Kamran Akbar Khan - Mirza Ghalib | Facebook

ग़ालिब के किशोरवय के काल में उनके ससुर द्वारा उनसे किए जाना वाले दोस्ताना और उनके प्रति सम्मान और प्रशंसा रखने वाले रुख ने ग़ालिब को एक शायर के विकसित होने वाले शुरुआती दौर में बेहद प्रोत्साहन दिया होगा| पिछले अध्याय में उर्दू, खड़ी बोली और फारसी के मिले जुले असर से उपजी हिन्दुस्तानी भाषा की तहज़ीब का जलवा गुलज़ार ने बिना ढ़ोल मंजीरे पीटे बड़े स्वाभाविक अंदाज़ में दर्शा  दिया| आंचलिक शब्दावली के उपयोग से भी वे नहीं चूके| गली में पड़े कंचे को उठाते समय बेग़म के पूछने पर वृद्ध ग़ालिब एक युवा ऊर्जा से भर कर कहते हैं,

‘कंचा है किसी लौंडे का रह गया है’

किशोरावस्था में आगरे से दिल्ली रहने आने पर इसी गली कासिम में इसी जगह तो वे हम उम्र लड़कों के साथ कंचे खेला करते थे| उस एक कंचे ने ग़ालिब के जीवन के कितनी परतें खोल दीं| यहीं खेलते खेलते उन्होंने शायरी के जगत में अपने सुखद भविष्य के सपने बुनने शुरू किए, अपनी बेग़म संग किशोरावस्था से ही वक्त्त बिताते कब उन दोनों में परस्पर मैत्री और प्रेम बढ़ गए होंगे इसका पता ही नहीं चला होगा|

हिन्दुस्तानी ज़ुबान और हिन्दुस्तानी तहज़ीब, दोनों का रस पहले अध्याय से ही चारों और रिसता है और दूसरे अध्याय में तो यह अपने पूरे शबाब पर रहता है|

आगरे से ग़ालिब के बाल सखा बंसीधर दिल्ली आए हैं| इक्के की सवारी के हिसाब से दिल्ली आगरे के बीच काफी लंबा रास्ता है और रास्ते भर बंसीधर और इक्के वाले के मध्य वार्तालाप भी हुये होंगे तभी ग़ालिब के घर के बाहर रुकते ही इक्के वाला कहता है कि दिल्ली का यह घर आगरे वाले कला महल के सामने काफ़ी छोटा लगता है|

बंसीधर के पूछने पर कि क्या आगरे में भी वह मिर्ज़ा को जानता था? इक्के वाला खुश होकर बयान करता है कि छुटपन में बंशीधर और असद कला महल की छत से पतंग उड़ाते थे और वे दोनों राजा बलवान सिंह की खूब पतंगे काट करते थे और वह और उसके साथी इन्हें लूटा करते थे|

ग़ालिब के घर की घरेलू सहायिका वफ़ादार तुतलाती है और उसे ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में ज्यों का त्यों रखा गया है| वफ़ादार को ग़ालिब और बंसीधर की गहन मित्रता का पूरा ज्ञान है और बंसीधर समय- समय पर वहाँ आते रहते हैं, इसी नाते वह बड़े आदर सम्मान और अतरंगता के साथ बंसीधर का स्वागत करती है|

बंसीधर पूरे अधिकार लेकिन तहज़ीब से वफ़ादार से अंदर बेग़म को अपने आने की सूचना देने और दूसरे घरेलू पुरुष सहायक कल्लू मियां को बाहर आकर सब्जियों से भरे टोकरे उठाने के लिए बाहर आने के लिए कहते हैं| वे बेहद नर्म लहजे से आगरे से उन्हें दिल्ली लाये इक्के वाले सारथी को पास ही स्थित एक सराय में आराम के लिए जाने के लिए कहते हैं|

“आज रात तो हम आगरे जाएंगें नहीं, यहीं ठहरेंगे अपने दोस्त के यहाँ”

तो हम भी अपनी बिटिया के यहाँ ठहर जाएँगे| यहीं दिल्ली में ब्याही है| कल सुबह फिर हाजिर हो जाएंगें|

टोकरी से एक बड़ा सा काशीफल देते हुये बंसीधर कहते हैं –

ये तो बहुत अच्छी बात है तब ऐसा कीजिये बिटिया को हमारी तरफ से ये दीजिएगा| खाली हाथ नहीं जाते बिटिया के यहाँ|

आज के दर्शक को दिखाई देता है कि ऐसी परंपरा का पालन सदियों से होता आता रहा होगा|

तहज़ीब का असली प्रदर्शन होता है घर के प्रांगण में बंसीधर के खाँस कर प्रवेश करने के बाद|

कमरे से निकलकर एक स्तम्भ की आड़ में खड़े होकर बेग़म कहती हैं –

आदाब अर्ज करती हूँ लाला जी

आदाब भाभी

अभिवादन करते, बेहद तमीज़ भरे शारीरिक हावभाव को अपनाते हुये प्रसन्न होकर बंसीधर स्तम्भ के दूसरी और आकर खड़े हो जाते हैं|

बंसीधर के वहाँ तक आने और निहायत ही तमीज़ से खड़े होकर आँखों को ज़मीन पर टिका कर बात करने से भारतीय मिथक परंपरा से यहाँ सीता और लक्ष्मण की याद आना स्वाभाविक है|

