मुझे बारिश में चलना सदैव अच्छा लगता है क्योंकि ऐसे में कोई मुझे रोता हुआ नहीं पा सकता – दुनिया के सबसे महान सिनेमाई हास्य कलाकार – चार्ली चैपलिन ने एक बेहद साहित्यिक महत्त्व वाली रचनात्मक बात कही|

अभी हाल ही में भारत से पोलियो पर पूर्ण नियंत्रण संभव हो पाया है लेकिन पिछली सदी में पोलियो नामक राक्षस कितने ही परिवारों में त्रासदी लेकर आ जाता था|

हास्य अभिनेता के रूप में प्रसिद्द हो चुके हिन्दी फिल्मों के तीन- चार अभिनेताओं में से एक महमूद भी थे जिन्होंने कई संवेदनशील फिल्मों का निर्देशन भी किया, उन्हें फिल्मों में अभिनय करके कमाए धन से निर्मित भी किया| फिल्मों में नृत्य करके आजीविका कमाने वाले मुमताज़ अली की शराब की लत के कारण महमूद और उनके सात अन्य भाई बहनों को बेहद गरीबी में बचपन गुजारना पड़ा| अपने समय की सफलतम फ़िल्म किस्मत (अशोक कुमार अभिनीत) में वे 11 वर्षीय बाल कलाकार के रूप में सिनेमा के परदे पर अभिनय की शुरुआत कर चुके थे लेकिन तब भी अगले कई बरस उन्हें छोटे बड़े गैर फ़िल्मी काम करके ही जीने के साधन जुटाने पड़े| इन कामों में ड्राईवर बन कर कर चलाना भी था| जीवन के इस संघर्ष पूर्ण दौर ने स्कूल बनकर उन्हें बहुत बारीकी से जीवन की पेचिदियाँ सिखाईं और इन सबको उन्होंने बाद में अपनी फिल्मों और अपनी भूमिकाओं में उतारा|

देव आनंद ने फंटूश में और गुरुदत्त ने सी आई डी और प्यासा में ऐसी भूमिकाएं महमूद को दीं, जिनमें दर्शकों ने उन्हें नोटिस किया| और फिर तो जैसे उनकी प्रतिभा का विस्फोट ही हिन्दी सिनेमा के पटल पर हो गया और आने वाले सालों में वे सफलतम हास्य अभिनेता ही नहीं बने बल्कि निर्माता निर्देशक भी बन बैठे| आई एस जौहर के साथ उन्होंने जौहर एंड महमूद इन गोवा, और हांगकांग जैसी श्रंखला ही बना डाली|

साठ के दशक में कम पढ़े लिखे महमूद की अभिनय के क्षेत्र में महारत का रुतबा ऐसा हो चुका था कि न केवल वे फ़िल्म के नायक से ज्यादा फीस लेते थे बल्कि उस समय के सफल सितारे अपने दृश्यों को करने से पहले उनकी गाइडेंस लेते थे कि किसी दृश्य को कैसे अभिनीत किया जाए|

महमूद का संगीत का बोध कमाल का था| छोटे नवाब में उन्होंने नवोदित राहुल देव बर्मन को संगीतकार बनाया तो उसके दस साल बाद अपनी फ़िल्म कुंवारा बाप में संगीतकार रोशन नागरथ के 18 वर्षीय बेटे राजेश रोशन को संगीतकार बना कर प्रस्तुत किया|

बात हास्य कलाकार के जीवन के निजी दुःख से शुरू हुयी थी| अभिनेत्री मीना कुमारी की बहन से विवाह से महमूद को कई संतानों की प्राप्ति हुयी और उनमें से एक बेटे मैकी अली को बचपन में ही पोलियो ने अपना शिकार बना दिया था| अपने दुःख से ग्रसित होकर पोलियो के विरुद्ध जाग्रति का प्रसार करने के लिए महमूद ने फ़िल्म – कुंवारा बाप की रचना की| इसके लिए महमूद ने हॉलीवुड में बनी चार्ली चैपलिन की मूक फ़िल्म The Kid (1921), Bachelor Mother (1939), और किशोर साहू द्वारा निर्देशित कुंवारा बाप (1942) से प्रेरित होकर इस फ़िल्म को बनाया|

मैकी अली ने उसमें महमूद के बेटे की भूमिका भी निभाई| इस फ़िल्म में महमूद ने उस समय के लगभग सारे ही चर्चित सितारों की भीड़ लगा दी थी और महमूद का रुतबा भी ऐसा था कि सभी फ़िल्म में आ भी गए|

किशोर कुमार ने जोश भरे युवा गीत, रोमांटिक गीत, दर्द भरे गीत, हास्य बोध वाले गीत खूब गाये हैं लेकिन सामान्यतः बच्चे को सुला सकने वाली लोरी गाने के लिए उस दौर में न तो संगीतकार उनके पास जाते और न ही अभिनेतागण और निर्देशक लोग ही ऐसा प्रयास करते| लेकिन महमूद ने राजेश रोशन से इस लोरी विशेष को किशोर कुमार से गवाने की ही बात की जबकि फ़िल्म में दो बार मोहम्मद रफ़ी ने भी अपनी गायिकी का जलवा दिखाया है|

किशोर कुमार ने जैसे इसे गाया है वह इसे कम से कम पिछले पचास सालों की एक अति विशिष्ट लोरी गीत बना देता है|

