सिनेमा के परदे पर अमिताभ बच्चन और रेखा की जोड़ी का अर्थ ही परदे पर बिजली का करेंट दौड़ना रहा है| एक समय था जब अमिताभ बच्चन अपने चरित्रों में कॉमेडी की भरपूर डोज़ दर्शकों को दिया करते थे और उस दौर की फिल्मों में अगर रेखा उनकी नायिका बनीं तो उनके युगल गीतों में रेखा अमिताभ की उर्जा को कांटे की टक्कर देती नज़र आती हैं| यह अलग बात है कि अमिताभ बच्चन की तमाम हिट फिल्मों में सफलता का सारा श्रेय उन्हें ही मिलता रहा| उनके सितारे ही उनके ऐसे पक्ष में रहे कि उनके सामने गज़ब का अभिनय कर गए अभिनेताओं को उनके श्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए सराहना नहीं मिली, न दर्शकों द्वारा न समीक्षकों द्वारा| उनके इसी दौर में उनको “वन मैन इंडस्ट्री” के खिताब से फ़िल्म संसार पुकारने लगा| उनकी साख ऐसी थी कि उनकी कमजोरियों की ओर ध्यान ही नहीं जाता था लोगों का, वे एक फ़िल्म में कुछ दृश्य अपने श्रेष्ठ अभिनय के स्तर से नीचे भी कर गए तो भी उनके अच्छे औसत के कारण वे बचे रहे|

प्रकाश मेहरा की “मुकद्दर का सिकंदर” अमिताभ बच्चन और रेखा की जोड़ी की बहुत बड़ी हिट फ़िल्म है|

जहां अमिताभ ज़ंजीरशोलेदीवार , परवरिशहेराफेरी और अमर अकबर एंथोनी और तमाम अन्य सुपर हिट फिल्मों के कारण बॉक्स ऑफिस पर और अपने अच्छे अभिनय के बलबूते अभिनय के क्षेत्र में भी सिनेमा के शहंशाह बने हुए थे तो रेखा भी इनमें से कई फिल्मों में उनकी नायिका थीं, और घर जैसी फ़िल्म में अपने उल्लेखनीय अभिनय प्रदर्शन से अच्छी अभिनेत्री होने की प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी थीं| अमिताभ बच्चन के साथ किये गए दृश्यों में मुश्किल से ऐसा दृश्य किसी फ़िल्म में मिलेगा जहां यह कहा जा सके कि रेखा अमिताभ के अभिनय के सामने उन्नीस पड़ गयीं| उन्होंने सटीक कदमताल की है अमिताभ के साथ|

मुकद्दर का सिकंदर” में एक गीत है-

“वफ़ा जो न की तो जफा भी न कीजे, सितम जानेमन इस तरह भी न कीजे, कि मरने की तमन्ना में कहीं जी न जाएँ“”|

फ़िल्म में रेखा का चरित्र – ज़ोहरा बाई, देवदास की चंद्रमुखी से प्रेरित है| और फ़िल्म में ज़ोहरा का परिचय देने वाला गीत “सलामे इश्क मेरी जां, ज़रा कुबूल कर लो” नामक मुजरे से होता है जिसमें जीवन में पहली बार किसी कोठे पर गए सिकंदर मियाँ (अमिताभ बच्चन) तरन्न्मुम में आकर खुद ही उठकर गाने लगते हैं – इससे आगे की अब दास्ताँ मुझ से सुन

और नशे में झूमते इस बेपरवाह युवक सिकंदर से जोहरा को पहली नज़र का प्रेम हो जाता है| वह अपने कोठे पर तब तक मुजरा न करने की कसम खा लेती है जब तक सिकन्दर दुबारा वहां न आ जाए|

एक दिन सिकंदर एक पॉल नाम के गुंडे का पीछा कर रहे हैं उसे मारने के लिए| पॉल ज़ोहरा के कोठे में छिप जाता है और जोहरा से उसकी जन बचाने की विनती करता है उसे इमोशनली मेनिपुलेट करके कि सिकंदर उसे मार कर फांसी पर चढ़ जाएगा और जोहरा की सिकंदर के प्रति मुहब्बत अधूरी रह जायेगी|

