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Rakesh

Sharda(1957): प्रेमिका सुहागन प्रेमी के पिता की

कल्पना कीजिये कि एक युवक की प्रेमिका परिस्थितिवश उसकी माँ बन जाये तो क्या हो? ऐसे रिश्ते से उपजे जटिल समीकरण को सुलझाने के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित दक्षिण और हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक एल वी... Continue Reading →

धूप आने दो (2020) : “गुलज़ार एवं ‘विशाल+रेखा’ भारद्वाज” की वैदिक सूर्य स्तुति

‘सूरज की पहली किरण से आशा का सवेरा जागे’ जीनियस किशोर कुमार द्वारा रचित पंक्ति गागर में सागर भरने की उक्ति को चिरतार्थ कर देती है| धरा पर मानव जीवन पर छाए “कोविड-19” के गहरे धुंध भरे साये तले सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक... Continue Reading →

guLaBO SITaBO (2020) : अमिताभ को नकली नाक और सिर पर गमछे के पीछे काहे छिपा दिया बे!

कम अक्ल, रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसी छोटी मोटी साजिश भरी हरकतें, जिन्हे सब जानते हों, करने वाले बुजुर्ग के चरित्र से दर्शक कैसे जान-पहचान कर पाएंगे? अगर वह अपना मुंह ढके रहे और आँखें भी बेहद मोटे चश्मे के... Continue Reading →

पाताल लोक (2020) : अपराध, राजनीति, मीडिया और पुलिसिया गठजोड़ का चिट्ठा

हिन्दी सिनेमा के अब तक के इतिहास में राजनीतिक थ्रिलर वर्ग में श्रेष्ठ फ़िल्मों में गुलज़ार लिखित और रमेश शर्मा निर्देशित “न्यू दिल्ली टाइम्स (1987)” के बाद हाल में अमेज़न प्राइम वीडियो पर प्रदर्शित क्राइम और राजनीतिक थ्रिलर वैब सीरीज़... Continue Reading →

Sacred Games (2018,2019) : खोजा परमाणु बम, निकला गुरुजी!

श्रंखला के दूसरे सीज़न में उपस्थित कमजोरियों में सबसे बड़ी कमजोरी हर षड्यंत्र का सूत्रधार गुरुजी को दिखाना ही है| कथा का सारा वज़न इस कोण पर गिर जाता है| दुनिया में बहुत से षड्यंत्रकारी सिद्धान्त चलते रहते हैं| इनमें... Continue Reading →

Sacred Games (2018,2019) : क्या श्रंखला सिख संप्रदाय का अपमान करती है?

सिख धर्म का अपमान करना तो श्रंखला के लेखकों, निर्देशकों और प्रस्तोता का आशय  बिलकुल भी नहीं रहा होगा पर उन्होने अतार्किक गलती अवश्य की या उनसे ऐसी अतार्किक गलती अवश्य ही हुयी या हो गई| इस पर आने से... Continue Reading →

Sacred Games (2018,2019) : दर्शक के भ्रम की आंच पर पकता खेल

किसी भी फ़िल्म में बड़े और महत्वपूर्ण चरित्रों को पा जाने वाले अभिनेताओं में अपने आप एक ऊर्जा भर जाती है और हर काबिल अभिनेता उसका लाभ उठाता है| पर अकसर ही कम महत्व वाले या छोटे काल के लिए... Continue Reading →

थप्पड़ (2020) : अनुभव सिन्हा कृत हिंसा हिंसा न भवति!  

थप्पड़ : (बस इतनी सी बात), निर्देशक अनुभव सिन्हा की सामाजिक मुद्दों पर टीका टिप्पणी वाली श्रंखला की अगली कड़ी है जिसमें व्यावसायिक करियर के अपने स्वप्न पर अपने ऑफिस द्वारा नियंत्रण करने से बेहद नाराज़ युवक अपने ही घर... Continue Reading →

ऋषि कपूर (1952-2020) : बचपन, जवानी, बुढ़ापा, शो का पटाक्षेप

...[राकेश]

