वह जो बंगला है ना
सामने
मेडिकल कॉलेज के एक
डॉक्टर का है
वहाँ जो भीड़ है
वह पागलों की है
बीमारों की है
मरीजों के साथ साथ उनके परिजन भी
बीमार हो गये हैं।
पागलों का इलाज करते करते
डॉक्टर भी हो गया है पागल पैसे के पीछे।
(~ कृष्ण बिहारी)

ग्राम चिकित्सालय का दूसरा सीजन शुरू में थोड़ा लड़खड़ाता है लेकिन जल्दी ही संभल कर अपनी लय पकड़ लेता है| सुप्रसिद्ध हिन्दी लेखक कृष्ण बिहारी की एक कविता है – मास्टर, डॉक्टर और पुलिसभ्रष्टाचार के तीन स्रोत, जिसमें वे तीनों वर्गों में व्याप्त हो चुके भ्रष्टाचार का उल्लेख करते हैं| शिक्षा और स्वास्थ्य दो आधारभूत क्षेत्र हैं जिन पर किसी भी समाज या देश में मनुष्य के जीवन की गुणवत्ता निभर करती है| अगर इन दोनों क्षेत्रों में व्यापक भ्रष्टाचार के कारण लोगों का इन क्षेत्रों से ही मोह भंग हो जाए तो उनमें घनघोर निराश का वास हो जाए|

भारत में उदारीकरण के बाद स्वास्थ्य सेवायें निरंतर महंगी होती चली गयी हैं और इस क्षेत्र में बीमा का समावेश बड़े स्तर पर होने के बाद तो बहुत ही मंहगी हो चुकी हैं| जब सरकारी अस्पतालों की संख्या निजी अस्पतालों से ज्यादा होती थी तब भी सरकारी अस्पतालों में इस तरह की भीड़ नहीं होती थी जैसी अब होने लगी है जबकि महंगे निजी अस्पतालों में भी भीड़ की कमी नहीं है| स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में इतनी अनियमितता भारत में आ चुकी है और डॉक्टर्स और अस्पतालों के लालच को लेकर विविध घटनाएं सामने आ चुकी हैं कि आम जन का बहुत भरोसा डॉक्टर्स और अस्पतालों पर बचा नहीं है|

एक समय था ट्यूशन की समस्या के कारण और निजी स्कूलों के लालच के कारण शिक्षा क्षेत्र से भी आमजन बहुत बुरी तरह निराश हो गए थे लेकिन इन्टरनेट पर शिक्षा को लेकर हुयी क्रान्ति ने जनता को उस क्षेत्र में बहुत राहत दी है और अब वे इसी बात से संतुष्ट हैं कि आम जन अच्छे और बुरे शिक्षक में भेद कर सकते हैं और अच्छे शिक्षक तक पहुँच सकते हैं और उनके बच्चे केवल स्कूलों और उनके शिक्षकों पर ही निर्भर नहीं हैं|

पुलिस, क़ानून व्यवस्था और न्याय के मामले में अभी ऐसा नहीं हो सकता और जनता उन पर पूरे तरह निर्भर है लेकिन स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में वर्तमान का इंटरनेट और ए.आई का युग अवश्य ही आम जन को कुछ रहत दे सकता है| कम से कम लोग डॉक्टर्स और अस्पतालों की ज्यादतियों के किस्से अन्यों से साझा कर अपना दुःख और अपनी कुंठा का असर कम कर लेते हैं|

ग्राम चिकित्सालय श्रंखला चिकित्सा के क्षेत्र और डॉक्टर्स दोनों की न केवल साख लौटा रही है बल्कि डॉक्टर्स को उनका कर्तव्य भी याद दिला रही है और उन्हें व्यापार और चिकित्सा सेवा में अंतर भी समझा रही है और स्पष्ट कर रही है कि पैसा नहीं जनसेवा ही इस व्यवसाय का प्रथम उद्देश्य रहा है|

डॉक्टर्स को लोग ईश्वर के प्रतिनिधि जैसा सम्मान दिया करते थे, वह उन्हें रोग से छुटकारा दिलाता है, कई बार मौत के मुंह से वापिस ले आता है| श्रंखला में एक दृश्य है जहाँ बेहद जटिल परिस्थितियों में नायक डॉक्टर प्रभात (अमोल पराशर) सिजेरियन डिलीवरी कर न केवल प्रसूता स्त्री और उसके नवजात शिशु की जान बचा लेता है बल्कि यह आदर्श भी स्थापित करता है कि अगर डॉक्टर की डिग्री भी दांव पर लगानी पड़ जाए तो भी आपात स्थिति में एक डॉक्टर को उसका कर्तव्य पूरा करना चाहिए|

नवजात शिशु को हाथों में लेने के साथ जिस एहसास से डॉक्टर प्रभात गुजरता है, वह ईश्वर और मनुष्य के बीच माध्यम बनने का ही है| यह चमत्कार ही है कि एक नवजात जीवन प्रत्यक्ष आँखों के सामने आ जाता है| इस अलौकिक आत्मिक संतोष और प्रसन्नता को केवल डॉक्टर्स ही महसूस कर पाते होंगे कि उनके द्वारा एक नया जीवन अस्तित्व में आया है| इस प्रसन्नता के सामने लाखों रुपयों के धन की प्राप्ति भी उन्ती प्रसन्नता नहीं दे पाती होगी|

