सूरज की पहली किरण से आशा का सवेरा जागे’ जीनियस किशोर कुमार द्वारा रचित पंक्ति गागर में सागर भरने की उक्ति को चिरतार्थ कर देती है| धरा पर मानव जीवन पर छाए “कोविड-19” के गहरे धुंध भरे साये तले सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक अफरातफरी के माहौल में हक्के-बक्के खड़े भारतीय मनुष्यों के भय से सीधे-सीधे दो- दो हाथ करने और जीवन में आशा का संचार करने के लिए गुलज़ार, जो गाहे -बेगाहे सभी को अपने काव्य की मार्फत मार्ग दिखाते रहते हैं, मार्ग पर प्रकाश फेंकते रहते हैं जिससे इच्छुक सुयोग्य व्यक्ति बढ़ कर आगे जा सकें, सूरज, जो पृथ्वी पर जीवन की एक कुंजी है, की स्तुति लेकर सामने आए| वैदिक ऋषियों की भांति गुलज़ार ने इस स्तुति को गढ़ा है| अगर कोरोना से मानव सभ्यता जीत नहीं पाती या इस जीत को पाने में समय ज्यादा लग जाने के कारण मानव जीवन की बहुत बड़ी क्षति हो जाती है तो ऐसी स्तुतियाँ ही मानव जीवन की प्रतिनिधि कवितायें कहलाएंगी| विज्ञान आधारित तमाम विकास किसी काम के शायद न रह पाएँ| सरल जीवन ही आधारभूत बन जाएगा|

कोविड-19 से उत्पन्न अभूतपूर्व स्थितियों के विरुद्ध आशा का संचार करने के लिए गुलज़ार ने एक छोटा सा खूबसूरत गीत रचा और जिसे विशाल भारद्वाज ने न केवल बेहतरीन सुरों से सजाया बल्कि अपने नवजात म्यूजिक लेबल का पहला गीत भी इसे बनाया|

इस गीत के वीडियो में अन्य विशेषताओं के साथ सबसे बड़ी बात लगी शुरू और अंत में खामोश बैठे गुलज़ार साब को दिखाना| मानो वे दुनिया पर नज़र रखते हुये जीवन, आक्रमण, भय, साहस, और आशा आदि सभी बातों की गणना करते हुये भूत-वर्तमान और भविष्य में गोते लगाकर इस काव्य की सृजना से गुज़र रहे हैं| इस काव्य पर विशाल भारद्वाज के संगीत और विशाल और रेखा भारद्वाज के गायन को परख रहे हो| उनकी मुखाकृति सोच में गहरे डूबे होने का संकेत देती है| उन्हे देख ऐसा लगता है मानो कह रहे हों सबसे कि धरा पर जो कुछ अच्छा है, नवजात है, युवा है, पुरातन है, सबको अपनी समझदारी से बचाओ! मूर्खता में अवसर न गंवा देना|

विशाल भारद्वाज को ऐसे गाते देखना इतना दर्शाता है कि अब वे अपने अंदुरनी कलाकार संग पूर्ण सामंजस्य की स्थिति प्राप्त कर चुके हैं और वे अब अपनी चंद श्रेष्ठतम कृतियों, जो गीत, संगीत या फ़िल्म किसी भी रूप में हो सकती हैं, को संसार को देने के कगार पर आ खड़े हुये हैं| विशाल भारद्वाज को मग्न हो कर गाते देख फ़िल्म Love Actually का दृश्य याद आता है जहां गायक चरित्र रिकार्डिंग स्टुडियो में  Love is All around गाते हुये आनंद लेता है|

विभिन्न साजों को बजाते वादक साथियों को वीडियो का हिस्सा बनाना भी आकर्षक है। सैक्सोफोन को इतने पल बजते देने का अवसर गीत के संगीत में रखे जाना देखना भी बेहद सुखद है।

रेेखा भारद्वाज की आवाज में कोई अच्छा गीत सुनकर ऐसा ही लगता है कि वे कहाँ गायब रहती हैं, ज्यादा गीत क्यों नहीं गातीं? पहले उनकी आवाज में नमकीन खनक हुआ करती थी अब एक अलग किस्म की मिठास भी आ गई है| बल्कि स्वाद के पैमाने पर कसें तो उनकी आवाज नींबू की ऐसी शिकंजी जैसा स्वाद देने लगी है जिसमें नमक, मसाले, मिठास और खटास का पूर्णत: संतुलित मिश्रण उपस्थित है| अमृता प्रीतम की प्रेम कवितायें, मीरा के आध्यात्मिक प्रेम से भरे गीत, आदि इत्यादि कितना काव्य उनकी आवाज की बाह जोट रहा है|

