भारत में कंप्यूटर साइंस की नींव 1950 के दशक में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI), कोलकाता में रखी गई थी, जहाँ 1956 में पहला डिजिटल कंप्यूटर HEC-2M स्थापित किया गया। इसके बाद, TIFRAC (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च ऑटोमैटिक कैलकुलेटर) 1960 में TIFR, मुंबई में विकसित हुआ, जो भारत का पहला स्वदेशी डिजिटल कंप्यूटर माना गया।
कंप्यूटर साइंस की विधिवत शिक्षा प्रदान करने की शुरुआत आई आई टी कानपुर में हुयी| 1959 में IIT कानपुर को पहले नगर में 1921 से चल रहे हरकोर्ट बटलर टेक्नोलॉजिकल इंस्टिट्यूट (HBTI) [वर्तमान में HBTU, Harcourt Butler Technical University] के परिसर में स्थापित किया गया और 1963 में IIT का अपना परिसर, कल्याणपुर, कानपुर में बन गया|
आईआईटी कानपुर ने 1960 में IBM 1620 कंप्यूटर स्थापित किया, जो भारत में शैक्षणिक संस्थानों में कंप्यूटर साइंस की शुरुआत का एक महत्वपूर्ण कदम था। इसके बाद, 1965 में कंप्यूटर साइंस से संबंधित पाठ्यक्रम और अनुसंधान शुरू हुए।
आईआईटी कानपुर को अमेरिका के सहयोग से (MIT और अन्य अमेरिकी विश्वविद्यालयों के सहयोग से) स्थापित किया गया था, जिसके कारण यहाँ कंप्यूटर साइंस जैसे उभरते क्षेत्र में जल्दी प्रगति हुई।
आईआईटी कानपुर ने ही 1978 में बी.टेक कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग (CSE) प्रोग्राम औपचारिक रूप से शुरू किया। यह भारत में किसी भी आईआईटी में बी.टेक स्तर पर कंप्यूटर साइंस का पहला पूर्णकालिक स्नातक कार्यक्रम था।
इससे पहले 1970 के दशक के मध्य तक, आईआईटी कानपुर में कंप्यूटर साइंस से संबंधित पाठ्यक्रम इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के तहत पढ़ाए जाते थे। लेकिन बढ़ती मांग और तकनीकी प्रगति के कारण, 1978 में एक अलग कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग स्थापित किया गया, और बी.टेक प्रोग्राम शुरू हुआ।
उसी काल के आसपास आईआईटी बॉम्बे ने भी कंप्यूटर साइंस में बी.टेक शुरू किया| पहले आईआईटी बॉम्बे में कंप्यूटर साइंस से संबंधित कुछ पाठ्यक्रम इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के तहत पढ़ाए जाते थे।
आईआईटी दिल्ली ने भी 1983 में कंप्यूटर साइंस विभाग और बी.टेक प्रोग्राम शुरू किया।
इसी समय के आसपास बाकी दोनों पुराने संस्थानों – आईआईटी मद्रास और आईआई टी खड़गपुर ने भी कंप्यूटर साइंस विभाग और बी.टेक प्रोग्राम शुरू किए|
राजनेताओं से जुड़े दावों से इतर शैक्षणिक और शोध संस्थान किसी भी विषय में प्रगति के लिए अनवरत प्रयास करते ही रहते हैं| यह एक संयोग मात्र होता है कि किसी नेता के नाम के साथ किसी क्षेत्र विशेष की प्रगति का तमगा जुड़ जाता है|
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