Shalimar2-001हॉलीवुड के अभिनेताओं Rex Harrison एवं John Saxon तथा ग्लैमर की प्रतीक अभिनेत्री Gina Lollobrigida, और प्रसिद्ध सिनेमेटोग्राफर Harvey Genkins को बम्बई लाकर अगर कोई निर्देशक इस बात की घोषणा करे कि इन विश्व प्रसिद्ध सितारों और हिन्दी सिनेमा के तत्कालीन प्रसिद्ध बड़े सितारों को लेकर वह एक बड़े बजट की फ़िल्म दो भाषाओं, हिन्दी एवं अंग्रेजी में बनाने जा रहा है, तो हिन्दी सिनेमा के उधोग में बवंडर मचना स्वाभाविक है| सन 1977 के साल हिन्दी सिने-संसार में उत्तेजना और हलचल मचाने वाले थे हॉलीवुड से बम्बई पधारे युवा फिल्मकार, नाटककार और लेखक कृष्णा शाह, जो कि अमेरिका में Yale और University of California जैसे उच्च कोटि के शिक्षण संस्थानों से शिक्षा प्राप्त करके नाटक और फ़िल्म बनाकर ख्याति प्राप्त कर चुके थे| 1976 में बनाई उनकी फ़िल्म The River Niger ने विभिन्न अन्तराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में कई पुरस्कार जीते थे और ब्रोडवे में भी उनके द्वार लिखित एवं निर्देशित नाटक की धूम मची हुयी थी|

ऐसी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के साथ जब वे हॉलीवुड और हिन्दी सिनेमा के संगम से एक फ़िल्म बनाने का सपना लेकर बम्बई पहुंचे तो उनके आगमन से हिन्दी सिने उधोग में बहुत से लोग इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के साथ जुड़ने के लिए प्रयासरत हो गये और एक-दूसरे का पत्ता काटने की साजिशें शुरू हो गयीं|

हॉलीवुड के उपरोक्त अभिनेताओं को कृष्णा शाह इस प्रोजेक्ट के लिए अनुबंधित कर चुके थे| कृष्णा शाह उस वक्त हिन्दी फिल्मों के सबसे चर्चित सितारों अभिनेता अमिताभ बच्चन और अभिनेत्री जीनत अमान को मुख्य भूमिकाओं में लेना चाहते थे| वे शम्मी कपूर, प्रेमनाथ और ओ.पी रल्हन को भी पहले ही अनुबंधित कर चुके थे| परन्तु कुछ दिनों की सुगबुगाहट के बाद चर्चा चली कि अमिताभ बच्चन ने कृष्णा शाह की फ़िल्म में कम करने से इंकार कर दिया| कृष्णा शाह ने वक्त न गंवाते हुए मुख्य भूमिका के लिए धर्मेन्द्र को अनुबंधित कर लिया|

मुहूर्त शॉट के बाद एक शानदार पार्टी का आयोजन किया गया था जिसमें हिन्दी सिनेमा की सभी महत्वपूर्ण हस्तियाँ आमंत्रित की गयी थीं| ऐसा कहा जाता है कि पार्टी में हॉलीवुड की ग्लैमरस अभिनेत्री Gina Lollobrigida का मुकाबला उस वक्त हिन्दी सिनेमा में ग्लैमर की प्रतीक बन चुकी जीनत अमान से हो गया और तीस साल से कम उम्र की जीनत ने पचास साल की उम्र पार कर चुकी Gina Lollobrigida को पछाड़ कर उस शाम बाजी जीत ली| कुछ ऐसा हुआ जिसे Gina Lollobrigida बर्दाश्त नहीं कर पाईं और अमेरिका वापिस चली गयीं और उन्होंने फ़िल्म छोड़ देने की सूचना कृष्णा शाह तक पहुंचा दी| कृष्णा शाह Gina Lollobrigida को मनाने अमेरिका चले गये पर जब कुछ समय बाद वे भारत लौटे तो Gina Lollobrigida के बदले वे उस भूमिका में Sylvia Miles को अनुबंधित करके आए थे जो कि  Gina Lollobrigida के मुकाबले एक कम जाना हुआ नाम था और ग्लैमर और स्क्रीन प्रेजेंस में भी वे Gina Lollobrigida के मुकाबले में नहीं ठहरती थीं|

