावी होने लगा था और दोनों के दुर्भाग्य से गौतम ऋषि वहाँ पहुँच गये और क्रोध में उन्होंने इंद्र को शाप दिया और अहिल्या का परित्याग कर दिया| कहा जाता है कि गौतम ऋषि ने अहिल्या को शिला बन जाने का शाप दिया और जब विश्वामित्र के साथ वनागमन कर रहे राम ने उनका स्पर्श किया तो वे शिला से स्त्री बन गयीं| इस मिथक की सार्थक लगने वाली अपनी व्याख्याएं हो सकती हैं पर मूल बात यह है कि लगभग हरेक के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या अहिल्या की कोई गलती थी इस सारे कांड में? क्रोध शांत होने पर गौतम ऋषि को संतुलित दिमाग से सोचकर क्या अहिल्या का पक्ष देखने का विचार नहीं गुजरा?

बहरहाल निर्देशक सुजॉय घोष (विद्या बालन वाली फिल्म – कहानी, के निर्देशक) ने गौतम, अहिल्या और इंद्र की उस कथा को अपने ढंग से नया रूप दिया है|

इस नये रूप में गौतम, अहिल्या के मनमोहक व्यक्तित्व और शारीरिक सौंदर्य को एक चारे के रूप में इस्तेमाल करते हैं इंद्र रूपी युवकों को लुभाकर उनकी वासना के लिए उन्हें दंडित करने के लिए| अहिल्या भी उनके इस अभियान का एक सहर्ष हिस्सा है और शिकार को फंसाने के लिए वह अपना हिस्सा बखूबी निभाती है|

मिथक के इस नये रूप में इंद्र अब इन्स्पेक्टर इंद्र सेन (Tota Roy Chowdhury) हैं जो अर्जुन नामक युवक की गुमशुदगी के केस के सिलसिले में पूछ्ताछ करने क्याती प्राप्त कलाकार गौतम साधू (Soumitra Chatterjee) के घर पहुंचता है, जहां एक युवती अहल्या (Radhika Apte) दरवाजा खोलती है| अहल्या की खूबसूरती से अभिभूत इंद्र के मन में अहल्या को देख कर लालसाएं जागी हैं यह निर्देशक के निर्देशन में कैमरा दिखा देता है, और न केवल दिखा देता है बल्कि इंद्र के आगे आगे चलती अहल्या को देखकर हर पुरुष दर्शक के अंदर क्या चल रहा है इसकी खोज खबर भी उसे दे देता है| इंद्र ही आगे चलती अहल्या को नहीं देखता बल्कि उसके माध्यम से हर पुरुष दर्शक भी उसे देख रहा है|

वृद्ध गौतम को देख कर इंद्र अहल्या को गौतम की बेटी समझता है पर गौतम सुधार कर बताता है कि अहल्या असल में उसकी पत्नी है और वही उसकी प्रेरणा है एक से बढ़कर एक कलाकृतियां गढ़ने के पीछे|

सेना, पुलिस, और जासूस या कहिये क्षत्रिय के रूप में परिभाषित मनुष्य में उसके सामने आए मामले में छिपे हुए जानने की उत्कट इच्छा होती है, क्षत्रिय के भीतर प्रकृति में अपने साहस के बलबूते अंजान को जान लेने की इच्छा भी होती है, वैसे तो हर इंसान में होती है पर इस अंजान को जानने के खतरे से डर कर अन्य वर्ग के इंसान पीछे हट जाते हैं| दूसरा भाव जो मनुष्य को और ज्यादा पाने, और अन्यों से अलग पाने क भाव होता है और यह लालच उसे बहुत कुछ करने के लिए विवश करता है|

हम न मरिहें मरिहें संसारा

यह एक सामान्य सी बात है कि किसी ऐसी विपत्ति के बारे में सोचते हुए भी जिसमें सभी लोगों के मरने की आशंका हो, ज्यादातर मनुष्य यही सोचते हैं कि वे तो बच ही जायेंगें| ऐसे ही किसी भी लालच के वशीभूत कम करते हुए मनुष्य यही सोचते हैं कि अन्य लोगों का नुकसान हुआ होगा पर उनका कोई नुकसान लालच के साथ जाने में नहीं होगा बल्कि किसी अपराध को करते हुए भी यही भाव रहता है कि अन्य लोग पकडे गये होंगे वे तो बच ही जायेंगें, यही भावना दुनिया में अपराध का कारोबार कायम रखे हुए है| यही भावना है जिसके कारण लोग समाज की निगाह में अवैध समझे जाने वाले संबंध बनाते हैं, सुखद वैवाहिक जीवन के चलते रहने के बावजूद विवाहेत्तर संबंध बनते चले जाते हैं और वैवाहिक बंधन टूटते चले जाते हैं|

हिंदी फिल्मों के सुपर स्टार शाहरुख खान ने एक बार यह पूछे जाने पर कि उनके साथ एक से बढ़कर एक आकर्षक अभिनेत्रियों ने काम किया है पर कभी उनके किसी के भी प्रति आकर्षित होकर अफेयर चलाने के बारे में अफवाह तक भी नहीं उड़ी, शाहरुख ने कहा था,” आई वेल्यूड माई पीस ऑफ माइंड मोर देन सच अ’ टेम्पोरेरी टेम्पटेशन”|

बहुत लोग ऐसे टेम्पटेशन को नजरंदाज नहीं कर पाते और उसका शिकार बन जाते हैं| और इस बात की बहुत बड़ी भूमिका ऐसे प्रलोभनों क वशीभूत होते हुए होती है कि किसी को पता नहीं लगेगा अतः उन्हें कोई भी कीमत अदा नहीं करनी है|

इंद्र के मन में अहल्या के प्रति आकर्षण पनप चुका है और अहल्या की हरकतें उसके अंदर इस आकर्षण को तीव्रता प्रदान करती हैं|

अब अहल्या के दृश्य से अनुपस्थित होने का समय है ताकि इंद्र उसकी अनुपस्थिति को महसूस कर सके|

अर्जुन के बारे में पूछताछ का जवाब देते हुए गौतम साधू उसे एक पत्थर दिखाते हैं और कहते हैं कि यह जादुई पत्थर है और उसे इंद्र और अहल्या की कथा याद दिलाते हुए कहते हैं कि इंद्र के पास ऐसा ही जादुई पत्थर था जिसके कारण उसके पास शक्ति थी कैसा भी रूप धारण करने की| वे कहते हैं कि इस पत्थर में भी ऐसी जादुई शक्ति है इसे हाथ में लेकर अगर कोई व्यक्ति किसी और का रूप धारण करने की इच्छा रखता है तो वह उस व्यक्ति के रूप में परिवर्तित हो जायेगा|

