निर्देशक वी के प्रकाश द्वारा निर्देशित फ़िल्म – फिर कभी को यूटीवी ने सीधे डीवीडी और डी टी एच पर प्रदर्शित किया था|
जिन सालों में वयस्क प्रेम कहानियों पर जोगेर्स पार्क जैसी फ़िल्में बन रही थीं| यह उस दिशा से अलग किस्म की फ़िल्म है|
रोते रोते हँसना और हँसते हँसते रोना के उदाहरण के तौर पर यह एक सटीक फ़िल्म है| मिठुन चक्रवर्ती ने अपने बेहतरीन अभिनय से फ़िल्म को आकर्षक बनाया और उन्होंने बड़ी कुशलता से अपने चरित्र के विभिन्न शेड्स प्रदर्शित किये|
जीवन में सुख और दुःख का चक्र कैसे समय के विशेष कालखंड को प्रभावित करता है उसे परिभाषित करता है, उसके दर्शन के लिए यह फ़िल्म उचित वातावरण प्रस्तुत करती है|
बचपन में या किशोरावस्था में साथ पढ़ते, खेलते कूदते एक लड़के और लडकी में गहन प्रेम हो जाए और फिर किसी कारण वश दोनों के परिवार अलग अलग जगहों पर चले जाएँ तो यह भौतिक दूरी सहना इन किशोरों के लिए एक असहनीय दुःख लेकर आता है| लेकिन पढाई लिखाई, जीवन में कुछ बनने की जद्दोजहद और जीविकोपार्जन हेतु जेवण द्वारा बनाए गए दबाव के कारण किशोरावस्था का वह प्रेम दिल के किसी कोने में संरक्षित हो जाता है| शायद दोनों सोचते हों कि एक बार अपने पैरों पर खड़े हो जाएँ तब पुनः मिलने का यत्न करेंगे| लड़के के मन में प्रयास करने का ख्याल, और लडकी के मन में लड़के का इन्तजार करने का ख्याल घर कर सकता है|
किशोरवस्था का प्रेम अब दुःख नहीं बल्कि एक कसक बन कर साथ रहता है| समय ऐसी चाल दिखा सकता है कि दोनों या उनमें से कम से कम का विवाह अन्यत्र हो जाता है और अब विवाहित व्यक्ति अपने वैवाहिक जीवन में व्यस्त हो जाता है| किशोरावस्था के प्रेम की याद उस तरह नहीं सताती और अगर विवाह करने वाला पुरुष है और उसकी नव विवाहित पत्नी भी उसके किशोरावस्था के प्रेम के बारे में जान कर उसे प्रसन्नता से बीते जीवन की एक याद समझ स्वीकार कर लेती है और वह प्रेम उन दोनों पति पत्नी के मध्य पत्नी द्वारा पति को गाहे बगाहे छेड़खानी करने का अवसर बन जाए तो वैवाहिक जीवन सुखद और गहरा होता जायेगा| अब पुरुष का अपनी पत्नी संग गहरा नाता हो गया है, जीवन उसके संग जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है| उसके बिना जीवन की कल्पना करना भी मुश्किल है| उसे यह भी लगता होगा कि उसकी किशोरावस्था की प्रेमिका का विवाह भी किसी अन्य पुरुष से हो गया होगा और वह भी एक सुखी वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रही होगी|
व्यक्ति की सन्तान होकर बड़ी हो जाती है, उसका भी विवाह हो जाता है| उसके भी संतान हो आ जाती है और वह पौत्र या पौत्री भी किशोरावस्था को प्राप्त कर लेते हैं और व्यक्ति रिटायरमेंट के बाद का जीवन अपनी पत्नी एवं अपनी संतान के परिवार संग बिताने लगता है| जीवन में परिवार से बाहर कुछ मित्र भी हैं जिनके साथ नोकझोंक में जीवन आनंद से व्यतीत हो रहा है| बुढापे में शारीरिक समस्याएं आती ही हैं लेकिन औसतन जीवन ठीक ठाक है|
30-40 साल से एक दूसरे के साथ नोंक झोंक करते पति पत्नी जीवन व्यतीत कर रहे हैं और रात को भी पति के सुबह उठते ही सिगरेट पीने की आदत के कारण दोनों झगड़ कर सोये हैं जिससे पति को नाराजगी है कि उसकी पत्नी उसकी शारीरिक समस्या नहीं समझती|
सुबह सवेरे वह उठता है तो उसकी साइड टेबल पर सिगरेट रखी है, वह अति प्रसन्न है और उस प्रसन्नता में अपनी पत्नी को उठाना चाहता है, उससे चुहल करना चाहता है| पति की प्रसन्नता देख दर्शक खुशी से भरा हुआ है| व्यक्ति को लगता है कि उसकी पत्नी जबरदस्ती आँखें बंद करके लेटी हुयी है और उसकी सारी हरकतें देख रही है|
वह बेड के दूसरी ओर जाकर उसे हिलाकर उठाना चाहता है, उसका हाथ पकड़ कर खींचना चाहता है| पर ….
