Bombay Velvet-001Bombay Velvet केवल बम्बई का ही दस्तावेज नहीं है, परतें उघाड़ी जाएँ तो हर शहर का कमोबेश ऐसा ही इतिहास निकलेगा| बंद कमरों में सत्ताधीश किसी भी शहर की आकृति, रंगत, प्रकृति और तकदीर गढ़ रहे होते हैं और हरेक जगह के विकास के पीछे हर किस्म के अपराध और बहुत से लोगों की मौतें छिपी होती हैं| हर दौर में शक्तिशाली लोगों के तंत्र ने कमजोर या अपने से कम शक्तिशाली लोगों को मोहरा बनाकर जीवन में कथित विकास का खेल खेला है और अपने जीवन को अपनी परिभाषा के अनुसार रोचक बनाया है| अगर वे अपनी हर तरह की क्षुधा को संतुष्ट करने के लिये योजनाएं बनाकर उन पर अमल न करें तो उनकी अपनी निगाहों में उनके जीवन व्यर्थ चले जाएँ| सत्ता, और शक्ति पर कब्जे के ये खेल ही उनके जीवन के उद्देश्य हुआ करते हैं| जीवन की इस शतरंज में वे लोगों को अपनी जरुरत के अनुसार प्यादों के दर्जे से ऊपर उठाकर घोड़ों, हाथी, ऊंट, या वजीर के स्तर पर बैठा दिया करते हैं और यदि कोई इनके लिए बेकार हो जाए या इनके सामने सिर उठाने लगे तो या तो ये उसे फिर से साधारण प्यादा बना डालते हैं और इससे काम न बनता हो तो उसकी बलि या तो ले लेते हैं या कोई चाल चलकर बलि चढ़ा देते हैं|

हर व्यक्ति की अपनी महत्वाकांक्षाएं हुआ करती हैं और उन्ही को सफल बनाने के लालच के वशीभूत होकर वह जीवन में कर्म करता है| कुछ में यह विवेक होता है कि क्या सही है और क्या गलत और कौन सा रास्ता सही है और कौन सा आपराधिक पर बहुत से लोगों के लिए साध्य ही महत्वपूर्ण हैं साधन नहीं | लक्ष्य पूर्ति हेतु वे कुछ भी कर सकते हैं और यही विशेष प्रवृत्ति हर देश, काल और वातावरण में अपराधियों की खेप समाज में बनाए रखती है| अब इसमें भी कई तरह के लोग होते हैं| प्यादे और उनसे ऊपर के अन्य मोहरे तो आसानी से अपराधी घोषित और सिद्ध किये जाते रहे हैं पर जो ये खेल खेलते और खिलवाते हैं उन शक्तिशाली लोगों की सफलता के पैमाने की ऊँचाई और विशालता के कारण उन्हें कोई अपराधी नहीं कहता और वे हर देश के हर शहर और कस्बे पर हर काल में नियंत्रण रखे चले जाते हैं फिर चाहे देश में तानाशाही का राज हो, राजतंत्र हो या लोकतंत्र|

Bombay Velvet महत्वाकांक्षा से भरे लोगों की कहानी है जिन्होने पचास, साठ और सत्तर के दशक में बम्बई पर नियंत्रण करके उसे अपनी हवस के अनुसार आकार, और प्रकृति दी| बलराज (रणबीर कपूर), जिसे कैज़ाद खंबाटा (करण जौहर) जॉनी नाम देता है, अति-महत्वाकांक्षा से लबरेज युवक है, जिसे हर हाल में और हर कीमत पर बड़ा आदमी बनना है और उसकी यही इच्छा उसे खंबाटा के हाथ का प्यादा बना डालती है, और खंबाटा खुद बम्बई के मेयर रोमी मेहता (सिद्धार्थ बसु) दवारा नियंत्रित खेल में एक अदद मोहरा ही है| जैसे खंबाटा जानकर मेहता के हाथों की कठपुतली बनता है या दिखावा करता है वैसे ही जॉनी खंबाटा के हाथों इस्तेमाल होने के लिए स्वयं ही तैयार है बशर्ते इस इस्तेमाल के एवज में उसे वाजिब दाम मिलें| जॉनी और खंबाटा में अंतर इतना है कि जॉनी खुलेआम खंबाटा का विरोध करके अपना हक लेने की बात करता है और उसके खिलाफ खड़ा हो जाता है वहीं खंबाटा, मेहता से लाभ अर्जित करना चाहता है, उसके विरोध में खड़े होकर अपने सर्वनाश को आमंत्रित नहीं करना चाहता| जॉनी दुस्साहसी युवक है, जिसे उपलब्धियों की सीढियां चढ़ने की जल्दबाजी है, जबकि खंबाटा बेहद शातिर और ठंडे दिमाग वाला व्यवसायी है| दोनों का टकराव होना ही है और होता है, जॉनी खंबाटा की आँखों में आखों डाल कर काले कारोबार से अर्जित धन में से अपना हिस्सा माँगता है|

