श्याम बेनेगल का सिनेमा वर्तमान के “Make in India” नारे पर विशुद्ध रूप से खरा उतरता है| श्याम बेनेगल की विविधता से भरी फिल्मोग्राफी इतनी संपन्न है कि भारत के सामजिक-राजनीतिक इतिहास को देखने, जानने और समझने के लिए दर्शक की आसानी से गाइड बन जाती हैं| बहुत कम बजट में उन्होंने ऐसी फ़िल्में बनायी हैं जिन्हें विश्व के किसी देश के किसी सिने प्रेमी को आसानी से पूरे आत्मविश्वास से दिखाई जा सकती हैं कि देखो ये सब मौलिक फ़िल्में हैं भारत की|
अभिनेता-निर्देशक गुरुदत्त के कजिन श्याम बेनेगल की फिल्मों की सार्थकता किसी न किसी रूप में बनी ही रहती है, नए ज़माने के दिग्दर्शक, लेखक और तकनीकी विशेषज्ञ भी उनकी फ़िल्में रेफरेंस की तरह देखते ही रहते हैं|
तस्वीर संग्रह में ऊपर आम के बाग़ में झूले वाली तसवीर श्याम बेनेगल की जूनून (1978) फ़िल्म की है, इस तस्वीर में नफीसा अली, एक ब्रितानी लडकी के चरित्र में, भारत में पहली बार बारिश देखकर प्रसन्न हैं| उनके नीचे की तसवीर में उर्दू की प्रसिद्ध कथाकार इस्मत चुगताई हैं जिन्होंने जूनून में दादी चरित्र की भूमिका निभाई थी| अब इस दृश्य की तुलना ऐसे ही दृश्य से करें जि संजय लीला भंसाली की प्रसिद्ध वेब सीरीज हीरामंडी में फिल्माया गया| यह मात्र संयोग तो हो नहीं सकता कि हीरामंडी का दृश्य जूनून के दृश्य जैसा ही लग रहा है|
श्याम बेनेगल ने अपनी जीविका विज्ञापन की दुनिया से अर्जित करना आरम्भ किया और कई बरस उसमें व्यस्त रहे| जीवन के चार दशक पूरे करने के बाद ही उन्हें अंकुर बनाने का अवसर मिला| अंकुर व्यावसायिक रूप से भी एक सफल फ़िल्म थी और इसने अच्छा खासा लाभ अर्जित किया था|
अंकुर की कहानी, गुरुदत्त के कजिन श्याम बेनेगल के दिमाग में तब से थी जब वे कॉलेज में पढ़ ही रहे थे और वह विकसित होती रही| जमींदारी प्रथा के कारण सामाजिक शोषण आंध्रप्रदेश में मुद्दा रहा है दक्षिण के अन्य राज्यों में भी रहा है| पूर्व प्रधानमन्त्री पी वी नरसिंह राव ने आत्मकथात्मक उपन्यास द इनसाइडर में बहुत विस्तार से इस समस्या और इसके निवारण के लिए उठाये क़दमों पर लिखा है| राव जब आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो जमींदारी उन्मूलन में और भूमि सुधारों में उन्होंने बेहतरीन काम किया था| भू-मालिकों द्वारा अपने विवाह से बाहर, गाँव में एक या ज्यादा स्त्रियों को बिना उनसे विवाह किये, पत्नी की तरह रखना एक आम प्रथा बन चुकी थी और अक्सर ऐसे संबंधों से उत्पन्न संतानों और वैध विवाह से उत्पन्न संतानों में संपत्ति के संघर्ष चले हैं| दक्षिण के बहुत से फ़िल्मी कलाकारों के निजी जीवन की भी यही कहानियां रही हैं| अंकुर जैसी समान्तर सिनेमा की फ़िल्म और वर्तमान में बनी पुष्पा