18-19 साल का अरसा बड़ा होता है एक फ़िल्म के पुराने पड़ जाने, और विषय के बासी हो जाने के लिए, लेकिन अपने बहुत से गुणों के कारण दिबाकर बनर्जी की अभी तक की सबसे अच्छी फ़िल्म खोसला का घोसला ने अपना जादू नहीं खोया|
उदारीकरण के पैर जमाने के बाद बहुत कम हिंदी फ़िल्में ऐसी बनीं जिन्होंने निम्न मध्यवर्गीय परिवारों के अंदुरनी आपसी रिश्तों और बाहर के सामाजिक परिवेश को उतनी बारीकी से दिखाया हो जैसा इस फ़िल्म ने दिखाया| फ़िल्म के लेखक जयदीप साहनी ने एक रोचक प्लॉट तैयार किया और उसमें असल से लगने वाले चरित्रों को जमाया जिन्होंने परदे पर कमाल कर दिखाया|
जमीन पर जबरदस्ती कब्जा करना एक समय में दिल्ली में बहुत बड़ी बीमारी रही है| और इस समस्या के इर्द गिर्द दो तरह की दुनिया बसाना दिवाकर बनर्जी का उल्लेखनीय योगदान रहा इस फ़िल्म में|
एक तरफ निम्नमध्यवर्गीय परिवार की एक अच्छा जीवन जीने की जद्दोजहद वाला संसार है और जिसे एक सामाजिक पारिवारिक फ़िल्म का नाम दिया जा सकता है|
दूसरा संसार एक थ्रिलर फ़िल्म का है जहां सामान्य लोग ठगी प्लॉट करके एक बड़े भूमाफिया की नाक के नीचे से उनसे ठगा गया धन वापिस ले आते हैं|
और इन दो अलग अलग किस्म की फिल्मों का मिश्रण खोसला का घोसला में कमाल रूप में नज़र आता है|
पारिवारिक परिवेश में रिटायरमेंट के बाद बुजुर्गियत की ओर जाते दंपति की आपसी नोक झोंक, हम उम्र पारिवारिक मित्रो के बीच के हास्य बोध से भरे संवाद, पुत्रों और पिता के मध्य गेनेरेशन गैप के कारण होने वाले तनाव, सीमितता भरे निम्न मध्यवर्गीय माहौल से बाहर निकलने की अच्छा पढ़ लिख गयी गई युवा पीढी की तीव्र इच्छा, भले उसके लिए उसे अपने परिवार को समस्याओं में छोड़कर विदेश चले जाने के आरोप ही सहन क्यों न करने पड़ें, और उसी घर में कम पढ़े लिखे, किसी काम में सैटल न हुए युवा की कागजी योजनायें और अंततः अपनी अपनी बड़ी बड़ी योजनाओं को छोड़ एक दूसरे के लिए त्याग करने की भावनाएं, आदि इत्यादि एक परिवार नामक सामजिक संस्था की मजबूती को दिखाते हैं|
भू-माफिया को कैसे ठगा जाता है, वह अपने आप में एक अच्छे थ्रिलर की गाथा है|
अभिनय के हिसाब से देखें तो यह मुख्यतः नवीन निश्चल, अनुपम खेर, बोमन ईरानी और विनोद नागपाल के बीच का मैच है और चारों एक दूसरे से बेहतर करने के प्रयास में फ़िल्म को बेहतरीन अदाकारी का मैच बना देते हैं|
इन दिग्गजों के अभिनय के उच्च स्तर के सामने राजेश शर्मा और रणवीर शौरी ही उभर कर इनके ट्रैक पर आ पाते हैं| कम समय की भूमिकाओं में बहुत से अभिनेताओं ने फ़िल्म को अच्छा और विश्वसनीय बनाने में पूर्ण सहयोग दिया है|
…[राकेश]
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