4 दशकों का उनका दाम्पत्य जीवन छोड़कर उसकी पत्नी रात में कभी अकेले अंतिम यात्रा पर निकल चुकी है|
अब इस व्यक्ति का दुःख है वृद्धावस्था में पत्नी का साथ छूट जाने का|
ऊपर से तो अब व्यक्ति अपनी संतान के परिवार के साथ ही रह रहा है अतः उसका जीवन पत्नी के देहांत से उपजे दुःख के बावजूद ठीक ठाक ही गुजरना चाहिए लेकिन उसके जीवन में इस अनायास आ गए अकेलेपन को केवल भुक्तभोगी ही समझ सकता है|
उसके किशोरावस्था वाले जीवन में एक अधूरी रह गयी दुखद प्रेमकथा थी, उसके वृद्ध दिनों में पत्नी के एकाएक चले जाने से टूट गए संबंध की दुखद कथा है|
जीवन अबूझ होता है|
ओल्ड स्कूल मीट में 40 साल पहले अधूरी रह गयी प्रेम कथा के दोनों सिरे आमने सामने आते हैं तो वर्तमान में कथा में नए मोड़ आते हैं| व्यक्ति को अगर पता लगे कि उसके किशोरावस्था की प्रेमिका ने उसके कहे (मैं आऊंगा मिलने. मेरा इन्तजार करना) पर भरोसा करके सारा जीवन बिता दिया और विवाह नहीं किया, तो उसके जीवन में एक नया मौसम दस्तक देगा ही देगा|
पर अब मामला इतना सरल नहीं है, किशोरावस्था में भी वह अपने परिवार के दबाव में था और अब वृद्धावस्था में भी अपनी संतान के परिवार के दबाव में है|
उसकी प्रेमिका उससे एक सटीक संवाद कहती है,” तब तुम अपने पिता से आज्ञा लेकर मिलने आते थे, अब तुमने अपने बच्चों से आज्ञा लेनी पड़ती है|”
प्रेमिका के सामने स्पष्ट ही है कि उसके प्रेमी के दब्बूपने के कारण उनकी प्रेमकहानी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पायी थी|
जीवन ने आज उन्हें दूसरा मौका दिया है लेकिन उसे पता है कि उसके प्रेमी के लिए बहुत मुश्किल होगा अपने परिवार का सामना करके उसके संग जीवन के बाची बचे दिन गुजारना|
वृद्धावस्था के इस दौर में प्रेम का आगमन सुख और दुःख दोनों लाता है| व्यक्ति के सामने पत्नी के देहांत का दुःख भी है और मनोवैज्ञानिक दबाव भी कि कैसे वह अपने चालीस साल के वैवाहिक जीवन की यादों को भुलाकर एक नए संबंध में खुशी ढूंढ सकता है?