जैसी घोर व्यावसायिक श्रेणी की फ़िल्म के मूल में यही अधिकार का संघर्ष है| समाज के ऐसे ज्वलंत मुद्दे पर श्याम बेनेगल ने भारतीय प्रचलित सिनेमा के सिद्ध फ़ॉर्मूला छाप रास्ते को न अपना कर सार्थक सिनेमा की राह पकड़ी और ऐसी फ़िल्म बनाई जिससे मुद्दा मुख्य रहे और अन्य उप-विषयों के कारण कमजोर न हो जाए| अपनी फ़िल्म में शोषक परम्परा के विरुद्ध प्रतिरोध को और सघन दिखाने के लिए उन्होंने फ़िल्म के अंत में एक दृश्य और जोड़ा जिसमें एक ग्रामीण लड़का पत्थर उठाकर जमींदार के घर पर फेंकता है, यह प्रतिरोध का अंकुर फूटा था|
इस फ़िल्म के साथ एक एतिहासिक तथ्य जुड़ा है कि श्याम बेनेगल और उनकी टीम के अतिरिक्त जिसने इस फ़िल्म को प्रदर्शन से पूर्व देखा वे सत्यजीत रे थे जो बम्बई आये हुए थे| इसी फ़िल्म में शबाना आजमी को देखकर उन्होंने उन्हें शतरंज के खिलाड़ी में लिया|
अगली फ़िल्म निशांत में वे पुनः आम लोगों पर जमींदारी प्रथा द्वारा अत्याचार करने के मुद्दे को लेकर आये और इस बार बहला फुसला कर लालच द्वारा स्त्री को अंकशायिनी बनाने के बदले उन्होंने सीधे पूरे गाँव के सामने जमांदार परिवार द्वारा स्त्री को उसके घर से अगवा करते हुए दिखाया और जमींदार का इतना भयानक नियंत्रण गाँव पर था कि वहां कैद स्त्री, जो गाँव के स्कूल के अध्यापक की पत्नी है, जमींदार के घर से उसकी कार में बाकायदा मंदिर में पूजा करने जाती है और वहां उसे अस्त व्यस्त हालत में उसका पति बैठा मिलता है लेकिन वह उसके साथ नहीं जा पाती, क्योंकि क़ानून व्यवस्था संभालने वाले तंत्र की भी ऐसी स्थिति नहीं है कि जमींदार परिवार को मनमानी करने से रोक सके|
जब तक फ़िल्म बनी, देश में आपातकाल लग चुका था| सेंसर और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फ़िल्म रोक दी, और सैंकड़ों कट्स बता दिए| श्याम बेनेगल ने अपने एक परिचित के माध्यम से तब की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से मुलाक़ात की| इंदिरा जी ने पूछा कि फ़िल्म दिखा सकते हो? विज्ञापन की दुनिया के अनुभव वाले श्याम बेनेगल ऐसी किसी स्थिति के लिए तैयार होकर गए थे और फ़िल्म का एक प्नेिंट अपने साथ दिल्ली लेकर गए थे| उन्होंने फ़िल्म दिखाने का इंतजाम किया और प्रधानमंत्री को आमंत्रित किया| उन्हें लगता था कि प्रधानमंत्री मुश्किल से 20-30 मिनट की फ़िल्म देख पाएंगीं| लेकिन इंदिरा जी ने पूरी फ़िल्म देखी और श्याम बेनेगल से कहा कि समस्या क्या है, आर दीज़ पीपल स्टुपिड? ऐसी फ़िल्म तो अवश्य ही प्रदर्शित होनी चाहिए जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग देखें| उन्होंने श्याम बेनेगल को सूचना प्रसारण मंत्रालय को फ़िल्म को पास करने का ऑर्डर देने का आश्वासन दिया|
