चंद्रशेखर एकमात्र प्रधानमंत्री रहे हैं देश के, जिनके बारे में निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि चंद्रशेखर प्रधानमंत्री न बनते उस समय तो भारत को दिवालिया होने की शर्मिंदगी और फिर टूटने की शर्मनाक स्थितियों से गुज़ारना पड़ता| इंदिरा गांधी के समय से ही देश की वित्तीय हालत ख़राब थी और अस्सी के दशक में राजीव गांधी और वीपी सिंह के कार्यकालों में यह हालत बदतर ही हुयी| जब स्थिति चंद्रशेखर के सामने बयान की गयी तो उनका पहला वाक्य यही था- क्या यह खराब स्थिति मेरे ही सामने लाने के लिए बनी है या पहले के प्रधानमंत्री गण को भी इससे अवगत कराया गया था? उन्हें बताया गया कि विदेशी मुद्रा की कमी से उत्पन्न खराब स्थिति का मुद्दा राजीव गांधी और वी पी सिंह दोनों के सामने रखा गया लेकिन उन्होंने समस्या को अनदेखा किया|
देश के आठवें (कार्यवाहक गुलजारीलाल नंदा को छोड़) प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के समय अमिताभ बच्चन अभिनीत फ़िल्म – हम, बनी थी| उसके प्रीमियर के लिए अमिताभ बच्चन, नए-नए प्रधानमंत्री बने श्री चंद्रशेखर को आमंत्रित करने पीएम आवास गए थे| अमिताभ बच्चन ने बाद में कहा कि जब वे एक बड़े कक्ष में पहुंचे तो फर्श पर बिछे पतले से गद्दे पर बिछाई गयी सफ़ेद चादर पर सफ़ेद धोती कुरता और कन्धों पर एक चादर डाले एक व्यक्ति फाइलों और कागजों में उलझा हुआ था| कक्ष के दरवाजे से मुझे लगा मानो देश का एक साधारण किसान अपने कमरे में बैठा काम कर रहा है| उनकी सादगी देख मैं आश्चर्यचकित था|
इससे पहले, चंद्रशेखर जब प्रधानमंत्री बने तो देश उस वक्त मण्डल कमीशन लागू होने के कारण, राम मंदिर–बाबरी मस्जिद प्रकरण और रथ यात्रा जैसे मुद्दों के कारण आंदोलित था और हर ओर अशांति का माहौल था| 1990 के नवम्बर माह में भाजपा द्वारा जन मोर्चे की वी पी सिंह सरकार से समर्थन वापिस लिए जाने से सरकार गिर जाने के कारण कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चंद्रशेखर की समाजवादी जनता दल की सरकार अस्तित्व में आयी थी|
हिंदी के लेखक रविन्द्र कालिया (दिवंगत) की ग़ालिब छुटी शराब में एक जगह अमेठी के राजपरिवार के सदस्य संजय सिंह और एक ज्योतिषी का जिक्र है| उस ज्योतिषी ने रविन्द्र कालिया और संजय सिंह को 70 के दशक के अंत में ही यह बता दिया था कि कुछ साल बाद अमुक तारीख को चंद्रशेखर भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे| ऐसा ही हुआ भी| बाद में अपने एक टीवी साक्षात्कार में बड़बोले उद्योगपति और सक्रिय राजनीति में प्रवेश कर पाने में नितांत असफल रहे जयंत मल्होत्रा ने दावा किया कि चंद्रशेखर को उन्होंने प्रधानमंत्री बनवाया था|
उन्हीं दिनों का एक रोचक प्रकरण बताया जाता है| अल्पमत में आ जाने से इस्तीफ़ा देने से पहले वी पी सिंह ने देश को प्रधानमंत्री के रूप में दूरदर्शन के माध्यम से अंतिम बार संबोधित करने का निर्णय लिया और बाद में ऐसा कहा गया कि लगभग 30 मिनट के उस भावुक संबोधन की रिकार्डिंग लगभग पूरे दिन चली| यह वीपी सिंह विरोधियों द्वारा उडाई गयी अफवाह भी हो सकती है और सत्य घटना भी|
विभिन्न समस्यायों से घिरे देश के नए प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर ने भी उचित समझा कि देश को संबोधित करके देशवासियों को स्थिरता की आशा प्रदान की जाए| रात आठ बजे के आसपास संबोधन का समय निश्चित हुआ| एक दिन पहले दूरदर्शन पर घोषणा कर दी गयी| अगले दिन सुबह ही दूरदर्शन के लोग रिकार्डिंग के लिए पीएम आवास (या दफ्तर) पहुँच गए| सूचना पाने पर चंद्रशेखर ने दूरदर्शन की टीम से पूछा कि वह वहां क्या कर रही है? टीम ने कहा कि उनका देश के नाम संबोधन है उसकी रिकोर्डिंग के लिए वे लोग आये हैं| चंद्रशेखर ने कहा कि वह तो शाम को है, अभी से क्यों आ गए?