एक आधुनिक पुलिस अधिकारी होने के नाते इंद्र के लिए यह बात बकवास है, सभी के लिए होगी| पर गौतम के यह कहने पर कि अर्जुन, जिसके बारे में खोज खबर लेने इंद्र वहाँ आया है, ने इस पत्थर की जादुई शक्ति के बारे में जान लिया था और संयोग से जब गौतम अपनी पत्नी अहल्या का मोबाइल देने ऊपर के कमरे में गया और वापिस आया तो अर्जुन गायब था और यह पत्थर फर्श पर पड़ा था और हो न हो अर्जुन ने इस पत्थर की सहायता से किसी और व्यक्ति का रूप धारण कर लिया क्योंकि वह ऐसा करना चाहता था, इंद्र के सामने एक उत्सुकता जाग जाती है| इस पत्थर का रहस्य जानने के बारे में|

दूसरा प्रलोभन, जिसके बारे में उसके मन में पहले से ही स्थान बन चुका है, इंद्र के सामने आता है जब गौतम उसके सामने प्रस्ताव रखता है कि इस पत्थर को हाथ में लेकर वह कल्पना करे कि वह गौतम साधू है और ऐसा करने के बाद वह अहल्या का मोबाइल ऊपर जाकर उसके कमरे में उसे दे दे, उसे अपने आप पता चल जायेगा पत्थर जादुई है या नहीं|

पत्थर के बारे में जानना और अहल्या से एकांत में दुबारा मिल पाना, दो ऐसे प्रलोभन हैं इंद्र के सामने, जिनकी अनदेखी वह नहीं कर पाता|

और ऊपर जाकर उसके सामने सबसे बड़ा प्रलोभन अहल्या रखती है जिसके आगे अपने खुद के लालच के वशीभूत होकर वह अपने को विवश पाता है और गौतम दवारा निर्धारित परिणति को प्राप्त होता है|

अगर इंद्र के अंदर अहल्या को पाने का लालच न होता तो पुलिस अधिकारी का दिमाग रखने के नाते वह गौतम को कहता कि वही इंद्र या किसी और का रूप धारण करके दिखाए| और इतनी समझ तो एक आम इंसान में भी होगी जो पुलिस अधिकारी न भी हो कि गौतम साधू ने उसे मोबाइल देने के लोइए ऊपर अपनी पत्नी के कमरे में भेजा है उसके साथ समय व्यतीत करने नहीं और कुछ देर बाद वह खुद भी तो ऊपर आ सकता था| पर इंद्र की वासना ने उसके सोचने समझने की शक्ति को सम्मोहित करके उसे एक आसान शिकार बना दिया|

14 मिनट की छोटी सी अवधि वाली फिल्म एक अच्छे थ्रिलर के रूप में दर्शक का ध्यान पकडे रखती है| अच्छी होने के बावजूद यह एक बात फिर से सिद्ध करती है कि भारतीय निर्देशकों के पास वह टेलेंट नहीं है जैसा हॉलीवुड के पास है जब जादुई बात दिखाने का मामला हो|

अहल्या का सबसे कमजोर दृश्य वही है जिसमें अहल्या के बिस्तर के सामने लगे दर्पण में वह अपनी जगह गौतम की छवि देखता है| वह दृश्य कायदे का नहीं बन पाया| फिल्म का रहस्य ज्यादा जानदार रहता अगर सिर्फ अहल्या के उसकी ओर देखकर उसे गौतम होने की स्वीकृति देने के कारण वह ऐसा मान लेता और दर्शक कभी भी इस दृश्य से रूबरू न होते कि वह दर्पण में क्या देख पा रहा है| इसकी जरुरत थी ही नहीं| अहल्या के उसे गौतम के रूप में संबोधित करने से ही दर्शक के लिये बात बन जाती|

यह दृश्य फिल्म की आत्मा के विरोधाभास में है कि गौतम पत्थर के रहस्य और अहल्या के खूबसूरत आकर्षण को परोस कर युवकों क शिकार करता है| पत्थर को जादुई बना फिल्म इस पहलू को कमजोर कर देती है|

दूसरी कमी है गौतम दवारा लोगों को छोटी मूर्तियों के रूप में बदल देने का|इसके विकल्प की आवश्यकता थी| ऐसे थिलर में जादू की कोई जगह नहीं हो सकती| जादू की बात कथानक का हिस्सा बने यह बढ़िया है पर अंत में तो यह नज़रों का फेर ही सिद्ध होना चाहिए|

बहुत पहले की बात है पहाड़ी पर एक जादूगरनी रहती थी जो पहाड़ी पर जा पहुँचने वाले युवकों को बकरा बना देती थी… लगभग हरेक भारतीय बालक ने ऐसी कहानी सुनी होगी यकीन मानिए इसके फिल्मांकन की कुव्वत भारतीय निर्देशकों में नहीं पाई जाती पर यही हॉलीवुड के काबिल निर्देशक बना कर प्रस्तुत करें तो हम मुँह खोले जादू का कमाल परदे पर देखते हैं|

फिल्म के ये दो पहलू फिल्म को आधुनिक काल का बेहद उम्दा थ्रिलर होने से रोकते हैं| उम्दा थ्रिलर में तार्किकता का बहुत बड़ा रोल होता है और यहाँ तार्किकता गायब है| इन दो कमियों से बचा जा सकता था|

फिल्म का नाम भले ही अहल्या हो और अहल्या (राधिका आप्टे) के चरित्र के व्यक्तित्व पर फिल्म निर्भर करती है और तीनों मुख्य अभिनेताओं ने बढ़िया अभिनय किया है पर फिल्म से जो अभिनेता सबसे ज्यादा चमक कर बाहर आता है वे सौमित्र चटर्जी हैं चाहे उनका परफेक्ट अंग्रेजी डिक्शन हो या चेहरे का नापा तुला हाव भाव सभी गजब हैं, और उनकी शारीरिक भाव-भंगिमा और बोलने की टाइमिंग का सामंजस्य देखते ही बनता है जब हास्य का पुट लिए बात चीत करते हुए व्हिस्की का गिलास हाथ में लिए वे कुर्सी पर बैठते हैं और अधिकारपूर्ण स्वर में बोलते हैं,”व्हाट कैन आई डू फॉर यू इन्स्पेक्टर?”

सौमित्र चटर्जी को इस फिल्म में देखकर ऐसा ही लगता है कि सत्यजीत रे की अप्पू के बाद क्या गैर-बंगाली फिल्म दर्शकों ने इतने दशकों इस अभिनेता को क्या भुला नहीं दिया| इस फिल्म में उनके जलवे को देख यह भी लगता अहै कि अमिताभ बच्चन की जगह अगर वे पीकू में दीपिका पादुकोण के चरित्र के पिता की भूमिका निभाते तो फिल्म क्या गजब की ऊँचाई न पा जाती, एक बंगाली चरित्र के विश्वसनीय और अच्छे चित्रण से?

