कूकी, फ़िल्म की 16 वर्षीय नायिका (रितिषा खौंड) का नाम भी है और फ़िल्म का शीर्षक भी|

गैंग रेप की शिकार नायिका के बलात्कारियों को पुलिस पकड़ लेती है, अदालत सजा भी दे देती है लेकिन कूकी को इससे राहत नहीं मिलती|

उसे महसूस होता है कि बलात्कार ने न केवल उसके शरीर को बल्कि उसके मन को भी गहरे में आहत किया है| उसका मन इतना घायल है कि वह पुरुष स्पर्श मात्र से घृणा करने लगती है, जिस बारिश में वह सौंदर्य देखा करती थी वह अब उसे भयावह लगने लगती है| जिस अपने लगभग हमउम्र प्रेमी एवं दोस्त के साथ वह भविष्य के सपने बुन रही थी, उसका साथ उसे काटने लगता है और उसका स्पर्श उसे रत्ती भर भी नहीं सुहाता| दुनिया की नज़रें उसे अपने अन्दर प्रवेश करती लगती हैं|

आहत लडकी दुनिया के सामने आकर सबसे पूछती है कि बलात्कार को हत्या जैसा संगीन अपराध क्यों नहीं माना जाता? जबकि बलात्कार एक स्त्री की रूह की भी हत्या कर देता है|

क्यों क़ानून बलात्कार की शिकार स्त्री की ह्त्या भी कर दिए जाने के बाद ही इस अपराध को दुर्लभ अपराध की संज्ञा देता है?

फ़िल्म कूकी की विशेषता है, एक सामान्य परिवेश को वैसा ही दिखाने में, जैसा कि वह होता है| एक नाबालिग लड़की का प्रेम में पड़ जाना दर्शक को भी चेताता जाता है कि क्या यह एक सुखद और सहज प्रेमकथा हो पायेगी|

अपने माता पिता से छिपकर उत्सव के स्थल से रात के अँधेरे में स्कूटी से अकेले अपने बॉय फ्रेंड को लेने जाने से दर्शक किसी अनहोनी की आशंका से ग्रस्त हो जाता है और वास्तव में जैसा स्त्री विरोधी माहौल चारों ओर पसरा रहता है उससे उसे इस लडकी के लिए भय लगता ही है और सुनसान जंगल के रास्ते से जाती लडकी को देख सौ प्रतिशत दर्शकों को लगेगा कि लडकी गलती कर रही है, ऐसा रिस्क लेकर|

कूकी में नायिका के वकील पिता (राजेश तैलंग) भांप जाते हैं कि उनकी बेटी की एक लड़के से मित्रता हो गयी है और वे उससे डांट डपट न करके उससे मित्रवत, सच्चाई पूछने का प्रयास करते हैं| जब नायिका उत्सव स्थल से गायब हो जाती है तो वे अपनी बेटी के बॉय फ्रेंड पर झपट पड़ते हैं कि तुझसे ही मिलने गई थी मेरी बेटी|

ऐसी हताशा में यही उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती|

आगे फ़िल्म अन्य फिल्मों से अलग रास्ता अपनाकर अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही बेटी के कारण बुरी तरह घायल मन वाले पिता और लडकी के बॉय फ्रेंड के बीच एक स्नेह का संबंध बनते दिखाती है|

फ़िल्म की यह विशेषता है कि बलात्कार की शिकार लडकी के इर्दगिर्द उसके परिवार, उसकी डॉक्टर, पुलिस अधिकारी और उसके मित्रो सभी का व्यवहार बेहद धनात्मक दिखाया गया है और सभी लड़के को सामान्य स्थिति में लाने के पुरजोर प्रयास करते हैं|

एक सीधे सपाट कथानक में भी बलत्कृत बेटी के पिता की भूमिका में राजेश तैलंग ने शानदार अभिनय किया है और चरित्र के भावों को कई रंगों से भर दिया है| अस्पताल में एक दृश्य है जब डॉक्टर और पुलिस अधिकारी लडकी के पिता को उनकी बेटी के साथ हुए गैंग रेप की सच्चाई बताने के लिए कक्ष में अन्दर बुलाते हैं तो राजेश तैलंग तेजी से अन्दर जाते हैं और जब बाहर निकलते हैं तो अन्दर तक टूटे हुए हताश पिता के रूप में| कक्ष में प्रवेश करने और कक्ष से बाहर निकलने की प्रक्रिया में जो अभिनय की गहराई राजेश तैलंग ने दर्शाई है वह तारीफ़ के काबिल है| एक उदार पिता की भूमिका में राजेश तैलंग शानदार हैं|

रितिषा खौंड को शीर्षक भूमिका मिली थी, जिसका उन्होंने भरपूर लाभ उठाया| बोधिसत्व शर्मा, दीपान्निता शर्मा, और ऋतु शिवपुरी आदि अभिनेताओं ने सहज अभिनय किया है|

ज्ञान गौतम ने असम के प्राकृतिक सौंदर्य को दर्शाने और कथानक को वहां का स्थानीय दर्शाने में कैमरे से उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है|

प्रणब जे डेका द्वारा निर्देशित कूकी जिस मुद्दे को उठाती है उससे दर्शकों के अन्दर खलबली मचाने में कामयाब रहती है| दर्शक उन मुद्दों के बारे में सोचता अवश्य ही है और उसे फ़िल्म द्वारा उठाये मुद्दे सही भी लगते हैं|

मनोरंजन से ज्यादा विषयपरक फ़िल्म के रूप में दर्शक को विचार करने के लिए प्रेरित करना ही फ़िल्म का उद्देश्य लगता है|


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