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Cinema, Theatre, Music, Literature & Life

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Classics

हीर राँझा (1970) : पद्यात्मक संवादों से सजी फ़िल्म

...[राकेश] © यह पोस्ट (January 18, 2007 , 6.22 a.m.) को अंगरेजी में लिखे अपने ही लेख पर आधारित है|

Sunny Deol @Damini (1993)

कह रहा है शोर-ए-दरिया से समुंदर का सुकूतजिस का जितना ज़र्फ़ है उतना ही वो ख़ामोश है ~ नातिक़ लखनवी ये ढाई किलो का हाथ जब किसी पर पड़ता है तो आदमी उठता नहीं उठ जाता है| चिड़ियाघर में पिंजरे... Continue Reading →

जाने वो कैसे लोग थे (Pyaasa 1957)

...[राकेश]

चैन से हमको कभी (प्राण जाए पर वचन न जाए 1974)

अब जो रिश्तों में बँधा हूँ तो खुला है मुझ परकब परिंद उड़ नहीं पाते हैं परों के होते ~ जौन एलिया जौन एलिया के उपरोक्त्त शेर में इस गीत की नायिका की दिल की हालत छिपी हुयी है| यह... Continue Reading →

रुक जा रात ठहर जा रे चंदा (दिल एक मंदिर 1963)

रुक जा रात ठहर जा रे चंदा बीते न मिलन की बेलाआज चांदनी की नगरी में अरमानों का मेलारुक जा रात ...पहले मिलन की यादें लेकर आई है ये रात सुहानीदोहराते हैं चाँद सितारे मेरी तुम्हारी प्रेम कहानीमेरी तुम्हारी प्रेम... Continue Reading →

शतरंज के खिलाड़ी – सत्यजित रे का रवैया

खोट रे के रवैये में दीखता है - नेत्र सिंह रावत सारिका, मई 1978

कुंदनलाल सहगल … फिल्मों में पदार्पण

राघव मेनन , Published in सारिका 1981

Dillagi (1978) : होलीमय संगीत के पांच सुरीले रंग

होली केवल मनुष्यों द्वारा जन्माया गया उत्सव ही नहीं है बल्कि प्रकृति भी इस समय धरती पर रंग बिरंगे रूप में छटा बिखेरने लगती है, ऋतुओं में भी बसंत अपने पूरे यौवन पर आ जाता है| होली जीवन में लचीलेपन... Continue Reading →

मीना कुमारी की दौड़ !

मधुलिका कुमारी थी, सुंदरी थी। कौशेय वसन उसके शरीर पर इधर-उधर लहराता हुआ स्वयं शोभित हो रहा था। वह कभी उसे संभालती और कभी अपनी रूखी अलकों को। कृषक बालिका के शुभ्र भाल पर श्रमकणों की भी कमी न थी,... Continue Reading →

Anupama(1966): एक स्त्री और एक पिता की मूर्तियों की गढ़न

JwarBhata(1944): दलीप कुमार की पहली फ़िल्म की समीक्षा

प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक बाबूराव पटेल ने दलीप कुमार की पहली फिल्म ज्वार भाटा (1944) की समीक्षा में दलीप कुमार की बेरहमी से आलोचना की थी| Review Courtesy : Jhinjhar @ IMDB

और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैं (सनी 1984) : धर्मेन्द्र फैक्टर

और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैंलोग मिलते हैं, जुदा होते हैं कब बिछड़ जाए, हमसफ़र ही तो हैकब बदल जाए, एक नज़र ही तो हैजान-ओ-दिल जिसपे फ़िदा होते हैं और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैं जब रुला लेते हैं जी भर के... Continue Reading →

धर्मेन्द्र : परदे पर स्त्री तिरस्कार का सामना

...[राकेश]

तुम्हारा इंतज़ार है तुम पुकार लो : Khamoshi(1969)

...[राकेश]

Mani Kaul : जहाँ सिनेमा एक ‘राग’ बन गया (HK Verma)