राधिका आप्टे के लिए यह छोटी सी फिल्म बड़ी संभावनाओं के द्वार खोलती है और उनके नाम के साथ हाल के महीनों में जुड़ते तमाम विवादों के बावजूद फिल्म उन्हें एक संभावना वाली अभिनेत्री के रूप में स्थापित कर देती है|

 …[राकेश]

इच्छुक लोग फिल्म को यहाँ देख सकते हैं

अगस्त 7, 2015

हिंदी सिनेमा का अनूठा संन्यासी सुपर अभिनेता स्टार

Vinod Khanna1सन 1984 के किसी दिवस की बात है| एक शिष्य अपने गुरु दवारा बसाए गये शहर में उनके आवास के बाहर रोते हुए गुरु की निजी सचिव से कह रहा है,” भगवान, ने मुझे किस मुसीबत में डाल दिया| मुझे तो भीतर कहीं प्रतीत नहीं होता कि मुझे बुद्धत्व प्राप्त हो गया है| भगवान ने मेरा नाम उस सूची में कैसे रख दिया| दो दिन से मैं सो नहीं पाया हूँ| भगवान को गलत भी नहीं कह सकता पर अपने अंदर के सच को भी जानता हूँ| मैं तो दो हिस्सों में बंट गया हूँ| भगवान से कहो मुझे सच बता दें|”

मसला सिर्फ इतना सा था कि आश्रम में एक सूची जारी गई थी जिसमें इक्कीस ऐसे संन्यासियों के नाम थे जिनके बारे में कहा गया था कि उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हो गया है| और यह शिष्य, जो कि गुरु के व्यक्तिगत बगीचे में माली का काम देखता है, इसीलिये अपने गुरु के आवास के पास आकर रो रहा था कि उसे तो बुद्धत्व जैसी कोई बात अपने अंतर्मन में दिखाई नहीं देती और वह तो अभी पुरजोर प्रयास कर रहा है ध्यान में गहरे उतर कर विचलित मन से पार जाकर स्थायी शान्ति पाने के लिए तो कैसे गुरुदेव ने उसका नाम उस सूची में डाल दिया? क्या उसे स्वयं पता न लगता अगर ऐसा कुछ होता?

बाकी बीस शिष्यों में से जरूरी नहीं सभी ने ऐसे ही प्रतिक्रया दी हो, बहुतों में यह अहंकार भी उत्पन्न हो गया होना संभव था कि गुरुदेव ने उनमें बुद्धत्व देख लिया है सो वे वाकई बुद्धत्व की स्थिति को प्राप्त हो गये हैं|

बहरहाल यह घटना शिष्य दवारा ध्यान और संन्यास का पालन बेहद गंभीरता से करने की ओर इशारा करती है और यह भी दर्शाती है कि कैसे शिष्य ने अपनी अध्यात्मिक यात्रा पर चलते हुए अपने अहं पर विजय प्राप्त कर ली थी|

शिष्य के अंदर अध्यात्मिक खोज की इच्छा के बीज बचपन से ही मौजूद थे| हालांकि माता-पिता लगभग हर साल हरिद्वार-ऋषिकेश की धार्मिक यात्रा पर उसे उसके अन्य भाई-बहनों के संग बचपन से ही ले जाते रहे थे पर उसकी जिज्ञासा ऐसी तीर्थ यात्राओं से संतुष्ट होने वाली नहीं थी| कहीं गहरे में उसके अंदर अपने ‘मैं’ को पहचनाने की इच्छा बलवती हो चुकी थी| यूं तो बड़े होते होते वह बहुत सारी सामान्य गतिविधियों में संलग्न रहा जैसे उसके अन्य साथी रहते थे, पर उसके अंदर एक अंतर्द्वंद ने उसका पीछा कभी नहीं छोड़ा| बम्बई के एक मशहूर पहलवान से पहलवानी सीखकर अपने हष्ट-पुश्ट शरीर को फौलादी बना लेने के शौक से लेकर वह अपने कालेज के दौर में दुनिया भर में प्रसिद्द हो चुके बीटल्स के संगीत का भी दीवाना था| पढ़ने का शौक ऐसा कि एक तरह जेम्स हैडली चेज़ के उपन्यास उसके हाथों में दिखाई देते तो दूसरी तरफ वह गंभीर साहित्य भी उसी ललक के साथ पढता और वह योग, ध्यान और अध्यात्म से सम्बंधित पुस्तकों को पढते भी पाया जाता| कालेज की पढ़ाई के दौरान ही उसका रुझान नाटकों आदि की तरफ हो गया था, जिसे उसके पिता सख्त नापसंद करते थे| पिता ने कभी उसकी पसंद – नापसंद जानने की कोशिश नहीं की बल्कि हमेशा उसके लिए निर्णय लेकर उस पर अपनी राय थोपी और वह इस जबरदस्ती का सख्त विरोधी था| नतीजन घर में लगभग हर मामले में पिता –पुत्र में ठनी रहती और उसकी माँ को बीच-बचाव करके मामले को टालना पड़ता| वह चाहता था इंजीनियरिंग करे परन्तु उसके पिता ने उससे बिना पूछे ही बारहवीं के बाद उसका दाखिला बम्बई में कामर्स पढ़ाने वाले कालेज में करा दिया, ताकि वह डिग्री लेकर उनके कारोबार में उनका हाथ बंटाएं| कुछ बरस पहले देखी फिल्म मुगल-ए-आज़म ने उसका ध्यान फिल्मों की ओर आकर्षित कर लिया था|

कालेज में उसका एक बड़ा सा गैंग हुआ करता था जिसमें लड़के लडकियां दोनों ही थे जो उसकी अगुआई में विभिन्न गतिविधियों में सलंग्न रहा करते थे जिसमें थियेटर एक महत्वपूर्ण गतिविधि उन लोगों के लिए हुआ करती थी| कालेज में उसकी मुलाक़ात उस लड़की से हुयी जिससे उसे पहले प्रेम हुआ और कुछ साल बाद जिससे उसने विवाह किया| साठ के दशक के अंतिम बरसों में किसी शाम एक पार्टी में मशहूर फिल्म अभिनेता से उसकी मुलाक़ात हुयी और अभिनेता, जो कि अपने भाई को हिंदी फिल्मों में स्थापित करने के लिए उसे नायक की भूमिका में लेकर एक फिल्म बना रहे थे, ने उसे अपने भाई के सामने एक अन्य भूमिका फिल्म में करने का प्रस्ताव दिया| थियेटर और फिल्मों की तरफ उसके रुझान को देखते हुए उसके लिए यह एक अच्छा अवसर था फिल्मों में काम करने का, पर घर पर बात पता चलते ही उसके पिता ने उसके सिर पर बन्दुक तान दी| माँ दौडी आई और मामले को शांत करते हुए एक प्रस्ताव रखा कि लड़के को दो साल की छूट दी जाए अगर वह फिल्मों में नाकामयाब रहता है तो दो साल बाद वह फिल्मों और नाटकों को पूरी तरह से भुलाकर घर के बिजनेस की बागडोर संभालेगा| नाकामयाब तो क्या होता, लड़के को पहली ही फिल्म में दर्शकों और फिल्म समीक्षकों की भूरी-भूरी प्रशंसा मिली बल्कि उस फिल्म- मन का मीत, का सबसे होनहार और सबसे शानदार अभिनेता वही था| फिल्म प्रदर्शित होने के एक हफ्ते के भीतर ही वह १५-१६ फ़िल्में साइन कर चुका था जिनमें वह सहायक या खलनायक की भूमिकाओं में था| यह वही साल था जब आराधना के बाद राजेश खन्ना के नशे ने समूचे देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया था|

