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Skater Girl (2021) : अवसर और परिवर्तन

दक्षता, किसी भी क्षेत्र में हासिल की जाये, मुक्ति प्रदान करती ही करती है, नयी संभावनाओं के द्वार खोलती है, उड़ान भरने के लिए प्रेरित करती है| परिवर्तन लाने के लिए अवसर का होना भी आवश्यक है| अगर जेसिका (Amy... Continue Reading →

Shikara (2020) : कैंसर चिकित्सा पर श्वेत पत्र के बदले हीलिंग टच थेरेपी पर लघु पत्र

थल थल में बसता है शिव हीभेद ना कर क्या हिंदू-मुसलमांज्ञानी है तो स्वयं को जानवही है साहिब से पहचान  [संत ललद्यद (1320-1392) कश्मीरी शैव भक्ति की संत कवियित्री]फ़िल्म -शिकारा, में तीस साल बाद अपने गाँव वापिस जाने वाले शिव... Continue Reading →

रोज़ रोज़ आँखों तले [जीवा (1986)] : मिसरी सी मीठी पहेली

यह अत्यंत मीठा गीत गुलज़ार साब के कुछ ऐसे गीतों में से एक है जिसके बोल सुनकर श्रोता को यह एहसास तो होता जाता है कि बात कुछ महत्वपूर्ण कही जा रही है लेकिन इस कृपा से वह वंचित रहता... Continue Reading →

Tribhanga (2021): Tedhi Medhi Crazy

इंसान सिर्फ आनंद दायक वस्तुओं या घटनाओं में ही अटक कर नहीं रह जाता, बहुत बार तो जीवन में घटित ऋणात्मक भी जीवन को ऐसे घेरे में बाँध लेता है कि पीड़ित व्यक्ति बाकी सारी उम्र सिर्फ उस ऋणात्मक घटना... Continue Reading →

Pagglait (2021) : आस्तिक की तेहरवीं, संध्या की मुक्ति

फ़िल्म “राम प्रसाद की तेहरवीं” के ढांचें में फ़िल्म “क्वीन” की रानी (कंगना रनौत) को रख दें तो “पगलेट” और इसकी नायिका संध्या (सान्या मल्होत्रा) की बुनियाद दिखाई देने लगेगी| फ़िल्म है तो एक युवा व्यक्ति – आस्तिक, की मृत्यु... Continue Reading →

राम प्रसाद की तेहरवीं (2019) : कोई किसी का नहीं, ये झूठे नाते हैं नातों का क्या

सीमा भार्गव (अब पाहवा) ने “बड़की” के चरित्र में जिस क्रांतिकारी धारावाहिक “हम लोग” में काम किया, उसके पीछे भारत के हिन्दी के एक बहुत बड़े लेखक मनोहर श्याम जोशी की विद्वता, समाज शास्त्र और विशेषकर भारतीय समाज की विशद... Continue Reading →

Geeli Pucchi [Ajeeb Daastaans (2021)] : अपनी परेशानियों और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त लोगों की स्वहित साधने की बारीक चालें

लघु फ़िल्म Juice (2017) के बाद निर्देशक - लेखक नीरज घायवान दर्शकों को सोचने विचारने के लिए प्रेरित करती हुई एक और स्त्री केन्द्रित फ़िल्म – गीली पुच्ची, लेकर आये हैं| एक लघु उद्योग में प्रोडक्शन विभाग में कार्यरत भारती... Continue Reading →

Dil Bechara (24.07.2020) : मौत के कुएं में विचरते ‘आनंद’ और ‘मिली की प्रेमकहानी

  फ़िल्म – दिल बेचारा, की विशेषता है मौत के निराशा भरे माहौल में प्रेम के आशामयी अंकुर उगाना| मौत का छाता तना होने के बावजूद प्रेम की कोंपले फूट पड़ती हैं और इस तरह यह एक सफल प्रेम की... Continue Reading →

धूप आने दो (2020) : “गुलज़ार एवं ‘विशाल+रेखा’ भारद्वाज” की वैदिक सूर्य स्तुति

‘सूरज की पहली किरण से आशा का सवेरा जागे’ जीनियस किशोर कुमार द्वारा रचित पंक्ति गागर में सागर भरने की उक्ति को चिरतार्थ कर देती है| धरा पर मानव जीवन पर छाए “कोविड-19” के गहरे धुंध भरे साये तले सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक... Continue Reading →

guLaBO SITaBO (2020) : अमिताभ को नकली नाक और सिर पर गमछे के पीछे काहे छिपा दिया बे!

