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Cinema, Theatre, Music & Literature

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Legends

डॉ. अब्दुल कलाम : बेशकीमती सलाह

प्रिय भारतवासियों, आपसे दो शब्द कहने हैं! हमारे यहाँ मीडिया इतना ऋणात्मक क्यों है? भारत में हम लोग क्यों इतना अटपटा महसूस करते हैं अपनी क्षमताओं और उपलब्धियों को पहचानने में? हम एक महान देश हैं| हमारे पास अद्भुत सफलता की... Continue Reading →

‘श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते’ : ‘दिनकर जोशी’ की कालजयी कृति

गुजराती साहित्यकार दिनकर जोशी जी ने अपने अदभुत उपन्यास “श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते” में कृष्ण के न रहने से उपजी एक पर्वत सी ऊँची पीड़ा को दर्शाने का कठिन काम साधा है। कृष्ण के देहत्याग के बाद पीछे छूट... Continue Reading →

Madhumati(1958): दिलीप कुमार की पतलून की खुली हुयी ज़िपर, शरारत या लापरवाही?

शाहरुख खान के एक विडियो साक्षात्कार/कांफ्रेंस से एक निकाला गया रील नुमा विडियो सोशल मीडिया पर अक्सर ही छाया रहता है जहाँ वे कहते पाए जाते हैं कि उन्होंने अमिताभ बच्चन से पूछा कि सर, स्टेज पर जाने से पहले... Continue Reading →

अमृता शेरगिल : केदारनाथ अग्रवाल

मात्र 28 साल जीवित रहीं विश्वव्यापी ख्याति प्राप्त करने वाली अमृता शेरगिल ने सेल्फ-पोर्टेट भी खूब बनाए और अपने न्यूड सेल्फ पोर्ट्रेट भी बनाए| उनके ऐसे कैमरे से खींचे गए चित्र भी थे| उनकी मृत्यु के 19 साल बाद उनकी... Continue Reading →

शाकाहार या मांसाहार : मनुष्य के लिए क्या श्रेष्ठ (ओशो)

आदमी को, स्वाभाविक रूप से, एक शाकाहारी होना चाहिए, क्योंकि पूरा शरीर शाकाहारी भोजन के लिए बना है। वैज्ञानिक इस तथ्य को मानते हैं कि मानव शरीर का संपूर्ण ढांचा दिखाता है कि आदमी गैर-शाकाहारी नहीं होना चाहिए। आदमी बंदरों... Continue Reading →

अहिंसा, मांसाहार, महावीर : ओशो  

प्रश्न: आपने कहा कि बाह्य आचरण से सब हिंसक हैं। आपने कहा कि बुद्ध और महावीर अहिंसक थे। बुद्ध तो मांस खाते थे, वे अहिंसक कैसे थे? ओशो– मेरा मानना है कि आचरण से अहिंसा उपलब्ध नहीं होती। मैंने यह... Continue Reading →

Chintu Ji (2009): निर्देशक रंजीत कपूर से बातचीत (1)

थियेटर और हिंदी सिनेमा जगत के प्रसिद्द लेखक एवं निर्देशक रंजीत कपूर कुछ अरसा पहले दिल्ली आये थे तो उनसे लम्बी बातचीत हुयी, जिसमें उनकी एक फ़िल्म निर्देशक के तौर पर पहली फ़ीचर फ़िल्म - चिंटू जी, पर भी बात... Continue Reading →

दादा साहब फाल्के : लाइट्स…कैमरा…एक्शन!