इरफ़ान (1966-2020) : चकाचौंध मचाता सितारा डूब गया गुलशन सारा उदास छोड़ कर

मुद्दतों बाद मयस्सर हुआ माँ का आँचल मुद्दतों बाद हमें नींद सुहानी आई ...[राकेश] © लेख के सन्दर्भ आनंद https://cinemanthan.com/2015/09/25/ananad1971/ कलयुग https://cinemanthan.com/tag/kalyug-1981/ 7 खून माफ़ https://cinemanthan.com/2015/04/21/7khoonmaaf/ तलवार https://cinemanthan.com/2015/10/06/talvar2015/ Piku https://cinemanthan.com/2015/05/12/piku2015/

फिर से अइयो बदरा बिदेसी (नमकीन 1982) … गुलज़ार का मेघदूत

अगर कभी गुलज़ार के किसी पुराने गीत को उन्हे अपने स्वर देने पड़ें तो यह गीत सर्वश्रेष्ठ अवसर उत्पन्न करता है उनके लिए| ...[राकेश] https://youtu.be/BfeJ-tuUoIc?si=GAonq-Xo3g4RN6PO ©

Juice (2017) : क्वथनांक से बस एक डिग्री कम

लघु फ़िल्म “जूस” अच्छे निर्देशन और अच्छे अभिनय से सजी हुई है| घरेलू माहौल में पार्टी के दौरान कमरों के सीमित स्पेस में असरदार तरीके से फ़िल्म को फिल्माया गया है| चरित्रों की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं को बहुत कुशलता से... Continue Reading →

Chutney (2016) : सच और कल्पना के पाटों के बीच पिसता हुआ होश

कहानी सुनाना तो एक कला है ही और कहानी को इस तरीके से सुनाना कि सुनने वाले साँस रोक कर सुनने के लिए बाध्य हो जाएँ तो ऐसी कथा वाचन कला बेहतरीन कला का नमूना बन जाती है| कहानी की... Continue Reading →

Mumbai Varanasi Express (2016) : मौत के आगोश में संतुष्ट जाने का दर्शन

जीवन का खेल बड़ी तेजी से चलता है, जीवन के खिलौने एक के बाद एक पीछे गिरते जाते हैं, और भुला दिए जाते हैं| जीवन को जीने या जीवन को सुख सुविधा से भरपूर तरीके से जीने के साधन जुटाने... Continue Reading →

Mr Kabaadi (2017) :  भारत में काम होता बड़ा या छोटा, बनाता मनुष्य को चलता या खोटा

फ़िल्म के अंतिम दृश्य में कैमरे की ओर पीठ करे सड़क पर जा रहे रूहानी सुकून देने वाले इत्र और सुरमा प्रदानकर्ता छन्नू खान (ओम पुरी) अचानक पलटते हैं और कैमरे की मार्फ़त अभिनेता ओम पुरी दर्शकों से मुखातिब होते... Continue Reading →

Shalimar (1978) : हॉलीवुड और हिन्दी सिनेमा के संगम की भव्यता से बनी फिल्म की निर्माणगाथा

 ...[राकेश] ©  

Tere Ghar Ke Samne (1963) : सर्दियों की नर्म धूप

  ...[राकेश] © https://cinemanthan.com/2013/09/18/tukahan/

Nayantara’s Necklace (2015) : अपने वर्तमान से ऊबे, थके और परेशान हुए लोग

दो स्त्रियों एवं एक पुरुष चरित्र के माध्यम से एक स्त्री की कहानी दिखाने वाली तकरीबन बीस मिनट की अवधि की यह लघु फिल्म, लघु फिल्मों को बनाए जाने की महत्ता को स्थापित करती है और यह भी स्थापित करती... Continue Reading →

Tamasha (2015) : बचपन ओ’ मोहब्बत को दिल से न जुदा करना

बचपन, बचपन से मोहब्बत और बचपन की मोहब्बतें तीनों का इंसान के जीवन में बहुत बड़ा शायद सबसे बड़ा स्थान है| बचपन की मोहब्बतों में आवश्यक नहीं कि यह किसी इंसान से ही मोहब्बत का मामला हो, यह किसी विधा... Continue Reading →

Bawarchi (1972): दिल चोर बावर्ची!

