धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है

जैसी वैधानिक चेतावनी उपभोक्ता के दिमाग में प्रविष्ट कराई जाए ऐसी प्रथा पहले नहीं होती थी|

बीड़ी, तंबाकू को तेंदू पत्ते में लपेटकर बनाई जाती है, और यह भारत में एक लोकप्रिय तंबाकू उत्पाद रहा है। लेकिन सामाजिक रूप से इसे सदैव निम्न वर्ग से जोड़कर देखा गया| सिगरेट के मुकाबले बेहद सस्ती होने के कारण कम आय वर्ग में यह प्रचलन में रही| पीते तो अमीर वर्ग के लोग भी रहे विशेषकर व्यापार के काम से जुड़े लोग लेकिन न उन्होंने इसे अपने से जोड़ने दिया न अन्य लोगों ने उनसे जोड़ा|

गाँव देहात में और मजदूर वर्ग में बहुत जगह स्त्रियाँ भी बीड़ी से बाकी लोगों को पैसिव धूम्रपान का आनंद देती देखी जाती रही हैं, आज भी देखी जा सकती हैं|

बीड़ी भले निम्न आय वर्ग के उपयोग की वस्तु मानी जाती रही हो इसे बनाने और बेचने वाले लोग बेहद अमीर रहे हैं|

मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ , उड़ीसा और झारखंड आदि राज्यों में इस व्यापार से जुड़े धन्ना सेठों पर थोड़ी सी भी शोधपरक जानकारी बड़ी-बड़ी कुंडलियाँ खोल देगी|

मुक्तिबोध जैसे बहुत बड़े साहित्यकार ने बीड़ी सुलगाते हुए तसवीर खिंचाई जो उनकी किताबों के मुख्य पृष्ठ की शोभा बढ़ाती रही है, अन्य बहुत से प्रसिद्द्ध व्यक्तियों ने बीड़ी पीने की आदत के बावजूद इसे पीते हुए तसवीरें न खिंचाईं|

कुछ फ़िल्मी सितारों को भी बीड़ी ने भरपूर सहयोग दिया| सार्वजानिक रूप से वे ट्रिपल फाइव और डनहिल पीते रहे लेकिन अपनी निजी मंडली में उन्हें बीड़ी के सेवन से कतई कोई परहेज न रहा| ऐसे एक बहुत बड़े सितारे के बीड़ी सेवन काल में उनके “सी इन सी” ने उनसे मजाक संबंधी गुजारिश करने की हिमाकत कर दी ” —- यदि आप बीड़ी के साथ फोटो खिंचा लो तो बीड़ी कम्पनी लाखों रूपये आपके क़दमों पर डाल दें”| केवल विदेशी ब्रांड की विशेष शराब पीने के अभ्यस्त सितारे ने खुमारी में भी इतना होश रखा कि अपने उस खासमखास चाटुकार को अपनी महफ़िल से फ़ौरन से पेश्तर रवानगी दे दी|

बीड़ी बनाने वाली कम्पनियों की चालाकियां उच्चतम स्तर की रही हैं| बेचारे फ़िल्मी सितारों को इल्म भी नहीं होता था कि उनके फोटो के साथ फलां बीड़ी बिक रही है|

ज़रा सोचिये दुनिया में कौन विज्ञापन बनाने वाला दिमाग हेमा मालिनी जैसी अभिनेत्री, जो अपनी छवि के प्रति बेहद संवेदनशील और जागरूक रही हैं, की फोटो के साथ बीड़ी के साथ जोड़ कर देख सकता है लेकिन दक्षिण भारत के बीड़ी के एक ब्रांड – बीड़ी न. १६१ राम प्रताप छाप बीड़ी, ने ऐसा करिश्मा कर दिखाया|

कटार बीड़ी ने भी कदमताल करते हुए हेमा मालिनी के पति धर्मेन्द्र को मैदान में उतार दिया|

पर सबको पीछे छोड़ा दक्षिण भारत के एक अन्य बीड़ी निर्माता ने जिसने फुटबाल जगत के सबसे बड़े सितारे मैसी की तसवीर के साथ बीड़ी बेचनी शुरू कर दी|

सिगरेट चूंकि शुरू से ही मध्यम और उच्च आय वर्ग से संबंधित उत्पाद माना गया इसलिए बड़े- बड़े सितारों ने सिगरेट के विज्ञापन, प्रिंट और विडिओ माध्यमों में किये और इसे स्टाइलिश इंसानों के उपयोग की वस्तु बनाने की मुहीम में अपना भरपूर सहयोग दिया| “लाल और श्वेत” ब्रांड पीने वालों की बात ही कुछ और मानी गई|

फिल्मों में भी नायक, नायिका और उच्च आय वर्ग के चरित्र सिगरेट, चुरुट, सिगार आदि पीते रहे और नौजवानों को लुभाते रहे कि इनका सेवन करने वाले कूल होते हैं|

फिल्मों में भी निम्न और बिना आय वर्ग के गरीब चरित्र, बुरे चरित्र, संदिग्ध चरित्र वाले स्त्री चरित्र, देह व्यापार से जुड़े स्त्री चरित्र बीड़ी का दमन थामे रहे|

फिल्मों में लेखक के लिए ऐसा सोचना भी पाप है कि वह दिखा दे जहाँ संभ्रांत नायिका कहे नायक से – ठहर तो, बीड़ी के दम मार लूं , फिर चलते हैं| वैधानिक चेतावनी के साथ सिगरेट सुलगाने के दृश्य चलते हैं|

2003 में Cigarettes and Other Tobacco Products Act (COTPA) लागू किया गया और इसके अंतर्गत तंबाकू उत्पादों, जैसे बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू युक्त्त पान मसाला आदि के प्रत्यक्ष विज्ञापन पर प्रतिबंध लगा दिया गया और सितारों की आय के एक स्रोत का रास्ता बंद किया गया|

तंबाकू बनाने वाले और उसे प्रचारित करने वाले सितारे सरकारों से भी एक कदम आगे का सोचते हैं, उन्होंने उसी ब्रांड नेम से अन्य उत्पाद बाज़ार में उतार दिए| अब सरकार को भी पता होता है और जनता को भी पता होता है कि ये सितारे असल में किस वस्तु का विज्ञापन कर रहे हैं लेकिन सब देख कर भी अनजान बने रहते हैं और बीड़ी, सिगरेट परिवार का कारोबार चलता रहता है|

…[राकेश]


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