मंत्रालय में बैठे नेताओं और अधिकारियों ने मन मसोस कर पी एम् के दबाव के कारण फ़िल्म को तो बिना कट के पास किया लेकिन श्याम बेनेगल के ऊपर एक शर्त लगा दी कि फ़िल्म के शुरू में ही ऐसा डिस्क्लेमर दिखाई कि यह सब स्वतंत्रता से पहले ब्रिटिश राज की घटनाएं हैं|
भूमिका में फिर से श्याम बेनेगल ने पुरुष नियंत्रित समाज की बखिया उधेड़ कर रख दी और स्त्री के सामने भी आइना रख दिया जिससे वह अपने जीवन की दिशा, दशा और गति को ढंग से देख ले, अपने चिंतन की सामर्थ्य बढाए और सोच समझ कर समझदारी से जीवन के निर्णय ले और अपने आत्मविश्वास को हर हालत में कायम रखे| परिस्थितियों के सामने घुटने न टेक दे| हंसा वाडकर के जीवन पर बनी फ़िल्म, एक स्त्री के जीवन पर बनी फ़िल्म नहीं रह जाती, बल्कि स्त्री विमर्श की फ़िल्म बन जाती है |
शुरू की उनकी फ़िल्में प्रतिरोध का सिनेमा वाली श्रेणी में आती हैं और शुरू से वे उन्हें सरकारी फंडिंग से बनाना चाहते तो शायद वे कभी नहीं बनतीं|
भारत एक खोज, यात्रा, संविधान, संक्रांति आदि कार्यक्रम जो श्याम बेनेगल ने दूरदर्शन के लिए बनाए और एन एफ डी सी के लिए चंद फ़िल्में (समर, सूरज का सातवाँ घोडा, हरी भरी, द मेकिंग ऑफ़ महात्मा, मम्मो) बनाने के अलावा और सभी फ़िल्में उन्होंने निजी निर्माताओं के साथ बनाईं| या कहना चाहिए कि अपनी तरह की फिल्मों के लिए भी उन्होंने निर्माता ढूंढ ही लिये और फ़िल्में बनाते रहे|
भूमिका के साल भर बाद जब उन्होंने पहली बार निर्माता बने शशि कपूर के साथ जूनून बनायी तो साहित्य से रस्किन बांड के लघु उपन्यास ए फ्लाइट ऑफ़ पिज़ंस को परदे पर उकेरने ले आये|
श्याम बेनेगल की मंथन भारत की ओर से विदेशी भाषा श्रेणी में ऑस्कर पुरस्कार प्रतियोगिता में भेजी गयी थी| हो सकता है एक दो फ़िल्में और उनकी, ऑस्कर के लिए भेजी गयी हों उन सालों में जब अंत तक अधिकारी लोग कोई निर्णय न ले पाए हों और अंत में लगा हो कि भारतीय फ़िल्म तो भेजनी ही है तो श्याम बेनेगल फ़िल्म भेज देते हैं| ऑस्कर को लेकर भारतीय अधिकारियों की नीतियाँ ढुलमुल रही है| कई मर्तबा तो इन्हें यह ही नहीं पता होता कि जिस फ़िल्म को भेज रहे हो वह किसी विदेशी फ़िल्म की नक़ल भर है और वहां लोग खिल्ली उड़ायेंगे|
श्याम बेनेगल की कुछ फ़िल्में इतने विश्वसनीय तरीके से भारतीय कथाओं को दिखाती हैं और सिनेमाई स्तर में वे वैश्विक गुणवत्ता की बराबरी करती हैं कि आसानी से ऑस्कर में भारत की ओर से भेजी जा सकती थीं|
अंकुर, भूमिका, जूनून, कलयुग, मंडी, त्रिकाल, और – सूरज का सातवाँ घोडा, ये सात फ़िल्में ऑस्कर में विदेशी भाषा श्रेणी में नामांकन प्राप्त कर सकती थीं, अगर ऑस्कर के दस्तूर के अनुसार इनके प्रोमोशन के लिए भारत सरकार की अधिकृत एजेंसियां प्रयास करतीं| श्याम बेनेगल के निर्माताओं के पास इतना धन कभी नहीं रहा होगा कि वे ऑस्कर की अमेरिकी लॉबी करने वाली परिपाटी का अनुसरण कर सकें|