साभार : Pratham Books Author: Rupali Bhave; Illustrator : Sunayana Nair Kanjilal; Translator: Deepa Tripathi

Call of The Valley (1967) : एक चरवाहे की दैनन्दिनी

© ...[राकेश]

राज कपूर : श्रेष्ठ फ़िल्मी गीतों के निर्देशक

राज कपूर की फिल्मों के गीत विशाल जनसमूह के ह्रदय को छूने वाले गीत रहे हैं| महासागर जैसे उनके संगीत संसार से 2-3 झलकियाँ भी देख ली जाएँ तो उनकी फिल्मों के संगीत संसार से परिचित होने के लिए वे ही... Continue Reading →

रेजांग ला की लड़ाई (18 नवंबर 1962) = हक़ीक़त (1964)

परसेप्शन बहुत बड़ी बात है| 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो भारत उसका सैन्य मुकाबला करने के लिए उसके स्तर पर तैयार नहीं था| अंग्रेजों द्वारा कंगाली की कगार पर छोड़ दिया गया देश विकास के मार्ग... Continue Reading →

Mother Teresa : ओशो विश्लेषण

राजनेता और पादरी हमेशा से मनुष्यों को बांटने की साजिश करते आए हैं| राजनेता बाह्य जगत पर राज जमाने की कोशिश करता है और पादरी मनुष्य के अंदुरनी जगत पर|   इन दोनों ने मानवता के खिलाफ गहरी साजिशें मिलकर... Continue Reading →

… मेरा नाम!

फ़िल्मी दुनिया में व्यवसायिक रूप से अपना असली नाम न रखकर, कोई अन्य नाम रखने की प्रथा पुरानी है| कई बार लोगों ने अपने कठिन लगते नामों को सरल रुप देने वाले नाम रख लिए, कभी उनके नाम वाला ही... Continue Reading →

अमृता प्रीतम : मेरे घर का सीधा सा इतना पता है!

आज मैंने अपने घर का नम्बर हटाया हैऔर गली के माथे पर लगागली का नाम हटाया हैऔर हर सड़क कीदिशा का नाम पोंछ दिया हैपर अगर आपको मुझे जरुर पाना हैतो हर देश केहर शहर कीहर गली काद्वार खटखटाओयह एक... Continue Reading →

Socialism, Communism – Osho

समाजवाद और साम्यवाद : वही फर्क करता हूं मैं जो टी.बी. की पहली स्टेज में और तीसरी स्टेज में होता है, और कोई फर्क नहीं करता हूं। समाजवाद थोड़ा सा फीका साम्यवाद है, वह पहली स्टेज है बीमारी की। और पहली स्टेज पर बीमारी... Continue Reading →

पंडित नेहरु और हिंदी फ़िल्में

पचास और साठ के दशक का हिंदी सिनेमा भी नेहरु के विशाल व्यक्तित्व के प्रभाव से अछूता नहीं रहा और हिंदी फिल्मों के नायकों का चरित्र भारत को लेकर नेहरुवियन दृष्टिकोण से प्रभावित रहा और उसमें चारित्रिक आदर्श की मात्रा डाली जाती... Continue Reading →

पंडित नेहरु : श्रद्धांजलि (अटल बिहारी वाजपेयी)

29 मई 1964, राज्यसभा एक सपना था जो अधूरा रह गया। एक गीत था जो गूँगा हो गया। एक लौ थी, जो अनन्त में विलीन हो गयी। सपना था, एक ऐसे संसार का, जो भय और भूख से रहित होगा।... Continue Reading →

पंडित नेहरु और ओशो

ओशो बुनियादी तौर पर ही राजनीतिज्ञों के खिलाफ थे और सारी उम्र वे उनके खिलाफ बोलते ही रहे। उन्हें निशाना बनाते रहे। उनके ऊपर चुटकले बनाकर लोगों को शासकों की इस जाति के सामने मानव को आँखें मूँद कर समर्पण न... Continue Reading →

विफलता : क़ैदी – जयप्रकाश नारायण

ओशो द्वारा लिखा 54 साल पुराना पत्र

प्रिय, मौन आशीर्वाद है, लेकिन यह मौन तुम्हारे द्वारा रचा नहीं जा सकता| क्योंकि तुम तो स्वयं में शोर ही हो| इसलिए तुम कैसे मौन रच सकते हो? लेकिन तुम मौन का भ्रम अवश्य ही रच सकते हो| और मौन... Continue Reading →

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