पंडित नेहरु ने अपनी जीवनी में Robert Frost की कविता के अंतिम पद्यांश को उद्घृत किया तो यह कविता भारत में ख्याति पा गयी|

डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता के उपरोक्त्त पद्यांश का हिन्दी में खूबसूरत अनुवाद किया जिसे उन्होंने अपनी आत्मकथा के एक खंड – बसेरे से दूर में भी स्थान दिया|

गहन-सघन मनमोहक वन-तरु,

मुझको आज बुलाते हैं

किन्तु किए जो वादे मैंने,

याद मुझे आ जाते हैं

अभी कहाँ आराम बदा,

यह मूक निमन्त्रण छलना है

अरे, अभी तो मीलों मुझको,

मीलों मुझको चलना है (हरिवंश राय बच्चन)

लेकिन यह पूरी कविता के साथ संभवतः सटीक नहीं बैठेगा| डॉ. बच्चन ने यह अनुवाद इस ढंग से किया है जिससे वह श्रम और कुछ ठोस करने के निश्चय से भरे हुए व्यक्ति पर सटीक बैठे, चूंकि वे पंडित नेहरु के सन्दर्भ में इस कविता का उल्लेख कर रहे थे सो यहाँ उनका उद्देश्य पंडित नेहरु की छवि को बढ़ाना भी था|| उन पर पंडित नेहरु द्वारा इस अंतरे पर विशेष ध्यान देने के तथ्य का भी प्रभाव रहा हो सकता है| लेकिन अगर वे रॉबर्ट फ्रॉस्ट की पूरी कविता का हिंदी में अनुवाद करते तो अंतिम अंतरे का एकदम यही अनुवाद शायद वे न करते. भले ही भाव लगभग ऐसे ही रहते|

डॉ बच्चन का अनुवाद Frost की कविता का उतना नहीं, जितना पंडित नेहरू की विरासत का हिस्सा बन गया है| फ्रॉस्ट की कविता का मूल स्वर शांति, मोहक जंगल के आकर्षण और कर्तव्य के बीच द्वंद्व से भरा हुआ है जबकि बच्चन साहब ने इसे पंडित नेहरु के व्यक्तित्व तक सीमित कर दिया| बच्चन फ्रॉस्ट की मूल कविता का नहीं बल्कि पंडित नेहरु की पसंदीदा पंक्तियों का अनुवाद कर रहे थे उनके संकल्प और उनके व्यक्तित्व के घेरे में रहकर|

आखिर तथ्य तो यही रहेगा कि रॉबर्ट फ्रॉस्ट ने यह कविता पंडित नेहरु के लिए विशेष रूप से तो नहीं लिखी थी| वे बाद में इसके प्रशंसक बन गए वह अलग बात है लेकिन इस कविता के अस्तित्व का पंडित नेहरु के व्यक्तित्व और कर्तव्यों से कोई संबंध नहीं था| कविता की अंतिम चार पंक्तियाँ पंडित नेहरु के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गयीं और उनका व्यक्तित्व इन पक्तियों से मेल खाने लगा|


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