~ © HK Verma हिन्दी अनुवाद – …[राकेश] [नोट : यह लेख श्री एच के वर्मा के अंगरेजी में लिखे लेख का हिंदी अनुवाद है| HK Verma, an alumnus of FTII, is a renowned cinematographer who earlier in his career collaborated with celebrated cinematographer KK... Continue Reading →

चल अकेला, चल अकेला … मुकेश

जोड़ी तोर डाक शुने केऊ ना एशे तोबे एकला चोलो रे। तोबे एकला चोलो, एकला चोलो, एकला चोलो, एकला चोलो रे। (रविन्द्रनाथ टैगोर) चल अकेला, चल अकेला, चल अकेलातेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला हज़ारों मील लम्बे रास्ते तुझको... Continue Reading →

Chetna (1970) : सिनेमेटोग्राफर कौन?

लेखक निर्देशक बाबू राम इशारा की बहुचर्चित व कुख्यात फ़िल्म चेतना में कैमरे के विशिष्ट प्रयोग किये गए, जिन्होंने दर्शकों के सम्मुख भ्रम उत्पन्न किये, सेंसर बोर्ड के सदस्यों ने भी भ्रम को सच मान इसे "A" श्रेणी में सर्टिफाइड... Continue Reading →

‘श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते’ : ‘दिनकर जोशी’ की कालजयी कृति

धर्मवीर भारती जी की कालजयी रचना अंधायुग में एक प्रसंग है जहाँ गांधारी कृष्ण को शाप देती है। गांधारी : तो सुनो कृष्णप्रभू हो या परात्पर होकुछ भी होसारा तुम्हारा वंशइसी तरह पागल कुत्तों की तरहएक दूसरे को फाड़ खायेगातुम खुद उनका विनाश करके... Continue Reading →

दादा साहब फाल्के : लाइट्स…कैमरा…एक्शन!

साभार : Pratham Books Author: Rupali Bhave; Illustrator : Sunayana Nair Kanjilal; Translator: Deepa Tripathi

Call of The Valley (1967) : एक चरवाहे की दैनन्दिनी

© ...[राकेश]

राज कपूर : श्रेष्ठ फ़िल्मी गीतों के निर्देशक

राज कपूर की फिल्मों के गीत विशाल जनसमूह के ह्रदय को छूने वाले गीत रहे हैं| महासागर जैसे उनके संगीत संसार से 2-3 झलकियाँ भी देख ली जाएँ तो उनकी फिल्मों के संगीत संसार से परिचित होने के लिए वे ही... Continue Reading →

वतन पर खतरे के समय फ़िल्म उद्योग के कर्त्तव्य

सन 1962 में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरु की वैश्विक शांति में आस्था पर चोट करते हुए उनके पंचशील के सिद्धांत को ठुकराते हुए पड़ोसी चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया| अंगरेजी हुकूमत से आज़ादी मिले डेढ़ दशक... Continue Reading →

जाने वाले सिपाही से पूछो (उसने कहा था 1960) – गीतकार शैलेन्द्र या मख़दूम?

बिमल रॉय निर्मित और मोनी भट्टाचार्जी निर्देशित फ़िल्म - उसने कहा था, हिंदी के लेखक चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' की एकमात्र उपलब्ध कहानी - उसने कहा था, पर आधारित है| सलिल चौधरी के मधुर एवं आकर्षक संगीत से सजी इस फ़िल्म... Continue Reading →

Mahandi (1994) : एक पिता की मार्मिक कथा

80 के दशक के अंत में और 90 के दशक के शुरू में दो घटनाएं हुईं| तमिलनाडू के एक राजनेता पर पीडोफ़ाइल्‌ होने के आरोप लगे थे, उससे पहले भी एक राज्य के मुख्यमंत्री पर ऐसे आरोप लगे थे और इलस्ट्रेटेड... Continue Reading →