उस वक्त की फ़िल्मी पत्रिकायें फ़िल्म से जुडी छोटी बड़ी सभी ख़बरें प्रकाशित कर रही थीं| ऐसा कहा गया कि Rex Harrison जब अपनी गर्लफ्रेंड के साथ बम्बई एयरपोर्ट पर आए तो उनके साथ उनके सामान से भरे चालीस से ज्यादा सूटकेस थे जो कि कस्टम ने अपने कब्जे में ले लिए| कस्टम के इस कदम से Rex Harrison आग बबूला हो गये और उन्होंने वापिस अमेरिका जाने की जिद पकड़ ली| कृष्णा शाह ने भागदौड करके उनका सामान वापिस दिलवाया| कृष्णा शाह की मुश्किल को बढाते हुए ओ.पी रल्हन न केवल Rex Harrison से ज्यादा सूटकेस लेकर शूटिंग स्थल पर पहुंचे बल्कि उन्होंने अपनी करतूत की खबर बाकायदा प्रेस को देकर इस बात को छपवाया भी और सुनिश्चित किया कि इस खबर से लैस पत्रिका Rex Harrison के कमरे में जरुर पहुंचे|

फ़िल्मी पत्रिकाएं फ़िल्म, जिसे शालीमार शीर्षक दिया गया था, के निर्माण से जुडी ख़बरें और गॉसिप लगातार छाप रही थीं|

हॉलीवुड की तर्ज पर कृष्णा शाह ने यह भी तय किया कि फ़िल्म स्क्रिप्ट को एक उपन्यास का रूप भी दिया जायेगा और फ़िल्म के प्रदर्शन के साथ ही उपन्यास को भी प्रकाशित किया जायेगा और उपन्यास के प्रकाशन और उसकी मार्केटिंग का सारा खर्च भी कृष्णा शाह ने खुद ही उठाना तय किया| स्क्रिप्ट के आधार पर उपन्यास लिखने के लिए बड़े बड़े लेखकों से संपर्क साधा गया जिनमें आर.के. नारायण भी सम्मिलित थे जिन्होने यह काम करने से इंकार कर दिया| अंत में मनोहर मुलगांवकर को यह प्रोजेक्ट सौंपा गया और इस कम के एवज में उन्हें एकमुश्त एक बड़ी रकम का भुगतान लेखन आरम्भ करने से पहले ही किया गया| कहते हैं इतनी बड़ी रकम भारत में कभी किसी लेखक को नहीं दी गई थी| मनोहर मुलगांवकर को फ़िल्मी सितारों के साथ उनके ही होटल में ठहराया गया| यह भी तय किया गया कि अंग्रेजी में लिखे जा रहे उपन्यास का अनुवाद हिन्दी और उर्दू में भी छापा जायेगा और प्रत्येक भाषा में 20,000 प्रतियां छापने का निश्चय किया गया| फ़िल्म का प्रोजेक्ट नई नई योजनाओं से एक बेहद महत्वाकांक्षी रूप लेता जा रहा था और पैसा पानी की तरह बह रहा था|

ऐसी योजना बनाई गयी कि परंपरागत पुस्तक विक्रेताओं के अलावा अन्य स्थानों के दवारा भी पुस्तक जनता के समक्ष लाई जायेगी| इंडियन ऑयल के साथ करार किया गया कि उनके सभी स्टेशनों पर शालीमार पुस्तक को प्रदर्शित और बेचा जायेगा|

फ़िल्म के प्रीमियर के साथ ही एक भव्य समारोह में दिल्ली में इंडियन ऑयल के स्टेशन पर शालीमार उपन्यास को भी प्रदर्शित किया गया|

एक फ़िल्म के रूप में शालीमार भारत में नहीं चल पाई और इस पर आधारित उपन्यास की हजारों प्रतियों के ढेर रद्दी में दिए गये|

फ़िल्म को एकमात्र सांत्वना इसके संगीत की सफलता से मिली जिसके लिए फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार (राहुलदेव बर्मन), पार्श्व गायक (किशोर कुमार) और पार्श्व गायिका (ऊषा उत्थुप) की श्रेणियों में फिल्मफेयर पुरस्कारों के लिए नामांकित किया गया|

एक बहुत बड़े प्रोजेक्ट की परिणति असफलता में हुयी| अगर फ़िल्म हिन्दी या अंग्रेजी किसी भी वर्जन में सफल हो जाती तो हॉलीवुड और हिन्दी सिनेमा के मध्य सार्थक गठबंधन के रास्ते सत्तर के दशक में ही खुल जाते|

…[राकेश]

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