प्रतीत तो ऐसा ही होता है
रचनाकार को

कि उसके द्वारा ही रचा जा रहा है
पर क्या रचने वाला वास्तव में  

रचनाकार का “मैं” ही होता है?
तब,
कभी एक बाल मन,
कभी एक किशोर मन,
कभी एक युवा मन,
कभी एक प्रौढ़ मन,
और एक वृद्ध मन
जो रचता है,
क्या उसी “मैं” कारण रचता है

जो कि वह समझता है

वह है?

आयु की बात को छोड़ भी दें तो
क्या यह जो मन

जिसके द्वारा सब कुछ रचा जाता रहा है,
वह स्त्री होता है या पुरुष?
या कि वह निरपेक्ष होता है
इन दोनों ही जैविक अंतरों से,
इन दोनों ही भावों से,
या कि वह ऊपर उठ चुका होता है

ऐसे किसी भी अंतर से?

यदि सभी कुछ “मैं” के द्वारा ही रचा जाता है
तो क्यों श्रद्धा भाव उमड़ता है

रचनाकार के अन्दर

प्रकृति के प्रति,
इस पूरी सृष्टि के प्रति
तब तब
जब जब

कुछ भी बहुत अच्छा

रचा जा सकना संभव हो पाता है
और ऐसा लगता है रचनाकार को

कि उसका तो
सारा अस्तित्व ही

एक खोखली बासुंरी समान हो गया है
जिसमें कोई और ही फूँक भर कर
सुरीली तान छेड़ रहा है।

यदि सब “मैं” का भाव ही रचता है तो क्यों
एक अदभुत कृति की रचना के समय
शिल्प और शिल्पकार के बीच स्थित
द्वैत खो जाता है
और रह जाता है केवल
एकत्व” का भाव?
इस अद्वैत के भाव को

या तो “मैं” कह लें

या
वह” कह लें
पर इस “मैं” में “वह” भी है
बल्कि “वह” ही महत्वपूर्ण है
और उस “वह” में भी

“मैं” का समावेश है

पर एक बात स्पष्ट भाव से सामने आती है
यह “मैं” वही नहीं है
जो कि यह बताता चलता है
कि अरे यह सब तुम्हीं ने तो किया है।

बहुत कुछ ऐसा रचा जाता है
जो जन्म तो लेता है
पर उसे जन्माया नहीं जाता
उसे जन्माया जा नहीं सकता
वह तो बस ऐसे ही उतरता है
मानस की शुद्धतम अवस्था में
जैसे कि बाकी सब रचनायें उतर रही हैं
प्रकृति में
प्रकृति के द्वारा ही
यहाँ

वहाँ
जल में,

थल में,

नभ में,
धूप में

छाया में।

…[राकेश]

Painting : Vincent Von Gogh


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