बॉलीवुड की चमक फीकी पड़ती जा रही है, इसकी जगह एक कठोर वास्तविकता ने ले ली है कि यह एक ऐसे संकट से घिर गया है जो इसने खुद ही पैदा किया है। अत्यधिक बजट में चौंका देने वाला सबसे बड़ा हिस्सा (65-70%) सितारों की फीस में चला जाता है। इसकी तुलना अगर 70 और 80 के दशक के स्वर्णिम युग से करें, तो उस समय कलाकारों का पारिश्रमिक केवल 15-20% ही था और वह एक वाजिब और समझदारी भरा हिस्सा होता था।
पर यह संकट की स्थिति आयी कैसे?
आज हमारे सिनेमा के पास शानदार दृश्य, शानदार संपादन और तकनीकी जादूगरी है। लेकिन ईमानदारी से कहें तो यह तकनीकी चमक काफी हद तक डिजिटलीकरण और उन्नत उपकरणों की वजह से है, और यह आवश्यक नहीं कि तकनीकी टीम की रचनात्मक अर्जित दक्षता की वजह से यह चमक मिली है।
हिंदी फ़िल्म उद्योग ने सिनेमा को तमाशा बनाकर इसे बाज़ार के किसी भी अन्य प्रोडक्ट की तरह इसका व्यापार किया है, और अब परिणाम खुद ही चीख कर कह रहा है कि घटते दर्शक और बॉक्स ऑफिस पर फीके प्रदर्शन के पीछे के कारणों पर विचार करने का समय आ गया है।
यहाँ यह चेतना आनी आवश्यक है कि समस्या का समाधान फ़िल्म निर्माण में और अधिक पैसा झोंकना नहीं है। एक क्रांतिकारी बदलाव की आवश्यकता है| यह समय है, कहानी कहने की जड़ों की ओर लौटने का। हमें गोदार्द और ट्रूफ़ो जैसे फ्रेंच न्यू वेव मास्टर्स या मृणाल सेन और बासु चटर्जी जैसे भारतीय निर्देशकों की प्रतिभाओं द्वारा अपनाए गए और विगत में सफलतापूर्वक सिद्ध किये मॉडल को अपनाने की ज़रूरत है।
हमें धरातल पर आकर सोच विचार करके एक ही बड़े प्रोडक्शन में सब कुछ झोंकने के बजाय, फाइनेंसरों को उसी समग्र बजट का उपयोग करके दस कम बजट वाली फिल्मों में निवेश करने के लिए राजी करना चाहिए। इसे विविधता भरे पोर्टफोलियो के निर्माण के दृष्टिकोण के रूप में सोचना चाहिए। एक दो फिल्मों की सफलता भी पूरे निवेश को लाभ की स्थिति में ला सकती हैं| हमें याद रखना चाहिए कि बीते दौर की प्रतिष्ठित और सफल फ़िल्मों – “भुवन शोम” (बजट: ₹1.25 लाख) और “रजनीगंधा” (बजट मात्र ₹6 लाख) के बजट कम थे लेकिन फिल्मों की गुणवत्ता उच्च रखी गयी थी|
इस विविधता भरे दृष्टिकोण से कई लाभ मिलते हैं:
रचनात्मक स्वतंत्रता :
फ़िल्म का कम बजट, फिल्म निर्माताओं को जोखिम लेने, नई कहानियों के साथ प्रयोग करने और विविध विषयों का पता लगाने में सक्षम बनाता है।
प्रतिभा का विकास:
यह उभरते अभिनेताओं, लेखकों और निर्देशकों को अपने कौशल का प्रदर्शन करने के लिए एक मंच प्रदान करता है।
दर्शकों की सहभागिता:
विविधतापूर्ण कहानी कहने से व्यापक दर्शक वर्ग को लाभ मिलता है| उनमें सिनेमा के प्रति आकर्षण बढ़ता है और उनके फिल्मों से वास्तविक जुड़ाव को बढ़ावा मिलता है।
वित्तीय स्थिरता:
कई परियोजनाओं में जोखिम को फैलाना एक अधिक स्थिर और लचीला उद्योग सुनिश्चित करता है।
हमें स्टार-नियंत्रित, तमाशा-ग्रस्त मॉडल से मुक्त होने की आवश्यकता है क्योंकि यह अंततः फ़िल्म उद्योग को एक डेड एंड वाले रास्ते पर ले जा रहा है।
हिंदी सिनेमा उद्योग को सम्मोहक कथाओं, वास्तविक प्रदर्शनों और रचनात्मक सरलता की शक्ति को फिर से खोजने की आवश्यकता है।
हिंदी फिल्म उद्योग को पुनर्जीवित करने के लिए कम बजट के सिनेमा को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है|
यह केवल एडवांस्ड तकनीक और अत्याधुनिक उपकरणों की शरण में जाने से नहीं होगा बल्कि फ़िल्म उद्योग को कहानी और इसे बताए जाने के तरीके के बारे में गंभीर योजनायें बनाकर उन्हें क्रियान्वित करना होगा|
यह सिनेमाई क्रांति का समय है।
कहानी दिखाने की कला पर वापस लौटना ही समझदारी की बात होगी|
एक बार में एक ही फिल्म बनाने की ओर लौटना होगा ताकि फ़िल्म को सम्पूर्ण ध्यान मिल सके|
सिस्टम को रीबूट करने और नए सिरे से शुरुआत करने का समय आ चुका है।
महज शो पीस नहीं बल्कि असली फिल्में बनाना शुरू करने का समय आ चुका है।
हिंदी फ़िल्म उद्योग को यह सच दुहराने की आवश्यकता है कि
” फ़िल्म निर्माण एक व्यवसाय जरुर है, लेकिन इससे भी पहले सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि यह सिनेमा है… एक महान कला!”
~ © HK Verma
नोट : यह लेख श्री एच के वर्मा के अंगरेजी में लिखे लेख का हिंदी अनुवाद है|
HK Verma, an alumnus of FTII, is a renowned cinematographer who earlier in his career collaborated with celebrated cinematographer KK Mahajan on many great films by Mani Kaul, Mrinal Sen, Basu Chatterjee, and Kumar Shahani.
He has been a visiting faculty of the Narsee Monjee Institute of Management Studies (Cinema), and FTII (History of Cinema).
He also authored the book – THE DREAM FACTORY : 100 YEARS OF HINDI CINEMA
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