फिल्म ज़मीन आसमान (1984) में संजय दत्त और अनीता राज पर फिल्माया गीत “ऐसा समां न होता, कुछ भी यहाँ न होता, मेरे हमराही जो तुम न होते” से है, अस्सी के दशक में पंचम द्वारा संगीतबद्ध उन बेहतरीन गीतों में सम्मिलित है, जिन्हें उनकी संगीतमयी खूबसूरती के बावजूद फ़िल्म में उतना ही अच्छा फिल्मांकन प्राप्त नहीं हो पाया| अंजान के लिखे रोमांटिक गीत को लता मंगेशकर की कलात्मक गायिकी ने एक अमर गीत बना दिया है|
आर. डी. बर्मन ने वाद्य संगीत प्रबंधन और लता मंगेशकर की गायिकी, दोनों तत्वों को दो समान्तर ट्रैक्स पर दौड़ाया है और उनकी सम्मिलित ध्वनि श्रोता के लिए सम्मोहक वातावरण रचती है|
गीत में नायिका अपने प्रेमी के समक्ष खुल कर अपने भाव प्रदर्शित कर रही है कि प्रेमी के होने से ही उसके जीवन में बहार आई है अन्यथा यह एक सूने अंदाज़ में व्यतीत होता जा रहा था| प्रेमी की अनुपस्थिति जीवन को नीरस और अर्थहीन बना रही थी| उसके उदगार उसके वर्तमान जीवन में प्रेम और प्रेमी की महत्ता को गहराई से व्यक्त करते हैं।
अंजान के लिखे रोमांटिक गीतों के बोल सहज होते हैं लेकिन तब भी गीत श्रोता के दिल को छू जाते हैं। इस गीत में भी भावनात्मक गहराई का प्रदर्शन सरल भाषा में किया गया है|
पंचम के संगीत संयोजन में शास्त्रीय संगीत में आधुनिक लोकप्रिय संगीत का सम्मिश्रण प्रस्तुत किया है| वाद्य संयोजन में पश्चिमी के साथ भारतीय पारंपरिक वाद्यों का भी समावेश किया गया है|
संगीत पर राग पहाड़ी और राग भैरवी की छाया देखी जा सकती है। राग पहाड़ी की मधुरता और कोमल स्वर (गंधार और निषाद) की उपस्थिति गीत की रोमांटिक धुन का आकर्षण बढाती हैं|
पंचम ने कहरवा पर आधारित ताल पर गीत को ढाल कर इसे लयबद्धता प्रदान की है।
बांसुरी के स्वरों से आरंभ हुए गीत में माहौल पर्वतीय क्षेत्र में विचरण का बन जाता है और इसमें खोये श्रोता के मन को झंकृत करने सितार, गिटार और वायलिन के संयुक्त स्वर आ जाते हैं और इन तारों वाले वाद्य यंत्रों के एकक्षत्र राज को तोड़ने, ड्रम और तबले के साथ कोरस गायिकी के सुर संगीत के अखाड़े में कूद पड़ते हैं|
और तब गीत में प्रवेश होता है सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर का|
लता मंगेशकर की गायिकी गीत को आवश्यक संवेदनशीलता और गायन की तकनीकी कुशलता प्रदान करके इसे बेहद उच्च स्तर पर ले जाती है| इस रोमांटिक गीत में उनकी गायन शैली शास्त्रीय गायन पद्धति का पुट समाहित करती है और उनकी प्रसिद्ध हरकतों के दर्शन करवाती है| लता जी की गायकी में स्वरों की शुद्धता असाधारण है।
लता मंगेशकर “ऐसा समां न होता” जैसे साधारण बोलों को स्वरों की सूक्ष्म और तेज हरकतों से भरी मुरकियों से विशिष्ट बना देती हैं|
ऐसा समां न होता
कुछ भी यहाँ न होता
मेरे हमराही जो तुम न होते
ऐसा समां न होता
उपरोक्त मुखड़े में शब्द दुहराए गए हैं लेकिन वे दूसरी बार गाये गए उसी शब्द को पहले जैसे अंदाज़ में न गाकर उसे नए रूप में ढालकर गाती हैं|
गीत में और शास्त्रीय पुट लाते हुए वे कुछ स्थानों पर अपने स्वरों में कंपन लाकर गमक का प्रभाव उत्पन्न करती हैं और फ़िल्म के भावनात्मक पक्ष को उभारती हैं|
लता मंगेशकर के गायन में मींड का उपयोग सदैव ही श्रोता के लिए उनके गायन का एक शक्तिशाली आकर्षण रहा है और यहाँ इस गीत में भी उन्होंने मींड का प्रभावी उपयोग किया है। गीत की मेलोडी और बोलों के भाव के अनुरूप यहाँ संक्षिप्त और मधुर मींड आकर्षक लगती हैं|
गीत के बीच किसी अंतरे के अंतिम शब्द में मींड के उपयोग के तुरंत बाद बिना अल्प अवधि लिए निरंतरता में उनके द्वारा लिए गए आलाप श्रोता के लिए इस गीत को अद्भुत बना देते हैं|
पूरे गीत में एक भी शब्द में ताल से कोई विचलन नहीं होता| तीव्र गति से गाये गए इस गीत लंबी पंक्तियों को बिना सांस टूटे गाना उनकी तकनीकी श्रेष्ठता का प्रमाण है और यह स्मरण में रखने की बात है इस गीत को गाते वक्त उनकी आयु तकरीबन 55 साल की थी|
उनकी आवाज़ की मिठास और कोमलता इस गीत में प्रमुखता से सुनाई देती है और एक श्रोता को तकनीक और रस भाव दोनों रूप में तृप्त कर जाती है|
गीत का फिल्मांकन गीत के संगीत एवं गायन पक्षों की समृद्धता को देखते हुए साधारण ही कहा जाएगा|
…[राकेश]
Discover more from Cine Manthan
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
Leave a comment