नेता, कोलोनाइजर्स, पुलिस और अपराधियों के इस नेक्सस में छोटे और बीच के मोहरे ही खेल में घात का शिकार होकर घायल होते हैं या मारे जाते हैं जबकि रोमी मेहता जैसे बड़े नाम आराम से शहर पर अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं|

इस सारे नेक्सस में लगभग हरेक चरित्र अपराधिक काम में सलंग्न है और किसी भी चरित्र से दर्शक इस नाते सहानुभूति नहीं रख सकता कि चरित्र या उसे निभाने वाला अभिनेता उसे व्यक्तिगत रूप से अच्छा लग रहा है| फिल्म समाप्त होने पर केवल दो चरित्रों को मानवीयता या कर्तव्य का पालन करने के कारण भले मानुष की श्रेणी में दर्शक रख सकता है| एक तो है रोज़ी (अनुष्का शर्मा), जो बचपन से परिस्थितियों का शिकार रही और जब बात उसके अपने निर्णय लेने की आई तो उसने अपने दिल की बात मानते हुए छल-कपट को दरकिनार करके प्रेम को तरजीह दी और दूसरा चरित्र है पुलिस डिटेक्टिव विश्वास कुलकर्णी (के.के. मेनन) का, जो कि अपने कर्तव्य का पालन करते हुए क़ानून तोड़ने वाले हर आदमी को क़ानून की गिरफ्त में लाने में लगा रहता है पर विशाल भ्रष्ट तंत्र के समक्ष उसकी विवशता यह है कि वह भी जॉनी बलराज के स्तर के अपराधियों को ही टारगेट कर सकता है, उन बड़े लोगों – खंबाटा, मेहता, पुलिस कमीश्नर, आदि बड़े लोगों तक उसके हाथों के दवारा क़ानून की पहुँच नहीं है जो जॉनी से अपराध करवा रहे हैं| रोज़ी इस सच्चाई को नज़रअंदाज करने के लिये विश्वास को उलहाना भी देती है| यह सब अपनी आँखों से देखने पर वह सिर्फ कुंठित हो सकता है, इनके विरुद्ध बगावत का बिगुल नहीं बजा सकता और इसीलिये हर काल में सब कुछ एक ही तरीके से होता रहता है और बुराई, और भ्रष्टाचार दोनों मिलकर अच्छाई और ईमानदारी की ऐसी तैसी करे रखते हैं|

चरित्र चित्रण के हिसाब से फिल्म बेहद रोचक है और इस बात को कहने में कतई कोई अतिशयोक्ति नहीं कि हिंदी फिल्मों में आज के दौर में लेखक-निर्देशक की बात हो तो अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज, दोनों ही उम्दा प्रदर्शन कर रहे हैं और सिने प्रेमियों को अपनी अपनी हर नई फिल्म के साथ कुछ नया भेंट में देते रहे हैं और बहुत स्तरों पर इनकी रचनाएं बेहद रोचक रही हैं| नया काम करेंगे तो कमियां भी उजागर होती हैं पर मुख्य बात यही है कि दोनों हर बार पहले से अनछुई टेरीटरी सामने लाते रहे हैं| दोनों की उपस्थिति से हिंदी सिनेमा समृद्ध हो रहा है और इनके साथ इनके अन्य साथी भी इस रोचक यात्रा में सहभागी बन कर हिंदी सिनेमा को वर्तमान में उंचाइयां प्रदान कर रहे हैं|

