कई साल पहले जब फ़ारुक शेख टीवी शो – जीना इसी का नाम है, को प्रस्तुत करते थे तब श्याम बेनेगल वाली क़िस्त में सेट पर आये अमरीश पुरी ने श्याम बेनेगल की फ़िल्म – भूमिका, के बारे में कहा था कि एक दृश्य में स्मिता पाटिल का चरित्र उनके चरित्र से बहस कर रहा है तो उसकी रिहर्सल आदि हो चुकी थी और उन्होंने श्याम बेनेगल से कहा कि अगर इस बहस में स्मिता के गुस्सा होकर बोलने के बाद प्रतिक्रिया में वे स्मिता को थप्पड़ जड़ दें तो?
स्क्रिप्ट में ऐसा नहीं था लेकिन शुरुआती हिचक के बाद श्याम बेनेगल ने अमरीश पुरी को हरी झंडी दिखा दी कि कर दो ऐसा|
दृश्य में अमरीश पुरी कुर्सी से उठकर स्मिता पाटिल के गाल पर तमाचा लगा देते हैं और स्मिता स्तब्ध रह जाती है| अनायास हुए ऐसे शारीरिक आक्रमण से, जबकि कैमरा चल रहा है, निर्देशक ने सीन को कट नहीं करवाया है, स्मिता के चेहरे पर गुस्से, अपमान, पीड़ा और कुंठा के प्राकृतिक भाव आते जाते हैं| फ़िल्म के लिहाज से तो यह बेहद शक्तिशाली दृश्य बन गया और स्मिता पाटिल की प्राकृतिक प्रतिक्रियाओं ने एक बड़े वास्तविक दृश्य के रूप में इसका अंत हुआ लेकिन क्या ऐसा करना नैतिक था?
क्या स्मिता पाटिल को इस थप्पड़ योजना के बारे में पहले से बताया नहीं जाना चाहिए था, क्या उनकी रजामंदी नहीं लेनी चाहिए थी?
यहीं गनीमत नहीं रहती| कुछ अरसा पहले अमोल पालेकर की आत्मकथात्मक पुस्तक – “व्यू-फाइंडर” प्रकाशित हुयी है| उसका प्रचार करने लल्लन टॉप चैनल पर पधारे अमोल पालेकर ने भी भूमिका फ़िल्म में स्मिता पाटिल से जुड़ा किस्सा सुनाया| भूमिका में फ़िल्म की नायिका के शुरुआती विवाहित जीवन के दौर में, जिसे फ्लैश बैक तकनीक से ब्लैक एंड व्हाईट में दिखाया गया है, अमोल पालेकर का चरित्र अपनी पत्नी बनी स्मिता पाटिल को दो तीन थप्पड़ लगाते हैं|
अमोल पालेकर के अनुसार इस दृश्य में थप्पड़ के बारे में स्मिता पाटिल को पहले से नहीं पाता था और यह भी फ़िल्म की स्क्रिप्ट का हिस्सा नहीं था और श्याम बेनेगल ने इसे शूट करते हुए ही कहा कि अमोल तुम स्मिता से झगडा करते हुए उसे थप्पड़ जड़ देना| बकौल अमोल वे इसके लिए तैयार नहीं थे लेकिन श्याम बेनेगल ने सीन शूट करना शुरू कर दिया और उन्होंने स्मिता पाटिल को थप्पड़ लगा दिए| टेक लेने के बाद वे स्मिता पाटिल से गले मिले और दोनों रोये|
अगर ऐसा अमरीश पुरी का चरित्र अमोल पालेकर के चरित्र के साथ कर देता या कि अमोल का चरित्र अमरीश पुरी के चरित्र के साथ ऐसा अनायास कृत्य कर जाता तो क्या होता? मसला थप्पड़ से ज्यादा अभिनेत्री की इस बारे में अनभिज्ञता का है|
एनीमल फ़िल्म में स्त्री के चित्रण पर हायतौबा मचाने वाले लोगों को ऐसे मामले नहीं दिखाई देते जो वास्तविक जीवन में फ़िल्म की शूटिंग के दौरान घटे?