बंसीधर दुबारा धीमे स्वर में लेकिन बेहद प्रसन्नचित भाव से अभिवादन करते हैं –

आदाब भाभी| कैसी हैं आप

शुक्र है अल्लाह का

प्रसन्न स्वर में –

मिर्ज़ा कैसे हैं| हमारे यार को तो आपने बस दिल्ली का ही कर लिया| आगरे का रुख ही भूल गए|

अभी परले रोज़ ही आपको याद कर रहे थे|

एकदम से गंभीर स्वर में –

किले में रसाई का कोई वसीला बना कि नहीं अभी तक

बेग़म कोई जवाब नहीं देतीं तो इस अनुत्तरित भाव को भाँप कर बंसीधर कहते हैं –

क्या बात है भाभी आपकी खामोशी में मुझे शिकायत सुनाई देती है|

भाई साहब क्या अर्ज़ करूँ! उनकी ज़िद और आना से आप वाकिफ हैं| मेवाफरेशों से उधार मांग लेते हैं लेकिन किसी साहिबे आला का एहसान लेने को तैयार नहीं| कर्ज मांगते ज़रा नहीं झिझकते लेकिन एहसान लेते शर्म से ज़मीन में गड़ जाते हैं| अब्बा थे जब तक किसी से कह सुन लिया करते थे अब वो भी नहीं कि कोई सिफ़ारिश ही कर दे| उठना बैठना भी ऐसे कमजर्फ लोगों के साथ हो गया है कि ….हमें  तो बिलकुल नहीं भाता| शराब और जुआ भी भला ज़ेब देता है उन्हें? लिल्लाह ये न समझिएगा कि शौहर की शिकायत कर रही हूँ, आप बचपन के दोस्त हैं उनके, इसी से जुबां खुल गई|

उपरोक्त्त संक्षिप्त से वार्तालाप से बंसीधर की ग़ालिब से गहन मित्रता और ग़ालिब की बेग़म संग उनकी सहजता के दर्शन ही नहीं होते बल्कि ग़ालिब के स्वाभाविक चरित्र और उनकी मौजूदा गतिविधियों का परिचय भी मिल जाता है| ग़ालिब की खुद्दारी कितने ऊंचे दर्जे की है, यह पता लग जाता है|

धन का कर्ज मांगना उन्हें अंदर से विचलित नहीं करता क्योंकि उन्हें पता है वे बाजार में व्यावसायिकों से कर्ज लेते हैं जिन्हें वे ब्याज समेत धन चुका देंगे जब भी वे दे पाने की स्थिति में होंगे| कर्ज देने वाले व्यापारी उन्हें कर्ज देकर उन पर कोई अहसान नहीं कर रहे बल्कि अपना व्यापार कर रहे हैं| किसी से व्यक्तिगत अहसान लेना मिर्ज़ा को सख्त नागवार गुजरता है, और किसी बड़े पद वाले रसूख वाले व्यक्ति का अहसान लेने से उन्हें सख्त परहेज है|

वे एक शायर हैं, एक कलाकार हैं| उनकी शायरी, उनकी कला, उनकी विद्वता उन्हें वह स्थान दिलाये जिसके वे अधिकारी हैं| कोई रसूख वाला उनकी सिफ़ारिश करके उन पर अहसान लाद कर सत्तानशीनों से उन्हें कोई स्थान दिलवा दे, यह उन्हें मंजूर नहीं| वे अपने बलबूते अपनी पहचान चाहते हैं| कोई यह कहे कि उनकी सिफ़ारिश की बदौलत उनकी पहचान बन पाई तो यह उनकी शायरी की तौहीन होगी|

ग़ालिब के चरित्र में एक विद्रोह, एक ताप दिखाई देता है| ऐसे चरित्र के संपर्क में आने वला कलाकार स्वयं ऐसा ही होता है या हो जाता है| गुलज़ार में भी यह विद्रोह और ताप झलकता है|

बंसीधर की आवाज सुन ग़ालिब ऊपरी मंजिल से अपने कक्ष से भर निकल कर अपने बाल सखा को अपनी बेग़म के पास खड़े देख ऊपर से ही प्रफुल्लित स्वर में कहते हैं-

अरे भाई बंसीधर आते ही अदालते आलिया में सुनवाई हो गई| कहाँ रहे इतने महीने?

तुम ही कौन सा चले आए| मैं तो फिर भी दो बार फेरा कर गया यहाँ का|

सब्जियों से भरे टोकरे को देख ग़ालिब बंसीधर को छेड़ते हैं –

ये क्या कुम्हड़ा ककड़ी उठा लाये लाला?