गुरुदत्त ने अपने निर्देशन के शुरुआती दौर में देव आनंद को लेकर एक फिल्म बनायी थी “जाल” जिसमें देव आनंद ने टोनी नामक एक ऐसे युवक की भूमिका निभाई थी जो अपराधी गतिविधियों में लिप्त था और जो अंत में क़ानून के हाथों मारा जाता है, पर मरने से पहले वह धर्मभीरू नायिका की क्षमा का पात्र बनकर उसके प्रेम के उपयुक्त बनकर दर्शकों की सहानुभूति पाता है| गुरुदत्त ने यह जरुर किया कि टोनी का किसी पृष्ठभूमि के कारण अपराधी बनना नहीं दिखाया वरना हिंदी फ़िल्में अक्सर यही हेरफेर कर देती हैं कि नायक अपराध भी करेगा तो उसे मजबूरी में अपराधी बनते दिखाया जाता है, उसके अपराधी बनने के पीछे उसका शोषण होता है या उसकी मजबूरियाँ पर अनुराग कश्यप की इस फिल्म में जॉनी बलराज के सामने ऐसा कुछ नहीं है वह बचपन से ही जेबकतरा है| भावनाएँ उसकी लगभग मृतप्राय हैं| वह खंबाटा से कहता भी है कि जिस औरत को उसने माँ जैसा समझा उसने कभी उसे नौकर बनाया, कभी दल्ला, कभी कुली और बाद में उसका सोना भी लेकर भाग गई| उसकी भावनाएं भी उसकी महत्वाकांक्षाओं के लालच के कारण मुक्त ना होकर उसकी गुलाम हैं| प्रेम उसे सिर्फ रोजी से है परन्तु यह प्रेम भी ऐसा नहीं कि रोजी उससे प्रेम की खातिर महत्वाकांक्षाओं को छोड़कर एक सीधा जीवन जीने को कहे तो वह उसकी बात मान ले| रोजी के प्रति प्रेम भी उसकी अपनी शर्तों पर है जो जाहिर है सनक से भरी हुयी हैं|

हिंदी फ़िल्में कभी कभार ही इतना साहस कर पाती हैं कि चरित्र को उसकी मूल प्रवृत्ति और प्रकृति के साथ दिखा पायें, वरना अगर चरित्र नायक है तो खलनायक वाली तमाम हरकतों के बाद भी कथालेखक और निर्देशक ऐसा कुछ खोज लेते हैं जिससे नायक, जो कि परिभाषा से एंटी-हीरो है, कुछ भला प्रतीत हो| गैंगवार वाली फिल्मों में भी कुछ चरित्रों को नायकत्व का चोगा पहना दिया जाता है| खुद अनुराग कश्यप की बहुचर्चित फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर में यह महीन अंतर आ जाता है कि इस बात के बावजूद कि सभी चरित्र अपराधी हैं और मानव ह्त्या जैसे घोर निंदनीय अपराधों में लिप्त हैं तब भी फिल्म किसी तरह से सरदार (मनोज वाजपेयी) और उसके पुत्र फैज़ल (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) को नायकत्व का मुलम्मा चढाकर प्रस्तुत कर देती है|

Bombay Velvet में उस प्रवृत्ति से बहुत हद तक दूरी बना ली गई है और खंबाटा एवं मेहता की तुलना में जॉनी कम शातिर लग सकता है पर रहता वह एंटी-हीरो ही है| फिल्म दर्शक को इस बात की अनुमति या सुविधा नहीं देती कि वह जॉनी को नायक की भांति स्वीकार करे| दर्शक को जॉनी से दूर से निरपेक्ष भाव से देखने आर फिल्म विवश कर देती है| यह फिल्म की बहुत बड़ी कामयाबी है, यह फिल्म जॉनी बलराज के चरित्र दवारा हिंदी फिल्मों पर थोपी गई एक परम्परा को धवस्त करने में सफल रहती है|

Once upon a time, in a land far, far, away… जैसी पंक्ति से शुरू होने वाली कथाओं का एक चरित्र हुआ करता है, पहली बात तो यही होती है इन कथाओं के साथ कि ये आज की न होकर बहुत पहले के समय की हुआ करती हैं और श्रोता इन कहानियों और इनके किरदारों के साथ शुरू से ही एक दूरी बना कर इन्हे सुनने (देखने/पढ़ने) का आनंद लेता है| वह कहानी को कहानी की रोचकता के साथ ग्रहण करता है और आवश्यक नहीं कि वह उसके सामंजस्य या उसकी सार्थकता का मिलान आज के दौर से करे| कुछ तत्व ऐसे अवश्य हो सकते हैं कहानी में जो आज के दौर से मेल मिलाप रखते हों या आज भी सार्थक लगते हों पर ऐसा होना ही चाहिए यह आवश्यक नहीं|