क्या भूमिका में स्मिता पाटिल को ऐसे सरप्राइज देने की आवश्यकता थी? स्मिता पाटिल भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन अभिनेत्रियों में से एक थीं| वे योजनाबद्ध तरीके से फिल्माए गए पहले से रिहर्सल से जाने पहचाने दृश्यों में भी ऐसे भाव प्रकट कर देतीं जैसे कि अब अनजान बने रहकर प्रकट किये हैं| आखिर अभिनेता का काम ही सही भावों की प्रस्तुती करना होता है| अब बीमार होने के अभिनय में अभिनेता सचमुच में बीमार थोड़ी हो जाएगा, या कैंसर का रोगी परदे पर बनने के लिए उसे कैंसर से ग्रस्त होना पड़ेगा? या कि एक्सीडेंट में विकलांग होने की भूमिका में उसे सचमुच में अपने अंग भंग करने की आवश्यकता है?
हॉलीवुड के अभिनेता Marlon Brando के साथ एक बहत बड़ा स्कैंडल जुड़ा| उन पर ऐसे आरोप लगे कि Bernardo Bertolucci की फ़िल्म – Last Tango in Paris (1972) में बेर्तोलुची और ब्रांडो ने नई अभिनेत्री Maria Schneider को बताये बिना, स्क्रिप्ट का भाग न होते हुए भी, उन पर एक रेप सीन शूट किया| यह दृश्य शुरू से ही विवादित रहा और इस घटना के कई संस्करण लोगों के सामने आये और कभी मारिया ने कुछ कहा कभी ब्रांडो ने और कभी बर्तोलुची ने| बर्तोलुची ने अंत में यह तो कहा कि मारिया को पूर्व सूचित किये दृश्य को शूट किया गया था लेकिन उन्होंने इसे आर्ट की दृष्टि से मारिया के स्वाभाविक भावों को कैमरे में पकड़ने का प्रयास बताया और कहा कि उन्हें कोई खेद नहीं है ऐसा करने का|
स्वाभाविक प्रतिक्रिया लेने का यह कैसा आग्रह है कुछ निर्देशकों का? दिलीप कुमार ने गंगा जमुना में अंतिम दृश्य में बेहद थका हुआ दिखाई देने के लिए सीन शूट होने से पहले स्टूडियो के चारों ओर दौड़ लगाकर अपने को थका डाला, यही काम अमिताभ बच्चन ने दीवार में किया जहाँ पीटर और उसके गिरोह को पीटकर उन्हें गोदाम से बाहर आकर बाहर लगे नल के पानी से मुंह धोना था| अमिताभ ने भी जैम कर दौड़ लगाकर अपने को इतना थका डाला जिससे लगे कि वे दस बारह लोगों से लड़कर बाहर आये हैं| अभिनेता जयदीप अहलावत ने भी गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के एक दृश्य में अपने को थका दिखाने के लिए शारीरिक मेहनत करके वास्तविकता का पुट अपने अभिनय में डाला|
अच्छे अभिनेता गण अपने अभिनय को गहरा बनाने के लिए बड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन यह उन्हीं के एकल प्रयास पर निर्भर करता है| वे इसमें दूसरे अभिनेता को प्रताड़ित करने का माध्यम नहीं बनाते| जहाँ दूसरा अभिनेता सम्मिलित है दृश्य में, वहां नैतिकता का तकाजा है कि सब कुछ पूर्व नियोजित योजना और स्क्रिप्ट के अनुसार ही हो ताकि दूसरे अभिनेता को अपमान का बोध न हो, उसकी निजता और उसके आत्मसम्मान पर आक्रमण न हो|
इस लिहाज से भूमिका में स्मिता पाटिल के साथ गलत हुआ था| अमरीश पुरी, अमोल पालेकर और श्याम बेनेगल तीनों को स्मिता पाटिल को पहले से सूचित करके उन्हें पड़ने वाले थप्पड़ों के लिए उनकी सहमति लेनी चाहिए थी|
…[राकेश]
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