फिल्मों में काम और अच्छी सफलता मिलने के बावजूद उसके अंदर का संघर्ष जारी था और अपने अस्तित्व को लेकर प्रश्न उसके अंदर मंडराते रहते थे और वह अपनी अध्यात्मिक यात्रा शुरू करने के लिए तडपता था|

ऐसे ही समय उसके हाथ परमहंस योगानंद की प्रसिद्द पुस्तक ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ अ योगी’ लगी और योगी का फोटो देखकर उसे लगा कि वह इस योगी को पहले से जानता है और पुस्तक पढ़ना शुरू करते ही उसे लगने लगा कि योगी के इन विचारों से वह भली-भांति परिचित है| इस भाव का राज उसके सामने खुला तकरीबन तेरह-चौदह साल बाद जब अमेरिका में एक मनोविश्लेषक ने सम्मोहन के दवारा उसके पूर्व जन्म के बारे में उसे बताया कि पिछले जन्म में वह परमहंस योगानंद का अमेरिकी शिष्य था और दूसरे विश्वयुद्ध में उसकी मृत्यु हुयी थी|

उसी समय उसने ट्रान्सीडेंटल मेडिटेशन सीखा और उसका अभ्यास करते हुए उसे अपने अंदर कुछ हद तक ठहराव मालूम होता था| पर उन्ही दिनों उसने जे. कृष्णामूर्ति के प्रवचन सुने और कृष्णमूर्ति इस तरह की विधियों के पूर्णतया विरोध में थे| उनकी बातें उसे तार्किक और सही लगती थीं पर ट्रान्सीडेंटल मेडिटेशन से अल्पकालिक लाभ भी हो रहा था| विरोधाभासों से उसके अंदर गतिरोध आ गया| इन्ही अंतर्द्वंदों के मध्य उसकी मुलाक़ात ऐसे बुद्ध पुरुष दार्शनिक से हुयी जिन्हें देखते और उनकी वाणी सुनकर ही उसके अंदर शान्ति छा गयी और उसे लगा अंततः वह प्रकृति दवारा उसके लिए निर्धारित अपने गुरु की छत्रछाया में पहुँच गया है|

गुरु ओशो, जिन्हें तब उनके चाहने वाले लोग भगवान श्री रजनीश के नाम से पुकारते थे, ने शिष्य विनोद खन्ना की सारी उलझनें हर ली|

विनोद खन्ना फिल्म संसार में सफलता की सीढियां चढ़ते जा रहे थे पर वह भाग उनके जीवन में एक पार्ट-टाइम गतिविधि जैसा ही था| अभिनय करते हुए वे उसमें सौ प्रतिशत नहीं राम पाते थे, जैसा वे उस समय महसूस करते थे जब ध्यान आदि में डूब जाते थे या गुरु के प्रवचन सुनते थे| मुख्य शान्ति विनोद खन्ना को अपने गुरु के आश्रम में उनके सानिध्य में ही प्राप्त होती थी| वह मौका मिलते विनोद खन्ना बम्बई से पूना चले जाते, गुरु दवारा उत्सर्जित उर्जा क्षेत्र में साधना लीन हेतु| अपने कालेज के दिनों की प्रेयसी गीतांजलि से विवाह वह कर चुके थे और दो बेटों- राहुल और अक्षय के पिता भी बन चुके थे| पर न तो फ़िल्मी दुनिया का ग्लैमर, न इससे मिलने वाले सुख-संपत्ति, एश्वर्य और प्रसिद्धि और न ही घर पर पत्नी और बेटों का साथ, कुछ भी ऐसा नहीं था जो कि विनोद की अध्यात्मिक यात्रा से उनका ध्यान अपने ओर खींच लेता| अध्यात्मिक यात्रा की उनके ललक बनी ही रही| ओशो का सामीप्य पाकर विनोद की गुरु की तलाश समाप्त हो चुकी थी और ध्यान के माध्यम से अध्यात्म की यात्रा शुरू हो चुकी थी| यहाँ यह जिक्र करना गैर-मुनासिब न होगा कि लगभग उन्ही सालों में प्रसिद्द निर्देशक विजय आनंद और उस वक्त नामालूम से संघर्षरत निर्देशक महेश भट्ट भी ओशो के संन्यासी बनने की प्रक्रिया में थे पर दोनों ही उन्हें छोड़कर बाद में यू.जी कृष्णमूर्ति से जुड़ गये, हालांकि महेश भट्ट का रजनीश ऑब्सेशन आज भी समाप्त नहीं हुआ है और वे उनके खिलाफ बोलने का एक भी मौका चूकते नहीं हैं| बाद में विनोद ने एक बार कहा भी कि अच्छा होता विजय आनंद और महेश भट्ट बौद्धिकता से परे जाकर सहे में ध्यान आदि से जुड़ते|

अध्यात्मिक यात्रा की ललक इतनी सांद्रता के साथ विनोद के भीतर उपस्थित थी कि जब वे हिंदी सिनेमा के ऊपर के तीन सबसे सफल और सबसे अच्छे नायक अभिनेताओं में सम्मिलित थे, तब उन्होंने घोषणा कर दी कि वे फ़िल्मी संसार छोड़कर स्थायी रूप से गुरु के आश्रम में रहने जा रहे हैं| हिंदी सिनेमा का एक बेहतरीन अभिनेता जो एक बहुत बड़ा सितारा भी था, सुख, और ऐशो- आराम की ज़िंदगी और बेहद अच्छे दाम्पत्य जीवन की सुरक्षा को छोड़कर अंजान जीवन में छलांग लगाने जा रहा था| फ़िल्मी दुनिया में कुछ अभिनेताओं ने अंदर ही अंदर राहत की साँस ली होगी क्योंकि उनके सामने से एक सशक्त प्रतियोगी स्वेच्छा से हट रहा था और बाकियों ने विनोद को पागल समझा होगा| सैंकड़ों जोड़ी सूट, कपड़े, जूते और अन्य साजो सामान को लोगों में बांटकर विनोद ने आश्रम में स्थायी निवास करके सारे समय पहले गेरुआ और बाद में आश्रम दवारा निर्धारित मेरून चोगा पहनना शुरू कर दिया|

Vinod Khanna3 ओशो, अमेरिका में ओरेगान में कम्यून स्थापित करने चले गये तो विनोद खन्ना  भी उनके साथ अमेरिका चले गये और विनोद ने अपने गुरु की निजी वाटिका की देखभाल के लिए माली का काम करने में जीवन का सुख प्राप्त करना शुरू कर दिया| विनोद चार साल वहाँ रहे और साधना करते रहे|