तत्परता से बंसीधर जवाब देते हैं

अब आमों की फसल बारहों महीने तो होती नहीं मियां|

बचपन के घनिष्ठ मित्रों के आपस में मिल जाने के बाद श्रेष्ठ है उन्हें एक दूसरे के साथ वक्त बिताने के लिए छोड़ देना, सो ग़ालिब की बेग़म बंसीधर से ऊपर ग़ालिब के पास जाने के लिए कह देती हैं|

बंसीधर ने ऊपर ग़ालिब के कक्ष में उनसे वही सब पूछा है जो नीचे ग़ालिब की बेग़म ने उनसे बताया था| इस बातचीत से ग़ालिब की व्यक्तिगत ज़िंदगी की घटनाओं और वर्तमान उनकी वैवाहिक स्थिति का पता चलता है| ग़ालिब कहते हैं –

पहला बेटा जन्मा ही मुर्दा था,  दूसरा चंद माह का हो के गुज़र गया| उनके ग़म से अभी तक बेग़म की आँखें नाम हैं, घर में वे आँखें पढ़ी नहीं जातीं| घर रहूँ तो वे मातम करती दिखती हैं| खुदा परस्त तो वे पहले से थीं अब तो सजदों में खुद को दफन किए रखती हैं|

संतान के दुःख से बेहद दुःखी बेग़म का सामना ग़ालिब ज्यादा देर नहीं कर पाते से बाहर चले जाया करते हैं| कुछ घंटे हाजी मीर की दुकान पर बैठ काट दिया करते हैं बाकी समय जुआरियों के साथ चौसर  खेलने में|

दुरूह परिस्थितियों में जीते और उनका बखान करते हुये भी ग़ालिब का हास्य बोध बरकरार रहता है| वे कहते हैं –

चचा की पेंशन रुकी है या यूं कहिए जमा हो रही है

मित्रता हमेशा मित्र का साथ मांगती है, देना चाहती है, मित्र के साथ समय व्यतीत करना चाहती है,  और चूंकि ग़ालिब और बंसीधर बचपन के मित्र हैं जो किशोरावस्था में शहरों में बस कर दूर ओ गए सो कई मर्तबा दोनों को इस दूरी ने कचोटा होगा, दोनों मन में फिर से एक ही शहर में रहने की भावना ने ज़ोर मारा होगा| फिर ग़ालिब की माँ और छोटा भाई आगरे में ही रहते हैं| उसी नाते संजीदगी से बंसीधर कहते हैं –

जब तुम्हारे ससुर गुजरे, लगा तुम वापिस आगरा आ जाओगे पर लगता नहीं दिल्ली छोड़ोगे तुम

इस बाबत ग़ालिब के भीतर का शायर कह उठता है  –

 

है अब इस मामूरे में कहते गमें उलफत असद

हमने माना कि रहें दिल्ली में, पर खाएँगे क्या

दिल्ली का जिक्र हुआ है तो गुलज़ार मामला सीधे इब्राहिम ज़ौक़ के घर पहुंचा देते हैं जहां वे अपने चापलूसों से घिरे बैठे हैं और गुनगुना रहे हैं –

कौन जाये ज़ौक पर दिल्ली की गलियां छोडकर

गरचे मुल्के दक्कन में इन दिनों है क़द्र-ए-सुख़न

 

ये महफिल ऐसी है जैसी आम तौर पर सत्ता के नजदीकी लोग सजाया करते हैं| और वहाँ उपस्थित सबसे शक्तिशाली व्यक्ति को छोड़ बाकी सारी दुनिया का उपहास उड़ाया करते हैं|

अपने चापलूसों द्वारा अपने शेर पर दाद पाते ज़ौक़ (शफ़ी इनामदार) आने वाले  मुशायरे आमंत्रित शारों की सूची में असदुल्ला खां ग़ालिब नाम पढ़ कर चौंक जाते हैं और इस नए नाम के बाबत पूछते हैं  कि ये कौन साहब हैं| उन्हें बताया जाता है|

आगरे से आए हैं मोहल्ला बल्लीमारां में रहते हैं

इनके दादा समरकन्द से आए थे शाह आलम के समय| तुर्की बोला करते थे|

इनके वालिद हिंदुस्तान में ही पैदा हुये| लेकिन कुछ बोले नहीं|

(सब लोग हँसते हैं)

ज़ौक़ – और आप असदुल्ला खां ग़ालिब क्या बोलते हैं|

खुद को फारसी का शायर मानते हैं|

ज़ौक़ – खुद ही मानते हैं या कोई और भी मानता है?

दिल्ली वालों को भी मनवाना चाहते हैं|

ज़ौक़ आँखों में चमक लाकर नाम को तौलते हुये और शायद ग़ालिब की शख्सियत की कल्पना करते हुये –

असदुल्ला खां ग़ालिब

ग़ालिब को अभी खबर ही नहीं है कि सत्ताधारियों में उनके नाम का जिक्र हो चुका है और आगरे अर्थात दिल्ली से बाहर का होने के कारण उनके नाम के प्रति एक प्रतियोगी एवं विरोध का भाव उत्पन्न भी हो चुका है| पर इस विकट प्रतियोगी संसार की बात थोड़ा रुक कर क्योंकि पीछे दो बेहद करीबी मित्रों की बातों के बीच से ही उठकर इस दरबारी माहौल में आना हो गया था|

यहाँ ग़ालिब के घर बाहर ड्योढ़ी पर चादर में खुद को लपेटे ग़ालिब और बंसीधर के मध्य का वार्तालाप दुनिया के हरेक दर्शक का दिल चुरा लेगा| जिन्होंने ऋषिकेश मुकर्जी कृत फ़िल्म सत्यकाम (1969) देखी हो उन्हें नायक सत्यप्रिय (धर्मेंद्र) और उनके मित्र नरेन (संजीव कुमार) के मध्य का रिश्ता याद आता होगा| नरेन की ऊपर से आसानी से दिखाई न दे सकने वाली समझौतावादी प्रकृति और प्रवृति का स्मरण हो आता होगा जिसका अच्छा खासा योगदान जगत द्वारा सत्यप्रिय की बलि लेने में होता है|