अमोल पाराशर ने इस दृश्य विशेष को अद्भुत तरीके से प्रस्तुत कियुआ है और इसकी आत्मा इस उच्चता के साथ उजागर की है कि यह इस सीज़न का सर्वोत्तम दृश्य बन गया है|

श्रंखला इस मायने में भी महत्वपूर्ण काम कर रहे एही कि यह घिसे पिटे रास्ते पर नहीं चल रही और डॉक्टर प्रभात और डॉक्टर गार्गी के रूप में ऐसे युवा पुरुष और स्त्री प्रस्तुत कर रही है जो बस युवा होने के नाते, और ग्रामीण परिवेश में बोरियत के कारण ही आसानी से एक दूसरे के प्रेम या आकर्षण में नहीं पड़ जाते | उनमें परस्पर आकर्षण पनपता भी है तो दोनों के स्वभाव, व्यावहारिक समझ, और चरित्र में इतने अंतर हैं कि उनेक बीच पसरा परस्पर आकर्षण बार बार कसौटी पर कसा जाता है और दोनों ही प्रेम और आकर्षण से ज्यादा अपने अपने व्यवसाय के प्रति उत्तरदायी बने रहते हैं| श्रंखला दोनों के चरित्रों को वर्तमान के युवाओं की तुलना में बहुत ज्यादा मजबूती प्रदान कर रही है और यह श्रंखला का एक मजबूत आकर्षण है|

सरकारी तंत्र में कुर्सी का कित्नाम्ह्त्व होता है और इसमें भ्रष्टाचार कैसे घर कर चुका है यह सीएमओ के पीए – बाबू साहेब (दिनेश लाल यादव निरहुआ“) के चरित्र के माध्यम से बखूबी दिखाया गया है| लेकिन बाबू साहेब का चरित्र भी एकरंगी नहीं है| कुर्सी के दंभ के कारण उसका व्यवहार अन्यों से अकड़ वाला है लेकिन मिर्गी के रोग से ग्रसित अपनी साली के विवाह हेतु वह जिस तरह चिंतित और प्रयासरत रहता है वह उसके चरित्र को आकर्षक बनता है और विवाह का मसला लगभग सुलझने के बाद जिस तरह डॉक्टरी सहायता से साली का इलाज हो सकना संभव पाता है तो एक अभिभावक का भावुक रूप भी दिखाता है|

श्रंखला लगभग सभी चरित्रों को बहुरुपिया दिखाती है हैऔर यह विशेषता एक प्राकृतिक रूप श्रंखला को देती है और चरित्र असली लगते हैं, कृत्रिम रूप से गढ़े हुए नहीं| नकली डॉक्टर चेतक (विनय पाठक) भी अपनी बेटी को असली डॉक्टरी की पढ़ाई करवा रहा है और उसके द्वारा शीशा दिखाने पर डॉक्टर प्रभात के विरुद्ध षड्यंत्र कर गाँव वालों को भड़काने की हरकत पर उस समय लगाम लगा लेते है जब वह प्रभात को गंभीर स्थति में पहुँच गयी ग्रामीण स्त्री की सिजेरियन डिलीवरी सफलतापूर्वक कराते देखता है| कहीं उसे एहसास हुआ होगा कि भविष्य में उसकी अपनी बेटी उसके ठगी और झूठ वाले नक़्शे कदम पर नहीं बल्कि डॉक्टर प्रभात के क़दमों का अनुसरण करेगी|

ग्रामीण क्षेत्रों में योग्य एमबीबीएस डॉक्टर्स की भयंकर कमी है ऐसे में एक एम.डी. डॉक्टर का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात होकर गाँव वालों के इलाज के लिए दिन रात एक कर देना , विचार रूप में ही इतना स्वप्निल सा है कि इससे जुड़े रोमेंटिसिज्म से ही रोमांच हो आता है और इस क्षेत्र में भारत जैसे विकासशील देश में इतना काम होना बाकी है कि इतने रोचक किस्से इस श्रंखला के भाग बन सकते हैं कि यह वास्तव में ही मेडिकल क्षेत्र का एक क्रांतिकारी कार्यक्रम बन सकता है|

काश कि टीवीएफ़ के इस कार्यक्रम से प्रेरित हो भारतीय सिनेमा भी इस क्षेत्र की ओर अपनी आँखें खोले और रोचक और प्रेरित करने वाली फ़िल्में बनाए|

अगले सीज़न के प्रति उत्सुकता बरकरार है|

…[राकेश]

ग्राम चिकित्सालय सीजन 1 – ग्राम चिकित्सालय (2025) : अँधेरे में आशा की किरण का उजाला https://cinemanthan.com/2025/06/05/gram-chikitsalay2025/


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