विनोद का वैवाहिक जीवन टूट चुका था| यहाँ महात्मा बुद्ध के जीवन की एक घटना का जिक्र करना मुनासिब रहेगा|

राजकुमार सिद्धार्थ रात के अँधेरे में अपनी पत्नी यशोधरा और नये जन्मे शिशु राहुल को छोड़कर और बरसों बाद जब वे गौतम बुद्ध बन कर उस राज्य में वापिस आए जहां यशोधरा, बेटे राहुल के साथ रहती थीं तो इतने बरसों बाद मिलने पर यशोधरा ने बुद्ध से पूछा या कहा कि अगर वे उसे बता कर जाते कि उनके लिए साधना और अध्यात्मिक यात्रा इतनी बड़ी बात है तो क्या वे उन्हें जाने से रोकतीं, या इस यात्रा को करने से मना कर देतीं? बुद्ध ने मौन रहकर इस बात का कोई जवाब नहीं दिया| यशोधरा ने बरसों इस बात के ताप को सहा कि सिद्धार्थ क्यों रात के अँधेरे में घर छोड़कर चले गये| पर यह निश्चित नहीं है कि अगर सिद्धार्थ यशोधरा से सलाह करके जाने की इच्छा प्रस्तुत करते तो वह उन्हें बिना किसी विरोध के जाने देती|

विनोद खन्ना ने तो बाकायदा सबको बता कर अपना निर्णय लिया था और निर्णय की सूचना काफी पहले सबको दे दी थी| पत्नी से भी खूब चर्चा इस संबंध में हुयी होगी और पत्नी की रजामंदी बिल्कुल न रही होगी तभी एक प्रेम-विवाह की परिणति इस बिंदु के कारण कानूनी अलगाव में परिवर्तित हो गई| कौन सी पत्नी दो छोटे बच्चों के भविष्य को देखते हुए पति को साधना करने दूर आश्रम में रहने जाने देगी? ओशो ने हालांकि संन्यास का रूप ही बदल दिया और अब तो पति और पत्नी दोनों ही संन्यासी रहकर साधनारत रहते हैं| घर और संन्यास का भेद ही उन्होंने मिटा दिया| आज तो विनोद एवं उनकी धर्मपत्नी कविता दोनों ही ओशो के संन्यासी अनुयायी हैं| विनोद खन्ना की पहली पत्नी को ओशो में रूचि नहीं थी या कालेज के समय से प्रेम संबंध के कारण उन्हें ऐसा लगना भी स्वाभाविक है कि उनके प्रेमी और पति ने उनसे ज्यादा गहरा संबंध अपने गुरु से कायम किया| दो बेटों की उपस्थिति भी विनोद खन्ना और उनकी पहली पत्नी गीतांजलि को अलग होने से नहीं रोक पायी|

बहरहाल जब अमेरिका सरकार ने ओशो के कम्यून रजनीशपुरम को नष्ट करने की ठान ली और इस तरफ सक्रिय कदम बढ़ा कर ओशो को येन केन प्रकारेण अमेरिका से बाहर निकाल दिया तो विनोद खन्ना भी भारत लौट आए| उनके दिमाग में अब नई उलझनें उत्पन्न हो गई थीं| संशय के समय भांति भांति के विचारमनुष्य के सोचने समझने की शक्ति को ग्रसित कर लेते हैं| जिस फ़िल्मी दुनिया को छोड़कर वे ओशो के पास गये थे अब उन्हें लगने लगा कि उन्हें फिर से फिल्मों में काम करके फिर से अपना व्यवसाय शुरू करना चाहिए| कुल्लू – मनाली में वे ओशो से मिले और अपनी मंशा उनके सामने जाहिर की तो ओशो ने उनसे पूछा कि क्या वे फिर से फिल्मों में काम कर सकेंगें| विनोद के हाँ कहने पर ओशो ने उनसे भारत में पूना के मुख्य आश्रम और समूचे एशिया में ओशो के काम का नेतृत्व संभालने के लिए कहा| विनोद बाद में जवाब देने की बात करके बम्बई आ गये| गुरु को ना कहना उनके लिए जीवन का सबसे कठिन फैसला रहा होगा| ओशो के बहुत नाम वाले शिष्य इस जिम्मेदारी को संभालने के लिए उत्सुक रहते| बाद में फ्रांसिस फोर्ड कपोला की The Godfather के निर्माता Albert S Ruddy की पत्नी ने ओशो आश्रम का काम संभाला| विनोद फ़िल्मी दुनिया में लौट आए जिसने उन्हें फिर से आँखों पर लिया और शीघ्र ही इंसाफ और सत्यमेव जयते जैसी फिल्मों से विनोद खन्ना हिंदी फिल्म उधोग में सितारे के रूप में वापसी कर चुके थे| विनोद अब इस संसार में रहते हुए अपनी साधना करना चाहते थे और संभवतः इसी संभावना के कारण कि विनोद के अंदर दो अलग हिस्से न हो जाएँ, और बाहर की दुनिया की मुसीबतों में विनोद गुरु के सामीप्य को और आश्रम को अपना अस्थायी सहारा ना बना लें, ओशो ने विनोद को अपने से दूर कर दिया और ओशो के देह छोड़ने से पहले विनोद फिर कभी उनके दर्शन नहीं कर पाए| गुरु कभी साथ देकर और कभी जरुरत के अनुसार दूरी बरतकर शिष्य की सहायता करते हैं, अध्यात्मिक यात्रा पर| ओशो ने विनोद की उस समय की मानसिकता को देखते हुए को सांसारिक जीवन में ढकेल दिया ताकि विनोद आधे अधूरे ढंग से सब कुछ न करके वही करें जिसमें उस समय उनका मन रमा हुआ था| जिसमें मन रमे वही काम साधना बन जाता है| ओशो ने यही सिखाया था| यहाँ तक कि चेन स्मोकर विनोद को सिगरेट भी होशपूर्वक साक्षी भाव से पीने की राह दिखाई थी| आश्रम में व्यतीत समय और गुरु के सामीप्य में उपलब्ध विशुद्ध अनुभूतियों के कारण विनोद के पास अस्त्र-शस्त्र थे आश्रम से बाहर की दुनिया, जिसे वे कभी खुद ही छोड़ कर आश्रम चले गये थे, की मुसीबतों से पार पाने के लिए| सांसारिक जीवन में उनके पहले विवाह से उत्पन्न दो बेटे थे, जिनके जीवन में उन्हें सहायता प्रदान करनी थी और हो सकता है कि वे पुनः विवाह करते, जो उन्होंने किया, तो दैनिक जीवन में बहुत सी बातें होती हैं जहां एक इंसान को समझौते करने पड़ते हैं अब विनोद को तय करना था कि वे किस तरह इन सबको जीते हुए अध्यात्मिक जीवन की यात्रा की शुद्धि को बरकरार रखें| अब गुरु का साथ उनके साथ भाव में था, गुरु हरदम उनके साथ थे, पर उनकी भौतिक उपस्थिति उनके साथ न थी| पांच साल बाद तो सभी के साथ ओशो का ऐसा ही अशरीरी संबंध बन गया, जब उन्होंने देह का त्याग कर दिया|