सिकंदर के वहां आ धमकने के बाद उसका ध्यान भटकाने के लिए जोहरा इस गीत को गाती है जिससे पॉल वहां से छिपकर भाग जाए|

फ़िल्म के नए संस्करणों में इस गीत को शायद काट दिया गया है लेकिन यूट्यूब पर अलग से यह गीत मिल जाएगा|

सिकंदर को पॉल को ढूंढना है और इस वक्त उसका ध्यान जोहरा के अस्तित्व पर उसकी खूबसूरती पर, उसकी कमाल की गायिकी पर नहीं है| और जोहरा को अपने सारे गुणों से सिकंदर का ध्यान अपनी ओर खींचना है जिससे उसका ध्यान पॉल से हट जाए और उसके अन्दर गुस्सा शांत हो जाए|

यहाँ रेखा के लिए एक्टिव होने का अवसर था और अमिताभ को रेखा की सक्रियता के प्रत्युत्तर में अपनी प्रतिक्रियाएं देनी थीं|

अभिनय की शुद्धता के हिसाब से रेखा तो इस गीत में अपना सौ प्रतिशत योगदान कर देती हैं लेकिन अमिताभ कमजोर पड़ जाते हैं| वे पोज़ देते नज़र आते हैं| न वे खुद और न ही उनके निर्देशक प्रकाश मेहरा इस गीत में उनसे वैसी अभिनय सामग्री निकलवा पाए जहां देखने वाले को पूर्ण संतुष्टि से ज्यादा कुछ मिल जाए जैसा कि अमिताभ के अभिनय प्रदर्शन से ज्यादातर मिल ही जाता है|

अमिताभ – रेखा के संयुक्त दृश्यों और गीतों में उनके द्वारा बोले गए संवादों और गाये गीत के बोलों से ज्यादा उनकी आँखों से भाव बाहर प्रसारित होते हैं| लेकिन इस गीत में आँखों के भावों की वह कांटे की टक्कर नज़र नहीं आती|

शायद अमिताभ को इस गीत के फिल्मांकन के समय ही अंदेशा हो गया होगा कि शूटिंग वाला दिन उनका नहीं है| कोई निजी समस्या भी हो सकती है|

वे इस गीत में दो तीन बार अपने चरित्र के खोल से बाहर आ गए हैं|

जोहरा बनी रेखा जब कक्ष का दरवाजा बंद करके पलट कर दरवाजे से लगे हुयी ही गाती हैं –

नहीं इश्क हमसे नहीं न सही

हमें इश्क तुमसे है हम क्या करें

तो ज़ोहरा की (और चरित्र में रेखा की) छेड़छाड़ अपने उरूज़ पर है, लेकिन सिकंदर बने अमिताभ के पास इसका माकूल जवाब नहीं है तो अभिनेता अपनी आँखें झुका लेते हैं मानो इस पल रेखा की श्रेष्ठता उन्होंने मन में स्वीकार कर ली हो|

इस एक ही गीत की बात हो तो इसमें रेखा अमिताभ से अभिनय की गहराई के मामले में जीत गयीं|

कुछ कारणों से सिलसिला के बाद इन की रेखा और अमिताभ बच्चन की कोई फ़िल्म साथ नहीं आई, लेकिन पीछे जो इन्होने किया उसमें इनकी साथ में की गई फिल्मों के तमाम दृश्य भारतीय सिनेमा की धरोहर हैं| बहुत सालों बाद भी जब ये दोनों महान अभिनेता भौतिक रूप से नहीं रहेंगे तब भी परदे पर इनकी उपस्थिति की जीवंतता दर्शकों को रोमांचित किया करेगी| इनके जैसी कैमिस्ट्री बहुत कम अभिनेता-अभिनेत्री आपस में बना पाते हैं|

…[राकेश]


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