ग़ालिब चरित्र में सत्यप्रिय जैसे ही बेहद ईमानदार हैं, जगत की चालाकी के समक्ष भोले हैं और उनके साथ ये अच्छा है कि उनका बंसीधर नरेन से अलग है| बंसीधर ग़ालिब की रग रग की धडकन से वाकिफ हैं| वे ग़ालिब की मूल प्रकृति से उलट न कुछ कहना चाहते हैं न करना| वे ग़ालिब के मूल स्वभाव की मर्यादा में ही उनके सबसे गहन मित्र के रूप में उनकी सहायता करना चाहते हैं| वे ग़ालिब के आत्म सम्मान पर बाल बराबर भी बोझ न पड़े इस तरीके से उनकी सहायता करना चाहते हैं| ग़ालिब को घोर मुसीबतों का सामना करते देख उनकी अपनी आत्मा पर बोझ रहता है| ऐसे शानदार मित्र की उपस्थिति अब तक ग़ालिब से गहरे जुड़ चुके दर्शक के लिए बड़ी सान्त्वना लेकर आता है| इसके बाद बंसीधर की स्मृति हमेशा बनी रहती है उनका अभाव खलता है| मित्र हो तो ऐसा!

अब विदाई की बेला है सो ग़ालिब और बंसीधर दोनों संजीदा हैं|  ग़ालिब कहते हैं

यूं छमाही न आया करो आगरा है ही कितना दूर

मैं तो हर मौसम के साथ आ जाता हूँ असद तुम ही नहीं आए कभी

इसका जवाब देते ग़ालिब (और उनके रूप में नसीर)  को देखिये

अब की आऊँगा, रोज़मर्रा की जद्दोजहद से फुर्सत मिले तो आऊँ

बंसीधर (राजेन्द्र गुप्ता) वाक्य को कुछ तोड़ मरोड़ कर कहते हैं –

असद वो तुम्हारे रुपए तो मैं उसे पहुंचा ही दूंगा लेकिन एक बात  बार बार लब पे आके रह जाती है

ग़ालिब तुरंत कुछ अनिश्चितता में फंस कर पूछते हैं –

क्या बात है, कहो न|

जिस व्यक्ति को के भी तरफ से कोई अच्छी खबर सुनने को न मिलती हो वह थोड़ा डर भी जाएगा| बंसीधर ग़ालिब के छोटे भाई के बारे में तो कुछ नहीं कहना चाहते?

संकोच से बंसीधर कहते हैं –

देखो, मेरे हालात इस वक्त सही हैं कुछ रुपये छोड़ जाता हूँ रख लो

उन्हें भय है कि कहीं ग़ालिब के आत्म सम्मान को ठेस न लग जाये|

ग़ालिब तुरंत इंकार कर देते हैं –

न ना

बंसीधर थोड़ा दबाव बनाते हैं –

लौटा देना जब होंगे

ग़ालिब चुहल करते हुये –

और न हुये तो

गुंजाइश पाकर भावुक बंसीधर कहते हैं –

यूं भी तो तुम्हारे ही हैं

मेरी ज़ेब और ज़मीर दोनों का बोझ हट जाएगा

दृढ़ निश्चय से भरे ग़ालिब मज़ाक करते हैं  –

देखो लाला कुछ लोग हैं कर्ज देना उनका रोजगार है, उन्हें क्यों बेरोजगार करते हो चलो चलो बैठो

और मैंने तो अभी तक तुम्हारे पतंग और माँझे का कर्ज नहीं उतारा है

बंसीधर मित्र से हार मानकर इक्के पर बैठ जाते हैं| तभी एक हरकारा आकर सलाम करता है और एक पैग़ाम ग़ालिब के हाथ में थमा देता है|

ग़ालिब खोल कर पढ़ने लगते हैं और कुछ खुश नज़र आते हैं| बंसीधर उत्सुक हैं जानने को कि क्या है| हरकारा जवाब के लिए रुकने के लिए पूछता है तो थोड़े आनंदित ग़ालिब कुछ झूमते से उससे कहते हैं-

नहीं जवाब हम भिजवा देंगे

बंसीधर पूछते हैं –

क्या फरमाते हैं इब्राहिम

प्रसन्न चित्त ग़ालिब निमंत्रण को लहराते हुये बात साझा करते हैं –

मुशायरा है शहजादा जफर की सदारत में| शिरकत के लिए दावतनामा आया है|

ग़ालिब से ज्यादा प्रफुल्लित बंसीधर बोलते हैं –

मुबारक हो मेरे दोस्त मुशायरा तुम लूट लोगे मैं जानता हूँ|

एक अच्छा मित्र क्या चाहेगा? उसके मित्र का भला हो उसके जीवन में शुभ घटे| पर ये सब भावनाएं हैं असली जीवन में क्या घट सकता है अभी उसका अंदाज़ा उन्हें नहीं लग सकता|

बंसीधर की भूमिका में अभिनेता राजेन्द्र गुप्ता ने अपनी अभिनय क्षमता का भरपूर जलवा दिखाया है| एक बेहद अच्छे मित्र के सारे हाव भाव उन्होंने ऐसे प्रस्तुत किए हैं मानों वे असल बंसीधर हैं और असली ग़ालिब के साथ ही उस दौर को जी रहे हैं| नसीरुद्दीन शाह जैसे गजब के अभिनेता के सामने वे अपने दृश्यों में एकदम टक्कर में खड़े दिखते हैं|