आ री आजा

निंदिया तू ले चल कहीं

उड़नखटोले में

दूर दूर दूर, यहाँ से दूर

मेरा तो ये जीवन तमाम

मेरे यार भरा दुःख से

पर मुझको जहां में मिला

सुख कौन बड़ा तुझसे

तेरे लिए मेरी जान

ज़हर हज़ार मैं पी लूँगा

तज दूंगा दुनिया

एक तेरे संग जी लूँगा

ओ नज़र के नूर

आ री आजा निंदिया…

मजरुह सुल्तानपुरी के लिखे बोल एक फ़िल्मी पिता की ही भावनाओं को व्यक्त नहीं करते बल्कि यह गीत पिछले पचास सालों में हजारों पिता पुत्र की जोड़ियों का एक निजी गीत बनता आया है| इसे सुनते , साथ साथ गाते कितने पिताओं की आँखें कभी गीत के दर्द से, कभी किशोर कुमार की गायिकी से और कभी अपनी संतान के प्रति ममता से द्रवित होकर आंसुओं से भर आती रही हैं|

एक समय आता है जब पिता पुत्र की जोड़ी एक दूसरे से बिछड़ ही जाती है और ऐसे में हजारों ऐसे लोग होंगे जो इस गीत को सुनकर अपने अपने पिता की स्मृतियों और इस गीत से जुडी मीठी यादों से भावुक हो जाया करते हैं|

फ़िल्म के अंत में जब मरणासन महमूद के पास बैठा उनका पोलियोग्रस्त बेटा लता मंगेशकर की गायिकी में उसी लोरी गीत को गाता है

आ री आजा

निंदिया तू ले चल कहीं

उड़नखटोले में ….

पार्श्व में यादों से झांककर किशोर कुमार की गायिकी में सुनाई देता है

ये सच है कि मैं अगर

सुख चैन तेरा चाहूँ

तेरी दुनिया से मैं फिर कहीं

अब दूर चला जाऊं

तो बेटा तड़प कर गाता है –

नहीं मेरे डैडी

ऐसी बात फिर से न कहना

रहेगा न जब तू

फिर मुझको भी नहीं रहना

न जा तू हमसे दूर

आ री आजा

निंदिया तू ले चल कहीं

उड़नखटोले में

दूर दूर दूर, यहाँ से दूर

अपने आसपास थोड़ा सा भी देखे आदमी तो कोविड ने तो ऐसे बहुत से अवसर ला दिए जब इस गीत ने दुःख के लावे को अन्दर से बाहर निकाल कर शेष जीवित रहे लोगों की भावनाओं को संभालने में सहायता की|

फ़िल्म में महमूद एक गरीब रिक्शेवाले की भूमिका में हैं और पोलियोग्रस्त यह बच्चा उन्हें एक मंदिर की सीढ़ियों पर लेटा हुआ मिलता है जिसे परिस्थितिवश उन्हें घर ले आना पड़ता है और फिर वे इसके मोह में पड़कर हजारों समास्याओं से जूझकर पालते हैं| बच्चे का नाम वे रखते हैं – हिन्दुस्तान !

स्कूल में रेस के दौरान एक दृश्य है जिसमें हिन्दुस्तान के गिर जाने से सब लोग उस पर हँसते हैं और महमूद दौडकर रेसिंग ट्रैक पर पहुंचकर हिन्दुस्तान को अपने कंधे पर उठाकर दौड़ लगाकर रेस पूरी करते हैं|

ऐसे नजदीकी और भावनाओं से ओतप्रोत पिता पुत्र के रिश्ते के लिए ही इतने जहीन गीत का जन्म हो सकता था|

मैकी अली ने चार साल बाद महमूद की एक अन्य फ़िल्म – एक बाप छह बेटे, में भी काम किया और बाद में अस्सी के दशक में वे लगभग पांच सालों के लिए घर से कहीं चले गए और अंततः पैंतीस साल की उम्र में 2002 में उनकी मृत्यु हो गयी और इसके दो साल बाद महमूद भी चल बसे|

महमूद की फ़िल्म की यह लोरी पिताओं के लिए तो सदैव अमर रहेगी!

फ़िल्म के दो अन्य गीत – सज रही गली मेरी माँ सुनहरे गोटे में, किन्नर समुदाय का राष्ट्रीय गीत जैसा बन चुका है| इस गीत में महमूद ने अपने पिता मुमताज़ अली से भी नृत्य करवाया| लता किशोर के युगल भक्ति गीत – जय भोलेनाथ की भी बड़ी प्रसिद्धि रही है| कई बरसों के बाद याराना में राजेश रोशन ने भोले ओ भोले को लगभग इसी तरीके से विकसित किया|

फ़िल्म भावनाओं पर आधारित है, और दर्शक की भावनाओं को उकेरने में कभी नहीं चूकती| दुर्घटना वाले दृश्यों में बेहद निम्न स्तर के मेकअप, और रक्त की जगह बहते रंग के स्पष्ट दर्शन के बावजूद परदे पर बाप-बेटे की भावनाओं के कारण दर्शक की भावनाएं इतनी तीव्रता से उत्पन्न होती हैं कि फ़िल्म की निम्न प्रोडक्शन वेल्यूज़ की ओर से दर्शक अपन ध्यान हटा कर भावनाओं के बहाव के साथ बहता जाता है|

यही महमूद और उनकी फ़िल्म की सफलता है|

…[राकेश]


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