हर फिल्म हा हा ही ही छाप मनोरंजन या हर गीत पर ठुमके लगाने के लिए सामग्री उपलब्ध कराने के लिए या रोजमर्रा की जिंदगी के झेमेलों से दूर ले जाकर दर्शक को सपनों की दुनिया में ले जाने के लिए नहीं बनती| हर निर्देशक एक कहानी को अपने अलग तरीके से बनाता है, सत्या का लेखक करने वाले अनुराग कश्यप अगर उस फिल्म को निर्देशित भी करते तो सत्या का ट्रीटमेंट अलग होता, यह बात गुलाल और बाम्बे वेलवेट दोनों फिल्मों के ट्रीटमेंट से बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है| अगर अनुराग ने सत्या बनाई होती तो वे सत्या के चरित्र के साथ ऐसा कुछ करते जैसा उन्होंने जॉनी के चरित्र के साथ किया है| अनुराग गुरु बनाते तो अलग तरीके से चरित्र को ट्रीटमेंट देते|

इतिहासकार लेखक ज्ञान प्रकाश की लेखनी से तो जन्मा ही होगा जॉनी बलराज का चरित्र पर फिल्म में जिस तरीके से अनुराग उसे प्रस्तुत करते हैं उसमें उनके अपने अनुभवों और समझ का भरपूर समावेश रहा होगा और कहीं न कहीं अपनी ढेर सारी प्रवृत्तियों या अनुभवों या आँखों देखी समझ में से लेकर किन्ही बातों का हल्का सा मिश्रण लेखक और निर्देशक अपनी फिल्मों के चरित्रों में करते ही रहते हैं|

दुस्साहसी जॉनी के बम्बई में बीते जीवन पथ में अनुराग के खुद के बम्बई में प्रवेश और संघर्ष की झलक का सामंजस्य मिल सकता है| यहाँ जॉनी के अपराधिक जीवन से तुलना की बात नहीं है, बल्कि एक बहुत बड़े महानगर, जिसे सपनों की नगरी भी कहा जाता है, में आए एक नवागंतुक के संघर्ष की बात है जो कभी अपनी योग्यता के बल पर और कभी केवल अपनी दुस्साहसिक प्रकृति के बल पर जमे जमाये तंत्र को चुनौती दे बैठता है और ललकारता है कि तुम लोग मुझे नजरअंदाज नहीं कर सकते, अपने शक्तिशाली तंत्र के बल पर भी मुझे आगे बढ़ने से नहीं रोक सकते| अपने मित्र, चिम्मन (सत्यदीप मिश्रा) के साथ अंग्रेजी फ़िल्में देख रहे जॉनी को देख अनुराग कश्यप के खुद के बयान किये उन दिनों की याद आना भारतीय सिनेमा भी पूरी तरह न देख पाने के बावजूद वे स्वाभाविक है जब बम्बई आ चुकने के बाद सिनेमा में किसी तरह प्रवेश करने के लिए और अपनी सिनेमाई समझ बढाने के लिए वे हॉलीवुड और अन्य विदेशी फिल्म उधोगों की फ़िल्में वीसीआर पर देखा करते थे जबकि भारतीय सिनेमा भी उन्होंने कायदे से पूरा नहीं खंगाला था| बकौल खुद उनके सत्यजीत राय की फ़िल्में तो उन्होंने बहुत बरस तक नहीं देखीं| ऐसी पृष्ठभूमि के बावजूद उन्होंने हिंदी सिने उधोग में अपनी काबिलियत और अपने सिनेमाई पैशन के बलबूते अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया, अपना इस्तेमाल होने दिया और वक्त आने पर अपनी कीमत (अपने दिल के मुताबिक़ फिल्म बनाने की सुविधा) छीनी|

Bombay Velvet में एक दृश्य है जिसमें मेहता के गैंग के साथ बैठा खंबाटा जॉनी से पूछता है कि इस समूह में हम सब कुछ न कुछ विशेष शक्ति लिए बैठे हैं, तुम इस समूह को क्या दे सकते हो जॉनी?

