राख को भी कुरेद कर देखो
अभी जलता हो कोई पल शायद

~ गुलजार

दिल्ली के दिल के कुछ घाव ऐसे हैं जिन्होंने नासूर बनकर पूरे देश को प्रभावित किया| गीता और संजय चोपड़ा हत्याकांड और निर्भया कांड भी उनमें से दो ऐसे ही घाव हैं जिन्होंने दिल्ली के वातावरण को बदल कर तो रख ही दिया, पूरे देश में बच्चों की सुरक्षा हेतु लोगों में भय फैला दिया| घर से बाहर आँखों से ओझल हुए बच्चे उनका आसरा देखती आँखों में भय सहित बसने लगे कि जब वे सुरक्षित घर लौट आयेंगे उसके बाद ही चैन पड़ेगा|

जिसने भी जीवन में संजय-गीता चोपड़ा केस के बारे में एक बार भी पढ़ा होगा वह इस भूल न पाया होगा| “राख” नामक वैब सीरीज, संजय-गीता चोपड़ा केस पर आधारित भी है और इससे दूर भी जाती रहती है| संजय-गीता चोपड़ा केस इतना पुराना है कि बहुत से लोगों ने ये नाम बहादुरी के लिए बच्चों को दिए जाने वाले राष्ट्रीय पुरस्कार के माध्यम से ही इन किशोरों के नाम सुने होंगे| यदि दोनों जीवित रहते तो दोनों ही 60 साल से ज्यादा के होते| पुरस्कार के कारण लोग उनके बारे में थोडा सा जान लेते हैं| अगर उस केस पर फ़िल्म या वैब सीरीज बनती है तो दर्शक दोनों किशोरों, उनके माता-पिता और उनके हत्यारों के बारे में जानना चाहेंगे लेकिन “राख” सीरीज, संजय-गीता चोपड़ा पर आधारित साहिल और सुमन के चरित्रों और उनके माता पिता के चरित्रों पर कम और उनके हत्यारों रंग-बिल्ला के चरित्रों पर आधारित रज्जो- बाबू के चरित्रों के इस केस से अलग जीवन पर बहुत ज्यादा केन्द्रित रहती है, और उसमें कई पुलिस वालों के, नर्सों के, अनाथालय के, पत्रकारों आदि के बहुत सारे चरित्र एक खिचडी सी बना देते हैं और मूल केस पीछे छूट जाता है| निर्माता-निर्देशक और लेखक के टीम ने मूल केस से बहुत ज्यादा छूट ले ली है और उन्होंने केवल संजय-गीता चोपड़ा का केस बस ऊपरी तौर पर अपनाया है| इसमें उन्होंने जातिवाद, सम्प्रदायवाद के तत्व शामिल कर लिए हैं| संजय-गीता चोपड़ा केस में अपराधियों और पुलिस के बीच की आँख मिचौली इसमें कमजोर पड़ती है भले इसमें सब-इन्स्पेक्टर जयप्रकाश जाटव को खूब भाग दौड़ करते दिखाया हो|

राख की यह खूबी कही जा सकती हैं कि इसे देखते हुए बोरियत नहीं होती और यही संभावना रहती है कि यह मूल केस पर कुछ जबरदस्त प्रकाश डालेगी लेकिन इसके समाप्त होने के बाद ऐसा महसूस नहीं होता कि एक बेहद प्रसिद्द या कुख्यात केस के बारे में कुछ बेहतरीन देखा है| ऐसा इसलिए है कि यह मूल विषय से दस तरह की अलग अलग दिशाओं में भटकती रहती है|

निर्भया केस पर दिल्ली क्राइम वैब सीरीज का एक भाग आधारित था और उन्होंने भी सिनेमाई छूट ली लेकिन उसमें हत्यारों को पकड़ने के लिए पुलिस का कठोर परिश्रम दर्शक को तनाव में रखता था| वहां सीरीज़ मूल विषय से बहुत दूर कभी नहीं भटकती| राख के बारे में ऐसा कहना मुश्किल है|

इसमें बाबू के जीवन में इतना ज्यादा भटकाव रहा कि एक बार को लगा कि सीरीज़ शायद उसके बारे में है कि वह कैसे अपराधी बना?

