असमय मात्र 43 साल की आयु में मृत्यु हो जाने से या उनके द्वारा रचे गए उच्च गुणवत्ता के गीतों की उपस्थिति से, कारण जो भी रहा हो, गीतकार शैलेन्द्र को हिंदी फिल्मों के संगीत के रसिक लोग फ़िल्म बरसात में लिखे उनके दो गीतों के बाद से ही सदैव स्मरण में रखते आये हैं| शैलेन्द्र एक ऐसा ऊँचा मानक बन चुके हैं कि न केवल संगीत रसिकों बल्कि फ़िल्मी दुनिया में सक्रियता से योगदान देने वाले रचनाकारों/कलाकारों के वचनों और लेखनी में भी वे बसते ही रहे हैं|

एक गीतकार के रूप में शैलेन्द्र नाम एक जीवित गीतकार का ही लगता है क्योंकि उनके रचे फ़िल्मी गीत संगीत रसिकों द्वारा अभी भी खूब सुने और सराहे जाते हैं| बहुत से अन्य गीतकारों के बरक्स शैलेन्द्र को कभी भी भूली बिसरी श्रेणी का गीतकार नहीं समझा गया|

एक गीतकार के रूप में उनकी खूबियाँ आज तक चर्चा में रहती हैं|

भले कोई रचनाकार इसी बात की ओर इशारा करे कि फ़िल्म आवारा के जगत प्रसिद्द गीत – आवारा हूँ, या गर्दिश में हूँ आसमान का तारा हूँ – पंक्ति में साहित्यिक संगति नहीं बैठती और पंक्ति में “या” का स्थान एकदम ही आपत्तिजनक है, लेकिन संगीत रसिकों के लिए यह गीत कभी प्रश्नचिह्न नहीं उगता| कभी राज कपूर द्वारा दिए फ़िल्मी गीत लिखने के प्रस्ताव को सिरे से ठुकरा देने वाले कविराज शैलेन्द्र ने एक बार फ़िल्मी गीतों की दुनिया में कदम रख दिए तो फिर फ़िल्मी गीतों में सुरों में संगति बिठाने की आवश्यकता की पूर्ती के लिए शैलेन्द्र ने ऐसे प्रयोग के लिए भरपूर लचीलापन बनाये रखा|

बहुत गीत शैलेन्द्र ने धुन बनाए जाने से पहले लिखे होंगे तो बहुत से गीत उन्होंने तैयार धुन पर भी लिखे| जिस देश में गंगा बहती है का प्रसिद्द गीत – ओ बसन्ती पवन पागल, न जा रे न जा, रोको कोई, जिस धुन से सजा उसे शंकर जयकिशन फ़िल्म आवारा में पार्श्व संगीत में पहले ही उपयोग में ला चुके थे| फ़िल्मी गीतों के निर्माण की दोनों विधियों में शैलेन्द्र पारंगत रहे|

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गीतकार शैलेन्द्र पर कोई किताब छपने की सूचना आये तो एक सामान्य पाठक या सामान्य हिंदी फिल्म संगीत रसिक की उत्सुकता किन तत्वों पर ठहरेगी?

क्या शैलेन्द्र की जीवनी जैसी सामग्री होगी किताब में?

क्या शैलेन्द्र के फ़िल्मी और गैर-फ़िल्मी रचनाकर्म की विस्तृत सूची किताब में दर्ज होगी?

क्या शैलेन्द्र के फ़िल्मी गीतों की पृष्ठभूमि पर कुछ जानकारी होगी किताब में, और गीतों के फिल्मांकन से जुड़े रोचक प्रसंग मिलेंगे पढने को?

क्या शैलेन्द्र के फ़िल्मी जीवन से जुड़े रोचक प्रसंग किताब में दिए गए होंगे?

क्या शैलेन्द्र के गीतों की विस्तारित व्याख्याएं पढने को मिलेंगीं, और उनके गीतों के अब तक अनजान अर्थ सामने आएंगे?