व्यक्ति के जीवन में सुख और दुःख इतने रूप बदलते हैं कि वह स्वयं भी भ्रमित हो जाए कि असलियत क्या है जीवन की? क्या सबसे पहले प्रेम के कारण वह दुखी रहता या रह पाया? या लम्बे वैवाहिक जीवन के अंत के कारण दुखी रहे, या रह पाया? या अब पुनः सबसे पहले प्रेम के जीवन में लौट आने से सुखी हो जाए या रह पाया? या सामाजिक बंदिशों के कारण जीवन में लौट आये प्रेम को स्वीकार न कर पाने के कारण दुखी रहे? सुख और दुःख दोनों अपने रंग और रूप बदलते रहते हैं|
श्रृंगार रस से भरा प्रेम वृद्धावस्था में नहीं हो सकता| यहाँ शारीरिक रोगों की कडवी सच्चाई के बावजूद स्नेह पनपता है|
फ़िल्म आगे चलकर , नायक के जीवन में पीछे चली जाती है| जहां मिठुन की युवावस्था का भाग उनके अपने बेटे रिमोह चक्रबर्ती ने निभाया था|
मिठुन के परतों वाले शानदार अभिनय के कारण, मनोरंजन से भरपूर दृश्यों के कारण और एक भावनाओं में पगी प्रेम कथा के कारण यह एक रोचक और अच्छी फ़िल्म है|
पत्नी के देहांत का पता लगने वाले कुछ सेकंड्स के अन्दर पति की भूमिका में बिलकुल विपरीत भावनाएं जिस कुशलता से मिठुन चक्रवर्ती ने प्रदर्शित की हैं, उसे देखकर उन पर गुस्सा आता है कि पिछली सदी के अंतिम दशक में उन्होंने सिनेमा के नाम पर कूड़ेदान भरने वाली फ़िल्में जो ठोक में कीं, उन्हें करने किसने दी?| इतना काबिल अभिनेता कैसे उस बर्बाद सिनेमा का हिस्सा बन सकता है? फ़िल्म में उनका चरित्र भावनाओं की विभिन्न कलाओं से गुज़रता है और उन्होंने हर कला को शानदार अभिव्यक्ति दी है| अपने बेटे की पत्नी (किटू गिडवानी) के समक्ष अपनी पत्नी और किशोरावस्था की प्रेमिका के बारे में जिस अंदाज़ में उन्होंने दृश्य का न्तेरुत्व किया है और एक प्रभावशाली संवाद, असरदार तरीके से प्रस्तुत किया है, वह किसी भी सिनेप्रेमी को उनके अभिनय का प्रशंसक बना दे|
“बहू, गंगा मेरे और लक्ष्मी के साथ हमेशा रही, हमारे बीच कभी नहीं रही“|
फ़िल्म में कुछ संवाद बेहद प्रभावशाली हैं|
सिनेमेटोग्राफी के विद्यार्थी इसके कैमरा निर्देशक नटराज सुब्रमण्यम के प्रदर्शन से और एडिटिंग के विद्यार्थी फ़िल्म के एडिटर महेश नारायणन के संपादन से बहुत कुछ सीख सकते हैं क्योंकि फ़िल्म में लगातार भूतकाल, वर्तमान और भविष्य के सपनों की श्रंखला दर्शक के सामने आती रहती है| हलके फुल्के क्षणों से दर्शक का मनोरंजन करती फ़िल्म एकदम से दर्शक का मन भारी कर देने वाले क्षण परदे पर ले आती है|
हरेक बात में सी आई ए की साजिश देखने वाले व्यक्ति की भूमिका में टीनू आनंद दर्शक को अच्छा आनंद देते हैं|
मिठुन चक्रवर्ती की पत्नी की छोटी सी भूमिका में रति अग्निहोत्री फ़िल्म में स्मृति के माध्यम से उपस्थित रहती हैं, और प्रेमिका के रूप में डिम्पल कपाडिया की एक अच्छी भूमिका वाली फ़िल्म है यह|
शांतनु मोइत्रा का संगीत शांत शांत बहता है लेकिन रजत ढोलकिया का बैक ग्राउंड म्यूजिक बहुत बार की तरह लाउड रहता है जो फ़िल्म की एक कमी है|
निर्माता या निर्देशक को इस खूबसूरत फ़िल्म को किसी ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर प्रदर्शित करने का प्रयास अवश्य ही करना चाहिए|
…[राकेश]
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