विनोद खन्ना के जीवन से उनकी ओशो के साथ की गई यात्रा और उनकी अध्यात्मिक यात्रा के पहलुओं को नहीं निकाला जा सकता और इन सब बातों का उल्लेख उनके फिल्मों में अभिनय जीवन का विश्लेषण करते हुए भी बेहद जरूरी है|

(ज़ारी)

…[राकेश]

 

अगस्त 2, 2015

Drishyam(2015) : लुका छिपी – अहंकारी पुलिस अधिकारी बनाम सिनेमा भक्त चौथी फेल आम आदमी

Drishyam-001जिसने ‘दृश्यम’ फिल्म का मूल मलयाली संस्करण (मोहन लाल अभिनीत) और कमल हसन अभिनीत तमिल संस्करण नहीं देखे हैं उनके लिए फिल्म का अजय देवग्न अभिनीत हिंदी संस्करण एक अच्छे थ्रिलर देखने का आनंद प्रस्तुत करता है और मूल मलयाली और उसके बाद का तमिल संस्करण भी देखने के लिए प्रेरित करता है|

सब कुछ दर्शक की आँखों के सामने होता है पर तब भी दर्शक तनाव महसूस करते हुए तन कर बैठा रहता है उत्सुकता के साथ देखने के लिए कि आगे क्या होने वाला है? एक अंतिम चाल को छोड़कर फिल्म दर्शक से कुछ भी नहीं छिपाती पर तब भी दर्शक के अंदर से फिल्म का अंतिम दृश्य आने तक तनावग्रस्त उत्सुकता समाप्त नहीं हो पाती|

जिन्होने मूल मलयाली और और उसके बाद बना तमिल संस्करण देखें हैं उनके लिए भी हिंदी संस्करण में रोचकता है और यह तुलनात्मक विश्लेषण करने का अवसर तो है कि कैसे समर्थ अभिनेतागण एक ही कथानक पर बनी फिल्म में अपनी निजता लेकर सामने आते हैं और हर संस्करण में दर्शक को प्रभावित करते हैं| हर संस्करण की गुणवत्ता की मात्रा कम ज्यादा हो सकती है और किसी संस्करण में कुछ और दूसरे संस्करण में कुछ और अच्छा हो सकता है|

इस कथानक से पहली बार हिंदी दृश्यम के माध्यम से परिचित होने वाले दर्शक को फिल्म की स्पष्ट कमियों के बावजूद एक रोचक थ्रिलर देखने के एहसास में कोई कमी महसूस नहीं होती|

एक निर्देशक फिल्म रचता है और उसकी और उसकी फिल्म की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि कितने एकुशालता से वह दर्शक को उस संसार में ले जाता है और उस संसार में दर्शक का विश्वास कायम करवाता है जिसे उसने फिल्म में रचा है| दृश्यम में बात कुछ आगे के कदम की है| यहाँ एक व्यक्ति स्क्रीन से बाहर के वास्तविक जीवन में ऐसी लीला रचता है कि उस लीला में अंजाने शामिल किये गये लोग ही नहीं विश्वास रखते कि जो कुछ वे कर रहे हैं या कह रहे हैं वह सच का हिस्सा है बल्कि जिनके लिए या जिनके सामने लीला रची गई है वे इस संदेह को रखने के बावजूद कि लीला वास्तविक नहीं है बल्कि रचाई गई है, उस पर विश्वास करने के लिए विवश हैं क्योंकि उनके पास कोई सुबूत नहीं है कि लीला नकली है जबकि लीला की सच्चाई के पक्ष में ढेरों सुबूत हैं|

फिल्म की पृष्ठभूमि की बात करें तो गोवा में विजय सालगांवकर (अजय देवग्न) केबल टीवी का छोटा सा व्यापार चलाता है| विजय फिल्मों का हद दर्जे का रसिया है और सारी सारी रात अपने ही केबल पर फ़िल्में देखता रहता है और सुबह होने पर ही घर जाता है| फिल्मों का रसिया वह इस हद तक है कि उसने लगभग सारी बुद्धिमत्ता फिल्मों से ही सीखी है| शिक्षा के नाम पर वह चौथी कक्षा भी उत्तीर्ण नहीं कर पाया था| अतः सिनेमा ही उसका अध्यापक रहा है और फ़िल्में ही उसकी किताबें रही हैं| फिल्मों ने ही उसे शातिर दुनिया से जूझने से पार पाने के नुस्खे सिखाये हैं जिन्हें वह अपने दैनिक जीवन में लागू भी करता रहता है| मसलन उसके इलाके के पुलिस स्टेशन के बेहद भ्रष्ट सब-इन्स्पेक्टर गायतोंडे के अत्याचार से ग्रसित एक वृद्ध दंपत्ति के यह कहने पर कि गायतोंडे ने उनके बेटे को एक प्राइवेट फाइनेंस कम्पनी, जो गायतोंडे का भाई चलाता है, के कर्जे की अंतिम किस्त समय पर न देने के कारण गैर-कानूनी रूप से उठवा लिया है और उसका कोई अता-पता नहीं है, विजय अपनी देखी किसी फिल्म से याद करके उन्हें सलाह देता है कि उन्हें कोर्ट में अपने बेटे की बरामदी के लिए Habeas corpus की याचिका दायर करनी चाहिए तब कोर्ट पुलिस को आदेश देगा कि उनके बेटे को कोर्ट में प्रस्तुत किया जाए और गायतोंडे कुछ भी नहीं कर पायेगा|

गायतोंडे और विजय का आपस में छत्तीस का आँकड़ा है और गायतोंडे विजय को सबक सिखाने की फिराक में रहता है पर विजय के चातुर्य और वाक्पटुता से हमेशा मुँह की खाकर अपमान का घूँट पीकर रह जाता है|

विजय अपनी पत्नी नंदिनी (श्रेया सरन) और दो बेटियों, बड़ी अंजू (इशिता दत्ता) जो कालेज में पढ़ती है और छोटी बेटी अनु, जो कि सात-आठ साल की है, के साथ एक हँसी खुशी वाला वैसा घरेलू जीवन बिता रहा है जहां लोग छोटी छोटी बातों में खुशियाँ हासिल करके संतोषी जीवन व्यतीत करते हैं|

पर विजय के परिवार के इस हँसी खुशी से चलते जीवन में अचानक एक भूचाल आ जाता है, जब सैम, नामक एक अमीर बिगडैल लड़का एक ग्रहण बन कर विजय के परिवार को ग्रसित करने आ धमकता है|