मुस्कराकर जॉनी कहता है कि जब इतने समर्थ लोगों के बीच मैं बैठा हूँ तो इतना तो आप लोग भी समझते हैं कि मुझमें कुछ तो होगा जो मैं दे सकता हूँ| ऐसी दबंगई जॉनी के किरदार को सिनेमाई परदे के अनुकूल और बेहद रोचक और आकर्षक बनाती है| न जानना भी कभी-कभी बहुत सहायता कर जाता है, जब वह यह नहीं जानता कि कौन कौन है और क्या है तब भी वह अपनी दुस्साहसिक प्रकृति और दबंगई के बलबूते किसी से भी भीड़ जाता है| अनुराग कश्यप ने भी Black Friday से लेकर Dev D के मध्य हिंदी सिने उधोग में ऐसा दौर देखा है जब उन्होंने बड़ों बड़ों के परखच्चे उड़ा दिए और उन बड़ों के रोष के बावजूद वे फिल्म उधोग में न केवल टिके रहे बल्कि आगे बढते रहे| यही जिजीविषा उन्होंने जॉनी के किरदार को दी है|

जॉनी का किरदार बेहद दिलचस्प बना है और रणबीर कपूर ने उसे निभाया भी उतनी ही रोचकता और शिद्दत से है|

एक दृश्य है जिसमें खंबाटा, जॉनी को अपना चश्मा देते हुए कहता है,” बिग शॉट बनना है न तुम्हे, मैं बनाउंगा… जगह हमारी होगी नाम तेरा होगा”| चश्मा लेते हुए, लालसा, दर्प और खुशी से दमकते जॉनी के भावों को जिस परफेक्ट मुस्कान के साथ रणबीर ने व्यक्त किया है वह उनके अंदर मौजूद अभिनेता के क्लास को दर्शाता है| यह रणबीर का सौभाग्य ही कहा जायेगा कि अभिनय जीवन के इस मुकाम पर उन्हें इतनी आकर्षक भूमिका निभाने को मिली है| इस भूमिका ने उनके अंदर के कलाकार को न केवल पूर्णतया सन्तुष किया होगा बल्कि उसका बहुत ज्यादा विकास भी किया होगा| ऐसा किरदार क्वांटम लीप वाला किरदार होता है| इस फिल्म में किया अभिनय प्रदर्शन रणबीर की फिल्मोग्राफी में ट्रॉफी की तरह चमकेगा|

जॉनी के दुस्साहस, उतावलेपन, महत्वाकांक्षी जिद्दीपने, बेहद नियंत्रित भावनाओं के जज्बे आदि विविधता से भरे चरित्र को जिस तरह रणबीर ने जीवंत किया है वह काबिलेतारीफ है|