1942 A Love Story : देश-प्रेम बनाम वैयक्तिक प्रेम

दो तरह के प्रेम (निजी प्रेम और देश प्रेम) के मध्य संघर्ष इस फ़िल्म के बुनियादी तत्वों में से एक है| प्रेम, देशप्रेम, और स्वतंत्रता आन्दोलन का संघर्ष की पृष्ठभूमि में देशप्रेम जब आहुति माँगता हो तो व्यक्तिगत प्रेम एक व्यसन की तरह... Continue Reading →

महादेव देसाई और रिचर्ड एटनबरो की फ़िल्म – गांधी

गांधी फ़िल्म की विश्व स्तरीय सफलता के बाद के वर्षों में कभी किसी पत्रकार ने बासु भट्टाचार्य से उनके घर जाकर साक्षात्कार लिया था तो उन्होंने रिचर्ड एटनबरो की फ़िल्म - गांधी पर कुछ टिप्पणियाँ करते हुए यह भी कहा... Continue Reading →

Jewel Thief (1967) : बेशकीमती संगीतमयी सस्पेंस थ्रिलर

अगर थ्रिलर फिल्मों की बात छिड़ ही जाए तो हिंदी सिनेमा मुख्य तौर पर दो हिस्सों में बंटता है, विजय आनंद की ज्वैल थीफ से पहले और इसके बाद| और दोनों ही कालों में एक भी फ़िल्म इसकी बराबरी में खड़े होने लायक नहीं... Continue Reading →

And Still I Rise : Maya Angelou

तुम मुझे पराजित हुआसाबित कर सकते हो स्वयं गढ़े इतिहास के पन्नों मेंअपनी कड़वाहट और तोड़ मरोड़ कर परोसे गए झूठों के जरियेतुम मुझे धूल -धूसरित कर सकते होपर मैं तब भी धूल की तरह ही उठ जाउंगी| क्या मेरी... Continue Reading →

सूरज बडजात्या की फ़िल्में और रामायण

''होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन! कह महाशक्ति राम के वदन में हुईं लीन।" [ "राम की शक्तिपूजा" - निराला] सूरज बडजात्या के किरदारों या उनकी कहानी की बात है तो सूरज की प्रेरणा का स्रोत रामायण और राम चरित मानस की कहानी और पात्र रहे हैं।... Continue Reading →

आख़िरी ख़त(1966): दुष्यंत,शंकुतला और भरत मुंबई में

दुष्यंत पर्वतीय अंचल में घूमते-घूमते पहुँच गया| वहां जंगल में उसे सुन्दर, मासूम, और अल्हड़ता से भरपूर जीवन जीती शकुन्तला दिखाई दी| घर में पितृहीन, सौतेली माँ के कटु वचनों से आहत रहती 17-18 साल की गरीब लड़की, जिसके अन्दर... Continue Reading →

Cinema Cinema (1979) : हिंदी सिनेमा का इतिहास

भारतीय जनमानस में फिल्मों का स्थान बेहद महत्वपूर्ण एवं विशेष रहा है, काल कोई भी हो| एक विकासशील या गरीबी से संघर्ष करते देश में गाँवों, कस्बों, छोटे शहरों या मझौले शहरों एवं पूर्व के बड़े शहरों (जैसे दिल्ली ,... Continue Reading →

Welcome To Sajjanpur (2008) : सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य

श्याम बेनेगल की फ़िल्म - Welcome To Sajjanpur (2008) मात्र एक कॉमेडी फ़िल्म न होकर सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य है और एक अच्छे व्यंग्य की तरह सामाजिक विसंगतियों पर हास्य-व्यंग्य के माध्यम से चुटीली चोट करती है| इस फ़िल्म में कथा-पटकथा लेखक अशोक मिश्रा की लेखनी... Continue Reading →