शहजादे जफर के दरबारी मुशायरे में  शायर मोमिन अपनी ज़ुल्फें अपने हाथों से एंठते हुये लगभग बेसुरे अंदाज़ में गाता है

कभी हममें तुममें भी चाह थी

कभी हमसे तुमसे भी आह थी

कभी हम तुम भी थे आशनां

तुम्हें याद हो के न याद हो

जिसे आप गिनते थे आशनां

जिसे आप कहते थे बावफा

मैं वहीं हूँ मोमिने मुब्तिला

तुम्हें याद हो के न याद हो

इस साधारण शायरी पर भी पहले से ज़ौक़ के इर्द गिर्द जमें शायरों का गुट जम कर वाह-वाह करता रहता है| शायर के साधारण से सुर में सुर मिलाकर उसके शब्द दुहराते हैं| ज़ौक़ ही उसकी पंक्ति को नहीं दुहराते, शहजादा जफर स्वयं इस शायरी पर दाद देते हैं| ग़ालिब ने जब यह सब देखा होगा तो उनके मन में आया तो होगा ही कि क्या यह शहजादा उनके अश’आर की तह तक पहुँच पाएगा और वे संशय से तो भरे ही होंगे कि गुटबाजी से घिरे ये तमाम शायर क्या उनके अश’आर पर भी ऐसे ही सामूहिक समर्थन देंगे जैसा अभी इस शायर को दिया?

तभी जब शहजादा जफर शमा को ग़ालिब के सामने लाये जाने का इशारा करते हैं तो ग़ालिब तनाव से भर जाते हैं| वे अपने इर्द गिर्द का माहौल देखते हैं और खासकर पैनी निगाहों से उन्हें ही घूर रहे ज़ौक़ को| उन्हें ये अंदाज़ा तो लग ही चुका है कि यह लगभग पहले से निर्धारित अखाडा है और यहाँ ज़ौक़ की ही तूती बोलती है और बाकी सब ज़ौक़ के मातहत सरीखे ही हैं जो उनकी चापलूसी में लगे रहकर यहाँ स्थान पाते हैं| ज़ौक़ सहित उस महफिल में मौजूद हर शख्स की निगाहें ग़ालिब पर टिकी हैं और ग़ालिब को उनके पैनेपैन का अहसास अपने वजूद पर हो रहा है|

बॉलीवुड के आधुनिक संदर्भ में शक्तिशाली अंदुरनी क्लब बनाम बाहरी नए कलाकारों, जिनके पास सपने और नाम मात्र के साधन होते हैं, की रोशनी में इसे देखें तो सही गलत परम्पराओं का आभास आसानी से हो सकता है|

बेहद दबाव में आ गए ग़ालिब सुर में गाते हैं –

नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का

हर निगाह उनकी तरह सवालिया अंदाज़ में घूर रही है कि ये क्या गा रहे हो मियां? फिर सभी एक दूसरे की ओर देखकर अफसोस सा जताते हैं मानों ग़ालिब कोई प्रतियोगिता शुरू होने से पहले ही उसे हार गए हों| अपने आत्मविश्वास के बलबूते ग़ालिब आगे गाते हैं|

कागज़ी है पैरहन , हर पैकर-ए-तस्वीर का

ईश्वर से मुखातिब एक बेहद खूबसूरत शेर ग़ालिब ने गढ़ा|

हे ईश्वर ये फरियादी किस बात की शिकायत कर रहा है

इस सृष्टि की हर चीज तेरे ही खिलवाड़ से जन्मी है, तुझी में लौट जानी है|

ग़ालिब का शेर महफिल में शिरकत कर रहे विद्वानों के सिर के ऊपर से जाता है| जफर, ज़ौक़ की ओर देखते हैं| एक शातिर दरबारी शायर ऐसा मौका भला क्यों चूकेगा? वे इशारे में ही अपने हाथ और चेहरे के भावों को प्रकट  कर देते हैं कि ग़ालिब ये क्या बकवास सुना रहे हैं?

कावे कावे सख़्त जानी हाय तन्हाई न पूछ

मुसीबतों से घिरे जीवन और तिस पर तनहाई के दुःख के बारे में न ही पूछो तो बेहतर|

महफिल में बैठे लोगों की बेरुखी से परेशान ग़ालिब अपनी आदत के विपरीत आग्रह करते हैं –

मिसरा उठाइए हजरात

सामने बैठे सज्जन मुसकुराते हुये कटाक्ष भरे अंदाज़ में कहते हैं –

हमसे तो उठता नहीं, बहुत भारी है

पड़ोस में बैठा एक चापलूस दबी ज़ुबान में ग़ालिब का उपहास करते हुये कहता है –

तो कुली मँगवा लीजिये

लोगों की कानाफूसी को नज़रअंदाज़ करते हुये साहस जुटाकर ग़ालिब, शहजादे से कहते हैं

मक्ता पेश करता हूँ

जफर कहते हैं –

आपने गज़ल पूरी नहीं की मिर्ज़ा

रोष से भरे ग़ालिब कहते हैं

हुजूर कुली नहीं मिले

ग़ालिब के पड़ोस में बैठे एक संजीदा से व्यक्ति पूछते हैं

क्या गज़ल में केवल दो ही शेर हैं, मतला और मक्ता

ग़ालिब उनसे कहते हैं

जी नहीं मुफ्ती साहब, गज़ल तो पूरी थी लेकिन पहला ही मिसरा इतना भारी था कि उठाना मुश्किल हो गया अगर बाकी अश’आर सुना देता तो शायद हजरात का उठना ही मुश्किल हो जाता|