सैम एक परिभाषित अपराध अंजू के खिलाफ कर चुका है, और उस अपराध की सामग्री के आधार पर वह अंजू और उसकी माँ के सामने आपत्तिजनक प्रस्ताव रखकर उन्हें ब्लैकमेल कर रहा है कि या तो अंजू या उसकी माँ उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए अन्यथा वह अंजू की जिंदगी बर्बाद कर देगा| दर्शक की आँखों के सामने सब कुछ हो रहा है और निस्संदेह हर दर्शक की सहानुभूति अंजू और नंदिनी के साथ होनी तय है, छीना झपटी में हादसा होता है और अंजू और नंदिनी के बिना चाहे सैम की मौत हो जाती है| एक घरेलू से परिवार की लड़की और उसकी माँ, क़ानून की नजरों में सैम की हत्यारिनें हैं, पर दर्शक की नजरों में? दर्शक ने सब देखा है, अतः उसकी नज़र में यह एक हादसा है| घरेलू, सीधे सादे लोग ऐसी स्थिति में क्या करेंगे? पुलिस के नाम से ही उनकी रूह कांपने लगती है| घबराहट में नंदिनी और अंजू सैम को अपने बगीचे में, खाद बनाने के लिए खोदे गये गड्ढे में दफ़न कर देते हैं और उन दोनों की इस हरकत को न केवल दर्शक बल्कि नंदिनी की छोटी बेटी अनु भी देखती है| जब तक विजय घर पहुंचे यह सब हो चुका है|

विजय क्या करेगा? कोई भी क्या करेगा? विजय के लिए उसका परिवार ही सब कुछ है| उन्हें बचाने के लिए वह कुछ भी करेगा पर एक लड़के की मौत हुयी है और अंजू यह कह कर विस्फोट करती है कि सैम गोवा की पुलिस की आई.जी मीरा देशमुख (तबू) का बेटा था|

पुलिस अपने आई.जी के लापता बेटे की तलाश में है, जिसकी कार उन्हें एक विवादास्पद स्थल पर उपस्थित झील से मिलती है| सच्चाई केवल विजय, उसकी पत्नी और उसकी दोनों बेटियों को पता है| पुलिस और विजय के बीच एक कड़ी है गायतोंडे, जिसने विजय को सैम की कार में बैठते देखा था, पर गायतोंडे की विजय से दुश्मनी जगजाहिर है और पुलिस के लोकल अधिकारी भी इस बात से वाकिफ हैं तो गायतोंडे के विजाप को केस में लपेटने के प्रयास को उसकी निजी खुन्नस समझा जाता है पर चूँकि पुलिस के पास कोई और रास्ता नहीं है तो शक की सुईं विजय के ऊपर ही अटका कर पुलिस छानबीन शुरू करती है| अब फिल्म दो लोगों के बीच का टकराव है| अगर मीरा देशमुख जीतती है तो विजय और उसका परिवार जेल जायेगा और अगर विजय जीत जाता है तो वह अपने परिवार को सुरक्षा दे पायेगा| एक आई.पी.एस अधिकारी और एक चौथी फेल आम आदमी की दिमागी जंग को फिल्म इस तरीके से प्रस्तुत करती है कि दर्शक के लिए यह तनाव एक रोचक सामग्री लेकर आता है|

मीरा देशमुख सही काम को करने के लिए गैर-कानूनी तरीके अपनाने में हिचक महसूस नहीं करती और यही हरकतें उसके चरित्र के साथ दर्शक की सहानुभूति कभी भी नहीं पनपने नहीं देते| उसके चरित्र के बरक्स उसके पति, महेश (रजत कपूर) के व्यवहार, और उसकी तार्किक समझ के कारण दर्शक के अंदर शुरू से ही उसके लिए अच्छी भावनाएं रहती हैं| यह बड़ा रोचक मामला है कि क़ानून की रक्षक, राज्य की सबसे बड़ी पुलिस अधिकारी के साथ दर्शक न होकर एक आम आदमी के साथ होते हैं जिसके परिवार को आत्म रक्षा में एक व्यक्ति की मौत का हिस्सेदार होना पड़ा है| क्या कानूनी रूप से सही या गलत है और क्या नैतिक आधार पर सही और गलत है, फिल्म इस बात को उठाती नहीं पर यह द्वंद बना रहता है| जांच कर रहे पुलिस बल में अच्छे अधिकारी भी हैं जो मानवीय व्यवहार करते हैं, तर्क की बात करते हैं, परन्तु मीरा देशमुख और गायतोंडे के सोच विचार और काम करने के तरीके से फिल्म कभी भी पुलिस के साथ सहानुभूति उत्पन्न होने नहीं देती| मीरा देशमुख तो एक स्थिति में आकर फिल्म की विलेन लगने लगती है|

मोबाइल युग में मोबाइल एक बहुत बड़ा सुबूत बन जाता है क्योंकि इसकी काल्स डिटेल्स और इसकी स्थिति जानकर इसके मालिक के बारे में बहुत कुछ पता लगाया जा सकता है| सैम की कार और सैम का मोबाइल ये दो सुबूत हैं जिनकी बिना पर पुलिस को विजय की इस केस में संलिप्तता को साबित करना है और विजय साबित करने पर तुला है कि जिस दिन सैम के गोवा में होने की बात कही जा रही है उस दिन वह गोवा में न होकर पणजी में था|

कौन जीतेगा? क्या विजय का परिवार प्रोफेशनल पुलिस वालों के सामने टिक पायेंगें? उन चारों में से कोई तो कमजोर कड़ी होगा जो पुलिस के टार्चर के समक्ष टूट कर सच बता देगा| आखिर इस परिवार में एक साथ-आठ साल की बच्ची भी है|

इन सवालों को फिल्म बिल्कुल अंत तक ऐसे खींचती है कि दर्शक दम साधे स्क्रीन की ओर देखता रहता है|

पुलिस की जांच संबंधी थ्रिलर होने के नाते फिल्म में तीन आपतिजनक कमियां दिखाई देती हैं|

(1) पुलिस जांच दल के अधिकारी, स्वयं आई. जी समेत कभी भी इस बात को नहीं उठाते कि झील से पाई गई सैम की कार से फिंगर प्रिंट्स के नमूने लें ताकि स्पष्ट हो सके विजय कार चला रहा था या नहीं| पानी में बीस दिन डूबे होने के बावजूद फोरेंसिक साइंस इस बात को नज़रअंदाज नहीं करेगी कि कार के अंदर उपस्थित प्लास्टिक, दरवाजों के मेटल, कार की चाभी,  और शीशे पर विजय की उँगलियों के निशान उपस्थित हो सकते हैं या नहीं| भले ही दुर्लभ हों पर एक सप्ताह से ऊपर पानी में डूबी कारों पर से निशान उठाये गये हैं| कम से कम पुलिस दल को इस बाबत एक संवाद दिया जाना चाहिए ऐसी कहानी में| पुलिस लाई-डिटेक्टर टेस्ट की बात कर सकती है तो फोरेंसिक जांच तो उससे पहले का स्टेप है जांच का|