टीम ने कहा कि उन्हें लगा पहले की तरह पहले रिकार्डिंग होगी फिर संपादित स्वरूप जनता के सामने जाएगा| चंद्रशेखर ने उन्हें डपटते हुए वापिस भेजा कि वे कोई अभिनेता नहीं हैं, वे जनता को सीधे रात में ही संबोधित करेंगे|
जनता दल के रूप में कांग्रेस के विरुद्ध 1989 के चुनावों में 144 सीटें जीतने वाले जनता दल ने चुनाव तो वी पी सिंह द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई छेड़ने के नाम लड़ा था, लेकिन दल ने चुनाव पूर्व यह नहीं घोषित किया था कि वी पी सिंह ही प्रधानमंत्री बनेंगे| चुनाव बाद जब राजीव गांधी की कांग्रेस ने विपक्ष में बैठने की बात राष्ट्रपति से कही, तब जनता दल के बड़े नेताओं की सम्मिलित बैठक में चंद्रशेखर ने वीपी सिंह से सबके सामने कहा था कि अगर वीपी सिंह नेता पद के लिए खड़े होंगे तो वे भी चुनाव लड़ेंगे|
चंद्रशेखर की इस बात से जनता दल में दो गुट बन गए और अफरा तफरी मच गयी| वीपी सिंह के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में क़ानून के रास्ते समर्थन देने वाले राजीव विरोधी राम जेठमलानी चंद्रशेखर के दावा करने से बौखला गए और चंद्रशेखर के आवास के बाहर धरने पर बैठ गए| टीवी पर पूरे देश ने देखा कि सुप्रीम कोर्ट के जिस वकील की ओर देखने में भी लोग घबराते थे, उनके कपड़े फाड़ दिए गए और उनके साथ धक्कामुक्की की गयी| बाद में चंद्रशेखर ने बाहर आकर ऐसी घटना के प्रति खेद व्यक्त किया और अपने को इस घटना से परे कर लिया|
देवी लाल, बीजू पटनायक, और अरुण नेहरु ने चंद्रशेखर को अँधेरे में रखकर ऐसी बिसात बिछाई कि उनसे देवीलाल के प्रधानमंत्री बनने के नाम स्वीकृति ली और जब बैठक में देवीलाल का नाम प्रस्तावित हुआ तो देवीलाल ने खड़े होकर खुद वीपी सिंह का नाम प्रस्तावित कर दिया| चंद्रशेखर नाराज़ होकर उस बैठक से चले गए यह कहते हुए कि उनके साथ धोखा किया गया है और ऐसी निम्न स्तर की राजनीति की आवश्यकता नहीं थी| यूं यह सत्य है कि चुनाव में जनता की ओर से ज्यादातर वोट वी पी सिंह की भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम के समर्थन करने के लिए ही दिया गया था और चंद्रशेखर ने दावा सिर्फ एक तकनीकी बात पर किया था कि चुनाव से पहले वीपी सिंह को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके वोट नहीं मांगे गए थे जनता से| उस वक्त चंद्रशेखर को पद के लालच में वीपी सिंह का विरोध करने वाला नेता समझा गया था| लेकिन चंद्रशेखर के पूरे राजनीतिक जीवन को देखा जाए और विशेषकर उनके द्वारा जताए गए विरोधों को तो वे नीतिगत बात के समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं, और त्वरित और अल्पजीवी लाभ हेतु लिए निर्णयों के विरोध में| जैसे जब डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम को परमाणु विज्ञानी के तौर दी गयी सेवाओं के बदले भारत रत्न देने की घोषणा की गयी तो उन्होंने इस घोषणा का यह कहते हुए विरोध किया था कि नौकरशाही को भारत रत्न जैसा पुरस्कार देने से एक नई परिपाटी जन्म लेगी| उनकी गहरी मित्रता पी वी नरसिंह राव और अटल बिहारी वाजपेयी से थी लेकिन यह दोस्ती निजी जीवन में थी और अपने संसदीय जीवन में संसद के अन्दर वे इन दोनों की राजनीति का विरोध करते रहे| ऐसा भी हुआ होगा कि दिन में संसद में जम कर उनके विरुद्ध बोले और शाम को उन्हीं के साथ बैठे चाय पी रहे हैं| नीति उनके लिए महत्वपूर्ण थी|
