ब्रिटिश राज से भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त करके भारत में लोकतंत्र की स्थापना की और भारत का संविधान बनाया तो सब कुछ आदर्शवादी तासीर वाला रहा होगा| पर शनैः शनैः लोकतंत्र की मूल भावना से खिलवाड किया जाता रहा और जनप्रतिनिधि जन सेवक न बनकर जनता के राजा बनने लगे और जनता के अधिकार सीमित होते गये|

विष्णु प्रभाकर ने आदर्शवाद और कुटिल राजनीति के यथार्थवाद की टक्कर एक ही घर के सदस्यों के आपसी वैचारिक टकराव के माध्यम से दर्शाई है इस एकांकी – सीमा रेखा में| हो सकता है जब यह लिखा गया होगा तब इसे समय से आगे का, या प्रभाकर जी की अति संवेदनशील कल्पना की उपज माना गया होगा पर भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान में हालात देखकर यह एकांकी सार्थक, संगत और महत्वपूर्ण बन गया है|


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