लता मंगेशकर ने गायन में अपनी एक अधूरी रह गई इच्छा के बारे में कहा था कि वे दिलीप कुमार के लिए गीत नहीं गा पायीं और यह संभव भी नहीं था क्योंकि कई अन्य अभिनेताओं की तरह दिलीप कुमार तो परदे पर स्त्री वेश में आते नहीं| स्पष्ट है कि लता मंगेशकर ने यह मजाक में कहा होगा, और यह भी स्पष्ट ही है कि न केवल दिलीप कुमार बल्कि इसी तरह उनके लिए राज कपूर और देव आनंद के लिए भी गीत गाना संभव नहीं था|
सिर्फ एक युक्ति ऐसी बनती है जिसमें ऐसी फ़िल्में हों जहां इन सितारों की भूमिकाओं के बचपन के भाग भी दिखाए गए हों और तब परदे पर उनके चरित्र के बचपन के लिए ही लता मंगेशकर गीत गा सकती थीं|
संयोगवश ऐसा अवसर उन्हें दिलीप कुमार और राज कपूर के लिए नहीं मिला|
मेरा नाम जोकर में लता मंगेशकर ने गीत नहीं गाये अन्यथा वे राज कपूर के चरित्र- राजू के बचपन के लिए गीत गा सकती थीं|
मंगेशकर परिवार के अत्यंत प्रिय अभिनेता देव आनंद के लिए लता मंगेशकर को यह अवसर मिला देव आनंद द्वारा निर्देशित फ़िल्म – हरे राम हरे कृष्ण में |
फ़िल्म में किशोर साहू एवं अचला सचदेव ने पति-पत्नी की भूमिकाएं निभाई हैं| अमीर जोड़ी आपस में लडती रहती है और एक दूसरे पर दोषारोपण करती रहती है| उनके पास अपने बच्चों, बेटा प्रशांत और उससे छोटी बेटी जसबीर के लिए समय नहीं है| उनके आपसी झगड़ों का बुरा मानसिक असर जसबीर पर पड़ता है| आज भी आपस में लड़ झगड़ कर और अपने साथ रहने की जिद करती जसबीर को झिड़क कर दोनों लोग किसी पार्टी में जाने के लिए तैयार हो रहे हैं| बाहर बरसात या हिमपात होने जैसा मौसम है और अन्दर घर में जसबीर सुबक सुबक कर रो रही है| उसके भयग्रस्त व्यक्तित्व को देव आनंद इस रूप में दिखाते हैं कि वह 4-5 साल की उम्र में भी एक हाथ का अंगूठा चूसती रहती है|
जसबीर से 4-5 साल बड़े प्रशांत की अपनी उम्र खेलने कूदने की ही है लेकिन वह बहन को प्रसन्न करने और घर का माहौल ठीक करने का दायित्व संभालने का प्रयास करता है और इस पृष्ठभूमि में यह अत्यंत मधुर गीत फ़िल्म में अस्तित्व में आता है|
फूलों का तारों का सबका कहना है
एक हजारों में मेरी बहना है
लगभग 3 मिनट के इस गीत को गीतकार आनंद बख्शी, संगीतकार राहुलदेव बर्मन और गायिका लता मंगेशकर के साथ निर्देशक देव आनंद और परदे पर उपस्थित किशोर साहू, अचला सचदेव, सत्यजीत और बेबी गुड्डू ने बेहद प्रभावशाली बना दिया है|
इस फ़िल्म की यह भी एक विशेषता है कि देव आनंद ने वयस्क प्रशांत की भूमिका निभाई तो अपने बचपन की भूमिका में सत्यजीत को ऐसा पहनावा (टखनों तक ही झूलती पतलून, हाइनेक थोडा ढीला ढाला पुलोवर), बालों का स्टाइल और हाव भाव दिए कि परदे पर वह असल में ही ऐसा लगता है कि देव आनंद अपने बचपन में ऐसे ही रहे होंगे| सत्यजीत देव साब के रंग में रंग कर परदे पर उपस्थित रहता है, देव आनंद की तरह चलता है, बोलते हुए उनकी तरह हाथों का उपयोग करता है| यह सब इस छोटे से गीत में भी स्पष्ट हो जाता है|
देव आनंद यहीं नहीं रुकते| एक व्यक्ति अपने पिता का ही प्रतिरूप हो जाता है| किशोर साहू भी ऐसे शारीरिक अंदाजों का प्रदर्शन करते हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि परदे पर प्रशांत जब उनकी उम्र का होगा तो ऐसे ही खड़ा होगा ऐसे हाथ हिलाएगा|
देव आनंद से यह सामंजस्यता, निर्देशक देव आनंद ने अपने वरिष्ठ एवं नाबालिग अभिनेताओं से प्रदर्शित करवाई है|
गीत के अंत में घर के मुख्य दरवाजे से बाहर जाते समय जिस अंदाज़ में किशोर साहू अपने हाथ में हैट लेकर हाथ हिलाकर बच्चों से विदा लेते हैं, वे देव आनंद का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं|
रोती हुयी छोटी बहन का दिल बहलाने का प्रयास करता प्रशांत जब गाता है
ये न जाना दुनिया ने तू है क्यूँ उदास
तेरी प्यारी आँखों में प्यार की है प्यास
तो इन पंक्तियों में आनंद बख्शी जसबीर के चरित्र का पूरा प्रोफाइल खींच देते हैं| यह गीत जसबीर बाद में जैसी बने एवाह क्यों बनी इसका उदाहरण प्रस्तुत कर देता है|
थोडा बहल गयी बहन को अपनी पीठ पर सवार करा कर प्रशांत उसे अपनी माँ और पिता के पास ले जाता है जो बेटी के गालों को चूम कर अपने दायित्व से मुक्त हो पुनः पार्टी के लिए तैयार होने में व्यस्त हो जाते हैं|
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