त्वरित लाभ के लिए राजनीति करना उनके स्वभाव में ही नहीं था| अस्सी के दशक की शुरुआत में कांग्रेस के पुनः केंद्र में सत्ता में आने के बाद जनता पार्टी के अध्यक्ष पद को छोड़कर चंद्रशेखर अपने अकेले के ही बल पर पैदल ही भारत का भ्रमण करने निकल पड़े| जनता से सीधा संवाद करना, उनकी दैनिक परेशानियों और दीर्घकालीन समस्याओं को जानना, उनके लिए वंचित सुविधाओं के बारे में जानना और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देना उनके मुख्य उद्देश्य थे| मोहन दास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत आये तो गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें देश में कुछ करना शुरू करने से पहले भारत भ्रमण की सलाह दी थी जिससे वे देश को अच्छी तरह से जान लें| विनोबा भावे ने भी भूदान आन्दोलन में जनसंपर्क हेतु देशव्यापी पदयात्राएं कीं लेकिन कन्याकुमारी से दिल्ली तक की यात्रा पैदल करने वाले चंद्रशेखर पहले ही राजनेता थे| पास में धन नहीं, और पैरों में चमड़े की चप्पलें पहने वे लगभग 4000 किमी पैदल चले| जहां रात को रुक गए वहां के स्थानीय लोगों ने खाने पीने और ठहरने का इंतजाम कर दिया तो ठीक वर्ना अगले दिन की यात्रा के बारे में सोचते हुए जहाँ ठौर मिला वहां सो लिए| राहुल गांधी की भरपूर सुविधाओं से लैस पदयात्रा को देखा जाए तो चंद्रशेखर की साधनविहीन पदयात्रा का महत्त्व समझ में आ सकता है| बाद में चंद्रशेखर ने भारत यात्रा केंद्र स्थापित किये| इस पदयात्रा से जो उन्हें व्यक्तिगत लाभ मिला छवि में उभार का, वह विपक्ष की ही राजीनति करने के कारण बहुत चमक नहीं सका| अक्तूबर 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो जाने से उपजी सहानुभूति की लहर में चंद्रशेखर अपनी परंपरागत सीट बलिया से लोकसभा चुनाव हार गए| जगन्नाथ चौधरी को वे पहले हरा चुके थे इसलिए आश्वस्त थे और अपने संसदीय क्षेत्र को छोड़ अन्य साथी नेताओं के चुनाव क्षेत्रों में वे घूमते रहे| बिलकुल अंतिम दिनों में वे बलिया में लौटे भी तो जनसभाओं में राष्ट्रीय स्तर की राजनीती की बातें करते रहे जबकि जगन्नाथ चौधरी विधायकी के स्तर के वादे कर रहे थे| चंद्रशेखर अपने चुनाव के लिए भी सांसद की मर्यादा से नीचे कभी नहीं उतरे| उनके सामने स्पष्टता कि वे राष्ट्रीय स्तर की राजनीति करते हैं, उस नाते बलिया उन्हें संसद में भेजना चाहे तो अच्छा है| उनका रुतबा ऐसा रहा कि अधिकतर तो बहुत से दल उनके विरुद्ध अपना उम्मीदवार ही खड़ा नहीं करते थे और उनका संसद में पहुंचना एक सामूहिक दायित्व समझ सुनिश्चित करते थे|
सांसद न बन पाने के बावजूद उनके व्यक्तिगत रुतबे में कोई कमी नहीं आई| राजीव गांधी ने कांग्रेस के सौ साल पूरा होने के जश्न के अवसर पर पुराने कांग्रेसियों से कांग्रेस में लौट आने का आग्रह किया था| साल भर चले समारोह के समापन पर चंद्रशेखर को विशेष वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था| जहाँ उन्होंने धुआंधार भाषण दिया| वे इंदिरा गांधी की गरीबी हटाओ के नारे पर भी कुछ मिनट बोले|
वीपी सिंह सरकार के गिरने के पश्चात प्रधानमंत्री बनते ही अपने निर्णयों के बलबूते चंद्रशेखर जनता में लोकप्रियता हासिल करते जा रहे थे| उनके तवरित, सही व जनहित में निर्णय लेने की क्षमता की गाढ़ी तारीफ़ उस वक्त के राष्ट्रपति श्री आर वेंकटरमण ने अपनी पुस्तक – My Presidential Years में की है|