सूरज का सातवाँ घोडा तक उनकी फ़िल्मी यात्रा उत्कृष्ट सिनेमा का नमूना है| उसके बाद फ़िल्में बनाने की उनकी गति थोड़ी कम हो गयी और जिस शिखर को वे पहले छू चुके थे, बाद की फ़िल्में उससे नीचे की चोटियों के स्तर तक की चढ़ाई ही पा सकीं| उनके साथ विजय तेंदुलकर, सत्यदेव दूबे जैसे लेखक भी नहीं रहे| नए जमाने के दस्तूर के अनुरूप कुछ फिल्मों में उन्होंने व्यवसायी सिनेमा के सितारों को भी अपनी फिल्मों में लिया| फ़िल्म आलोचक खालिद मोहम्मद की लिखी तीन फ़िल्में (मम्मो, सरदारी बेग़म, ज़ुबैदा) उन्होंने बनाईं| यह उनके खुले और उदार विचारों को भी दर्शाता है क्योंकि खालिद मोहम्मद 70 और 80 के दशक में श्याम बेनेगल की फिल्मों के प्रति एक निर्मम आलोचक के तौर पर ही पेश आते थे और उनकी फिल्मों की कठोर आलोचना अपने कॉलम में लिखते थे|
गांधी के जीवन पर चूंकि रिचर्ड एटनबरो पहले ही एक विश्व प्रसिद्द फ़िल्म बना चुके थे सो श्याम बेनेगल ने गांधी के महात्मा गांधी बनने की यात्रा पर केन्द्रित “मेकिंग ऑफ़ महात्मा” बनाई, जिसके बारे में यही विचार आता है कि एटनबरो की गांधी न बनी होती तभी इसे ज्यादा सम्मान मिल सकता था| यह उस स्तर की फ़िल्म नहीं थी|
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के ऊपर भी उन्होंने फ़िल्म- द फोर्गोटन हीरो, बनाई| जो कि उस समय तक नेता जी के जीवन पर बनी पहली ही फ़िल्म थी और निस्संदेह बाद में अन्यों द्वारा नेता जी के जीवन पर बनाई फिल्मों से श्याम बेनेगल की फ़िल्म कई मायनों में बेहतर है और उनकी फ़िल्म ने बाद के निर्देशकों के लिए सन्दर्भ का काम तो किया ही|
सामाजिक व्यंग्य के क्षेत्र में वेलकम टू सज्जनपुर उनकी एक उल्लेखनीय फ़िल्म है|
श्याम बेनेगल का सिनेमा किसी न किसी रूप में नए और अनुभवी फिल्मकारों को प्रेरित और प्रभावित करता ही रहेगा| कुछ इस बात से अचरज में पड़ेंगे कि श्याम बाबू ने कैसे गंभीर सामाजिक हस्तक्षेप अपनी फिल्मों के माध्यम से किया, कुछ यह देख पायेंगे कि सीमित बजट में भी उन्होंने उच्च गुणवत्ता की फ़िल्में बनाएँ और कभी बाज़ार के सामने झुक कर अपनी फिल्मों को समझौता नहीं करने दिया, उन्होंने अपनी शैली की ही फ़िल्में बनाईं, और जम्पिंग बेबी की तरह इधर उधर नहीं कूदे कि आजकल फलाने का सिक्का चल रहा है तो उसकी तरह अपनी फिल्मों को बना लें, और जिस तरह अनवरत उन्होंने सक्रियता से फ़िल्में बनायी हैं, वह किसी भी फिल्मकार के लिए ईर्ष्या का विषय हो ही सकता है|
…[राकेश]
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