धूप आने दो’ के भाव से सूरज की बात करें तो धरा पर सूरज की अनुपस्थिति जीवन के लिए भयावह है| सूरज का महत्व वे नहीं जानते जिन्हे इसकी रोशनी और ऊष्मा सहज ही मिलते रहते हैं, इसे जानते हैं वे जो दिनों, हफ्तों इसके दर्शन हेतु तरस जाते हैं| जैसे पनडुब्बी में रहने वाले सैनिक, ज्यादा बरसात वाले इलाकों में रहने वाले लोग जहां नमी की गंध से कपड़े और फर्नीचर ही नहीं जीवन भी भर जाते हैं|

अंधेरे बंद कोनों में, कमरों में वास करते लोगों को उस एक क्षण का इंतजार रहता है जब वे सूरज की किरणों को सूंघ सकें, उनका स्वाद ले सकें, उन्हे अपने पूरे अस्तित्व पर महसूस कर सकें| किसी बंद कमरे में बैठे किसी झिर्री से आते प्रकाश में नृत्य करते धूल के कण व्यक्ति के मन में कैसी आशा भर देते हैं इसे बस अनुभव करने वाला व्यक्ति ही जान पाता है|

भारत में लगभग सर्वत्र सूरज की बेहद अच्छी उपस्थिति होने के बावजूद भारतीयों का बहुमत विटामिन डी-3 की कमी के कारण बड़ी बड़ी बीमारियों का शिकार हो चुका है, इसी से पता चलता है कि ‘सूर्य नमस्कार’ जैसी दैवीय योगविधि और ‘आदित्यहृदय स्त्रोतम’ जैसे अद्भुत स्त्रोत के जनक देश में सूरज से कितना कम वास्तविक नाता इसके वासियों का बचा हुआ है| भारतीय घबराते हैं सूरज की ऊष्मा से, और जिसके पास भी बाहर न निकालने की सुविधा है वह सूरज की रौशनी में बाहर निकलने से कतराता है ताकि उसकी त्वचा का रंग गहरा न हो जाये| बड़ों की देखा देखी बच्चे सूरज तले बाहर न खेल कर इन्टरनेट के आभासी संसार के गेम्स खेलने में व्यस्त हैं| सूरज को इतना नज़रअंदाज़ मानव सभ्यता की कोई कौम नहीं कर सकती| उसे खामियाजा भुगतना ही पड़ता है|

सूरज का महत्व है तभी विविध विधाओं के बड़े बड़े कलाकारों ने इसे अपनी कला में बेहद महत्वपूर्ण स्थान दिया है|

सूरज की अनुपस्थिति में मानव मस्तिष्क में अपराध पनपते हैं| सूरज की रौशनी न हो तो उसके अभाव के धुंधलके से उत्पन्न अवसाद से पार पाना आसान बात नहीं|

नज़ीर बनारसी ने लिखा था –

अँधेरा मांगने आया था रौशनी की भीख

हम अपना घर न जलाते तो और क्या करते

सूरज, जीवन में आशा की किरण आदि न हों तो अंधेरे से, दुःख से पार पाने के लिए घर जला कर ही जीवन जिया जाता है फिर|

पृथ्वी पर मानव न हो तो संभवतः ये बहुत खूबसूरत ग्रह बन जाये लेकिन तब उस खूबसूरती को पहचान कर उसका विविध कलाओं में वर्णन करने वाली मनुष्य जाति न होगी| खूबसूरती बस होगी, उसे खूबसूरत नामक शब्द देने वाला भी कोई जीव जन्तु यहाँ उपस्थित न होगा| प्रकृति संभवतः इस स्थिति को पसंद न करे| कोई उसकी रचना का आनंद न उठाए, उसे न समझे तो वह क्यों कर निर्माण करेगी?

गुलज़ार, सूरज और धरा के अंतर्निहित संबंध और उनकी खूबसूरती को स्वीकारते लिखते हैं

 

धूप आने दो

मीठी-मीठी है, बहुत खूबसूरत है

उजली रौशन है ज़मीं, गुड़ की ढ़ेली है

 

हमने देखी हैं उन आँखों की महकती खुशबू के रचियता गुलज़ार के रचना संसार से परिचित लोग जानते हैं कि मानव इंद्रियों के अहसासों में वे कोई भेद नहीं करते, उनके रचनात्मक संसार में जो देखा जा सकता है उसकी गंध भी हो सकती है, उसका स्पर्श भी संभव है, उसका स्वाद भी होता है और उसकी एक ध्वनि भी होती है| उनकी ऐसी रचनाएँ परमहंस श्रेणी की हैं जहां सब एक ही तत्व से निर्मित है कहीं कोई विभेद नहीं, कोई विभक्ति नहीं| यह वैज्ञानिक भी है जहां अंततः ऊर्जा और पदार्थ के मध्य भेद विलुप्त हो जाता है|

