जो भारतीय दर्शक Alfred Hitchcock की Dial M for Murder (1954) और हॉलीवुड में ही इसकी रीमेक, माइकल डगलस अभिनीत A Perfect Murder (1998) नहीं देख पाए, वे इसी प्लॉट पर बनी मुकुल आनंद की एतबार (1985) देख सकते हैं| हॉलीवुड की दोनों फिल्मों से अलग एतबार, बप्पी लाहिड़ी द्वारा संगीतबद्ध दो प्रसिद्द गीतों “किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है” और “आवाज़ दी है, आज एक नज़र ने” के लिए भी याद की जाती है, भूपिंदर सिंह और आशा भोसले की युगल गायिकी से सजे दोनों गीत ज्यादातर भारतीय संगीत रसिकों के पसंदीदा गीतों में शामिल रहते ही हैं|

एतबार फ़िल्म का अब जो संस्करण यूट्यूब और ओटीटी आदि माध्यमों पर मिलते हैं उनमें इला अरुण का गाया एक गीत और आशा भोसले का एक अन्य एकल गीत गायब मिलते हैं|

इन्साफ का तराजूदलाल, बरसात और एतबार सहित चंद अन्य फिल्मों में राज बब्बर खलनायक के रुप में अपने अभिनय के जौहर दिखाते हैं| इन सभी फिल्मों में वे दुष्टता की हद वाली कमीनगी अपने परदे के व्यवहार में उतारते हैं|

एतबार में उनके चरित्र – जयदीप, के शेडस जटिल हैं| जयदीप लालची होने के साथ, भयंकर रूप वाले शातिर दिमाग का मालिक भी है| जयदीप में शिकारी या मछली पकड़ने वाले व्यक्ति जैसा धैर्य है| जयदीप की रईसी, पत्नी नेहा (डिम्पल कपाडिया) की पुश्तैनी दौलत की वजह से है और इसी नाते उसने यह विवाह भी किया है| खूबसूरत तो नेहा भी है लेकिन जयदीप को रईसी और उस नाते खूबसूरत स्त्रियों का साथ बेरोकटोक वाला और अपनी शर्तों पर चाहिए| उसे नेहा से कतई कोई लगाव नहीं है| और जब तक उसे लगता है कि नेहा उस पर निर्भर है वह उसे जमकर प्रताड़ना भी देता है|

उसके जीवन की एक ढर्रे पर चल रही गाडी को दूसरी राह पर धकेल देता है नेहा की ज़िंदगी में उसके पुराने दोस्त सागर (सुरेश ओबेरॉय) का आगमन| कॉलेज के बाद नेहा और सागर एक दूसरे से विवाह करना चाहते थे लेकिन अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने और नेहा के पिता की दौलत के सामने पहले अपने को स्थापित करने के उद्देश्य के कारण सागर पीछे हट जाता है|

लालची जयदीप के सामने स्पष्ट है कि अगर नेहा किसी भी कारण से उससे कानूनी संबंध विच्छेद कर लेती है तो उसकी सारी रईसी समाप्त हो जायेगी|

गिरगिट की तरह रंग बदलना किसे कहते हैं इसे देखना हो तो राज बब्बर के अभिनय को देखना चाहिए एतबार में | आगे के रास्ते के लिए जयदीप के सामने एक ही समय में दोहरा व्यक्तित्व जीने का ही विकल्प है| और इस दोहरे चरित्र को निभाने के लिए राज बब्बर अपने से वरिष्ठ दो अभिनेताओं के चरित्रों की ओर जाते हैं|

नेहा के साथ जयदीप के रूप में राज बब्बर शशि कपूर के खुशमिजाज चरित्रों जैसे आकर्षक, मोहक और मधुर स्वभाव जैसा व्यक्तित्व गढ़ते हैं| और अपनी लालच की पूर्ती के लिए वे परवाना फ़िल्म के अमिताभ बच्चन के चरित्र की राह पकड़ते हैं| दर्शक परदे पर सारी गतिविधि से परिचित है अतः उसे पता है कि यह चरित्र दिखावा कर रहा है लेकिन कहानी के चरित्रों को अपने बहाव में ले जाने के लिए जयदीप जो कर रहा है वह सच है| इस जटिलता को राज बब्बर कुशलता से परदे पर निभा जाते हैं| परदे पर जिस आत्मविश्वास की जरुरत उनके चरित्र को थी उसे राज बब्बर प्रभावशाली ढंग से दर्शाते हैं| अपने एक पुराने परिचित विक्रम (शरत सक्सेना) को अपने नियंत्रण में लेने के दृश्यों में राज बब्बर की अभिनय कला अपने पूरे शबाब पर चमकती है|

एक बेहद अमीर, खूबसूरत, गुणी और पढी लिखी स्त्री नेहा के दो ओर खड़े उसके भूतकाल (सागर) और वर्तमान (जयदीप) के रूप में सुरेश ओबेरॉय और राज बब्बर की मरदाना उपस्थिति और प्रतियोगिता उनके व्यक्तित्वों और उनके अभिनय के कारण विश्वसनीय लगती है और दर्शक के लिए फ़िल्म में तनाव उत्पन्न करती है जो उसकी ध्यान भटकने नहीं देती|

गीत- आवाज़ दी है, आज एक नज़र ने के समय नेहा के वर्तमान की स्थिति को अपनी आँखों के सामने बदलते देखते समय की परिस्थितियों को जिस तरह सुरेश ओबेरॉय ने प्रदर्शित किया है वह उनके अभिनय पर बारीक पकड़ को दर्शाता है| सागर आया किसी और उमंग से था और अब उसके सामने ही जीवन किसी अन्य ही दिशा में चला जा रहा है|

फ़िल्म एक अपराध थ्रिलर है जिसमें चरित्रों की योजना मुताबिक़ घटनाएं न घट कर अन्य ही मोड़ ले लेती हैं और इसलिए उनके जीवन में पुलिस का आगमन होता है और खुर्राट इन्स्पेक्टर बरुआ (डैनी डेन्जोग्पा) का आतंक घटना से प्रभावित चरित्रों पर दिखाई देता है| डैनी दो घंटे के आसपास की फ़िल्म में एक घंटे से ज्यादा बीत जाने के बाद ही परदे पर आते हैं लेकिन आने के बाद वही ज्यादा नज़र आने लगते हैं, दृश्य में वे न भी हों पर उनके चरित्र का असर उनकी गैर मौजूदगी में भी महसूस होता है|

हॉलीवुड की हिचकॉक वाली फिल्म से थोडा अलग चलने के प्रयास में लेखक विनय शुक्ल और निर्देशक मुकुल आनंद अंतिम 20-25 मिनट की फ़िल्म को कमजोर कर देते हैं| उन्हें मूल कथानक के साथ ही चलते रहना चाहिए था|

इस कमी के बावजूद हिन्दी में थ्रिलर फिल्मों के दर्शकों के लिए तेज गति की फ़िल्म – एतबार भुलाई न जा सकने वाली फ़िल्म है| जिसका अंत जानते हुए भी इसे दर्शक कुछ अरसे बाद फिर से देख लेते हैं|

महत्वपूर्ण मौकों पर पर बारिश के दृश्य फ़िल्म में थ्रिलर वाले हिस्से के अनुभव को घनीभूत करते हैं| सड़क पर बहुत सारे काले छाते लिए खड़े लोगों वाला शॉट आकर्षक है|

…[राकेश]


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