...[राकेश]

Talvar (2015) : पुलिस की अक्षम और आपत्तिजनक तहकीकात पर श्वेत पत्र

कुछ साल पहले खोजी पत्रिका ‘तहलका’ की पत्रकार शोमा चौधरी ने आरुषि हत्याकांड में अदालत का निर्णय आने पर अपनी तरफ से खोज की थी और अपने लेख (विस्तृत लेख यहाँ पढ़ा जा सकता है और शोमा दवारा खुलासा किये... Continue Reading →

Bombai ka Babu(1960) : सुचित्रा सेन के लिए देव आनंद सगा भाई है, पर देव सुचित्रा में प्रेमिका खोजता है

...[राकेश]

Anand (1971) : जीने का अंदाज अंकुरित कर जाने वाला जिंदादिल

...[राकेश]

Katha (1983) : सीधा-सच्चा, आदर्शवादी और अंतर्मुखी पुरुष बनाम जालसाज, झांसेबाज छलिया !

© ...[राकेश]  

Absurdistan(2008) : No Water No Sex

© ...[राकेश]  

Pratidwandi(1970) : वास्तविक समस्याएं जीवन में समझौते करने का दबाव बनाती हैं!

जीवन हमेशा ही पलक झपकते ही अपना रुख बदल लेता है| बस एक क्षण का समय ही पर्याप्त होता है जीवन की दिशा बदलने वाली घटना के घटित होने के लिए| आसानी से चल रहा जीवन एक तीव्र मोड़ ले... Continue Reading →

Mammo (1994) : भारत के बंटवारे और ‘दो राष्ट्र’ के जिद्दी प्रयोग में दबी कुचली ज़िंदगी

...[राकेश]

Kalyug (1981) : महाभारत के संघर्ष आधुनिक परिवेश में

...[राकेश]

Manjhi : The Mountain Man (2015) – जुनूनी आशिक की दास्तान है प्यारे

अपने ‘मैं’ को खोकर जिसे पाते वह सौगात ‘प्रेम’ की! प्रेम में पहले दूसरा स्वयं से महत्वपूर्ण हो जाता है फिर दोनों के ‘मैं’ कुछ समय के लिए एक हो जाते हैं और एक समय आता है जब व्यक्ति को... Continue Reading →

The Pursuit of Happyness (2006) : हाशिए पर पड़े जीवन का निराशा के गर्त से उठकर उदय होना

©...[राकेश]

हिंदी सिनेमा का अनूठा संन्यासी सुपर अभिनेता स्टार

सन 1984 के किसी दिवस की बात है| एक शिष्य अपने गुरु दवारा बसाए गये शहर में उनके आवास के बाहर रोते हुए गुरु की निजी सचिव से कह रहा है,” भगवान, ने मुझे किस मुसीबत में डाल दिया| मुझे... Continue Reading →

Drishyam(2015) : लुका छिपी – अहंकारी पुलिस अधिकारी बनाम सिनेमा भक्त चौथी फेल आम आदमी

जिसने ‘दृश्यम’ फिल्म का मूल मलयाली संस्करण (मोहन लाल अभिनीत) और कमल हसन अभिनीत तमिल संस्करण नहीं देखे हैं उनके लिए फिल्म का अजय देवग्न अभिनीत हिंदी संस्करण एक अच्छे थ्रिलर देखने का आनंद प्रस्तुत करता है और मूल मलयाली... Continue Reading →

Masaan (2015) : खिलने से पहले फूलों को खिज़ा खा गई

‘  ऐसे जीवन भी हैं जो जिए ही नहीं जिनको जीने से पहले ही मौत आ गई फूल ऐसे भी हैं जो खिले ही नहीं जिनको खिलने से पहले खिज़ा खा गई ...[राकेश] ©

Ugly (2014) : असंवेदनशीलता और खुदगर्जी से सड़ते रिश्तों की बजबजाती गंदगी में मरता बचपन

 ...[राकेश] Bombay Velvet https://cinemanthan.com/2015/05/19/bombayvelvet2015/

Tanu Weds Manu Returns (2015) : कंगना रनौट की प्रतिभा का विस्फोट

   ©...[राकेश]   Tanu Weds Manu (2011)

Bombay Velvet (2015) : अपराध और मुर्दों के टीलों पर बसी शहरी बस्ती के बसने की गाथा

© ...[राकेश]

Piku (2015) : हाजत हजार नियामत

...[राकेश]

किशोर कुमार : सवेरे वाली कुनमुनी, कुरमुरी लालिमा की छुअन जैसा गायन

©...[राकेश]  