क्या शैलेन्द्र द्वारा निर्मित एकमात्र फ़िल्म – तीसरी कसम, से जुड़ी बातें होंगी किताब में? और यह भी जानकारी मिलेगी कि क्या वाकई तीसरी कसम बनाने के प्रयास ने ही उनकी जान समय पूर्व ले ली?

यह सर्वज्ञात है कि सन 1966 में शैलेन्द्र का देहावसन हो गया| उससे कुछ पूर्व ही उनके द्वारा निर्मित पहली फ़िल्म तीसरी कसम प्रदर्शित हुयी थी| तीसरी कसम के निर्माण और प्रदर्शन के पश्चात बॉक्स ऑफिस पर इसकी असफलता, इस कारण शैलेन्द्र पर चढ़े कर्ज, और इन दोनों कारणों से शैलेन्द्र की असमय मृत्यु हो जाना बताया जाना शैलेन्द्र के इर्दगिर्द एक रहस्य बुनता चला गया है| और शैलेन्द्र के प्रशंसक इस बाबत अस्तित्व में रही अफवाहों के कारण कभी राज कपूर से कभी वहीदा रहमान से और कभी अन्य अज्ञात फ़िल्म वितरकों और फ़िल्म वित्तपोषकों से नाराज़ रहते आये हैं कि कभी यह खबर उड़ा दी जाती है कि राज कपूर ने बहुत समय लगा दिया तीसरी कसम के पूरा होने देने में, और शैलेन्द्र की मृत्यु के बाद उन्होंने शैलेन्द्र के परिवार की ओर से मुंह मोड़ लिया| कभी वहीदा रहमान के बारे में कहा जाता रहा है कि उनकी फीस की मांग के कारण और फ़िल्म निर्माण से जुड़ी अन्य आवश्यकताओं के कारण शैलेन्द्र को ऊँची ब्याज दर पर कर्ज लेना पड़ा|

किताब की सूचना के साथ ही यह जानकारी भी मिलती है कि किताब को शैलेन्द्र की बेटी अमला शैलेन्द्र मजुमदार ने लिखा है तो उत्सुकता बढ़ने के साथ एक अपेक्षा में उत्साह क्षीण हो जाता है यह सोचकर कि पिता के जीवित रहते अमला शैलेन्द्र की आयु ही क्या रही होगी? कुछ प्रत्यक्ष यादों को छोड़, जो विशुद्ध दृश्यात्मक यादें होंगी और किन्हीं घटनाओं की समझी हुयी व्याख्या से वंचित होंगी, ज्यादातर तो अमला शैलेन्द्र वही सब साझा कर पाएंगीं जो उन्होंने अपनी माँ (श्रीमती शैलेन्द्र) और बड़े भाइयों और अन्य नजदीकी रिश्तेदारों से सुना होगा|

अगर शैलेन्द्र के सबसे बड़े बेटे – शैली शैलेन्द्र (हेमंत शैलेन्द्र), अपने जीवन में पिता के ऊपर कोई किताब लिखते तो उन्होंने अपनी आँखों देखी और अपनी समझ से समझी गयी बातों को लिखा होता| उन्होंने मेरा नाम जोकर में पिता के द्वारा अधूरे छोड़े गीत को भी पूरा किया और अन्य फिल्मों में भी बतौर गीतकार काम किया, सो फ़िल्मी दुनिया को देखने का उनका प्रत्यक्ष अनुभव था| उन्होंने देखा कि फ़िल्मी दुनिया से किन लोगों ने उनके पिता के रहते हुए और उनके जाने के बाद उनके परिवार की सहायता की, उनसे दोस्ताना संबंध बनाए रखे, किन्होंने शैलेन्द्र के जाने के बाद परिवार से कन्नी काटनी शुरू कर दी? शैलेन्द्र की धर्मपत्नी से भी ज्यादा मुनासिब रचनाकार शैली शैलेन्द्र ही थे गीतकार शैलेन्द्र के ऊपर परिवार की ओर से एक विश्वसनीय किताब लिखने के लिए| लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया|

