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Cinema, Theatre, Music & Literature

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Indian Cinema

इरफ़ानियत : अभिनय और इंसानियत के मिश्रण से निकला X- फैक्टर

आम दर्शक किसी अभिनेता को कैसे जाने? अभिनेता नाटक करता हो तो उसके द्वारा नाटक में निभाए गए चरित्रों (चुनाव) के द्वारा या उन भूमिकाओं में उसके अभिनय की गुणवत्ता के द्वारा? अभिनेता सिनेमा के संसार में कार्य करता हो... Continue Reading →

समय साक्षी है (हिमांशु जोशी) : बहुत कठिन है डगर राजनीति की!

एक अच्छी कृति की पहचान यही होती है कि वह समय समय पर जीवित होता रहती है और भिन्न-भिन्न काल की पीढ़ियों को अपने से जोड़ती रहती है। अच्छे सिनेमा का गुज़ारा बिना अच्छे कथ्य के नहीं होता| अब यह... Continue Reading →

Shershah (2021) : कैप्टेन विक्रम बत्रा (पीवीसी) की शहादत

कारगिल का युद्ध एक ऐसा कड़वा इतिहास है जो भारतीय जनमानस से आसानी से हट नहीं पायेगा| जिसने भी उस दौर का मंजर देखा है, उसे कश्मीर की तरफ कूच करती बोफोर्स तोपें और सेना की टुकडियों के वाहनों की... Continue Reading →

राग-विराग (श्रीलाल शुक्ल) : छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार

प्रसिद्द लेखक दिवंगत श्रीलाल शुक्ल जी की यह बेहद अच्छी पुस्तक एक अच्छी फ़िल्म के लिए सम्पूर्ण सामग्री प्रस्तुत करती है| इस प्रेम कहानी में जातिगत भेदभाव का समाज पर और अंततः व्यक्तियों पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह बड़े... Continue Reading →

तुम्हारे लिए (हिमांशु जोशी) : गहन दुख में पगी एक प्रेमकथा

हिन्दी सिनेमा ने शरतचंद्र चटर्जी, टैगोर, बिमल मित्र, समरेश बसु, आदि बंगलाभाषी साहित्यकारों की रचनाओं पर आधारित फ़िल्में बनाई हैं और इन पुस्तकों के कारण ठोस विषय सामग्री मिल जाने के कारण इन सभी फिल्मों का स्तर सराहनीय रहा है|... Continue Reading →

रिम-झिम गिरे सावन (Manzil 1979) : आई बरसात तो लता मंगेशकर ने समां बाँध दिया

इस गीत के स्त्री गायक संस्करण ने दर्शक को बरसात का आनंद खुले आसमान के नीचे दिलवाया है| गीत के लता मंगेशकर संस्करण का फिल्मांकन बम्बई के 1978-79 के दौर का दस्तावेज है| तब बारिश से बम्बई में आतंक नहीं... Continue Reading →

रिम झिम गिरे सावन (Manzil 1979) : महागायक “किशोर कुमार” का सावन वर्णन

बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित फ़िल्म – मंजिल, के इस गीत का फिल्मांकन उस दौर के सामाजिक परिवेश के संकेत देता है| मित्र की शादी के समारोह में उसके घर पर आयोजित पार्टी में वे सबके कहने पर एकदम घरेलू माहौल... Continue Reading →

राह पे रहते हैं (Namkeen 1982) : जल गए जो धूप में तो साया हो गए

वर्तमान में गुलज़ार साब की फिल्मों को जब जब देखा जाता है, तब तब उनके अपने सिनेमाई क्लब के तीन सदस्यों क्रमशः संजीव कुमार, किशोर कुमार और राहुल देव बर्मन, का फ़िल्मी परिदृश्य पर न होना बेहद खलता है| गुलज़ार... Continue Reading →

Mimi (2021) : शिशु के साथ ही नहीं जन्मती माँ…

दुनिया की निगाह में एक युवा स्त्री तभी माँ के रूप में दिखाई देती है जब वह एक नवजात शिशु के साथ एक फ्रेम में साथ दिखाई दे| मानसिक तौर पर जब स्त्री तैयार हो जाती है मातृत्व की ओर... Continue Reading →

Feels like Ishq (2021) : तीन रोचक तीन उबाऊ

Netflix पर प्रदर्शित 6 प्रेम कहानियों पर आधारित फिल्मों की वैब श्रंखला में तीन फ़िल्में, क्रमश: The Interview, Star Host, और Quaranteen Crush ही ऐसी हैं जिनके चरित्र जमीन पर पैर टिकाये लगते हैं जो विश्वसनीय लगते हैं और जो... Continue Reading →