कम अक्ल, रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसी छोटी मोटी साजिश भारी हरकतें, जिन्हे सब जानते हों, करने वाले बुजुर्ग के चरित्र से दर्शक कैसे जान-पहचान कर पाएंगे? अगर वह अपना मुंह ढके रहे और आँखें भी बेहद मोटे चश्मे के... Continue Reading →

पाताल लोक (2020) : अपराध, राजनीति, मीडिया और पुलिसिया गठजोड़ का चिट्ठा

हिन्दी सिनेमा के अब तक के इतिहास में राजनीतिक थ्रिलर वर्ग में श्रेष्ठ फ़िल्मों में गुलज़ार लिखित और रमेश शर्मा निर्देशित “न्यू दिल्ली टाइम्स (1987)” के बाद हाल में अमेज़न प्राइम वीडियो पर प्रदर्शित क्राइम और राजनीतिक थ्रिलर वैब सीरीज़... Continue Reading →

Sacred Games (2018,2019) : खोजा परमाणु बम, निकला गुरुजी!

श्रंखला के दूसरे सीज़न में उपस्थित कमजोरियों में सबसे बड़ी कमजोरी हर षड्यंत्र का सूत्रधार गुरुजी को दिखाना ही है| कथा का सारा वज़न इस कोण पर गिर जाता है| दुनिया में बहुत से षड्यंत्रकारी सिद्धान्त चलते रहते हैं| इनमें... Continue Reading →

Sacred Games (2018,2019) : क्या श्रंखला सिख संप्रदाय का अपमान करती है?

सिख धर्म का अपमान करना तो श्रंखला के लेखकों, निर्देशकों और प्रस्तोता का आशय  बिलकुल भी नहीं रहा होगा पर उन्होने अतार्किक गलती अवश्य की या उनसे ऐसी अतार्किक गलती अवश्य ही हुयी या हो गई| इस पर आने से... Continue Reading →

Sacred Games (2018,2019) : दर्शक के भ्रम की आंच पर पकता खेल

किसी भी फ़िल्म में बड़े और महत्वपूर्ण चरित्रों को पा जाने वाले अभिनेताओं में अपने आप एक ऊर्जा भर जाती है और हर काबिल अभिनेता उसका लाभ उठाता है| पर अकसर ही कम महत्व वाले या छोटे काल के लिए... Continue Reading →

थप्पड़ (2020) : अनुभव सिन्हा कृत हिंसा हिंसा न भवति!  

थप्पड़ : (बस इतनी सी बात), निर्देशक अनुभव सिन्हा की सामाजिक मुद्दों पर टीका टिप्पणी वाली श्रंखला की अगली कड़ी है जिसमें व्यावसायिक करियर के अपने स्वप्न पर अपने ऑफिस द्वारा नियंत्रण करने से बेहद नाराज़ युवक अपने ही घर... Continue Reading →

रमैय्या वस्तावैय्या (Shri 420) … राम तेरा दिल और कर्म मैले

आग, बरसात से होते हुए आवारा तक फिल्म दर फिल्म अपने निर्देशकीय कौशल का परचम ऊंचा और ऊँचा करते हुए Shri 420 में निर्देशक राज कपूर अपनी निर्देशकीय प्रतिभा का शिखर छू जाते हैं| इस गीत के सिनेमाई रूपांतरण में... Continue Reading →

Juice (2017) : क्वथनांक से बस एक डिग्री कम

लघु फ़िल्म “जूस” अच्छे निर्देशन और अच्छे अभिनय से सजी हुई है| घरेलू माहौल में पार्टी के दौरान कमरों के सीमित स्पेस में असरदार तरीके से फ़िल्म को फिल्माया गया है| चरित्रों की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं को बहुत कुशलता से... Continue Reading →

Chutney (2016) : सच और कल्पना के पाटों के बीच पिसता हुआ होश

कहानी सुनाना तो एक कला है ही और कहानी को इस तरीके से सुनाना कि सुनने वाले साँस रोक कर सुनने के लिए बाध्य हो जाएँ तो ऐसी कथा वाचन कला बेहतरीन कला का नमूना बन जाती है| कहानी की... Continue Reading →

Mumbai Varanasi Express (2016) : मौत के आगोश में संतुष्ट जाने का दर्शन

जीवन का खेल बड़ी तेजी से चलता है, जीवन के खिलौने एक के बाद एक पीछे गिरते जाते हैं, और भुला दिए जाते हैं| जीवन को जीने या जीवन को सुख सुविधा से भरपूर तरीके से जीने के साधन जुटाने... Continue Reading →

Mr Kabaadi (2017) :  भारत में काम होता बड़ा या छोटा, बनाता मनुष्य को चलता या खोटा

फ़िल्म के अंतिम दृश्य में कैमरे की ओर पीठ करे सड़क पर जा रहे रूहानी सुकून देने वाले इत्र और सुरमा प्रदानकर्ता छन्नू खान (ओम पुरी) अचानक पलटते हैं और कैमरे की मार्फ़त अभिनेता ओम पुरी दर्शकों से मुखातिब होते... Continue Reading →

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