श्याम बेनेगल का भारतीय परिवेश से भरा सिनेमा

श्याम बेनेगल का सिनेमा वर्तमान के "Make in India" नारे पर विशुद्ध रूप से खरा उतरता है| श्याम बेनेगल की विविधता से भरी फिल्मोग्राफी इतनी संपन्न है कि भारत के सामजिक-राजनीतिक इतिहास को देखने, जानने और समझने के लिए दर्शक की... Continue Reading →

Khosla Ka Ghosla (2006) : भू-माफिया से ठगी

18-19 साल का अरसा बड़ा होता है एक फ़िल्म के पुराने पड़ जाने, और विषय के बासी हो जाने के लिए, लेकिन अपने बहुत से गुणों के कारण दिबाकर बनर्जी की अभी तक की सबसे अच्छी फ़िल्म खोसला का घोसला ने अपना जादू... Continue Reading →

अमिताभ बच्चन-यश चोपड़ा: अभिनेता-निर्देशक गठबंधन

अभिनेता अमिताभ बच्चन और निर्देशक यश चोपड़ा की जोड़ी ने हिंदी फिल्मों के लिए एक बहुत ही उपयोगी संयोजन प्रस्तुत किया है| 1975 से 1981 के बीच इस जोड़ी ने जिन पांच फिल्मों दीवार, कभी कभी, त्रिशूल, काला पत्थर और सिलसिला में काम किया और इन पाँचों फिल्मों में अमिताभ ने नायक... Continue Reading →

बच्चे को क्या मालूम … मंटो

लिबलिबी दबी- पिस्तौल से झुंझलाकर गोली बाहर निकली। खिड़की में से बाहर झाकने वाला आदमी उसी जगह दोहरा हो गया। लिबलिबी थोड़ी देर के बाद फिर दबी- दूसरी गोली भिनभिनाती हुई बाहर निकली। सड़क पर माशकी की मश्क फटी, वह... Continue Reading →

Guide(1965) : कुछ गीत और विजय आनंद (1)

कवि शैलेन्द्र सा महान गीतकार हो, सचिन देव बर्मन जैसा महान संगीतकार, जिसके गीतों की मिठास की प्रतियोगिता में उँगलियों पर गिने जा सकने वाले संगीतकार ही रहे हैं, साथ हो, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, जैसे महानतम गायक और एक एक गीत से फ़िल्म के संगीत... Continue Reading →

जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली (1971): गीत

वी. शांताराम निस्संदेह दृश्यात्मक कल्पना के बेहद उच्च कोटि के सिनेमाई शिल्पी थे| वी.शांताराम की फ़िल्में, अभिनय और संवाद के लिए नहीं बल्कि उनके द्वारा प्रस्तुत दृश्यात्मक कल्पनाओं के लिए हमेशा सराही जायेंगी| एक आम दर्शक या फ़िल्म समीक्षक उनकी फिल्मों पर... Continue Reading →

पंख होते तो उड़ आती रे : सेहरा (1963)

वी. शांताराम, हिन्दी और मराठी सिनेमा के बहुत बड़े निर्माता, निर्देशक, प्रसिद्द फ़िल्म निर्माण कम्पनी - राजकमल कलामंदिर के स्थापक ही नहीं बल्कि सिनेमा में भारतीय संस्कृति को प्रस्तुत करने वाले अद्भुत कल्पनाशीलता के स्वामी निर्देशक और आपदा में नई विधियां खोज... Continue Reading →

पड़ोसन (1968) : किशोर कुमार की हास्य शाला

इंसान के लिए हँसना तो बहुत जरुरी है| यह अच्छे स्वास्थ्य, मानसिक एवं शारीरिक, का द्योतक भी है और हंसने से व्यक्ति का मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य सुधरता भी है| जैसे पौ फट रही हो जंगल में यूँ कोई मुस्कुराए... Continue Reading →

आयी ऋतु सावन की : (Alaap 1977)