धूप और ज़मीं दोनों खूबसूरत भी हो सकते हैं और मिठास से भरे भी| धूप की मिठास तो अनुभव करने का भाव है, अगर कोई कर सकता है तो कर ही लेगा जो व्याख्या में उलझ जाएगा उसे रत्ती भर भी  अनुभव न हो पाएगा| और ज़मीं की मिठास तो धरा पर उत्पन्न विभिन्न कंद-मूल, साग-सब्जी, फलादि और विभिन्न प्रकार की फसलों और भूजल की मिठास से स्पष्ट ही है|

सूरज की किरणों से उजले ज़मीं के टुकड़े का बहुत बड़ा महत्व है| इसकी झलक एक बीमार को अच्छा कर सकती है| निराशा को आशा में बादल सकती है| किसी चित्रकार को एक अनूठा चित्र बनाने की प्रेरणा मिल सकती है इसे देख| एक कवि मोहक काव्य रच सकता है इसे देख कर प्रफुल्लित होकर।

सूरज से हम मानवों का नाता संकट काल में और बढ़ जाता है| नोरा जोन्स का Sunrise गीत हो या बीटल्स का गीत – Here Comes the Sun, हो, सूरज से हम प्रेरणा पाते ही रहेंगे|

 

गहरी सी ज़हरी हवा उतरी है इस पर

लगे ना घुन इसे

हट कर ज़रा सी देर तो ठहरो

धूप आने दो!  धूप आने दो!

हवा से परागण का विस्तार ही मानव के लिए प्राकृतिक है| कोविड-19 जैसी जानलेवा बीमारी के विषाणु भी इस हवा के माध्यम से वायुमंडल में तैरते फिरेंगे और हवा को जहरीली बना देंगे तो मनुष्य क्या करेगा? दो महीने पहले ऐसी संभावना थी कि जैसे जैसे गर्मी बढ़ेगी विषाणु का असर कम हो जाएगा| ऐसा नहीं हुआ लेकिन इस विषाणु के विरुद्ध इस असफलता के बावजूद मानव जीवन में धूप का महत्व कम नहीं होता| धूप मानव शरीर को भांति भांति की बीमारियों से लड़ने की शक्ति देती है, उसके शरीर में प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है|

ज़मीं पर जहरीली हवा घुन न लगा दे इसलिए गुलज़ार लिखते हैं – ‘हट कर ज़रा सी देर तो ठहरो’|

सूरज की किरणों को लैंस से सूखी घास फूस या कागज पर केन्द्रित करके आग लगाने का प्रयोग लगभग बड़ा होता हर बच्चा करता है और आनंदित होता है| ऐसे ही सूरज की धूप ज़मीं से घातक जहरीले विषाणु को जला कर भागा दे तो बात बने|

 

आफ़ताब उठेगा तो किरणों से छानेगा वो

गहरी जहरीली हवा में

रोशनी भर देगा वो

 

सूरज उदय होगा तो अपनी किरणों के तेज से वायुमंडल की जहरीली हो चुकी परतों को भेद कर उन्हे शुद्ध करता जाएगा| यही सूरज सदियों से करता आया है और इस बार भी देर सबेर ऐसा ही करेगा| वायरस के भय से सहमें लोग घरों में बंद हो गए तो यत्र तत्र सर्वत्र वायु प्रदूषण में गुणात्मक घटोत्तरी स्पष्ट रूप से दिखाई दी| सूरज ने मनुष्य के अलावा पेड़-पौधों और बाकी जीव जंतुओं पक्षियों को प्रकृति का आनंद भरपूर लेने का अवसर दिया| अपने घरों की खिड़कियों और छतों से मनुष्यों ने भी अरसे बाद साफ आसमान के नज़ारे का आनंद लिया| ऐसा ही लगा मानो नए तरीके से जीवन जीने का अध्याय मनुष्य को पढ़ना चाहिए|

मीठी हमारी ज़मीं

बीमार न हो

हट के बैठो ज़रा हट के ज़रा

थोड़ी जगह तो दो

धूप आने दो

 

मानव मानव के मध्य भौतिक दूरी भी एक तरीका है जहरीले विषाणु के प्रसार पर अंकुश लगाने का| हमारी मीठी ज़मीं बीमार न हो इसलिए आपस में दूरी बरतने की समझ विकसित करने की आवश्यकता आन पड़ी है|

…[राकेश]