कभी यह सब इन्स्पेक्टर जयप्रकाश जाटव के जीवन में हद से ज्यादा छानबीन करने लगती है| वास्तव में जयप्रकाश के चरित्र को ढंग से विकसित ही नहीं किया गया| कभी वह इस भाव में जीता है कि मानो वह किसी हीन भावना से ग्रसित है| कभी वह कर्तव्य परायण पुलिस अधिकारी लगता है| अली फज़ल एक शानदार अभिनेता हैं और अगर वह अपने चरित्र के भावों को दर्शक तक शुद्ध रूप में नहीं पहुंचा प् रहे और दर्शक उनके चरित्र को लेकर भ्रमित हो जाते हैं तो यह निर्देशक की गलती है|

अली फज़ल से ज्यादा स्पष्टता से राकेश बेदी जयप्रकाश के अवकाशप्राप्त पुलिसकर्मी पिता की भूमिका निभा अपाये हैं| जो वे कहते हैं, आँखों से बयां करते हैं बल्कि जो सोच भी रहे होंगे, वह उनके हाव भावों से दर्शक तक तैर कर पहुँच जाता है| यह जयप्रकाश और उसकी महिला मित्र या प्रेमिका निसार के साथ नहीं हो पता| दिल्ली पुलिस का सब इन्स्पेक्टर तक का वर्ग 90% से ज्यादा पुलिसकर्मी हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों से भरा रहा है तो जय प्रकाश का व्यवहार अपने आप वैसा ही हो जाएगा जैसा पुलिस के बहुसंख्यक वर्ग का रहेगा| परन्तु जयप्रकाश कई बार लखनऊ की नफीस भाषा बोलने लगता है| कई बार अभिनेता का परिश्रम से भरा प्रयास भी वांछित प्रभाव नहीं ला पाता| जयप्रकाश की भूमिका में अली फज़ल के साथ वही हुआ है| उनके चरित्र चित्रण में थोड़ी कसावट और स्पष्टता की आवश्यकता थी|

बाबू (आकाश मखीजा) और रज्जो (रमनदीप यादव) के चरित्रों पर सीरीज ज्यादा ध्यान केन्द्रित करती है और उनके मनोविज्ञान को ज्यादा स्पष्टता से खंगालती है| अगर उनके जीवनों के भटकाव को सीमित रखा जाता और इसी केस पर केन्द्रित किया जाता तो उनका प्रभाव ज्यादा गहरा होता|

सीरीज देखने में सबसे बड़ी बाधा है बार बार टाइम लाइन का बदला जाना, इससे दर्शक को दिखाई जा रही सामग्री समझने में समस्या होती है| हाल का समय, आज का दिन, और भूतकाल के बीच अगर कोई सीरीज बार बार घालमेल करेगी तो दर्शकों के लिए उसे देखना जटिल हो जायेगा|

सोनाली बेंद्रे ने शायद बहुत समय बाद किसी फिल्म में काम किया है| सीरीज में उनकी उपस्थिति शुरू में थोडा फ़िल्मी असर वाली लगती है| जिस बैक ग्राउंड के उनके पति और बच्चे लगते हैं उन तीनों के बीच वे ग्लैमर समाहित करती हैं| उनके लिए मध्यवर्गीय सादापन और घरेलू टच लाना शायद मुश्किल रहा हो| सीरीज देखते हुए और देखने के बाद सोनाली बेंद्रे का एक दृश्य ऐसा है जो गहरा लगता है और याद रह जाता है| बारिश में सड़क पर चलते हुए जब एक कार उनके पास रुकती है तो उनके मन में अपने बच्चों के साथ हुए हादसे की याद इतनी तीव्रता से आघात करती है कि वे सड़क पर पड़ा पत्थर उठाकर कार की विंडस्क्रीन पर मार देती हैं| यह पूरा सीक्वेंस अच्छे तरीके से फिलमाया गया है| हालांकि सारी सीरीज के बारे में यही बात पूर्ण विश्वास से नहीं कही जा सकती|

सिनेमेटोग्राफी, आर्ट डिजायन, आदि तकनीकी क्षेत्र बहुत अच्छे हैं लेकिन सीरीज घटनाओं के फैलाव के मामले में फिसल जाती है और जो कहानी इससे आधे से भी कम समय में कसावट लेकर एक बहुत ज्यादा प्रभावशाली सीरीज बन सकती थी वह इतनी बिखर जाती है कि एक निश्चित आकार नहीं ले पाती| और अधिकतर दर्शकों को यही लगेगा कि इतना समय क्यों देना पड़ा उन्हें इसे देखने के लिए|

…[राकेश]


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