अनुष्का शर्मा ने अपने अभिनय और अपनी सिनेमाई परदे पर उपस्थिति को Bombay Velvet में एक ऐसी ऊंचाई पर पहुंचा दिया है जहां न केवल देश के श्रेष्ठ निर्देशक बल्कि विश्व भर में जो भी निर्देशक इस फिल्म को देखेगा वह बेहिचक अपनी फिल्म की योजना अनुष्का को ध्यान में रखकर बना सकता है| क्लब में गाते हुए पार्श्व संगीत के शोर में, क्लब में घट रहे घटनाक्रमों को देखते हुए उन्होंने जिस तरह से अपनी प्रतिक्रियाएँ अपनी आँखों और चेहरे पर उकेरे भावों से प्रदर्शित की हैं उससे इस बात की भरपूर गवाही मिलती है कि उनके अंदर की कला अपने शबाब पर है, अदाकारी की बगिया गुलज़ार हो चुकी है, जिस निर्देशक को अपने सपनों की फिल्म बनानी हो और अच्छी अभिनेत्री चाहिए उसे अनुष्का की कला भरपूर समर्थन देगी| फिल्म ने बेहद खूबसूरत और प्रभावशाली तरीके से रोज़ी के किरदार को और एक अभिनेत्री के रूप में अनुष्का को परदे पर प्रस्तुत किया है| परिस्थितियों वश अपनी माँ से अलग कर दिए जाने और संगीत सिखाने के नाम उस पर कब्ज़ा कर बैठे शातिर और क्रूर आदमी की गिरफ्त में बरसों रहने के कारण उसका जीवन प्रेम से महरूम है और प्रेम का समावेश उसके जीवन में जॉनी के उसकी ज़िंदगी में आने से होता है और वह सभी बातों को परे कर जॉनी के प्रति अपने प्रेम को तरजीह देती है| उसकी सफता का रास्ता जॉनी से कहीं ज्यादा आसान है पर वह इस लालच को ठुकरा कर जॉनी के प्रेम को तवज्जो देकर उसके लिए अपने जीवन को होम करने लगती है| जॉनी भी एकमात्र उसे ही प्रेम करता है पर दोनों के एक दूसरे के प्रति प्रेम में एक अंतर है, और यह भारी अंतर है, रोज़ी, जॉनी के प्रति अपने प्रेम से पूर्णतया संतुष्ट है और उसे विश्वास है कि इसी के सहारे वह एक खुशी भरा जीवन जी लेगी लेकिन जॉनी के लिए रोज़ी के प्रति प्रेम, जो कि दीवानगी की हद तक है, उसकी बहुत सारी ट्राफियों में से एक है, एक इसी से वह संतुष्ट होने वाला नहीं है| उसे रोज़ी का साथ हर कीमत पर चाहिए पर इस साथ से संतुष्ट होकर वह बम्बई जीतने के लिए आगे और आगे जाना चाहता है| प्रेम उसकी महत्वाकांक्षाओं की आग की तपिश बुझाने में कामयाब नहीं है और यही अंतर दोनों के लिए भारी पड़ता है|

फिल्म बहुत खूबसूरत तरीके से जॉनी और रोज़ी की प्रेम कहानी को दर्शाती है|

आजादी के बाद भारतीयों दवारा बम्बई के कुछ हिस्सों के निर्माण और शहर के पुनर्निर्माण की कथा दिखाती है यह फिल्म और फिल्म के शुरुआती दृश्य में ही जब कैमरा क्लब में शराब पीते चेहरों से होता हुआ एक आदेश पर पहुंचता है जिसमें लिखा है कि यह क्लब सरकारी आदेश के मुताबिक़ केवल परमिट के मुताबिक़ और विदेशी लोगों को ही शराब परोसती है और अँधेरे में क्लब में पीछे के दरवाजे से शराब की आपूर्ति होती है तो उस वक्त के राजनीतिक माहौल और व्यापार की लुका छिपी को फिल्म स्पष्ट कर देती है| फिल्म में भले ही संक्षिप्त से प्रसंग से कोई टिप्पणी की गई हो या कुछ दिखाया गया हो पर बहुत लिहाज से फिल्म में डिटेलिंग है, जैसी Black Friday और Gangs of Waseypur में देखी गई थी| मसलन फिल्म के अन्त में पुलिस कमिश्नर जॉनी के साथ जो सलूक करता है, उसे देख कर्तव्यनिष्ठ पुलिस डिटेक्टिव विश्वास (के के मेनन) कुंठा और विवशता में अपना हैट जमीन पर पटक कर अपनी मजबूरी का अहसास दर्शक को कराता है| पचास और साठ के दशक से ही इस कर्तव्यनिष्ठ समूह की यही परिणति होती रही है| ऐसी छोटी छोटी बातों से फिल्म देश के सामाजिक और राजनीतिक परिवेश पर टिप्पणी करती चलती है|

क्लब को केन्द्र में रखते हुए पचास और साठ के दशक के मध्य तक हिंदी फ़िल्में बना करती थीं लेकिन उनमें अपवादों को छोड़कर अधिकतर बी और सी ग्रेड फिल्म हुआ करती थीं| Bombay Velvet अपने पूरे कलेवर में विश्व स्तरीय छलांग लगाती है| जो विश्व स्तरीय गैंगस्टर और क्लब आधारित फिल्मों के प्रशंसक रहे हैं, उनके लिए यह सुखद अहसास लेकर आती है कि भारत में भी वैसी ही स्टाइलिश और स्तरीय फिल्म बनाई जा सकती है| बरसों से हॉलीवुड और अन्य विदेशी फिल्म उधोगों से निकल आने वाली फ़िल्में, जैसे, The Wild One, Mean Streets, Raging Bull, Cotton Club, The God Father, Gangs of New York, Chicago, Cabaret, Scar Face, GoodFellas, आदि इत्यादि तमाम फिल्मों के प्रशंसकों को Bombay Velvet जैसी स्टायलिश फिल्म के हिंदी फिल्म उधोग में बनाए जाने से संतुष्ट और प्रसन्न होने चाहियें|