शहजादा जफर हँसते हुये कहते हैं –

आप इरशाद फरमाइए

महफिल की सामूहिक उपेक्षा से अपमानित और आवेशित ग़ालिब पहले से भी दुरुह शेर कहते हैं और वह भी बिना गाये, रोष भरे हृदय, जो की विपक्षियों को चुनौती दे रहा हो, की आवाज़ जैसी हो सकती है उसमें

 

बस-कि हूँ ‘ग़ालिब’ असीरी में भी आतिश ज़ेर-ए-पा

मू-ए-आतिश दीदा है हल्क़ा मिरी ज़ंजीर का

 

कैद में भी जो स्वतन्त्रता के नृत्य का आनंद ऐसे ले सके जैसे पैर आग की लपटों जैसे उड़ रहे हों, पैरों में पड़ी बेड़ियाँ जिसे इतनी हल्की लगती हों जैसे पैरों के बाल आग से जल कर बल खा गए हों, उसके आत्मबल को जगत क्या तोड़ पाएगा?

उन पर हँसते महफिल के लोगों की खामोश गुस्ताखी जब ग़ालिब की बर्दाश्त के बाहर हो गई तो वे शहजादे जफर को सलाम करके उन्हें सकते में छोड़ महफिल छोड़ आए|

ज़ौक़ को अंदाज़ा लग ही गया कि ग़ालिब का शायरी का स्तर बेहद ऊँचा है| वे शहजादे के समक्ष ऐसे व्यवहार करते हैं मानों ग़ालिब वहाँ उनकी महफिल में बैठने लायक नहीं थे इसलिए चले गए|

वर्तमान में बॉलीवुड में चल रही नेपोटिज्म और अंदुरनी लोगों के क्लब द्वारा बाहर से आए गुणी कलाकारों के साथ भेदभावपूर्ण बर्ताव और हर बात में उनका उपहास उड़ाने, उनके विरुद्ध अपने चापलूस पत्रकारों और मीडिया वालों से लेख लिखवाना, कार्यक्रम बनवाना और पुरस्कार समारोहों जैसे सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी उनका उपहास उड़ाना जैसे नीचा दिखाने वाले कृत्यों में संलग्नता की बातें लोगों को समझ नहीं आ रही या इसे वे अतिशयोक्तिपूर्ण समझ इस और से आँखें मूँद लेना चाहते हैं उनके लिए ग़ालिब के जीवन से जुड़े ये प्रसंग समझदारी और सच्चे कलाकारों के प्रति संवेदना लाने का कार्य कर सकते हैं कि किसी खुद्दार कलाकार को योजनाबद्ध तरीके से नज़रअंदाज़ करने से उसका जीवन नर्क बनता जाता है| कला के बलबूते कलाकार के मरने के बाद उसका नाम हो सकता है पर जीते जी तो ऐसे कलाकार दुःख और दुर्दिन भरे दिन ही व्यतीत करते हैं और इसके जिम्मेदार गुटबाजी करने वाले ये शक्तिशाली लोग होते हैं|

ग़ालिब और उनके मित्र बंसीधर अगर राजनीति से परिचित होते तो मुशायरे का निमंत्रण पाते वक्त ही इस बात को समझ जाते कि शेरो शायरी में रुचि रखने वाले शहजादा जफर के पहले से नजदीक लोग क्यों चाहेंगे कि कोई और आकर उनके इस गठबंधन में सेंध लगा दे? कोई अगर उनसे ज्यादा गुणी होगा तो उन्हें हमेशा डर लगा रहेगा कि शहजादा उसके ज्यादा करीब हो सकते हैं| ग़ालिब और बंसीधर को इस दरबारी सच्चाई का जरा भी आभास हो तो वे और ढंग से इस दावतनामे को लेते| स्वयं ग़ालिब कुछ तैयारी करते दरबार में शायरी पढ़ने की जिससे वे दरबारी चालों को काट कर अपना स्थान बना पाते|

 

जिस घड़ी के इंतज़ार में ग़ालिब ने जाने कितने महीने और शायद बरस बिताए होंगे कि कभी राज दरबार में जा अपना कलाम पढ़ पाएंगे वह घड़ी आई भी और ऐसे चली गई कि उन्हें दुःख और रोष के सिवा कुछ न दे सकी| उनकी अपेक्षाओं ने ही उन्हें ज्यादा दुःख पहुंचाया होगा| अगर वे तैयार रहते कि दरबारी शायरों की भीड़ से गुजरकर ही उन्हें अपने लायक शान मिल पाएगा तो वे मानसिक रूप से तैयार रहते एक जंग के लिए एक प्रतियोगिता के लिए| पर वे कलाकार के हृदय से वहाँ गए कि उनके फन की कद्र होगी| शायरी में दिलचस्पी रखने वाला शहजादा जो स्वंय भी शायरी करना चाहता है उनकी शायरी को समझ पाएगा और वाजिब तवज्जो देगा| कला को कला से समर्थन मिलेगा| पर ये सब बातें हवाई निकलीं व्यवहारिक तौर तरीकों के सामने|