आई ऋतु सावन की पिया मोरा जाये रे आई ऋतु सावन की। बैरन बिजुरी चमकन लागी बदरी ताना मारे रे, ऐसे में कोई जाए पिया, ऐसे में कोई जाए पिया. तू रूठो क्यों जाये रे, आई ऋतु सावन की। तुम... Continue Reading →

मिले दो बदन : Blackmail 1973

विजय आनंद ने एक निर्देशक के तौर पर अद्भुत गीतों को सिनेमा के परदे पर जन्माया है| विजय आनंद ने शुरू की नौ फ़िल्मों में से एक तीसरी मंजिल को छोड़कर शेष 8 फ़िल्में देव आनंद को नायक बनाकर ही बनाई थीं| तीसरी मंजिल भी निर्माता नासिर हुसैन और निर्देशक विजय... Continue Reading →

मुझे जां न कहो : (अनुभव 1972)

मेरी जां, मुझे जां न कहो मेरी जाँ बरसात की एक रात का गीत है| बरसात के मौसम में अलग अलग सुबह, दिन, शाम और रात की बरसात, बरसात से सम्बंधित किसी न किसी फ़िल्मी गीत की याद दिलाती ही है|... Continue Reading →

Kunwara Baap(1974):हिंदुस्तान के कुंवारे पिता के सुख दुःख

मुझे बारिश में चलना सदैव अच्छा लगता है क्योंकि ऐसे में कोई मुझे रोता हुआ नहीं पा सकता - दुनिया के सबसे महान सिनेमाई हास्य कलाकार - चार्ली चैपलिन ने एक बेहद साहित्यिक महत्त्व वाली रचनात्मक बात कही| अभी हाल ही में भारत... Continue Reading →

Satyam Shivam Sundaram(1978): सौन्दर्यशास्त्र पर टीका

अष्टावक्र का शरीर 8 जगह से झुका हुआ था इसलिए बचपन से ही उन्हें अष्टावक्र नाम से संबोधित किया जाता था| जब अष्टावक्र केवल 12 वर्ष के थे, तब वे राजर्षि राजा जनक के दरबार में चल रहे शास्त्रार्थ से अपने पिता को बुलाने गये| जनक के दरबार... Continue Reading →

Shakti(1982): दुःखजनित सन्नाटे से भरे वे 3 मिनट

दर्द हो दुख हो तो दवा कीजे फट पड़े आसमाँ तो क्या कीजे एक सिनेमा वैसा होता है जिसके लिए कहा जाता है Clash of the Titans. बड़े बड़े धुरंधर अभिनेता एक साथ अपने अभिनय के जौहर दिखाकर सिनेमा के परदे... Continue Reading →

Dushman 1972 : अपराध, दंड और प्रायश्चित

ताजिराते हिन्द की दफा 304 के लिए एक अनोखी सजा सुनाकर दुश्मन फ़िल्म में जज महोदय (रहमान) गैर- इरादतन अपराध कर जाने वाले व्यक्ति को सुधरने का अवसर देते हैं| किसी सामान्य व्यक्ति से गैर-इरादतन कोई अपराध हो जाए, इसमें... Continue Reading →

लता मंगेशकर एवं भगत सिंह

https://www.youtube.com/watch?v=BUK8fS1C_vM

Gandhi & Film

रिचर्ड एटनबरो की गांधी और बासु भट्टाचार्य एवं राजकुमार संतोषी ---------------------------------------------------------------------- 50 और 60 के दशक में हिंदी सिनेमा में एक से बढ़कर एक दिग्गज फ़िल्म निर्देशक और हर लिहाज से समर्थ निर्माता उपस्थित थे, बड़े काबिल लेखक फिल्मों के... Continue Reading →

RimJhim ke Tarane leke

एक अकेली छतरी में जब आधे आधे भीग रहे थे, पंक्ति जब गुलज़ार ने रची होगी अपनी फ़िल्म इज़ाजत के एक गीत के लिए, तब बहत संभावना है इस बात की कि उनकी स्मृति में विजय आनंद की फ़िल्म काला बाज़ार... Continue Reading →

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