अनुराग कश्यप की पहली फीचर फिल्म Paanch से लेकर Ugly तक उन पर यह आरोप लगता रहा है कि वे परदे पर बहुत हिंसा दिखाते हैं और बेहद जीवंत तरीके से दिखाते हैं| Bombay Velvet में हिंसा के शोर और असर को पार्श्व में बजते संगीत के शोर में टोन डाउन किया गया है और एक तरह से हिंसा की व्यर्थता को उजागर करती चलती है फिल्म|

सहायक भूमिकाओं में के. के. मेनन, सिद्धार्थ बसु, सत्यदीप मिश्रा, मनीष चौधरी और विवान शाह  का अभिनय शानदार है|

मेहमान भूमिका में रवीना टंडन गीत गाती हुयी दिखाई देती हैं और ऐसा लगता नहीं कि इससे पहले कभी भी जब वे नायिका की भूमिकाएं निभाया करती थीं उन्होंने कैमरे के सामने उपस्थित होने में इतना आनंद महसूस किया होगा, उनकी उपस्थिति आकर्षक लगती है फिल्म में|

अभिनेताओं में करण जौहर की उपस्थिति के बिना फिल्म पर बात पूरी नहीं हो सकती| उनका अभिनेता के रूप में एक बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाना ऐसा मैच लगता है जिसमें खिलाड़ी ने अपने स्तर से बहुत ऊपर का खेल दिखाया हो पर मैच जिताने में वह बहादुर भरा प्रयास नाकाफी रहा हो| दिल वाले दुल्हनियां ले जायेंगे की संक्षिप्त भूमिका को छोड़ करण जौहर को फिल्मों में दर्शकों ने नहीं देखा हालांकि टीवी के माध्यम से वे लोगों के सामने एक प्रस्तोता के भूमिका में निरंतर आते रहे हैं| अपना प्रदर्शन एक बात है पर उस प्रदर्शन का फिल्म पर क्या फर्क पड़ रहा है वह नितांत दूसरी बात| एक दृश्य है जिसमें जॉनी के घर पर उस पर आक्रमण होता है और चिम्मन मारा जाता है, हिंसात्मक हमले के खतम होने से पहले ही फोन बजता है और जॉनी भागकर रिसीवर उठाता है, कैमरा दूसरी ओर खंबाटा (करण जौहर) को दिखाता है, न जॉनी कुछ बोलता है, न खंबाटा, दोनों किरदार इंतजार कर रहे हैं कि दूसरी ओर का व्यक्ति पहल करे| खंबाटा को सुनना है कि फोन किसने उठाया और क्या जॉनी मारा गया, और जॉनी को जानना है दूसरी ओर कौन है| इन मौन पर तनाव भरे क्षणों में कैमरा बारी बारी से जॉनी और खंबाटा को कवर करता है| क्लोजअप में कैमरा रणबीर कपूर के हरेक भाव को पकडता है और उनकी आखों की मार्फ़त सामने आ रहे उनके भावों और विचारों को दर्शक महसूस कर सकता है, यही कैमरा करण को सामने से न दिखाकर उनका प्रोफाइल दिखाता है| एक नियमित पेशेवर अभिनेता इस दृश्य में रणबीर को कायदे की टक्कर देकर दृश्य में बला की जान डाल देता| करण अभिनेता नहीं हैं अतः उन्हें एक बड़ी भूमिका में प्रस्तुत करना फिल्म का एक सरप्राइज तत्व हो सकता है पर करण के भरपूर प्रयास के बावजूद हर दृश्य में यह भाव जगता ही है कि काश यह भूमिका नियमित और समर्थ अभिनेता निभाता| जरूरी नहीं कि कोई भी व्यक्ति अपने अभिनय के पहले ही प्रयास में बेहद अच्छा अभिनय प्रदर्शित कर जाए| फरहान अख्तर ने भी धीरे धीरे मुकाम पाया है| वे तो अपनी माँ हनी ईरानी की तरफ से आधे पारसी हैं हीन और शायद खंबाटा के रूप में ज्यादा विश्वसनीय लगते| के. के भी यदि यह भूमिका निभाते तो फिल्म में गजब का तनाव आ जाता, जो दृश्यों को और ज्यादा गहराई दे पाता| मद्रास कैफे के बाद तो जान अब्राहम भी इसे गहराई दे पाते| अर्थ यही है कि अपना काम निकालने के लिए अपनी पत्नी के शरीर को दूसरों के उपभोग के लिए परोसने वाले समलिंगी कैज़ाद खंबाटा, जो कि अपने भूतकाल को लेकर अंदर से पीड़ित रहता है, के जटिल चरित्र को बारीके से परदे पर उतारने के लिए बेहद जहीन अभिनेता की जरुरत फिल्म में थी|