निराश ग़ालिब घर लौटे हैं| उनसे प्रेम करने वाले सभी इसी आशा में थे कि उन्होंने मुशायरे में सभी का दिल लूट लिया होगा| सभी को उनकी प्रतिभा पर अगाध विश्वास था| घर में घुसते ही वफ़ादार कहती है –

बादशाह सलामत ने तो ताज रख दिया होगा आपके सर पर

इतनी निराशा में भी ग़ालिब विनोदप्रियता का परिचय देते हुये कहते हैं|

हाँ वो तो रख ही देते मैंने अपनी टोपी नहीं उतारी

उनके जैसी निराशा का सामना कर रहा व्यक्ति वफ़ादार को डांट भा सकता था| पर ग़ालिब में सज्जनता और मानवीयता कूट कूट कर भरी है| वे किसी और पर अपनी कुंठा नहीं निकालेंगे|

बस शराब के साथ तनहाई में बैठ जरूर जाएँगे अपना ग़म गलत करने हेतु| उनकी इस मांग पर बेग़म बिगड़ती हैं –

ज़रा मिज़ाज बिगड़ा कि प्याला ज़रा बात बिगड़ी कि कौड़ियाँ, बस यही आदत आपकी अच्छी नहीं लगती हमें

ग़ालिब ठिठोली करते कहते हैं –

हम तो अच्छे लगते हैं ना फिर आदत से क्या लेना आपको

यह संवाद दर्शक को ठिठका देता है कि इंसान इंसान से प्रेम करता है उसकी आदतों के अच्छे बुरे होने से कहीं ऊपर उठ कर|

बेग़म चेताती हैं ग़ालिब को –

मोहब्बत को करवट बदलते देर नहीं लगती सिक्का पलटा तो नफरत भी हो जाएगी

ग़ालिब दरखास्त करते हैं

पिला दे ओके से साक़ी जो हमसे नफरत है

प्याला अगर नहीं देता न दे शराब तो दे

बेग़म मौन रहती हैं|

ग़ालिब और प्रयास करते हैं उन्हें मनाने का

दिखा के जुंबिशे लब ही तमाम कर हमको

न दे बोसा जो मुंह से कहीं जवाब तो दे

पिघल कर बेग़म उनसे पूछती हैं कि मुशायरे में क्या हुआ|

ग़ालिब निराशा से समझौता सा करने के भाव से कहते हैं|

कुछ हुआ ही नहीं| निहायत शरीफ लोग हैं झगड़ा तक नहीं करते

बेग़म परिस्थितियों का अपना विश्लेषण निकाल कहती हैं –

दिल्ली वाले आपको पसंद नहीं करते, आगरे लौट चलें दिल्ली वाले यहाँ आपको मकबूल नहीं होने देंगे|

इस बात से ग़ालिब बेहद दुःखी हो जाते हैं –

शिया सुन्नी हिन्दू मुसलमान यही बँटवारे क्या कम थे कि लोगों ने अब दिल्ली आगरे लखनऊ की दीवारें खड़ी कर दीं| ये दुनिया मुझे छोटी लगती है| दुनिया के मूर्खता भरे और अन्यायपूर्ण तौर तरीकों से कुंठित शायर को दुनिया छोटी ही नहीं रहने लायक भी शायद न लगे|

पर अभी उनकी कुंठा हदें पार नहीं कर पाई है अतः उनका दुःखी और क्रोधित हृदय शायरी में सहारा ढूंढ लेता है| घायल हृदय से ऐसे ही उद्गार निकल सकते हैं जो दुःख और रोष को प्रकट तो करें पर साथ ही साथ ऐसे भावों से भरे हृदयों को सहारा भी दें| बेहद निराशा में मनुष्य ईश्वर को या तो कोसता है उससे शिकायत करता है कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ या हो रहा है या क्या मेरे हे भाग्य में यह सब नहीं लिखा| या तो भक्ति भाव से भरा मनुष्य पूर्णतः ईश्वर की शरण में जा रुदन और प्रार्थना में खो जाता है| ग़ालिब अभी पहली ही श्रेणी में हैं, वे उसके वफ़ादारों में नहीं ये बात वे बुढ़ापे में अपनी बेग़म के सामने स्वीकार करेंगे, और जिसे हम धारावाहिक में देख ही चुके हैं|  ग़ालिब बहुत बड़े शायर हैं और उनके रचे के मूल अर्थ तक पहुँच पाना आसान काम नहीं है|

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा, मेरे आगे

ग़ालिब को लगता है ईश्वर ने अपने मनोरंजन हेतु इस दुनिया की रचना की है और वे और सब मनुष्य बच्चों की तरह इस दुनिया रूपी खेल के मैदान में खेल रहे हैं और जहां मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं है और छोटे बड़े तमाशे करके रोज़ मनुष्य को बहलाया जाता है जिससे वह आशा क्दामान थामे कल के अच्छा होने की ऊर्जा से भर कर जीता रहे| ये भ्रम की स्थिति है ग़ालिब के समक्ष और जो किसी भी मनुष्य के सामने आती ही आती है कि क्या इस दुनिया का, जीवन का क प्रयोजन है कि नहीं| इसे किसी ने बनाया है या यह ऐसे ही संयोगवश उत्पन्न हो गई और एक दिन समाप्त भी हो जाएगी|

होता है निहाँ गर्द में सहरा, मेरे होते

घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया, मेरे आगे

ये जो रेगिस्तान धूल में उड़ कर कहीं गायब हो जाता है और नमाज़ पढ़ते आदमी की तरह अपना माथा मिट्टी से घिसता हुआ दरिया बहता रहता है क्या ये भी ऐसे ही भ्रम में पड़े रहते हैं जैसे हम मनुष्य?