(2) पुलिस जांच दल जब स्कूल में अंजू से पूछताछ करता है तो वह पुलिस के बिना पूछे ही बता देती है कि दो और तीन अक्टूबर को वे लोग गोवा में थे ही नहीं| जबकि पुलिस उससे सिर्फ इतना पूछ रही थी कि सैम उससे मिलने गोवा आया था या नहीं| यह एक बड़ा संदेह पुलिस के मन में उठना था पर नहीं उठता| यह संदेह उठता है नंदिनी के भी ऐसा ही कहने से जिसकी काट विजय आसानी से कर देता है क्योंकि अब उसके पस स्कूल की प्रिंसिपल के फोन का सुरक्षा कवच है|

(3) विजय कभी भी सैम के फोन से लिए गये वीडियो की बात अपने परिवार से नहीं करता| जैसे सिम कार्ड बचा है वैसे मेमोरी कार्ड भी तो बचा रह सकता है| हो सकता है वह मोबाइल के टूटने में नष्ट हो गया हो पर उसका जिक्र उसे अंजू और नंदिनी से अवश्य ही करना चाहिए था किसी संवाद में| खासकर तब जब वे आउट हाउस की सफाई कर रहे थे|

कौन सही है? यह प्रश्न उठना वाजिब है और जैसा कि नंदिनी विजय से कहती है कि सैम के मरने के बाद उन्हें घबराहट में उसे जमीन में दफनाना नहीं चाहिए था बल्कि पुलिस को सब सच बता देना चाहिए था, ऐसा ही भाव दर्शक के अंदर उठना स्वाभाविक है| विजय नंदिनी को जवाब देता है कि अंजू की जिंदगी बर्बाद हो जाती|

मीरा देशमुख के क्रियाकलापों को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि उसके दबाव में पुलिस इस बात को साबित होने देती कि आत्मा रक्षा में अंजू और नंदिनी के हाथों सैम मारा गया और सैम के किये अपराध के सुबूत को जरूरी नहीं कि केस में दर्ज भी किया जाता| किसी भी दृश्य में, यहाँ तक कि बिल्कुल अंत में भी मीरा देशमुख के किसी भी अंदाज से ऐसा नहीं लगा कि वह वही करती जो कानूनी और नैतिक दृष्टि से सही था| एक हद तक आकर उन्हें अपने बेटे के बारे में काफी कुछ पता लग जाता है पर न मीरा देशमुख न उसका पति अपने बेटे की करतूत पर कोई भी अफसोस जाहिर नहीं करते| ऐसे में यह एक पुलिस अधिकारी की ताकत और एक आम आदमी के दिमाग की ताकत का खेल बन जाता है जैसा कि विजय भी नंदिनी से कहता है कि अब यह एक खेल है जिसमें जीत भी हो सकती है और हार कर वे सब कुछ गँवा भी सकते हैं पर वे लोग अंत तक डट कर मुकाबला करेंगें|

वैसे इस फिल्म का एक दूसरा भाग भी संभव है जहां नंदिनी और अंजू पुलिस को भी सूचित करती हैं और तब विजय अपनी सिनेमाई मास्टरी की बदौलत अदालत में मीरा देशमुख के गैर-कानूनी और पक्षपाती पुलिसिये रवैये को टक्कर देता है और कानूनी जंग जीतता है|

यह फिल्म भी ‘अग्ली’ और कुछ अन्य फिल्मों की तरह स्थापित करती है कि कैसे पुलिस का व्यवहार अलग होता है वी.आई.पी मामलों और आम आदमी से जुड़े मामलों को लेकर| यहाँ मीरा देशमुख पुलिस की आई.जी है तो उसके बेटे की तलाश के लिए सारा पुलिस विभाग सिर के बल खड़ा होकर काम करता है और मनमुताबिक परिणाम पाने के लिए कानूनी और गैर-कानूनी तौर तरीकों की भी परवाह नहीं करता|

अभिनय की जिस गहराई के लिए तबू की एक अभिनेत्री की ख्याति है वह इस फिल्म में पूरी तरह नजर नहीं आती| जिस दृश्य में तबू का प्रवेश फिल्म में होता है उस दृश्य में वे इतने अप्रभावी ढंग से अभिनय करती हैं कि अपनी भूमिका में मिसफिट लगती हैं| गायब बेटे की तलाश में एक माँ के भाव तो वे बखूबी दर्शा देती हैं पर एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में वे संतुलन नहीं ला पाईं| उनके अभिनय को देख दर्शक एक संतुष्टि के भाव से भर जाया करते हैं जैसा उन्होंने हाल में हैदर फिल्म में दिखाया पर यहाँ वे ऐसा नहीं कर पायीं| उनके चरित्र के पति की भूमिका में रजत कपूर एकदम सटीक चुनाव लगते हैं और बेहद असरदार अभिनय करते हैं|

अजय देवग्न की शारीरिक उपस्थिति परदे पर इस भूमिका के लिए एकदम उपयुक्त लगती है| एक तरफ आम, छोटे व्यापार वाले घरेलू आदमी की मांग को अपने आह्व-भाव से पूरा कर पाते हैं दूसरा उनको देखकर दर्शक को यह भरोसा रहता है कि यह आदमी पुलिस बल से टक्कर ले सकता है| उन्हें निर्देशक और सेट-डिजायनर से इस बात की चर्चा अवश्य करनी चाहिए थी कि उनके चरित्र के आर्थिक स्तर के अनुसार उन्हें बहुत बड़ा घर दे दिया गया है रहने के लिए|

भिन्न-भिन्न भूमिकाएं निभाने की उत्सुकता ने उनके अभिनय जीवन को दीर्घकालिकता और रोचकता प्रदान की है| चालू किस्म की भूमिकाएं करते करते वे बीच बीच में कुछ भिन्न करते रहे हैं|

श्रेया सरन और उनकी बेटियों की भूमिकीयें निभाने वाली इशिता दत्ता और बाल कलाकार ने अजय देवग्न के किरदार का अच्छा साथ निभाया है क्योंकि इन चारों की आपस में ट्यूनिंग का फिल्म में महत्वपूर्ण स्थान है और वे एक ऐसा परिवार दिखाई दिए जिसके सदस्य आपस में बेहद करीब हैं और संकट काल में एक बड़े पारिवारिक राज को अपने सीने में सुरक्षित छिपा कर रख सकते हैं और एक दूसरे के लिए कष्ट सह सकते हैं|

सब इन्स्पेक्टर गायतोंडे की भूमिका निभाने वाले अभिनेता का काम शानदार है|

सहायक भूमिकाओं में नज़र आने वाले अभिनेतागण भी प्रभावशाली हैं|

विशाल भारदवाज ने अच्छा संगीत रचा है और ‘कार्बन कॉपी’ गीत खासा लुभाता है खासकर उसमें जिस तरीके से सीटी की धुन का उपयोग किया गया है वह बेहद कर्णप्रिय है|

 …[राकेश]

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