लगभग 10-12 साल पहले शैलेन्द्र के एक और पुत्र, दिनेश शैलेन्द्र ने फेसबुक पर एक दिन एक पोस्ट लिख दी थी कि उन्होंने अपने पिता की टेबल पर बिमल रॉय की फ़िल्म- बंदिनी के प्रसिद्द गीत – मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे , शैलेन्द्र की हस्तलिपि में लिखा हुआ देखा था| इस गीत पर गाहे-बगाहे यह चर्चा होती रही है कि भले ही गुलज़ार का नाम इस गीत के रचियता के रूप में दिया गया हो, इसे शैलेन्द्र ने लिखा था| दिनेश शैलेन्द्र ने इस बाबत कोई सुबूत प्रस्तुत नहीं किया जहाँ वे शैलेन्द्र का हस्तलिखित परचा सबसे साझा कर सकते थे, उन्होंने बस एक बात छेड़ दी| इस बारे में विगत में गुलज़ार साब से अवश्य ही किसी ने पूछा भी होगा ही, पर उनका ऐसा कोई बयान कभी सामने आया नहीं जहाँ वे यह कहते हों कि हाँ शैलेन्द्र ने ही इस गीत को लिखा था, या कम से कम मुखड़ा लिखा था और उन्होंने उसी तर्ज पर अंतरों को लिखा| दिनेश शैलेन्द्र की फेसबुक पोस्ट पर भी अच्छी खासी बहस छिड़ी| लेकिन यह तय नहीं हुआ कि हाँ यह गीत शैलेन्द्र ने लिखा था|

इस गीत के सन्दर्भ में सबसे तार्किक बात और तथ्य तो यही है कि शैलेन्द्र और गुलज़ार दोनों समर्थ गीतकार हैं, दोनों ने अपनी साख स्वयं अपनी रचनाओं के बलबूते कमाई है| दोनों की ही रचनावली से इस गीत के गायब हो जाने से उन दोनों की साख पर रत्ती भर भी अंतर नहीं पड़ने वाला| बंदिनी के समय शैलेन्द्र हिन्दी फ़िल्मी संगीत के गीतकारों में सबसे बड़े नामों में से एक थे तो गुलज़ार अपनी शुरुआत बस कर ही रहे थे| बंदिनी के गीत से जुड़ा विवाद कैसे और क्यों पनपा?

यह उत्सुकता भी अमला शैलेन्द्र मजुमदार द्वारा लिखी पुस्तक पढना आरम्भ करने से पूर्व थी कि क्या उनकी किताब इस गीत से संबंधित मसले को सुलझाएगी?

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शैलेन्द्र की बेटी अमला मजूमदार शैलेन्द्र द्वारा लिखी गई किताब में शैलेन्द्र के निजी जीवन के बारे में काफी सामग्री मिलती है| जैसा कि पुस्तक का शीर्षक है एक पुत्री की यादों से एक बेहद प्रसिद्द पिता के संक्षिप्त लेकिन विराट जीवन की झलकियाँ इस किताब में देखने को मिलती हैं|

वे बंदिनी के गीत से सम्बंधित मसले को नहीं छूतीं लेकिन तीसरी कसम से जुड़े रहस्यों को लगभग हटा देती हैं और इस मामले से जुडी सारी अफवाहों को झूठा साबित कर देती हैं| बचपन से जुड़े कई रोचक प्रसंग किताब में पढने को मिलते हैं|

हिन्दी में गीत और कवितायें लिखने वाले कविराज शैलेन्द्र के ऊपर किताब उनकी बेटी पहले हिन्दी में लिखतीं और बाद में किसी भी भाषा में किताब अनुदित होती रहती तो बेहतर रहता| यह सामग्री भी ऐसी है कि हिन्दी में इसमें ज्यादा सरल प्रवाह देखने को मिलता|

खटाक प्रकाशन की यह पहली या दूसरी किताब है, आशा है भविष्य में प्रकाशन सिनेमा संबंधित और किताबें प्रकाशित करता रहेगा|

…[राकेश]


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