 

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा, तेरे पीछे

तू देख कि क्या रंग है तेरा, मेरे आगे

 

कयामत के रोज़ मनुष्य का सामना खुदा से होगा| उस रोज़ सब कर्मों का हिसाब होगा| ग़ालिब का घायल  हृदय ईश्वर को ललकारता है कि मुझसे ये पूछने की दिल्लगी न कर कि धरती पर तेरे से अलग मेरी क्या दशा है जब मैं और तू आमने सामने होंगे और मैं अपनी इस ज़िंदगी को लेकर तुझसे सवाल करूंगा अब तेरी क्या दशा होगी इस पर भी तो सोच|

इसे इस ढंग से भी ले सकते हैं कि ग़ालिब शिकायत कर रहे हैं| हे ईश्वर अब जब तूने मेरा साथ छोड़ ही दिया है तो मेरे हाल की चिंता न कर, अब मैं भी तुझसे कोई नाता न रखूँगा, तुझसे कोई अपेक्षा न रखूँगा| ग़ालिब जैसे ज़हीन शायर के शेर को बहु स्थानों और बहु परिस्थितियों में उपयोग में लाया जा सकता है| एक प्रेमी भी अपनी प्रेमिका से इसे कह सकता है|

ईमाँ मुझे रोके है, जो खींचे है मुझे कुफ़्र

काबा मेरे पीछे है, कलीसा मेरे आगे

हालांकि आज भी मेरा धर्म (मेरा तुझसे नाता) मुझे रोकता है कि मैं तुझसे अपना नाता पूरी तरह से न तोड़ूँ| पर मुझे कुछ नहीं मिल रहा और मैं आज तुझसे दूर जाने को जो मुड़ा हूँ तो क्या मैं किसी और मत में चला जाऊँ तो मुझे वहाँ शांति मिलेगी? या ये सारे जुड़ाव भुलावे ही हैं? इस शेर को भी कई रूपों में लिया जा सकता है| सीधे सीधे शाब्दिक अर्थ लें तो यह भी निकाल कर आता है कि मेरे पीछे काबा है और सामने गिरजाघर है तब भी ये कैसे विरोधाभासों में मेरा जीवन अटक गया है| ईमान मुझे रोकता है और जिन्हें धर्म बुराइयाँ कहता है वे मुझे अपनी ओर आकर्षित करती हैं| मैं करूँ तो करूँ क्या, किस दिशा में जाऊँ कि जीवन सही दिशा में चले|

 

गो हाथ को जुंबिश नहीं, आँखों में तो दम है
रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मेरे आगे

मेरी आँखों में जो इतने सपने थे क्या उन्हें पूरा करने की शक्ति मेरे हाथों में नहीं या मेरे हाथों की लकीरों में वैसा भाग्य नहीं जिसमें सफलता छिपी हो? पर मुझमें इतनी असफलताओं, इतने संघर्षों को झेलने के बाद भी सपने देखने की सामर्थ्य बची है| इन सपनों को मेरी आँखों में बसा रहने दो|

इसे यूं भी कह सकते हैं कि ज़िंदगी के दुखों ने, संघर्षों ने, भ्रमों ने इतनी मय पिला दी है मुझे कि जाम उठाते हाथ काँपते हैं पर मेरी  आँखों ने और मय पीने की लालसा और ताकत खोई नहीं है| जाम और सुराही आँखों के सामने रहेंगे तो उन्हें देख ही तसल्ली मिलती रहेगी|

ग़ालिब की बातें ग़ालिब ही समझाएँ और आगे उनके जीवन के पहलुओं के द्वारा गुलज़ार समझाते चलेंगे और तब शायद उनकी शायरी और गहरे में पैंठ बनाए दर्शक के अंदर …

नसीरुद्दीन शाह, राजेन्द्र गुप्ता, तन्वी आज़मी, तो ग़ालिब और उनके घर के लोगों की भूमिका में जबर्दस्त अभिनय की छटा बिखेर ही रहे हैं इस कड़ी में| इब्राहिम ज़ौक़ की भूमिका में शफ़ी इनामदार भी दमदार अभिनय करते हैं| शहजादे के नजदीकी दरबारी शायर और चापलूसों से घिरे अहंकारी शायर के रूप में उन्होंने बेहतरीन अभिनय किया है|

शहजादा जफर के रूप में सुधीर दलवी भी खासा जमते हैं| वे नम्र स्वभाव के ऐसे शहजादे के रूप में फबते हैं जो ग़ालिब के स्तर का बुद्धिजीवी नहीं है और जिसे इस बात का एहसास है| आगे तो ज़ौक़ और शहजादे की भूमिका ग़ालिब के जीवन में बढ़ेगी ही और तब इन अभिनेताओं के अभिनय के और ज्यादा जौहर देखने को मिलेंगे|

…[राकेश]

जारी…

मिर्ज़ा ग़ालिब (1988-89) : ‘ग़ालिब का बयान’ वाया गुलज़ार – अध्याय 1