इसमें भी कुछ चीजें हैं जो खटकती हैं, जैसे क्लब में स्टैंड-अप कामेडी करने के दृश्य दो तीन बार आते हैं और ऊब उत्पन्न करते हैं| इनसे बचा जा सकता था| Paanch से लेकर Gangs of Waseypur तक अनुराग कश्यप की हर फिल्म के संगीत ने संगीत प्रेमियों के मध्य गहरी छाप छोड़ी है| इस फिल्म का संगीत उस स्तर का नहीं है जहां यह फिल्म के प्रदर्शन से पूर्व ही दर्शकों को आकर्षित कर पाता| एकाध गीतों को छोड़ अन्य गीतों पर दर्शक ध्यान भी नहीं देता कि पार्श्व में क्या चल रहा है| अनुराग कश्यप की फिल्म में गीत न हों तो कोई फर्क नहीं पड़ता पर अगर हों और उनके पहले की फिल्मों दवारा उत्पन्न संगीत की ख्याति के अनुरूप ने हों तो बात खटकती है|

Bombay Velvet, दो बातें तो खास तौर पर स्थापित करती है एक तो यह बम्बई शहर का फ़िल्मी अंतरराष्ट्रीयकरण करती है, इसका शिकागोकरण, न्यूयार्ककरण, मेक्सिकोकरण, पेरिसकरण, सिसलीकरण, मास्कोकरण करती है| इसका बम्बई वही बम्बई नहीं है जिसे आज तक हिंदी फ़िल्में दर्शक के सामने परोसती आई हैं| Bombay पर या इसके नाम से बनी अन्य तमाम हिंदी फिल्मों की प्रकृति से अलग प्रकृति है Bombay Velvet की|

दूसरी बात यह फिल्म हिंदी फिल्म का भी अंतरराष्ट्रीयकरण, या विशेष रूप से कहें तो हॉलीवुडकरण करती है| यह फिल्म संभवतः अनुराग कश्यप का भी अंतरराष्ट्रीयकरण कर देगी| तकनीकी रूप से तो फिल्म बेहद अच्छी है| बेहद तेज गति से भागती फिल्म में बहुत कुछ घटता रहता है जिसे पूरा समझने के लिए ऐसी फिल्म को बार बार देखना पड़ता है| इसकी आत्मा तक इसकी डीवीडी ही लेकर जायेगी जिस पर तसल्ली से सिने प्रेमी देख सकते हैं निर्देशक ने उनके लिए क्या क्या और कैसे रचा है!

सटीक रूप से कहा जाए तो यह अनुराग कश्यप का ऐसा ही प्रयास है जैसा Mikhail Kalatozov ने Soy Cuba (I Am Cuba) बना कर किया था| संयोगवश उस गजब फिल्म के पुनः और सही तरीके से प्रदर्शन में अनुराग कश्यप के प्रेरणा स्त्रोत विश्वविख्यात निर्देशक Martin Scorsese की बहुत बड़ी भूमिका थी|

हमेशा की तरह अनुराग अपनी इस फिल्म के एक दृश्य में उपस्थित दिखाई देते हैं| फिल्म के चार लेखकों में से दो अन्य वासन बाला, और थानी ने भी फिल्म में अभिनय किया है| चौथे लेखक ज्ञान प्रकाश को भी हो सकता है किसी दृश्य में अनुराग ने कैमरे के सामने खड़ा कर ही दिया हो और उनका चेहरा पहचान पाने वाले उन्हें पहचान गये हों|

…[राकेश]

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