सभी सुख दूर से गुज़रे (Aarambh 1976) : दुःख ही जब जीवन का स्थायी भाव बन जाए

अपनी किशोरावस्था से ही कुंदनलाल सहगल के गायन का दीवाना प्रशंसक बनने से मुकेश को दो बहुत बड़े लाभ हुए| एक तो दुःख के भाव को गायन में प्रदर्शित करने में उन्हें सहजता प्राप्त हो गई और दूसरे गीत में... Continue Reading →

Toofaan (2021) : ठाकुर बनने को 44 इंच का सीना नहीं चाहिए – परेश रावल

लगभग सभी समाज सेवी संगठनों (एनजीओ) का कुछ साल पहले तक एक आम शगल हुआ करता था (बहुतों का अभी भी है और आगे भी होता रहेगा), कि जब वे मैदान में समाज सेवा करने उतरती थीं तो वे जमीन... Continue Reading →

Dilip Kumar उर्फ़ मोहम्मद युसूफ खान और “भारत रत्न”

क्या दिलीप कुमार और भारत रत्न के बीच कुछ फासले हैं? यह तो सर्वत्र स्वीकृत बात है कि हिन्दी सिनेमा में नायक की भूमिकाएं निभाने वाले अभिनेताओं में वे चुनींदा सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में से एक रहे हैं बल्कि हिन्दी सिने... Continue Reading →

दिलीप कुमार : अभिनेताओं के अभिनेता का कालजयी खुमार

मौन साधा परदे पर तो ऐसा कि सन्नाटे के छंद ही बुन दिए और बकर बकर बोल हास्य रचा तो ऐसा कि लगा अभिनेता दिलीप कुमार को ट्रेजडी किंग का खिताब कैसे दे दिया लोगों ने, यह अभिनेता तो हास्य... Continue Reading →

 हंगामा है क्यों बरपा (Ray 2021) : आदतन चोर के घर आदतन चोर

सत्यजीत रे की चार कहानियों से प्रेरित चार फिल्मों के संग्रह में अभिषेक चौबे द्वारा निर्देशित “हंगामा है क्यों बरपा” ही एकमात्र आकर्षक फ़िल्म है जो रे की फिल्मों की टोन के साथ सुर मिला पायी है, बाकी तीनों फिल्मों... Continue Reading →

Haseen Dillruba (2021) : दिल्ली की ‘रानी’ के शोले ज्वालापुर में

पिछली सदी के सत्तर के दशक में बी आर चोपड़ा ने एक बेहतरीन मर्डर मिस्ट्री बनाई थी – धुंध, जिसमें अपने पति के खून का आरोप है रानी (जीनत अमान) पर| २०१३ में फ़िल्म आई क्वीन, जिसकी दिल्ली वासी रानी... Continue Reading →

Grahan (2021): सन चौरासी का दाग भरा इतिहास

किताब पर बनी फ़िल्म में यह अक्सर ही होता है कि किताब भारी पड़ जाती है और उसमें उपस्थित बातें परदे पर रूपांतरित नहीं हो पातीं| लेकिन ग्रहण कई बार किताब से ऊपर चली जाती है और किताब में संक्षिप्त... Continue Reading →

Sherni (2021): विकास और वन्य जीवन के मध्य संतुलन की शिक्षा

तकरीबन तीन दशकों से “शेरनी” शब्द का सम्बन्ध श्रीदेवी और शत्रुध्न सिन्हा अभिनीत एक बेहद सामान्य और फ़ॉर्मूला छाप हिन्दी फ़िल्म से जुड़ा रहा है| अब जाकर विद्या बालन अभिनीत शेरनी फ़िल्म ने इस शब्द को सही मायने दिए हैं,... Continue Reading →

Skater Girl (2021) : अवसर और परिवर्तन

दक्षता, किसी भी क्षेत्र में हासिल की जाये, मुक्ति प्रदान करती ही करती है, नयी संभावनाओं के द्वार खोलती है, उड़ान भरने के लिए प्रेरित करती है| परिवर्तन लाने के लिए अवसर का होना भी आवश्यक है| अगर जेसिका (Amy... Continue Reading →

Shikara (2020) : कैंसर चिकित्सा पर श्वेत पत्र के बदले हीलिंग टच थेरेपी पर लघु पत्र

थल थल में बसता है शिव हीभेद ना कर क्या हिंदू-मुसलमांज्ञानी है तो स्वयं को जानवही है साहिब से पहचान  [संत ललद्यद (1320-1392) कश्मीरी शैव भक्ति की संत कवियित्री]फ़िल्म -शिकारा, में तीस साल बाद अपने गाँव वापिस जाने वाले शिव... Continue Reading →

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