Holi (1984) : केतन मेहता की, फिल्ममेकिंग पर, रची गाइड

...[राकेश]

Jai Ho! Democracy : भारत-पाक तनाव की निरर्थकता को उकेरती एक एंटी वार फिल्म

भारत- पाकिस्तान के बीच तनाव का आलम ऐसा है कि बिना आग भी धुआँ उठ सकता है और बिना मुददे के भी दोनों देश लड़ सकते हैं, इनकी सेनाएं जंगे-मैदान में दो –दो हाथ न करें तो क्रिकेट के मैदान... Continue Reading →

7 Khoon Maaf (2011) : तत्वविज्ञानी रस्किन बांड+विशाल भारद्वाज की मार्फ़त Susanna का दृष्टांत

ऐसी फिल्में हिन्दी सिनेमा में बनती नहीं है अतः ऐसे प्रयासों का समुचित रुप से सही मूल्यांकन होना चाहिये और केवल बॉक्स ऑफिस की सफलता को ही पैमाना बनाकर ऐसी फिल्मों की संभावनाओं को नष्ट नहीं करना चाहिये। ...[राकेश] ©

NH 10 (2015) : जंगल राज में दबंग भेड़ियों के खिलाफ घायल हिरनी की प्रतिहिंसा

“मैडम जी, शहर में जहां बड़े बड़े मॉल खत्म हो जाते हैं न बस डेमोक्रेसी भी वहीं समाप्त हो जाती है”| एक पुलिस इन्स्पेक्टर फिल्म की नायिका मीरा (Anushka Sharma) से कहता है और उसे समझाता है कि पुलिस वाले... Continue Reading →

Lake Tahoe (2008) : स्वीकार लाता है जीवन में समझ, मानसिक शान्ति और आगे बढ़ने की ऊर्जा

मैक्सिकन निर्देशक Fernando Eimbcke की फिल्म Lake Tahoe एक रोचक फिल्म है जो दिखाती है कि जीवन में कुछ घटित होने के बाद उससे प्रभावित लोग कैसे अपनी अपनी प्रतिक्रियाएं देते हैं| अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु अचानक से हो... Continue Reading →

Mausam(2011) : काश अच्छे आगाज़ की तरह अंजाम भी बेहतर दे देते पंकज कपूर

आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता जब जुल्फ की कालिख में घुल जाये कोई राही बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता हँस-हँस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टूकड़े... Continue Reading →

Kahaani (2012): विद्या बालन की थ्रिलर फिल्म

इन्स्पेक्टर सात्यिकी की भूमिका में Parambrata Chatterjee सहज और आकर्षक लगे हैं| विद्या बालन के अलावा सबसे ज्यादा ध्यान खींचते हैं Saswata Chatterjee जिन्होंने बॉब विश्वास की भूमिका निभाई है| उनकी मुस्कान और उनकी शैतानियत का संगम एक आकर्षक स्क्रीन... Continue Reading →

Chalo Dilli (2011) : इंडिया का भारत भ्रमण

एक समय तक भारत के हरेक विद्यार्थी को सामान्य ज्ञान की परीक्षाओं में भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दो प्रश्न काफी परेशान करते थे (शायद अभी भी करते हों)। सवाल थे - दिल्ली चलो का नारा किसने दिया था।... Continue Reading →

डार्लिंग आँखों से आँखें चार करने दो (7 Khoon Maaf 2011)

कौन है भारत में ऐसा जो हिन्दी सिनेमा के संगीत संसार में मौजूद नायाब खजाने से रुबरु हुआ हो और शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के (अलबेला-1951) , मुड़ मुड़ के न देख (श्री 420 - 1955), मेरा नाम चिन... Continue Reading →

Shaan(1980): शोले की आन, बान और शान में घटोत्तरी

https://youtu.be/IQ-iTeN_Yv4?si=PRGH5MxznvZ2bmqX https://youtu.be/B_qbaictKdE?si=7zhObOZKvOOMSSwu ...[राकेश]

Angoor (1982) : विशुद्ध हास्य की मधुशाला

…[राकेश]

महंगाई डायन खाए जात है : अभावग्रस्त भारत की टीस को उकेरता व्यंग्य गीत

©...[राकेश]

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