बाद के सालों में यह कहा जाता रहा है कि प्रधानमंत्री के रूप में चंद्रशेखर ने राम मंदिर– बाबरी मस्जिद प्रकरण में दोनों पक्षों के प्रभावशाली लोगों को एक साथ बैठकर मुद्दे को सोहार्दपूर्ण तरीके से सुलझाने में बहुत सफलता प्राप्त कर ली थी और दोनों पक्ष किसी ऐसे समाधान को स्वीकार कर लेते जो दोनों पक्षों को मान्य होता| अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी खाड़ी युद्ध के कारण हालात अच्छे नहीं थे| भारत का विदेशी मुद्रा भण्डार भी समाप्तप्राय था|
चारों ओर से हो रहे आक्रमणों से चंद्रशेखर अभिमन्यु की भांति लड़ रहे थे और तीन चार महीने जलते हुए देश में उन्होंने शांति की स्थापना करने में बड़ी सफलता प्राप्त की थी और वे सभी वर्गों का विश्वास हासिल करते जा रहे थे| तब अखबारों में सुगबुगाहट के साथ एक खबर को जगह मिली, जिसे खबर न कह कर अफ़वाह कहना ही उचित होगा कि प्रधानमंत्री चंद्रशेखर हरियाणा पुलिस के दो कांस्टेबलों से राजीव गांधी की जासूसी करवा रहे हैं| इस पनपाई गयी खबर के धरातल पर अन्य ख़बरों को जन्म लेने का अवसर मिला| यह भी कहा गया कि राजीव गांधी चंद्रशेखर को पसंद नहीं करते और अपने साथियों संग बातचीत में चंद्रशेखर के लिए “That Bearded Guy” जैसे शब्द कहते हैं| राजीव गांधी का चंद्रशेखर के राजनीतिक व्यक्तित्व से बिलकुल भी परिचय नहीं रहा होगा| जिस ज्योतिषी ने चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री बनाने की तिथि कई साल पहले ही घोषित कर दी थी उनको भी यह ज्ञात नहीं हो सकता था कि चंद्रशेखर व्यक्तिगत रूप से क्या निर्णय ले सकते हैं? राजीव गांधी की जासूसी करने के कांग्रेस द्वारा लगाए आरोपों से आहत चंद्रशेखर ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया| राजीव गांधी उनके निर्णय से भौचक्के रह गए| उन्हें ऐसे कदम की आशा नहीं थी| कहा जाता है उन्होंने चंद्रशेखर तक अपना सन्देश शरद पवार के हाथों भिजवाया कि वे अपना त्यागपत्र वापिस लेकर सरकार चलायें| चंद्रशेखर ने अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने से इनकार कर दिया और राष्ट्रपति के कहने पर चुनाव होने तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहे|
उन्होंने “चालीस साल बनाम चार महीने” का नारा गढ़ा और चुनाव में उतर गए|
राजीव गांधी को चंद्रशेखर की सियासी समझ उनके सियासी स्वभाव की तासीर को तभी समझ लेना चाहिए था जब पत्रकारों द्वारा उनसे इस बारे में सवाल पूछे गयेथे कि वे बोफोर्स की जांच के बारे में क्या कदम उठा रहे हैं| चंद्रशेखर ने जवाब दिया था कि भ्रष्टाचार की जांच करना पुलिस का काम है प्रधानमन्त्री के रूप में उनके सामने बहुत से महत्वपूर्ण कार्य हैं, जिन्हें शीघ्रातिशीघ्र निबटाना है|
संसद में एक सांसद के रूप में सचेतन चंद्रशेखर को राजनीतिक तर्क प्रस्तुत करते देखें, प्रधानमंत्री के रुप में उनके भाषणों को पढ़ें, विपक्ष के सांसद के रूप में विभिन्न सरकारों का विरोध संसद में करते देखें, यंग इण्डिया में उनके द्वारा लिखे लेखों को पढ़ें, उनके द्वारा लिखी किताबों को पढ़ें तो एक विराट व्यक्तित्व वाले राजनेता के दर्शन होते हैं| राजनीति में सक्रिय रहते उनके दोनों बेटे किसी पद पर आसीन नहीं हो पाए| चंद्रशेखर एक आदर्श सांसद रहे| लाल कृष्ण अडवाणी की राजनीति का भरपूर विरोध करते हुए भी किसी अन्य युवा सांसद द्वारा अडवाणी की शान में गुस्ताखी किये जाने से नाराज़ चंद्रशेखर का ही जिगरा था कि खड़े होकर तुरंत विरोध जताएं|
पी वी नरसिंह राव के घनिष्ठ मित्र होते हुए भी, और डॉ मनमोहन सिंह को पीएमओ से जोड़ने के बावजूद भी नरसिंह राव सरकार के समय उनका और उनके वित्त मत्री मनमोहन सिंह का नीतिगत विरोध उन्होंने किया था|
वे समाजवाद से जुड़े नेता था| आज़ादी मिलने के दो तीन साल बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम ए करने के पश्चात बीएचयू में पीएचडी करने गए युवा चंद्रशेखर आज़ाद भारत के लगभग पहले छात्र आन्दोलन की अगुआई कर चुके थे जब छात्रों का नेतृत्व करते हुए उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में फीस बढाने के विरुद्ध मोर्चा खोला था और अंततः फीस में हुयी वृद्धि वापिस हुयी| समाजवादी नेता आचार्य नरेंद्र देव के राजनीति में सम्मिलित हो जाने के आदेश रुपी आह्वान के कारण उन्होंने पीएचडी का विचार त्याग कर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया| और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से होते हुए कांग्रेस में पहुंचे जहां मोहन धारिया, और कृष्णकांत के साथ वे युवा तुर्क कहलाये| इंदिरा गांधी बनाम सिंडिकेट की लड़ाई में उन्होंने इंदिरा गांधी का साथ दिया और युवा नेतृत्व पर भरोसा जताया| इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाए जाने पर उसका सक्रिय विरोध किया और उन चंद कांग्रेसी नेताओं में रहे जिन्हें दो-ढाई साल कारागार में व्यतीत करने पड़े| कारागार पर उन्होंने अपनी प्रसिद्द किताब – मेरी जेल डायरी, लिखी|
90 के दशक में मुक्त बाज़ार आधारित पूंजीवाद से गले मिल रही राजनीति में चंद्रशेखर के लिए उन दिनों में बहुत कुछ नहीं था जब संसद न चल रही हो| गांधी जी के रचनात्मक कार्यों से प्रेरित हो चंद्रशेखर ने कई अन्य काम किये| Zee टीवी की नालायकी है कि उसका यूट्यूब चैनल वहां पुराने कार्यक्रम प्रसारित नहीं करता| चंद्रशेखर ने ज़ी टीवी पर टीवी एंकर की भूमिका भी उन्हीं दिनों निभाई और देश : दिशा और दिशांतर (संभवतः यही सही शीर्षक है कार्यक्रम का) नामक कार्यक्रम लेकर वे आते थे जिसमें नामचीन भारतीयों से वे बातचीत करते थे, जिसमें एक कड़ी में गोविन्दाचार्य से बातचीत बेहद प्रसिद्द रही| चंद्रशेखर अपनी बात विनम्रता लेकिन दृढ़ता से कह देते थे|
उनके विरोधों से ही उनके नीति की राजनीति का समर्थक होने के बारे में पता चलता है| पत्रकार तवलीन सिंह ने चंद्रशेखर के भोंडसी स्थित भारत यात्रा केंद्र आश्रम में जाकर उनका साक्षात्कार लिया तो कार्यक्रम के आरम्भ में उनका परिचय एकैसे समाजवादी नेता के रूप में दिया, जो राजाओं की तरह रहता है|
आउटलुक के संपादक विनोद मेहता ने चंद्रशेखर के विवाहेत्तर संबंधों के बारे में अपनी किताब में लिखा जो हर हाल में चंद्रशेखर की मृत्यु के बाद प्रकाशित हुयी होगी|
वीर संघवी ने भी चंद्रशेखर की मृत्यु पर उनकी अंगरेजी भाषा की जानकारी पर प्रश्न उठाया कि उन्हें Social Climber का अर्थ पता नहीं था| वीर संघवी ने लेख में चंद्रशेखर को मुक्त बाज़ार के दौर में एक चुका हुआ नेता बताया जो अभी तक अपनी समाजवादी विचारधारा से चिपका हुआ था| लेकिन यह सब ज्ञान भी वीर संघवी ने चंद्रशेखर के जीवित रहते अपने किसी लेख में न उडेला बल्कि पहले तो वे उनसे मिलने भोंडसी आश्रम जाते रहे|
चंद्रशेखर कभी कभी अपनी पार्टी से इकलौते सांसद भी रहे| मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और इनसे पहले की पीढी के राजनेताओं के लिए चंद्रशेखर ताउम्र अध्यक्ष जी ही रहे|
चंद्रशेखर के जीवन में बहुत कुछ है एक शानदार बायोपिक बनाने के लिए|
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